लस्टम पस्टम

बड़ा कठिन बा जमाना के संगे चलल

September 7, 2010
बड़ा कठिन बा जमाना के संगे चलल

– जयंती पांडेय बाबा लस्टमा नंद के दुअरा पर सबेरहीं पहुंचले रामचेला. बाबा मालगोरू के नादे पर बान्ह के जब फुरसताह भइले तऽ रामचेला के लगे आ के बइठले. रामचेला पूछले कि बाबा हो! ई जमाना के साथ कइसे चलल जाउ. लोगवा कहऽ ता कि जमाना के साथ चलऽ. आखिर कइसे चलीं जमाना के...
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शिक्षा के गारंटी-जय हो! जय हो!!

September 5, 2010
शिक्षा के गारंटी-जय हो! जय हो!!

– जयंती पांडेय रामनिहोरा. ऊ गांव -जवार के बड़ा पुरान नेता हवें. कौ हाली तऽ परधानी जीत भइल बाड़े. एक दिन भिनसहरे बाबा लस्टमानंद के दुअरा पर अइले. बाबा बैलन के सानी पानी दे के गोबर- गोथार करत रहले. नेताजी दूरे से पुकरले, का हो, का करऽ तारऽ ? बस दू गो माल बाड़े...
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स्वागत करीं महंगी के

August 13, 2010

– ज्योति पाण्डेय महंगी के बढ़े में सरकार के कवनो दोष नइखे. महंगी के काम ह बढ़ल. अगर ऊ ना बढ़ी त केहु ओकरा ना चीन्ही, ना पूछी. सोसाइटी में रहे वाला हर बेकती आपन एगो पहचान राखेला. महंगी भी इहे रास्ता पर चलेले. महंगी लोगन के अभाव में जीये के आ रहे के...
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शिक्षा के गारंटी जय हो! जय हो!!

May 30, 2010

राम निहोरा अपना गाँव जवार के बड़ा पुरान नेता हउवें. कौ हाली त परधानी जीत गइल बाड़े. एक दिन भिनसहरे बाबा लस्टमानंद का दुअरा पर अइले. बाबा तब बैलन के सानीपानी दे के गोबर गोथार करत रहले. नेताजी दूरे से पुकरले, का हो, का करऽतारऽ? बाबा जबाब दिहलें, बस दू गो माल बाड़े सन...
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दिल्ली के मेट्रो

May 2, 2010

– जयन्ती पाण्डेय पिछला दिने लस्टमानन्द दिल्ली गइल रहलन. का कहीं का नजारा रहे. जब से दिल्ली में मेट्रो रेलगाड़ी चले लागल तबसे ओहिजा का लोगन का जिनिगी में बहार आ गइल बा. कालेज जाये वाली बबुनी के रोमांस करे के एगो नया जगहा भेंटा गइल बा. अब जब बबुनी के मोबाइल टुनटुनाता त...
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पत्थर के देश में पत्थर के लोग

April 20, 2010

– जयन्ती पाण्डे रउआ कहीं चल जाईं, भारत के कवनो कोना में. सब जगहा रउआ पत्थर दिल के लोग भेंटाई. आखिर काहें ना? जेकरा पर जिम्मेदारी बा कि ऊ सबके आदमी बनाई. ओकरो दिमाग में पत्थरे भर गइल बा. हँ, बात मास्टर लोग के कइल जाता. आज के मास्टर लोग गुरुजी ना हऽ, ऊ...
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अमीरी के नया शौक

April 5, 2010

– जयन्ती पाण्डे वइसे त कलकत्ता शहर के बड़ाबाजार के सेठ अमीरचंद का लगे बहुत दौलत रह, करिया आ सफेद दूनो. कारोबारो कई गो रहे. जायज कम आ नाजायज बेसी. धन रहे त नाँवो रहे चारू ओर. समाज में रुतबा रहे. तबो अमरचंद के बुझाव कि कवनो ना कवनो कमी जरूर बा. एही बीच...
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