About

Anjoria.com is the first website in Bhojpuri. When this was started there was no other website or portal in Bhojpuri. Others came late and this includes the most visited of Bhojpuri websites!

Anjoria lost the battle of prominance because of its name. Only those who know about it visited the site. Next weakness of Anjoria is me! I do not belong to any particular lobby, I lack good technical knowledge and marketing skills. I avoid taking stand on any issue especially when it involves friends or Bhojpurias on both sides.

But, despite all my personal weaknesses, Anjoria is the most regularly updated website of Bhojpuri, has a large number of writers whose articles have been published in it. Anjoria has the largest, I think so and may be wrong, segment of Bhojpuri literature, Bhojpuri grammar etc. Anjoria is very proud of Dr.Ashok Dvivedi, Dr.Bhagwati Pd. Dvivedi, Manoj Bhawuk, Alok Puranik, Jayanti Pandey, Vanita Kohli, Sunita Narayan, Krishnanand, Abhay Krishna Tripathi, Prabhakar Pandey, Umesh Chaturvedi, Dr. Kamal Kishore Singh, Nuraiin Ansari, Munir Alam etc whose article are very often published in it.

The basic motto of Anjoria is not merely to talk about Bhojpuri, but to talk about everything in Bhojpuri. And there lies the difference. We believe that Bhojpuri has unlimited potentials.

One Response to “ About ”

  1. munna k pandey on March 27, 2010 at 12:42 pm

    भोजपुरी की पहली फिल्म-गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो

    ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो’को भोजपुरी की पहली फिल्म होने का गौरव प्राप्त हैi इस फिल्म के निर्माता विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी तथा निर्देशक कुंदन कुमार थे.साथ ही,संगीत का जिम्मा चित्रगुप्त का था और फिल्म के गीतों को लता मंगेशकर,सुमन कल्याणपुर,मो.रफ़ी,उषा मंगेशकर ने स्वर दिया था.यह बहुत संभव है कि किसी क्षेत्रीय ज़बान की पहली फिल्म को शायद ही वह सफलता नसीब हुई हो,जो भोजपुरी की;गंगा मईया…’के हिस्से आई.नए-नए आज़ाद देश की तत्कालीन समस्याओं को एक बेहतरीन कथानक तथा उम्दा गीत-संगीत में पिरोकर सेल्युलाईड पर उतारा गया था,यही वज़ह रही कि यह फिल्म भोजपुरी की एक उत्कृष्ट क्लासिक का दर्ज़ा पा सकी.
    दर्शकों के हिस्से दो मापदंड होते हैं,एक कहानी के कारण कोई फिल्म अच्छी लगती है तो दूसरे अपनी कलात्मकता की वज़ह से उनके मन को भाती है.यद्यपि कलात्मकता के मूल में भी कहानी ही होती है.सारा क्रिया-व्यापार कहानी-कलात्मकता-सम्प्रेषण के सामंजस्य की मांग करता है.इसी का मेल फिल्म को जीवंत और उत्तम बनता है.’गंगा मईया…’की शुरुआत ही जमींदार (तिवारी)द्वारा एक किसान की बटाई ज़मीन वापस ले लिए जाने से होती है-’सरकार त अइसन कानून बनवले ह कि जेकर जोत रही खेत ओकर हो जाई’-यह फिल्म आज़ादी के बाद के नेहरूवियन समाजवाद का माडल तथा तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक दर्शन की झांकी लिए है.फिल्म का नायक(असीम कुमार)एक शिक्षित आदर्शवादी युवक की भूमिका में है,जो अपने ज़मींदार पिता के उलट समता की बात करता है.वह शहर में ऊँचे दर्जे तक पढने के बावजूद गाँव में ही रहकर खेती करना चाहता है क्योंकि उसका मानना है कि पढ़े-लिखे लोग अधिक वैज्ञानिक ढंग से खेती कर सकते हैं,पर उसके पिता का कहना है कि-’कागज़ पर हल ना चलेला’-नायिका (कुमकुम)को इस बात का मलाल है कि वह अनपढ़ है,वरना अपनी प्रेमपाती खुद ही लिखती.नए रंग-ढंग और पुराने कुरीतियों के बीच की बहस को इस फिल्म में इतनी सावधानी से पिरोया गया है कि वह कहीं से भी ठूंसी नहीं लगती.
    ‘गंगा मईया…’की मूल कथा के बीच प्रकरी की तरह एक दृश्य है-गाँव के स्कूल के लिए चंदा इकठ्ठा करने को बैठी पंचायत का क्योकि स्कूल में बच्चों की संख्या में इजाफा हो गया है और मूलभूत सुविधाएं उस अनुपात में नहीं हैं.यह अकेला दृश्य काफी देर तक हमारे दिलो-दिमाग पर छाया रहता है.एक ग्रामीण का तर्क है कि लड़कियों का नाम स्कूल से हटा दिया जाये क्योंकि ‘लड़की सभे के पढ़े-लिखे के का जरुरत बा?-नायिका का पिता(नजीर हुसैन)खुद ही अनपढ़ होने का दंश झेल रहा है,वह विरोध जताते हुए कहता है कि मर्दों के काम के लिए बाहर चले जाने पर-’हमनी यहाँ के औरत चिट्ठी-पत्री तार अईला पर तीन किलोमीटर टेशन जाली पढ़वावे बड़े.लड़की कुल पढिहें त इ नौबत काहे आई?-यह ग्रामीण समाज भी अभावों को झेलने को अभिशप्त है.अतः एक प्रश्न और उठता है कि स्कूल आदि की सुविधाओं को देखने का काम तो सरकार का है,तब पंचों का जवाब है-’सरकार स्कूल के रूपया-पईसा देले पर उ पूरा ना पड़ेला,फेर सात लाख गाँव बा इ देश में तब सरकार एतना जल्दी कईसे सब कोई तक पहुंची?तब हमनी के ऐ तरफ से भी सोचे के बा.-यानी नए स्वाधीन देश में सहकारिता और सामूहिक प्रयास से उन्नति का प्रयास.नेहरु के सन्देश की पैरवी.
    असीम कुमार अपने पिता की दहेज़ के लालच को धिक्कारता है-’आज हमार एगो बहिन रहित त एतना दहेज़ के बात पर रउआ पर का बितीत’-'ऐ देश में हमार अईसन केतना भाई बहिन बाड़े जे तिलक-दहेज़ के समस्यासे त्रस्त बाड़े’-यहाँ पर नायक का चरित्र एक प्रगतिशील आदर्शवादी युवक के तौर पर उभरता है परन्तु इतने ऊँचे मूल्यों की बात करने वाले नायक की तमाम आदर्शवादिता पंचों के आगे यह हिम्मत नहीं कर पाती कि वह नायिका से अपने रिश्तों को स्वीकार सके और गरीबी तथा क़र्ज़ के बोझ तले दबा लड़की का पिता अपनी जवान बिटिया की शादी उसके उम्र से दोगुने उम्र के पुरुष से करने को मजबूर होता है.बेमेल विवाह के परिणामतः नायिका असमय विधवा हो जाती है.नायिका की माँ(लीला मिश्र)इसी दुःख से चल बसती है.’गंगा मईया…’बरबस ही प्रेमचंद के ‘गोदान’की याद दिलाता है ना केवल कथानक के प्रवाह में बल्कि दृश्यों तक में.नज़र हुसैन अँधेरी कोठरी में बैठा है और गाँव की महिलाएं सनझा रोशन कर रही हैं और नजीर के घर कोई औरत नहीं जो सांझ का दिया जलाये,बिन घरनी घर भूत का डेरा स्वतः ही सामने आ जाता है.मरद का साठे पे पाठा होना हो अथवा ज़मींदार,महाजन,क़र्ज़.किसान,जाति-भेद,बेमेल विवाह की समस्या जितनी गोदान के लिखते वक्त थीं उससे रत्ती भर भी कम नए आज़ाद भारत में नहीं था.आदर्श और यथार्थ का गहरे तक गूंथा हुआ कथानक फिल्म को ऊँचा उठा देता है.
    यह फिल्म ढहते हुए सामन्तवाद का भी चेहरा सामने लाती है.नजीर हुसैन ताड़ीखाने में ताड़ी पी रहा है,यह ऐसी जगह है जहां जात नहीं पैसा अहमियत रखता है.वह ताड़ी के प्याले में ऊँगली डालकर कहता है-’ताड़ी के लबनी केतना गहिर बा?हमार खेतवा,बरिया,घरवा सब एही में डूब गईल…पईसा ही सबसे बड़का बाबु साहेब ह’-इधर अपनी किस्मत की मारी नायिका तवायफ के कोठे पर जा पहुँचती है और उधर अपनी खुद्दारी पर पिता द्वारा हमला होते देख नायक भी अवसाद में घर छोड़ देता है.तवायफ के हिस्से दो बेहतरीन संवाद हैं-’वेश्या के जनम देला तहरा नियन बाप,भाई और समाज-’और -’मरद के बड़ से बड़ गलती इ दुनिया माफ़ कर देला लेकिन औरत के एक गलती भी ना’-
    ‘गंगा मईया..’के गीत भी उत्कृष्ट भोजपुरी कविताई का नमूना है.’हे गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो,सईयाँ से कर द मिलनवा,हम त खेलत रहनी अम्मा जी के गोदिया,काहे बंसुरिया बजावल s ,मारे करेजवा में पीर,लुक-छिप बदरा में चमके जैसे चंदा,मोरा मुख दमके ‘-आदि गीत आज भी झूमने को मजबूर कर देते हैं.
    वर्तमान की भोजपुरी फिल्में भाषा की काकटेल दे रही हैं,उसके उलट ‘गंगा मईया…’की भाषा ठेठ भोजपुरी की होने के बावजूद चरित्र प्रधान है और फिल्म देखते हुए एकाएक लगता है गोया अपने ही गाँव की कहानी देख रहे हैं.बाज़ार का दबाव हमेशा से रहा है और रहेगा पर तब के लोग जो फिल्में बनाते थे,उसके जीवन-मूल्यों की महता को बरक़रार रखते थे.वर्तमान की भोजपुरी फिल्मों से वह अपनापन गायब होता जा रहा है और क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों के पतन का एक बड़ा कारण उनका अपने परिवेश-बोध से दूर होते जाना रहा है.सिनेमा की रचना-प्रक्रिया एक डिसिप्लिन की मांग करती है,जिसमें कहानी कहने का प्रयास भर ना हो बल्कि उस कहानी को उत्कृष्ट गीत-संगीत,अभिनय,सम्पादन,सिनेमेटोग्राफी तथा कुशल निर्देशन से उस कहानी को उसकी तात्कालिकता तथा परिवेश के साथ मिलाकर रचनात्मकता के साथ सामने लाना है.एक उम्दा फिल्म हवा-हवाई या रातों-रात तैयार नहीं होती.’गंगा मईया तोहे…’एक ऐसी ही फिल्म है जो तमाम विसंगतियों को साथ लेकर एक सुखान्त प्रेमकथा की भाव -भूमि रचती है और इसी नींव पर आज के भोजपुरी फिल्म जगत की ईमारत कड़ी है,अच्छी या बुरी यह तो समय तय करेगा पर इतना तो है कि’गंगा मईया…’जैसी फिल्म से किसी भाषा की फिल्मों की शुरुआत होना,क्रिकेट के खेल में पारी की पहली ही गेंद पर छक्का लगाने जैसा है,पर एक बात है ध्यान देने की है कि ‘गंगा मईया…’की ईमानदारी आज की भोजपुरी फिल्मों से गायब हो

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