बुढ़ापा के जिनगी

– नूरैन अंसारी

लोर बहत बा अंखिया से बरसात के तरह.
हम जियत बानी जिनगी मुसमात के तरह.
भरल बा घर कहे के अपने ही लोग से,
बाकिर छटाईल बानी हम कुजात के तरह.

जब से उठ गईल हमरा भरोसा के अरथी,
हम बसाये लगनी अरुआइल दाल-भात के तरह.
कईनी जिनगी भर हम जेकरा खातिर तपस्या,
उहे फेक दिहल सब्जी से तेजपात के तरह.

अब लउके न कुछ उ बानी सूरज के घर में,
जिनगी हो गईल “नूरैन” अन्हरिया रात के तरह.


नीमन लागल त एक बेर टीप दीं. बेकार लागल त दू बेर !

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