गर्मी कइलस बेहाल

– नूरैन अंसारी

बहत बिया सर-सर पुरवा बयरिया.
धधकत बा आग, चले लू के लहरिया.

घर से कहीं निकलल मोहाल भइल बा.
भाई हो गर्मी से जिअरा बेहाल भइल बा.

लागत बा चईत जइसे जेठ के महीना.
चुअत बा माथा से तर-तर पसीना.

किरपा अइसन करत बाड़ी धूप के रानी.
कि अमृत से बढ़िया, लागत बाटे पानी.

कपडा अपना देह के, जी के जंजाल भइल बा.
भाई हो गर्मी से जिअरा बेहाल भइल बा.

सुस्ताये खातिर पेड़ तर मेला लागल बा.
जगे-जगे सतुआ आ लस्सी के ठेला लागल बा.

जइसे-जइसे सूरज सर पर चढ़त बा भाई.
बार-बार नहाये के मन खुबे करत बा भाई.

गड़बड़ सगरी नस-नस के सुर-ताल भईल बा.
भाई हो गर्मी से जिअरा बेहाल भईल बा.


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