कवि सम्मेलन आ स्व॰ गणेशदत्त ‘किरण’

(स्मरण – आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’) (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 9वी प्रस्तुति) – रामजी पाण्डेय ‘अकेला’ ‘किरण’ जी का बारे में, हमार छोटकी चाची जे बसाँव के स्व॰ बृजा ओझा के बेटी हई, बतवली कि – ‘बैरी के ‘गनेशदत्त तिवारी’ भोजपुरी में बड़ा निमन कविता लिखेले आ बड़ा जोश में गावेले’. read more »

बतकुच्चन – ४३

शब्द का बहाने बतकुच्चन होला. आ शब्द एगो भा अधिका ध्वनियन के अइसन समूह ह जवना के कवनो मतलब निकलत होखो. मतलब नइखे निकलत त ऊ शब्द कहाइये ना सके. जइसे कि गिलगिलइला के शब्द ना कहल जा सके. अलग बाति बा कि एह काम के बतावे खातिर गिलिगिलाइल भा गिलिगिलाहट के शब्द जरूर मानल read more »

करप्शन के हाल्ला काहे

– जयंती पांडेय आज करप्शन के नांव पर बड़ा हल्ला बा. ई हल्ला उहे लोग हो-हल्ला मचा रहल बा, जेकरा करप्ट होखे के मौका ना मिलल. जसहीं मौका मिली, ऊ आपन ओठ सी लिहें. ई रीति जमाना से स चलि आ रहल बिया. लोग भ्रष्टाचार के विरोध करत समय ई ताक में लागल रहे ला read more »

केसर के गंध लेके पुरवा चलल रहे

(स्मरण – आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’) (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 8वी प्रस्तुति) – प्रभाष कुमार चतुर्वेदी (आखिरी पाँच बरिस) कविता केसर का गंध जइसन मादक आ पागल बनावे वाली होले. कवि के रचना पर कवि अपना आ पाठक लोग साथे सुनवइयो लोग के पागल बना देला – केसर के गंध लेके read more »

भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता खातिर सांसदन से गोहार

प्रोफेसर रविकांत दूबे के अध्यक्षता वाला बिहार भोजपुरी अकादमी का ओर से लोकसभा के करीब एक सौ सांसदन के चिट्ठी भेज के गोहार लगावल गइल बा कि भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करावे खातिर ऊ लोग संसद में आक्रामक बाकिर सशक्त आ सृजनात्मक तरीका से आवाज उठावे. जवना सांसदन के ई चिट्ठी read more »

बावन गो बौना पर, एक किरन-बावनी

(इयाद) (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 7वी प्रस्तुति) – आचार्य गणेश दत्त ‘किरण’ जन्म: मई 1933 मृत्यु : सितंबर 2011 गहिर संवेदना, इतिहास-बोध, पौराणिक लोक-परम्परा के समझ आ कल्पना-प्रवणता वाला आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’ भेजपुरी भाषा के प्रतिभाशाली आ समर्पित कवि-रचनाकार रहलन. भोजपुरी के भूषण नॉँव से चर्चित, ‘बावनी’ (1966) के कवि read more »

नया जमाना

(थाती) (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 6वी प्रस्तुति) जन्म: 1906 मृत्यु: 21 जुलाई 1971 पेशा से चिकित्सक, बांसडीह, बलिया निवासी ‘सुमित्र’ जी के एगो प्रौढ़ काव्य-संग्रह भोजपुरी ‘गाँव गिरान’ 1956 में प्रकाशित भइल रहे. राष्ट्रभाषा परिषद् पटना से प्रकाशित “भोजपुरी के कवि और काव्य” में. उनकर नाँव, परिचय आ एगो कविता read more »

चिहुँकला के जरुरत नइखे

अँजोरिया के ई रूप जानबूझ के कइल गइल बा कि पहिला पन्ना जल्दी खुल जाव आ ओकरा बाद जब रउरा कवनो सामग्री के विस्तार पढ़े के चाहीं तबहिये विज्ञापन वगैरह सामग्री सामने आवे. ई सुधार कइसन लागल कमेंट लिखल मत भूलाईं. जानल चाहत बानी कि रउरा सभ के का राय बा ?

गज़ल

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 5वी प्रस्तुति ) – ‍शशि प्रेमदेव गाँधी जी के बानर, बनि गइले पर नीक कहाइबि हम। साँच बात कहि के ए दादा, माथा ना फोरवाइबि हम। मन के कहना मान लेबि तऽ कबहूँ ना पछताइबि हम। बेसी चतुर बनबि तऽ बीच बजरिया फेनु ठगाइबि हम। हीरा read more »

प्रान बसे ससुररिया रे !

पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 4थी प्रस्तुति – ‍हीरालाल ‘हीरा’ अकसर एके संगे खइले सँगे मदरसा पढ़हू गइले एक्के अँगना खेलत-कूदत दिन-दिन बढ़ल उमिरिया रे। दू भई का नेह क चरचा सगरो गाँव नगरिया रे । भव भरल भटकाव न कवनो निश्छल हिया, दुराव न कवनो घरनी अवते एह लोगन के read more »

पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 3

सामयिकी आधी आबादी के बदलत चेहरा – ‍आस्था जिनिगी में, हार, असफलता आ पीछे छूटि गइल आम बात हऽ. सपना पूरा ना भइल त एकर मतलब ई ना हऽ कि सपना देखले छोड़ दिहल जाव. उमेद मुए के ना चाहीं. उमीद आ सपना जिया के राखल आ ओके पूरा करे खातिर, लगातार कोशिश कइल ‘खास’ read more »

पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 2

दखल नया बदलाव क इतिहास रचे वाला साल के विदाई ! – ‍प्रगत द्विवेदी नया साल के खुशमिजाज सलाम का साथे, बीतल बरिस के खटमिठ अनुभवन क इयाद आइल. नवका सत्र के, नया ‘सनेस‘ में हमके इहे बुझाइल कि हमहन के देश तमाम तरह के संकटन से उबरत, ‘भ्रष्टाचार‘ से जूझत, आर्थिक मन्दी से लड़त, read more »

रघुवीर शरण श्रीवास्तव के सुर संग्राम २ के विजेता बनवलसि महुआ

पिछला दिने बिना कवनो पूर्व सूचना के भा तामझाम के महुआ टीवी का नोएडा आफिस में गवनई के रियलिटी शो “सुर संग्राम सीजन – 2″ के विजेता के फैसला कर लिहल गइल. एह बात के जानकारी महुआ टीवी के पीआरओ प्रशान्त निशान्त से मिलल बा. कवना आधार पर एकर फैसला लिहल गइल ओकरा बारे में read more »

पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से -1

(हमार पन्ना) [एक] ‘भ्रष्टाचार’ पर राजनीति आ लोकतंत्र के ‘लोकपाल’ सर्वव्यापी राजनीति के पहुँच आ पइसार हर जगह बा त हमनी के जीवन क जरूरी हिस्सा बनल भ्रष्टाचार भला काहें अछूता रही? राजनीति में भ्रष्टाचार आ भ्रष्टाचार पर राजनीति अब ओह निर्णयक मोड़ पर पहुँच गइल बा, जहाँ तय कइल कठिन बा कि भ्रष्टाचार रही read more »

मोबाइल प्रतिनिधि चाहीं

अँजोरिया परिवार के वेबसाइट “टटका खबर” खातिर छपरा, सिवान, गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी, आरा, सासाराम, बक्सर, भभुआ, गोरखपुर, देवरिया, मैरवा, मऊ, गाजीपुर, बनारस, जौनपुर, बलिया वगैरह भोजपुरी इलाका में मोबाइल संवाददाता के जरूरत बा जे अपना मोबाइल से एस एम एस करिके, अपना इलाका के खबर भेज सकसु. हर प्रकाशित खबर का साथ संवाददाता का रूप read more »

बतकुच्चन – ४२

महुआ बीनत लछमिनिया के देखनी, हर जोतत महिपाल, टिकठी चढ़ल अमर के देखनी, सबले नीमन ठठपाल ! नाम कई बेर सार्थक ना हो पावे आ नामित आदमी भा संस्था भा चीझु नाम का हिसाब से ना चलि पावे. बाकिर एकर मतलब इहो ना होला कि नाम हमेशा गलते होखेला. कई बेर नाम पूरा सार्थक हो read more »

चार गो भतार ले के लड़े ‘सतभतरी’

– अशोक मिश्र काल्हु भिनुसहरे मुसद्दीलाल गली में खुलल पंसारी के दुकान का सोझा भेंटा गइलन. जाड़ो में ऊ पसीना-पसीना होखत रहले, उनुकर हालत देखि के हमरा ताज्जुब भइल. हम पूछनी, ‘अमां मियां! कवनो मैराथन दौड़ में शामिल हो के आवत बाड़ऽ का ? एह उमिर में एतना भागदौड़ नीमन ना होखे.’ हमार बाति सुनि read more »

बदलाव के कारगर हथियार बन गइल सोशल मीडिया

– उमेश चतुर्वेदी सोशल नेटवर्किंग साइटन पर नकेल कसे का तइयारी में जुटल सरकार शायद एहमें कामयाब होइयो जाव लेकिन हमनी के ई ना भुलाये के चाहीं कि सरकार एह पर काहे नकेल कसल चाहत बिया. दरअसल अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के जतना तेजी से सोशल नेटवर्किंग साइट वर्चुअल स्पेस में बढ़ावा दिहले read more »

लस्टमानंद के चुनावी रणनीति

– जयंती पांडेय बाबा लस्टमानंद अबकी चुनाव में खड़ा होखे के फैसला कऽ लेहले बाड़े आ ओकरा खातिर रणनीति बनावे में जुटल बाड़े. अब उनका खेलाफ बड़का दल के बड़ बड़ नेता खड़ा बा लोग आ ओकरा पर से अण्णा बाबा के चर लोग चारू इयोर घूम घूम के तरह तरह के बात करऽ ता read more »

लोक कवि अब गाते नहीं – १६

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) पन्दरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे गणेश तिवारी झूठ के साँच आ साँच के झूठ बनावे का तिकड़म में लागल रहेले. अबकी उनुका तिकड़म के माध्यम बनल बा पोलादन जे आपन जमीन गणेश तिवारी के एगो पटीदार के बेचले रहुवे आ अब read more »

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