बांसगांव की मुनमुन – 16 वीं कड़ी

बांसगांव की मुनमुन – 16 वीं कड़ी

( दयानन्द पाण्डेय के बहुचर्चित उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद )

धारावाहिक कड़ी के सोरहवां परोस
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( पिछला कड़ी में पढ़ले रहीं कि मुनमुन अपना नइहर लवटि आइल. ओकरा बाद विवाद के सलटावे के कोशिश का बारे में आजु पढ़ ली.
पिछलका कड़ी अगर ना पढ़ले होखीं त पहिले ओकरा के पढ़ लीं.)

तय कार्यक्रम का मुताबिक़ रमेश बांसगांव एक दिन पहिलहीं पहुंच गइलन. तरुणो आ गइल सपत्नीक. ई ऊ बढ़िया कइलसि. मुनमुन के समुझावे में आसानी रही. इहे ऊ सोचले रहल. बाकिर जब मुनमुन के ससुराल आ ओकरा मरद के तफ़सील अम्मा रोवत बिलखत बतवली त ओकरा गोड़ का नीचे के जमीन खिसक गइल. ऊ हिल गइल. सोचलसि कि दुनिया भर के न्याय के पाठ पढ़ावे वाला ऊ कइसे अपना बहिने का साथे अन्याय कर बइठल. तनिका असकत, तनिके अहंकार आ तनिकहीं व्यस्तता ओकरा के घनश्याम राय के परिवार के थाह ना लेबे दिहलसि. बहिन के होखे वाला घर के जांच पड़ताल ना करे दिहलसि. बूढ़ बाबूजी का भरोसे सब छोड़ दिहलसि आ एह चार सौ बीस घनश्याम राय के झांसा में सभे आ गइल. सगरे भाई बेंवतगर होखला का बावजूद अपने बहिन के अबला बना बइठलें ? सोच के ऊ अपना के धिक्करलसि. बाकिर अब का हो सकेला एह पर सोचल शुरु कइलसि. आख़िर कवनो ना कवनो राह त खोजहीें के रहल. दोसर कवनो चारा ना रहल. रात भर ऊ ठीक से सूत ना पावल. सबेरे उठ के सोचलसि कि काहें ना घनश्याम राय के अवहीं आवे से मना कर देव आ कह देव कि मौजूदा हालात में बातचीत मुमकिन नइखे. फिर कुछ सोच के टार गइल. बाबू जी से एह बारे में बतियवलसि त ऊ फफक पड़लन. बोललें, ‘बेटा हमार बुद्धि कुछ काम नइखे करत. बूढ़ा गइल बानी. ग़लती हो गइल कि मुनमुन के ओह नरक में बिआह दिहनी. ओह घरी बिआह तय कर लेबे के दबाव में आंख पर जल्दी के पट्टी बन्हा गइल रहल. कुछ जांचो-पड़ताल ना कर पवलन. लड़िका अतना नाकारा निकलल. हम घनश्याम राय के चिकना-चुपड़ा बातन में आ गइनी. तोहरा लोगन से तबहियें कह दिहले रहतीं कि हमरा वश के नइखे शादी-बियाह खोजल त शायद आजु ई दिन देखे के ना पड़ल रहीत. हमहूं बेटन का साथे अहंकार के तकरार में ज़िद में आ गइनी. भूला गइनी कि परिवार में आ उहो बेटन का साथे अहंकार के गठरी बन्हला से का फायदा फ़ायदा? छोट थोड़हीं हो जइतीं ? बाकिर मति मरा गइल, आजु त छोट होइये गइनी नू. फूल जइसन बेटी के जिनिगी नरक बना के.’ ऊ बिलखत कहलन, ‘अरे नरको में हमरा जगह ना मिली!’

‘अइसन मत कहीं बाबू जी!’ कह के रमेशो के आंख गील हो गइल, ‘हमनी का सबहीं एह पाप के भागीदार बानी जा.’ ऊ बोलल, ‘रउरा अनुभवी बानीं. कवनो रास्ता त निकलबे करीं.’

‘हमरा त कुछऊ नइखे सूझत. ना सोच पावत बानी ना सुनाईए देत बा. तूं बड़का बेटा हउवऽ तूहीं कुछ सोचऽ.’

‘चलीं आजु घनश्याम राय के बोलावले गइल बा. बातचीत करत बानी. शायद कवनो राह निकल जाव!’

‘अरे ओह नालायक, चार सौ बीस के बोलवला के का ज़रूरत रहल?’ मुनक्का राय बोललन, ‘ओह पापी के त हम दुबारा हमरा घरे अवले से मना कर दिहले रहीं. ऊ भला का आई चोर कहीं का!’

‘आई, आई !’ रमेश बोलल, ‘ऊ हमरा के फ़ोन कइले रहल आ गिड़गिड़ात रहल. त हमहूं बातचीत करे ला ओकरा के आ राधेश्याम के बोला लिहनी. बाप बेटा दुनू के.’

‘चलऽ अब तूं बोला लिहले बाड़ऽ त अलग बाति बा. ना त पिछला बेर आइल रहुवे त हम ओकरा के दुबारा आवे से मना कर दिहले रहीं.’ रमेश फेर अम्मा आ मुनमुनो के समुझवलसि कि, ‘रास्ता त कुछ ना कुछ निकालहीं के पड़ी.’ फेर बतवलसि कि, ‘घनश्याम राय आ राधेश्याम राय के बातचीत करे ला बोलवले बानी. तनिके देर में दुनू आवते होखिहें सँ.’

मुनमुन आ अम्मा दुनू चुपे रहली. कुछ बोलली ना. घनश्याम राय तय समय पर आ गइलन आ अपना योजना का मुताबिक़ अकेलहीं अइलन. बेटा के ना ले अइलन. रमेश पूछबो कइलसि कि, ‘राधेश्याम कहां रह गइलन?’

‘असल में ओकर तबीयत ख़राब हो गइल बा.’ घनश्याम राय बहानेबाज़ी कइलन.

‘फेर त बाते ना हो पाई घनश्याम जी!’ रमेश बोलल, ‘मूल समस्या त राधेश्याम से बा, उहे नइखे त बात का होखी?’

‘रउरा जवन पूछे के होखे ऊ फ़ोने से पूछ लेब ओकरा से.’ घनश्याम राय चिरौरी कइलन.

‘फ़ोने से बात हो जाए वाला रहीत त हम बांसगांव काहें अइतीं?’ रमेश तल्ख़ हो के कहलसि.

‘अब का करीँ. अचके में ओकर तबियत खराब हो गइल.’ घनश्याम रिरियइलन, ‘रउरा बस बहू के विदा कर दीं. अब कवनो समस्या ना आई. हम वचन देत बानी.’

‘रउरा वचन के कवनो मोलो बा? कवनो मतलबो बा?’ रमेश पूछलसि, ‘रउरा त बतवले रहलीं कि ऊ पी.सी.एस. के तइयारी करत बा? कइसे यक़ीन करीं रउरा वचन पर?’

‘देखीँ जज साहब, जवन बात बीत गइल ओकरा का बेर बेर दोहरवला से कवनो फायदा त अब बावे ना. आगे के सुधि लीहल जाव.’ घनश्याम राय फेर मनुहार कइलन. बातचीत शुरू भइल. तय भइल कि घनश्याम राय मुनमुन पर भइल ज़्यादतियन पर सफ़ाई देसु आ मुनमुन से जवनो शिकायत होखो उबहो बतावसु. पहिले त घनश्याम राय कहलन कि, ‘एह सगरी विवादन के सिरे से भूला के नया से बात शुरु कइल जाव आ हमरा बहू के हमरा साथे विदा कर दीं. आगे कवनो तकलीफ़ ना होखी, ना ही कवनो शिकायत.’

‘ना. अइसन त ना हो सकी घनश्याम जी!’ रमेश ने कहा, ‘रउरा बिंदुवार जवाब देबहीं के होखी.’

‘देखीं ई कवनो अदालत नइखे बइठल जज साहब कि गवाही, जिरह आ बहस होखो. पारिवारिक मसला हऽ आ एकरा के पारिवारिके तरीका से सलटावे के चाहीं.’

‘हम कब कहनी हँ कि अदालत हऽ?’ रमेश कहलन, ‘अगर राउर बेटा लुक्कड़ आ पियक्कड़ ह, रउरा घर में हमरा बहिन के भरपेट भोजन ना मिल सके, राउर पत्नी आ बेटी हमरा बहिन से उचित व्यवहार कइला का जगहा ओकरा के तंग करिहें, ताना मरिहें त अइसना में एह समस्यन के कवनो हल निकलला बिना रउरा साथे अपना बहिन के हम विदा नइखीं कर सकत.’

‘देखीं जज साहब रउरा सभे बेर बेर भोजन-भोजन के पहाड़ा पढ़त बानीं त इहो बताईं कि रउरा सगा पट्टीदारी में कवनो गमी हो जाव त रउरा किहां का दुनू बेर भोजन बनी?ना नू?’ घनश्याम राय बोललन, ‘त दुर्भाग्य से ओह घरी गवना का दू दिन बादे हमरा चाचा के मौत हो गइल रहुवे. ओही चलते ई दिक्क़त आइल.’

‘चलीँ मान लिहनी बाकिर फलाहार वगैरह के त कुछ व्यवस्था कइल चाहत रहुवे?’

‘ऊ त भइले रहल.’

‘आ राधेश्याम के लुक्कड़ई-पियक्कड़ई?’

‘ई एगो ऐब ओकरा में आ गइल बा. ओकरा के हमनी का सुधारत बानी जा.’ घनश्याम राय बोललन, ‘कहीं ओकरा के रोज़ी रोज़गार दिलवा देतीं रउरा सणे त थोड़िका आसानी हो जाइत.’

‘आ रउरा घर के औरतन के बेवहार?’

‘हम ओकनिओ के समुझाएब.’ घनश्याम राय बोललन, ‘आ रउरो सभे तनिका हमरा बहूओ के समुझा दीं.’

‘जइसे?’ रमेश पूछलन.

‘कि अब ओहिजा से शिक्षा मित्र के नौकरी ना हो पाई.’ घनश्याम राय बोललन, ‘ऊ चाहेले कि रोज हमरा गाँव से रउरा गाँवे पढ़ावे आइल करे. माने कि रोजे रोज ससुरारी नइह करत रहे. ई शोभा दीही भला?’

‘अउर?’

‘हमरा परिवार के औरतन के धउँसावल बन्द करे कि हमार भईया लोग त ई, हमार भईया लोग त ऊ. हम ई करवा देब, हम ऊ करवा देब.?!’

‘आ?’

‘इहो बता दीं सभे कि हमरा बहू के कवन बेमारी बा जे ई संदूक़ भर के दवाई राखेले?’

‘अउर?’

‘अउर बस विदा कर दीं!’ घनश्याम राय हाथ जोड़ के कहलन, ‘बहुते बदनामी हो रहल बा, पट्टीदारी, नातेदारी में. मूड़ी उठा के चलल मुश्किल हो गइल बा. जेकरे जवन मन करे सवाल पूछ लेत बा बहू का बारे में त जवाब देत नइखे बनत.’

‘अच्छा, ज़रिका राधेश्याम से फ़ोन पर बात करवाई.’ रमेश घनश्याम राय से कहलन, ‘आ हँ, मोबाइल के स्पीकर आन कर लीं जेहसे के बातचीत सभे बढ़िया से सुन पावे.’

‘जी जज साहब!’ घनश्याम राय बोललन. हालां कि मोबाइल के स्पीकर आन करे का बात पर ऊ तनिका सकपकइलन. बाकिर मोबाइल से राधेश्याम के फ़ोन मिलवलन, स्पीकर आन क दिहलन. ओने से फ़ोन घनश्याम राय के पत्नी उठवली. घनश्याम राय कहलन कि, ‘राधेश्याम से तनी बात करवावऽ. जज साहब बतियइहें.।’

‘बाकिर ओकर तबियत खराब बा नू?’

‘हँ, बावे. बाकिर बार करावऽ!’

‘रउऱा त जानते बानी कि ……।’ घनश्याम राय के पत्नी तनिका लटपटइली.

‘हम कहत बानी कि बात करावऽ!’ डपटत घनश्याम राय बोललें.

‘जी करावत बानी.’ कह के ऊ फ़ोन राधेश्याम के दे दिहली. ऊ बोलल, ‘हलो, के?’

‘हँ, बेटा तोहार बाबूजी बोलत बानी. लऽ. जज साहब तोहरा से बतियावल चाहत बानी?’ कहिके मोबाइल ऊ जज साहब के थमा दिहलन.

‘कवन जज?’ औने से राधेश्याम पूछत रहुवे.

‘अरे भइया राधेश्याम जी. हम बांसगांव से रमेश बोलत बानी.’

‘अच्छा-अच्छा हमार साला जज!’ ओने से बहकल-बहकल आवाज़ में राधेश्याम बोलल, ‘आई लव यू जज साहब! आई लव यू!’

‘का?’ रमेश बिदकल.

‘आई लव यू. आई लव मुनमुन. आई लव बांसगांव. आल आफ़ बांसगाव. लव-लव-लव!’

‘का बकत बाड़ऽ?’ रमेश फेरु बिदकल.

‘चोप्प साले!’ राधेश्याम लड़खड़ाईल आवाज़ में माई बहिन के गारी उच्चारे लागल. आ बोलल, ‘लव यू आल मादर….’

‘लीं घनश्याम जी अब रउरे बात करीं!’ कह के रमेश मोबाइल घनश्याम राय के देत हाथ जोड़ लिहलन.

राधेश्याम ओने से लगातार लड़खड़ात आवाज़ में गरियावे आ लव यू के प्रलाप जारी रखले रहल. घनश्याम राय हड़बड़ा के फ़ोन काट दिहलन आ कपार धर के बइठ गइलन.

‘कुछ अउऱ बाक़ी रह गइल होखो त बता दीं घनश्याम जी!’ रमेश तल्ख़ अंदाज में नफ़रत देखावत पूछलन.

‘कुछ ना जज साहब.’ घनश्याम राय अपना कपार पर हाथ फेरत बोललन, ‘जब अपने सिक्का खोटा बा त का कहीं?’

‘त फेर?’

‘अब आज्ञा दीं !’ घनश्याम राय हाथ जोड़त बोललन, ‘अब जब ओकरा के पूरा से सुधार लेब तबहिये बात करब.’ कहि के घनश्याम राय घर से बाहर निकल गइलन. बाकिर घर के एकहू बेकत उनुका के विदा करे बाहर ना आइल. ना ही चलत घरी केहू उनुका के नमस्कार कइल. अपमानित घनश्याम राय मुनक्का राय का घर से बाहर निकलि के अपना जीप में बइठले आ ड्राइवर के चले के कहि के अपना घरे फ़ोन मिलवलन. ओने से उनुकर श्रीमती जी रहली. पहिले त ऊ उनुकर माई-बहिन कइलन आ तब कहलन कि, ‘अतना समुझा के आइल रहीं. बात पटरी पर आवत-आवत गुड़ गोबर हो गइल.’

‘अब हम का बोलीं ?’

‘ई कब शराब पी लिहलसि दिन दहाड़े?

‘पता ना.’ पत्नी बोलली, ‘हम देखुईं ना.’

‘त जब शराब पी के अनाप-शनाप बकत रहल तब फोन ना काट सकत रहू ?’

‘ऊ एकदम नशा में रहुवे, हम मना करतीं आ हमरे पर हाथ उठा दीत त का करतीं.?’

‘मना करे के का रहुवे. चुपचाप फोन काट दिहले रहतू.’

‘ऊ त रउओ काट सकत रहीं.’

‘बेवकूफ़ औरत, फ़ोन हमरा हाथ में ना जज साहब का हाथ में रहुवे.’ ऊ बोललन, ‘आ फेर स्पीकर आन रहुवे. सभे ओकर ऊटपटांग बात सुनत रहुवे. अतना बेइज्जती भइल कि का बताई ?’

पत्नी कुछ बोलला का बजाय चुपे रह गइली.

‘अब कहाँ बा ?’ घनश्याम राय भड़कत पूछलन.

‘के?’

‘नालायक़ अभागा राधेश्याम अउर के?’

‘मोटरसाइकिल ले के कहीं निकलल बा.’

‘कहां?’

‘पता ना.’

‘अतना पियले रहल. अइसना में ओकरा के मोटरसाइकिल ले के जाए कइसे दिहलू ?’ घनश्याम राय तड़कलन.

‘हमरा मान के ना रहल ओकरा के रोकल.’ पत्नी बिलबिलइली.

‘चलऽ आवत बानी त देखत बानी.’ कहि के घनश्याम राय फ़ोन काट दिहलन.

ओने रमेश आ घनश्याम राय के बातचीत का बीच मोबाइल के स्पीकर पर राधेश्याम के बातचीत दरवाज़ा का अलोता से मुनमुन आ उनकर अम्मो सुनली. मुनमुन के रो-रो के बुरा हाल रहुवे. घनश्याम राय के गइला का बाद रमेश मुनमुन का लगे गइलन. ओकरा के चुप करावत दुखी मन से बोललन, ‘माफ़ करऽ मुनमुन हमन के रहतो तोहरा साथे भारी अन्याय हो गइल. शायद करम में इहे लिखल रहुवे.’ रमेश बोललन, ‘बाकिर घबरा मत. कुछ सोचत बानी आ देखत बानी कि का कइल जा सकेला.’ मुनमुन अउरियो रोवे लागल आ मुनमुन के अम्मो. अतना कि रोवाई सुनि के अड़ोस-पड़ोस के औरत जुट गइली सँ. एने मुनक्को राय सुबकत रहलन. निःशब्द. औरतन के आवत देखि ऊ आपन आँख पोछलन आ चादर ओढ़ के, मुंह तोप के पटा गइलन.

तरुण आ तरुण के बीवी कुछ समुझिये ना पावत रहुवे कि का कहे, का करे ? तरुण के बीवी मुनमुन के पति आ ससुर ला बढ़िया नाश्ता बनवले रहली. भोजनो के तइयारी क के रखले रहली. बाकिर सब धइले रहि गइल. तरुण के बीवी अब पछतात रहली कि अइली काहे. आ आंखिने-आंखिन में तरुण के इशारा करत रहली कि अब बांसगांव से निकलल जाव. बहुत हो गइल. बाकिर तरुण ओकरा के खुसफुसा के बता दिहलसि, ‘आजु ना. माहौल नइखू देखत ?’

‘बाकिर माहौल त काल्हुवो इहे रहे वाला बा?’ तरुण के बीवीओ खुसफुसइली.

‘तबो आजन ना.’ तरुण पूरी सख़्ती से कहलसि. बाकिर रमेश जाए के तइयारी कर लिहलन. अम्मा कहली कि, ‘बाबू खाना खा लीतऽ तब जइतऽ !’

‘अब अम्मा खाना नीक ना लागी.’

‘तबो हम बिना खइले जाए ना देब.’ अम्मा बोलली, ‘ख़ाली पेट जाइल ठीक ना रहे.’

‘चलऽ ठीक बा.’ कहि के रमेश थोड़िका देर ला रुक गइलन. फेर धीरज के फ़ोन क के सगरी डिटेल बतवलन आ कहलन कि, ‘हमार त अकिले काम नइखे करत. तूं ही कुछ सोचऽ.’ इहे बाति ऊ राहुलो के फ़ोन क के कहलन. तरुणो के बोला के पूछलन, ‘तूं का सोचल बाड़ऽ ? का कइल जाव आखि़र?’

‘का बताईं भइया कुछ समुझिये नइखीं पावत.’ तरुण हताा हो के बोलल.

‘तबहियों कुछ त सोचऽ.’ रमेश बोललन, ‘अक़ल त हमरो काम नइखे करत.’ कहि के रमेश सोफे़ पर बइठले-बइठल पसर गइल. थोड़िका देर में खाना बन गइल त तरुण आ के पूछलसि कि,

‘भइया खाना बन गइल बा, ले आईं ?’

‘हँ ले आवऽ बाकिर थोड़िके ले अइहऽ’ रमेश बोललन, ‘नामे भर के.’

खाना खा के रमेश चले लगलन त फेरु मुनमुन के समुझवलन, ‘घबरा मत, कुछ ना कुछ उपाय सोचत बानी.’ मुनमुन फेरु रो पड़ल. अम्मो. बाबू जी आ अम्मा के गोड़ छूवत रमेशो के आंख लोरिया गइल, बाकिर बिना कुछ कहले ऊ घर से बाहर आ गइलन. पीछे-पीछे तरुणो. रमेश के गोड़ छू के लवटि गइलन. कार बांसगांव पार करते रहल कि रमेश के ड्राइवर गाना बजा दिहलसि, ‘मेरे घर आई एक नन्हीं परी!’ सुन के रमेश के अच्छा लागल. कुछ देर ला ऊ एह गाना से जुड़ल मीठी यादन में गोता लगावे लगलन. याद पड़ल कि मुनमुन जब छोट रहल, तब ऊ ओकरा के गोदी में ले के खियावल करसु आ गावल करसु, ‘मेरे घर आई एक नन्हीं परी, चांदनी के हसीन रथ पे सवार…..।’ आ खाली उहे काहें, घर के लगभग सगरे लोग मुनमुन के खेलावल करे आ ईहे गाना गावल करे. बाकिर चांदनी के रथ पर सवार एह नन्हीं परी के अइसन खराब दिन आई तब ई केहू ना जात रहल. अब अचानके ई गाना उनुका खराब लागे लागल. तनी तल्खी से ड्राइवर के कहलन, ‘गाना बंद करऽ.’

ड्राइवर सकपका के गाना बंद कर दिहलसि. ओकरा बुझइबे ना कइल कि ग़लती का हो गइल ? दोसरका देिने तरुण आ उनुकर पत्नीओ चल गइल गइल लोग. हालांकि चलत बेरा तरुण के पत्नी से कहली कि, ‘हो सके त कुछ दिन ला मुनमुनो के अपना संगे लेले जइतू. कुछ ओकरो मन बदल जाइत. एहिजा बांसगांव में त तानेबाज़ी से ओकर करेजा फाट जाई. ’

‘कहां अम्मा जी, रउरा त जानते बानी कि हमार मकान छोटहन बा. दोसरे बचवन के पढ़ाई. तीसरे, इनकर ट्रांसफरो के टाइम हो चलल बा. पता ना कब कहां जाए के पड़ जाव.’ तरुण के पत्नी बोलली, ‘ना होखे त बड़का भइया भा छोटका भइया किहां भेज दीं.

‘ठीक बा, देखत बानी.’ अम्मा बात ख़तम कर दिहली.

जब तरुण अपना पत्नी का साथ चल गइलन त मुनमुन अम्मा से कहलसि, ‘अम्मा एगो बात कहीं ?’

‘कहऽ?’

‘आगे से कबो कवनो भइया भा भाभी से हमरा के साथे ले जाए ला मत कहीहऽ. काहे कि मुनमुन ला सभकर घर छोट बा. ओकरा ला केहू किहां ठाँव नइखे. आ तू त जानते बाड़ू कि हमरा टी.बी. बा. फेर केहू काहें अपना घरे ले जाई ?’ मुनमुन बोलल, ‘जवन भाई लोग पट्टीदारी आ अहंकार में, अपना पद आ पइसा का मद में चूर हो के एगो बहिन ला रिश्ता खोजल गवारा ना कइल, उनुकर होखे वाला बहनोई कइसन बा, शादी से पहिले जाने के कोशिश ना कइल ओह भाईयन से तूं आस लगावत बाड़ू कि ऊ लोग हमरा के ले जाई अपना साथे आ अपना घर में राखी ?’

‘ते बेटी आखि़र केकरा से आस करीं ?’ अम्मा बोलली.

‘केकरो से ना. सिर्फ़ अपना से उम्मीद राखीं.’ मुनमुन तनिका कसक के बोलल, ‘सोचऽ अम्मा, जे हम भाईयन के बहिन ना बेटी रहतीं त का तबहियों ई लोग अइसने करीत हमरा बिआह में ? अइसने लापरवाही कइले रहीत?’

अम्मा कुछ बोल ना पवली.

‘ना नूं?’ मुनमुन बोलल, ‘फेर अइसन जल्लाद आ कसाई भाइयन का सोझा कबो कवनो मदद भा भीख के कटोरा मत पसरिहऽ’

‘त अब हम का करीं फेर ?’

‘चलऽ हम त बहिन हईं. तूं आ बाबूजीओ का भइया लोगन के ज़िम्मेदारी ना हऊ ? अतना बड़का जज हउवें, अफ़सर हउवें, बैंक मैनेजर हउवें. एन.आर.आई. हउवें. थाईलैंड में बाड़ें. चार-चार गो खात-कमात ऐश करता बेटा बाड़ें. का माई बाप ला एक एक हजार भा दू दू हजार रुपिया हर महीना रुटीन ख़रच ला ना भेज सके ? भा अपना साथे ना राख सके ? त हम त वइसहूं अभागी हईं. हमार का?’

अम्मा रोवे लगली. चुपचाप. बाकिर मुनमुन ना रोवल. ऊ अम्मा से बस इहे कहलसि, ‘अम्मा अब मत रोवऽ. हमहूं ना रोवब. आपन हालात हमनी का अब खुद बदलन हा. खुद के भरोसे, दोसरा के भरोसे ना.’

(जब आदमी ठान लेव कि ऊ आपन हालात अपना बेंवत से, अपना मेहनत से ठीक करी त सब कुछ देर सबेर ठीक होइए जाला. का मुनमुनो के हालात बदली. कहानी त अब शुरु भइल बा. आवत रहीं, पढीं ला. आ हो सके त हर कड़ी अपना सोशल साइट पर साझा करत रहीं. हम त हमेशा कोशिश करत रहिलें कि जतना जल्दी हो सके ई उपन्यास पूरा करा दीं. बाकिर रउरो लोग के सहजोग जरुरी बा. – अनुवादक)

 

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