आजु खबर वायरल बा कि बिहार पुलिस निर्देश जारी कइले बिया कि जे दूअर्थी भोजपुरी गाना बजावत पावल जाई ओकरा के गिरफ्तार कर लीहल जाई आ ओकरा पर कड़ा कार्रवाई कइल जाई. उपर झापर तरीका से देखीं त एह बात के सभे स्वागत करी बाकिर गहिराई से सोचीं त ई भोजपुरी के बदनाम करे वालन के षडयन्त्र से अधिका कुछऊ नइखे.
अश्लील आ दूअर्थी गाना के विरोध होखो त हमहूं ओकर स्वागत करतीं, बशर्ते ओकरा के भाषा का सीमा में ना बान्हल गइल रहीत. अश्लील आ दूअर्थी गाना कवनो भाषा में होखे ओकर विरोध करीं बाकिर अश्लील आ दूअर्थी गाना का नाम पर अकेले भोजपुरौ के बदनाम करे के कोशिश के जतना निन्दा कइल जाव, कमहीं होखी. दोसरे ई के तय करी कि दूअर्थी कवना के मानल जाई. हर बात के दू गो अर्थ निकालल जा सकेला आ ई निकाले वाला के मानसिकता देखावेला. हो सकेला कि बोले वाला भा लिखेवाला के मकसद ऊ ना रहुवे जवन रउरा बूझनी. आ अगर राउर मन गन्दा बा, विचार गन्दा बा त रउरा कवनो बात के गन्दा अर्थ निकाल सकीलें.
एगो उदाहरण बतावत बानी. एगो मेडिकल का क्लास में एनाटोमी के प्रोफेसर एगो लड़िकी से सवाल कइलन कि – ‘शरीर के कवन अंग उत्तेजना में अपना मूल आकार से दस गुना ले बढ़ जाला ?’ लड़िकी लजा के अपना गोड़ का नाखून फर्श रगड़े लागल. ओकर चेहरा लजा के लाल हो गइल रहुवे. कुछ बोल ना पवलसि ऊ मेडिकल छात्रा. तब प्रोफेसर कहलन कि तोहरा के देख के हम अतने कह सकीलें कि तोहरा सही जानकारी नइखे आ तोहार मन विचार बहुते गन्दा बा. हमरा सवाल के सही जवाब होखी आँख के पुतरी. आ तू जवन सोच के लजा के लाल हो गइलू ऊ कबो अपना मूल आकार के दस गुना ना बढ़ सके!
बहुत साल पहिले कांग्रेसी राज में एगो कानून ले आवे के प्रयास भइल रहल कि राजनीति में धर्म के उपयोग प्रतिबन्धित क दीहल जाई. बाकिर जब कानून बनावे का बारे में सोचे लागल लोग त पहिले त इहे तय ना हो पावल कि धर्म के परिभाषा का राखल जाव. धर्म के आम भाषा में लोग रिलीजन भा मजहब भा सम्प्रदाय समुझ लेला. जबकि धर्म शाश्वत होखेला आ हर मजहब, हर रिलीजन आ हर सम्प्रदाय में करीब करीब एके लेखा होखेला. आ तब कांग्रेसी सरकार के मकसद त इहे रहल कि हिन्दूवादी राजनीति के रोकल जाव. आ हिन्दू कबो कवनो एक सम्प्रदाय, एक मजहब, एक रिलीजन में बान्हल ना जा सके. हिन्दू नास्तिको हो सकेला, आस्तिको हो सकेला, शाकाहारिओ हो सकेला, मांसाहारिओ हो सकेला. दोसरा रिलीजनन में ई सुविधा ना देखल जा सके. हर रिलीजन के एगो भगवान होलें, ओकर एगो किताब होला, खास पूजा पद्धति होखेला, आ बेटी रोटी के संबंध होखेला. हिन्दू के कवनो एगो भगवान नइखे. ऊ त तैंतीस प्रकार के देवी देवतन में श्रद्धा राखेला. दुनिया के कवनो दोसरा धर्म के भगवान नारी रुप में ना मिले जबकि हिन्दू के भगवान नारी बिना अधूरा मानल जालें. एहिजा नारी के स्थान हमेशा नर से पहिले राखल जाला. बरीस में एके दिन खातिर महिला दिवस मनावे वाला लोग का पल्ले नइखे पड़े वाला.
अब फेरु लवटल जाव भोजपुरी पर. जइसे देश के सगरी राष्ट्रविरोधी दल हिन्दूवाद भा सनातन का विरोध में रहेलें आ कवनो ना कवनो बहाने एकरा के हेय देखे-देखावे-बतावे के कोशिश करत रहेलें, ठीक ओही तरह भोजपुरी के विरोधी हमेशा एही फिराक में रहेलें कि कवन तरह भोजपुरी के बदनाम कइल जा सको, एकर ताकत तूड़ल जा सके. एक जमाना में जब अंगरेजी के शुरुआत होखर रहुवे तब ग्रीक आ लैटिन भाषा के समर्थक अंगरेजी के वल्गर भाषा बता के ओकरा पर हेय दृष्टि राखत रहलें. बाकिर अगरेजी अपना ओही वल्गरत्व का बल पर पसरत चल गइल. भोजपुरी बोले, लिखे सुनेवालन में अधिका लोग आम मनई होखेला, जवना के अश्लील – जे श्लील ना होखो- कहल जाला. सांच कहीं त भोजपुरी के ताकत ओकर इहे अश्लीलता हवे जवना का चलते ऊ आजु ले जिन्दा बिया. अश्लीलता के फूहड़ भा दूअर्थी माने वाला लोग के बेवकूफ कहल जा सकेला जे श्लील आ अश्लील के अर्थे ना जाने.
बाकिर असल सवाल इहे रही कि दूअर्थी होखला के परिभाषा का राखल जाई. मशहूर उर्दू लेखक मंटो का खिलाफ एक बेर अश्लीलता के मुकदमा चलावल गइल रहुवे. अदालत में मंटो पूछलन कि आखिर हमार कवनो शब्द अश्लील बावे ? कवनो उदाहरण त दीं सभे. कहल गइल कि रउरा लिखला में औरत के छाती के चर्चा होखेला. त मंटो के जवाब रहल कि औरत के छाती के छाती ना कहीं त का कहीं ?
असल में कवनो वाक्य, कवनो शब्द अश्लील होइये ना सके. ई त ओकरा के समुझे वाला के मानसिकता बतावेला. कवनो दूअर्थी कहाए वाला गाना ओही लोग ला अश्लील होला जेकर सोच गन्दा होखे. हिन्दी में एक जमाना छायावादी कविता के रहल. लागा चुनरी में दाग छुड़ाऊं कैसे, घर जाऊं कैसे ? के अर्थ एगो भक्त बताई कि हमरा व्यवहार में गलती हो गइल, अब हम कवना मुंह से भगवान का सोझा होखब !
अइसने एगो गीत महेन्दर मिसिर जी लिखले बानी जवन खूब सुने के मिल जाला – अंगूरी में डॅसले बिया नगिनिया, ए ननदी दियरा जरा द., दियरा जरा द, अपना भईया के बोला द. रसे रसे उठता लहरिया ए ननदी भईया के बोला द ?
एह गीत के रउरा का मानब ? दूअर्थी ? अगर एकरो कवनो गलत मतलब निकालत बानी त ऊ रउरा सोच का हिसाब से होखी. गलत उहो ना होखी बाकिर सही उहे ना ह? हर चीझ के उजर भा करिया का दायरा में ना बान्हल जा सके, भूरापन के सैकड़ो रंग हो सकेला ओह दुनू का बीच. से रउरा दूअर्थी भा अश्लील गाना के विरोध करे के बात करीं. रउरा सही रहब. राजनीति मेंं अपराधियन आ माफिया तत्वन के विरोध होखहीं के चाहीं. बाकिर कवनो एगो राजनीतिक दल के अपराधियन के विरोध करे के बात दोगलापन का सिवाय कुछ ना हो सके. अब अलग बात कि एह दोगला शब्दो के दू गो माने निकालल होला.
सुबरन को तीनो ढूंढ़े, कवि. कामी और चोर !
एहिजा कवि सु-वर्ण खोजत मिली, त कामी सुबरन माने सुन्दर देह, आ चोर खातिर सुबरन के मतलब सोना स्वर्ण होखेला. जाकि रही भावना जैसी, प्रभू मूरत देखिन तिन तैसी !
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