कब आइल, कब लवटल : रितु बसन्त मनमउजी

(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के नवीनतम अंक (107-108)) आ गइल बा. एही अंक से संपादक के पन्ना वाला लेख एहिजा दीहल जा रहल बा. पूरा पाती पत्रिका हमेशा का तरह अंजोरिया पर उपलब्ध बा. पढ़ीं आ पढाईं. पाती के बहुते अंक रउरा अंजोरिया पर मिल जाई. – संपादक)

(हमार पन्ना)

कब आइल, कब लवटल : रितु बसन्त मनमउजी

– डॉ अशोक द्विवेदी

‘‘कम्प्यूटरीकरन’’ का हाइटेक जमाना में जब गाहे-बेगाहे ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के चरचा चलत रहत बा — जब पुरनका निर्धारित मास के सुभाविक खासियत दू-तीन महीना बाद लउकत बा, अइसनका स्थिति में, माडर्न बनल मन के अचके खेयाल परो कि ‘‘अरे, एबेरी त मौसम मुताबिक जाड़े ना परल! रजाई आ गरमावे वाला कूल्हि कपड़ा धइल रह गइल !’’ सँचहूँ जब जाड़ खतम बुझाए लागल, तले कहीं बर्फबारी शुरु हो गइल । कहीं बे बोलवले आन्ही-पानी आ गइल। अब एही आहु-जाहु में कब दूनी बसन्त आइल, कब लवटि गइल ,रोज-रोज का अहजह में पते ना चलल ! का करसु बसन्त? कहांँ कहाँ सूतल,भरमल आ अझुराइल लोगन के जगावस आ बाएन बाँटस ! ऊ आपन रस्ता धइले अइले आ चलि गइले! जेकरा गरज बा, ऊ चीन्ह के उनकर अगवानी-मेहमानी कइलस।

टोल महल्ला के लोग तब ठिठकल,जब सुरसती-पूजा के पण्डाल धरे वाला लड़िका राह रोकि के चन्दा असूले लगलें स। अगिले दिन बसन्त पंचमी बा, कैलेण्डर बतवलस !

गाँव जवार के रहे वाला लोग सरेहि घूमत, हरियरी, पियरी आ दोसरा रंग से रँगाइल खेत-बधार देखि के भलहीं बसन्त के सुनगुन पा जाउ, बाकि उहवों अब बसन्त के स्वागत के ऊ उछाह नइखे ! शहरी लोगन के त बतिए अलगा बा ! इहवाँ लोग अउरी बिजी बा ! ओहू में नवका जुग-जमाना के बिजिनेस ! आफिसियल बान्ह छान्ह , जियका-जोगाड़ के झंझट। इहवाँ एघरी के शहरो में फेड़ रूख, बाग ,पारक बन-बनस्पति से सजल बटले बा, बसन्त महराज एनियो अपना रूप, रस-गंध के झलक देखइबे करेले, बाकि फेरु बतिया एही पर अटक जातिया कि ‘‘चीन्हे वाला’’ चीन्ही ! मनमउजी बसन्त अपना रंग में अइहें आ चलि जइहें ! बसन्त -फागुन के आफिसियल टोटरम से मनवाँ थोरे रँगाई ?

सृष्टि सिरिजना के लीला आ ओकरा खेला में भुलाइल अदिमी

सृष्टि का सुघराई आ लुनाई ( लावण्य) के कवनो जबाब नइखे ! एही में प्रकृति आ ओकरा सँग अनेक जीव-जन्तु बाड़े सन — नदी, ताल, सरोवर, बन, परबत, समुन्दर आ ओकरा बिस्तार में लहलह खेत-खलिहान, बाग-बगइचा आ आदमी बा ! सृष्टि सिरिजना के सुघराई आ ओकरा चुम्मकी खिंचाव (आकर्षण) से संसार चल रहल बा ! ई सुघराइये ( सौन्दर्य) नु हवे कि हरेक जीव, इहाँ तक कि अदिमियो ओह पर मुग्ध बा ! सुघर रूप आ सुघराई (बाहरी भाग भीतरी ) के आकर्षन ना रहित त, बुझला प्रेमो ना उपजित! सृष्टि का हरेक जीव में एही सुघराई क खिंचाव ओके एक दुसरा से जोड़ले-बन्हले भा रचले-बिगड़ले बा ! ई आदमी का दीठि ,संबेदन आ अनुभूति प निर्भर बा कि ऊ प्रकृति भा ओकरा नैसर्गिक सुघराई के कवना नजर, कवना भाव से देखत बा ! आदमी अगर अपना सुभाव आ चाल के ताल प्रकृति से सही ढंग से बइठावे त ओकरा अन्तर में प्रकृति के हास-हुलास उमगबे करी ! लोकमत एही बात के सिखावेला — प्रकृति का सँगे चलऽ ! अपना के प्रकृति का अनुसार ढाले — ओकरा अनुसार स्वानुशासन पर जोर एसे देला, कि आदमी बिपरीत समय भा अचके आइल मुसीबत का बेरा अपना के सम्हारि ली ! प्रकृति के प्रकृति हमनी का अनुसार ना चली । हमनी के प्रकृति का रूप-रंग ,साँस-सुबास अनुसार अपना के बदले के पड़ी !

काल परिवर्तन का बदलाव में, क्षेत्र आ उहाँ के जलवायु के बड़हन भूमिका बा ! पहाड़ी एरिया आ मैदानी एरिया में फरक परबे करी , अइसहीं समुन्द्री एरिया आ रेगिस्तानी इलाका के फरक बा! ठंढा का मौसम में कहीं बहुत अधिका ढंड आ कहीं बहुते कम होई त कवनो क्षेत्र में ठंढा आ गरमी दूनो सम होई ! हमहन का ओर कहाव कहल जाला –दइब क लीला, कहीं धूप, कहीं छाँह ! कहीं कुछ, त कहीं कुछ। दरअसल ई बिधना के बनावल सृष्टिए के खेला आ लीला हऽ ! भारत का पूरबी-पच्छिमी आ दक्खिनी-उत्तरी भाग का जलवायु आ मौसम का असर में जवन फरक लउकेला सब इनहीं कारन बा ! कहे के त प्रकृति काल (समय) आ ऋतु चक्र वाला पहिया पर घूमेले । एही वजह से कहीं अगताहे फूल-फल-फसल तइयार हो जाला आ कहीं महीना डेढ़ महीना बाद! कहीं आम पहिलहीं मोजराइ के फलगर हो जाला आ कहीं महीना डेढ़ महीना बाद!

एही रितु चक्र में शरद (जाड़ा) बा । जाड़ा में माघ महीना, बाघ कहाला। हमनी का ओर काशी क्षेत्र आ पूर्वांचली एरिया में सितियाइल सितलहरी चलेले आ मघवट चूवेला — माने सीति अइसन गिरेंले कि सबेर का बेरा फेंड़न का पतइनि से ओस चूवेले ! बाकि लोक में माघ मास पबित्तर मास मानल जाला ! लोकमानस एह मास के संयम आ अनुशासन वाला मानेला। एह महीना में नदियन में स्नान, ध्यान, पूजन, तप आ कल्पवास क महातम हऽ । खिचड़ी (मकर संक्रान्ति) आ माघी पूर्णिमा एही महीना में परेला। आस्था आ विश्वास के अध्यात्मिक परम्परा अनुसार बहुत लोग खिचड़ी का दिन से महाशिवरात्रि ले एह ऋषि-परम्परा के निबाह करे खातिर संकल्प लेके नदी संगम क्षेत्र में निवास करेला !माघ मास में, जब सुरुज भगवान उत्तरायन होलें त उनसे प्रकाश आ ऊर्जा पावे वाला लोग ग्यान-पुन्न आ आत्मबल अरजन खातिर शास्त्र आ लोकमत का अनुसार, साधना आ तप करेला ! गोस्वामी तुलसीदास जी लिखले बाड़े —
मज्जहिं प्रात सनेह उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा।।

अतने ना ,ऊ आगा बरनन करत बाड़े —
ब्रह्मनिरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्व बिभाग।
करहिं भगति भगवन्त कै संजुत ग्यान- विराग।।

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं।
पुनि सब निज-निज आश्रम जाहीं।।

गंगा जमुना का संगम स्थली पर प्रयाग में कुम्भ लागेला, जेमे देवतो लोग गमन करेला! एकर बरननो मिलेला —
माघमासे गमिष्यन्ति गंगायमुन संगमे।
ब्रह्माविष्णु महादेव रुद्रादित्यमरुद्गणरू।।

नदियन का मिलन के उत्सव -परम्परा: त्रिवेणी, प्रयागराज में कुम्भ मेला

हमनी का देश में, सरधा-सामूहिकता वाला आध्यात्मिक यात्रा के सांस्कृतिक -परम्परा के जियतार सजीव दृष्टान्त नदियन के मिलन (संगम) वाला जगह पर महोत्सव मेला का रूप में मनावल जात रहल बा! बिना कवनो नेवता भा बोलाहट के, देश का कोना-कोना से आवे वाला एह अद्भुत महाजुटान के दुनिया कौतूहल से देखे-जाने क कोसिस करेले ! ज्ञानी लोग बतावेला कि ई उत्सव बारह राशियन का अनुसार देश के बारह खास स्थान पर, नदी का किनारा का रेती भा एरिया में होला जवना में तीर्थराज प्रयाग (उ०प्र०), हरिद्वार (उत्तराखंड), नासिक (महाराष्ट्र )आ उज्जैन (म०प्र०) ई चार गो प्रमुख नदी-क्षेत्र बा ! देश का दोसरा क्षेत्रन में जगन्नाथपुरी, द्वारिकापुरी, रामेश्वरम् , गंगासागर, सिमरियाधाम , कामाख्याधाम, कुरुक्षेत्र आ कुम्भकोणम् — आठ गो जगह कुम्भ के जुटान होला! कुम्भ, अर्द्ध कुम्भ आ महाकुम्भ का नाँवे होखे वाला एह आपरूपी आयोजन में लोक का आस्था, विश्वास आ आध्यात्मिक रुचि का कारन अपना आपे जन समूह उमड़ जाला ! खगोलशास्त्र आ ज्योतिष गणना के जानकार एह आयोजन के तिथि निर्धारित करेला लोग!! खगोलशास्त्र आ ज्योतिष गणना के जानकार एह आयोजन के तिथि निर्धारित करेला लोग!

ग्रह-नक्षत्र आ राशियन का आधार पर, निर्धारित होनेवाला कुम्भ, अर्द्ध कुम्भ भा महाकुम्भ के होखे वाली गणना, खगोलशास्त्र का मुताबिक एकदम सटीक मानल जाला । छव बरिस पर अर्द्ध कुम्भ, बारह बरिस पर महाकुम्भ आ एक सौ चौवालीस बरिस पर महाकुम्भ के पवित्र स्नान-ध्यान आ अनुशासित भाव से सत्संग, साधना के आपन महिमा आ महातम बखानल गइल बा!

कहल गइल बा कि देवता-असुर का समिलात शक्ति से जब समुद्र मन्थन भइल, त ओमे से अमरत्व देबे वाला अमृत कुम्भ निकलल! ओके समूचा पावे का ललसा में, देवता आ असुरन में फेर लड़ाई छिड़ गइल! विष्णु भगवान का कहला पर, सबके अमृत परोसे के जिम्मा इन्द्र के लड़िका जयन्त के दियाइल, बाकि अधीरता में दानव पक्ष के राहु-केतु का खुटचाल का चलते, जयन्त के अमृत कुंभ लेके भागे के परल ! भागम भाग में अमृत कुम्भ से छलकि के अमृत बून भारत का चार जगह पर गिरल — ऊ चार जगह रहे हरिद्वार, उज्जैन, नासिक आ प्रयाग! जयन्त का रक्षा में लागल दोसर देवता लोग में सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, शनि रहे लोग। एही से सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति आ शनि (ग्रह) के बारह राशियन में बिचरन का आधार पर ज्योतिष गणना कइल जाला! ग्रह राशियन का संजोग पर, लागे वाला कुम्भ का एह उत्सव मेला में लोग खुदे, बिना नेवतले, रेला बान्हि के चल देला – बुझाला जइसे आस्था-विश्वास के कवनो अदृश्य आध्यात्मिक चेतना, जन चेतना के जगाइ के लहकाइ देले होखे । एह अवसर पर साधु सन्तन आ धर्माचार्यन के कई कई सभा -सतसंग वाला पण्डाल लागि जाला आ पवित्र नहान का बाद, लोग जीवन दर्शन आ ग्यान का एह सत्संग के लाभ उठावेला !

दुनिया खातिर अजूबाः प्रयागराज के महाकुम्भ

उत्तर प्रदेश के प्रयाग में भइल संगम क्षेत्र के महाउत्सव महाकुम्भ एक सव चउआलिस साल बाद लागल ! माघ महीना में, पैंतालिस दिन तक ( मकर संक्रान्ति से महाशिवराति तक ) चले वाला एह लोकप्रिय महोत्सव में जनचेतना के जियत-जागत महाजुटान के अइसन साखी बनल कि दुनिया चकचिहाइल देखते रहि गइल ! नदी मिलन का त्रिवेणी स्थल का सुदूर तक फइलल एह महाकुम्भ में, देश -बिदेश का लोगन के अइला के आंकड़ा बतावल गइल – छाछठ करोड़ (66 करोड़) !! ई अजगुत देखत दुनिया चिहाइल, दुनिया के मीडिया बखनलस कि इहाँ त कई कई देशन के पूरा आबादी क गिनती थोर परि गइल।

यू०पी० के 75 जिलन में एगो अउरी जिला भ गइल ‘महाकुम्भ मेला जनपद ’! 4000 हेक्टेयर का एह मेला क्षेत्र, जवन 25 सेक्टर में बाँटल बनावल गइल, ओहमें संगम के बिहंगम अवलोकन खातिर ऊँचाई पर एगो नए नगर टेन्ट-सिटी बनावल गइल। जाए खातिर तीस से अधिके द्वार (गेट ) रहल! हजारों लाखों लोग सफाई-सुरक्षा , चिकित्सा, भोजन भण्डारा, अइला -गइला आ देख भाल का इन्तजामे में लागल रहल । अइसे त एह महाजुटान में लोग खुद अपना निज अनुशासन में सम्भरि के आवेला, तब्बो भीड़ मेनेजमेंट, आवाजाही मैनेजमेंट, पार्किंग अउरी लाखन लोग के नहान मैनेजमेंट का बाद कल्पवास करे वाला लोगन के खइला पियला, रोग निदान आदि आदि बातन के खेयाल खातिर इन्तजाम। एह मेला का महाजुटान में अपना भारी जनसमूह उमड़ल कि दुनिया हैरान रह गइल । आधुनिक सुविधा वाला, दिब्य आ भब्य ढंग से ,रोसनी का एह जगमगात नगर में जात, सम्प्रदाय, क्षेत्र, वर्ण आ भाषा के कूल्हि भेद मिटावत अइसन सचेतन जन-ज्वार उमड़ल कि तरह तरह के विघटन बँटवारा करके जनता के आपुसी बैमनस आ दुश्मनी बढ़ावे वाला खुराफातियन के होशे उड़ि गइल !

आस्था का एह सांस्कृतिक आध्यात्मिक परम्परा वाला, उत्प्रेरक महामेला में लोगन के सरधा-विश्वास आ एकता के बिकसल रूप देखि के उन्हनी के महा अचम्भो भइल, जवन कुटिल सवारथी-राजनीति के रोटी खात रहलन स! कतनो सुघर आ बढ़िया इन्तजाम वाला आयोजन में नुक्स निकाले वालन खातिर, करोड़न लोगन के अतना बिशाल आयोजन बड़ा खटकल। आयोजन से चिढ़े-चिहाये वाला कई गोड़न के तऽ अइसन मरिचा लागल कि मत पूछीं! कवनो एके फालतू कहलस, कवनो मृत्यु कुम्भ तक कहलस, कवने गंगाजल के प्रदूषित कहलस बाकिर साँच त प्रमाणित होइए जाला आ झुट्ठा के मुँह करिया हो जाला! छाछठ करोड़ लोग आस्था भाव से, एह सांस्कृतिक आध्यात्मिक चैतना से चैतन्य होके, बिना बोलवले सामूहिकता के संस्कारित करत आइल आ सगरी कुप्रचार ,अफवाहबाजी का गाल पर तमाचा मारत, महापुन्य लूटि के अपना-अपना घरे चलि गइल !

बीति गइल फागुन मनभावन: चइत बनी मनसायन

राग-रंग-रस से सराबोर करत मनभावन फागुन का जाते एगो खालीपन जइसन बुझाए लागल। बहरा से आइल नेही-छोही आ आपन कहलाए वाला लोग फगुआ (होली) मनाइ के अपना -अपना ठाँव लवटि गइल । बिछोह आ प्रिय -विरह के अवसाद आ आलस लिहले चइत चढ़ गइल । गाँवें- गाँवें चइती आ चइता क राग सुनाए लागल! बैरिन कोइलिया के हूक भरल कूक से, विरही मन के पीर लिहले कवि का सँगे, गावे -बजावे वाला गुनी धुनी लोग आपन-आपन राग-रंग साजे लागल ।

एकाधे हफ्ता बाद नवराति क दिन आ जाई । नवमी पुजाई ! ‘पाती’ के ई नवका अंक रउरा हाथ में होई ! नवराति प्रकृति स्वरूपा भगवती का स्वागत, सेवा आ पूजन के समय हऽ। हम सबका, (सपरिवार) जोग -क्षेम खातिर माई से निहोरा करत बानी -‘‘सभकर भल होखे!’’

(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के नवीनतम अंक (107-108) से साभार)

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