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राजनीति में भोजपुरी आ भोजपुरी के राजनीति

राजनीति में भोजपुरी आ भोजपुरी के राजनीति पर लिखे चलनी त एगो पुरान सुनलका इयाद पड़ गइल. तब ढाका के मलमल के साड़ी बहुते मशहूर रहल. महीन अइसन कि सलाई का डिबिया से पूरा साड़ी निकालल जा सकत रहल. ओह पर एगो कवि (जिनकर नाम नइखे मालूम हमरा)लिखले रहलन कि –

साड़ी बीच नारी है कि नारी बीच साड़ी है
नारी ही साड़ी है कि साड़ी ही नारी है.

राजनीति में भोजपुरी के दखल आजादी का पहिले से चलल आवत बा. ओह दौरान भोजपुरी में राष्ट्रगान के प्रतीक बन गइल रहुवे. आजु का सारण जिला के नयागाँव से आवे वाला रघुवीर नारायण बाबू के लिखल गीत बटोहिया राष्ट्रगान जइसन जगहा पा गइल रहल.

देश के पहिलका राष्ट्रपति रहल डॉ राजेन्द्र प्रसाद आजु का सिवान जिला के जीरादेई से रहलन. तब राष्ट्रपति भवन में भोजपुरी के बोलबाला रहुवे.

सारणे जिला से आवेवाला जेपी का चलते आगे आवे वाला लालू प्रसाद एक जमाना में बिहार के राजनीति के भाषा बना दिहले रहलन. मशहूर लोककवि महेन्द्र मिसिर, अर्थशास्त्री गोरखनाथ, कुख्यात ठग नटवर लाल वगैरह अनेके नाम भोजपुरी के ख्याति भा कुख्याति दिअवलन. बाकिर एह लोग में से केहू भोजपुरी के राजनीति ना कइल. राजनीति में भोजपुरिया चाहे जतना होखसु बाकिर भोजपुरी के राजनीति करे वालन के नाम बहुते ना चलल त भोजपुरिया सुभावे का चलते. एक त ‘अबर बानी, दूबर बानी बाकिर भाई के बरोबर ना सवाई बानी’ वाला ठसक आ दोसरे आगे बढ़ेवाला के टँगड़ी खींचे के खराब आदत.

करीब इकइस बरीस पहिले जब दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट के शुरुआत कइनी तब ना त मोबाइल रहल, ना ह्वाट्सएप. कंप्यूटर लैपटॉपो गिनले चुनल लोगन का लगे रहल. हमहू बलिया के एगो इंटरनेट कैफे में बइठ के अंजोरिया निकालल करीं. तब सबले मुश्किल काम रहल एकरा ला सामग्री बिटोरल. लिखनिहार के समुझे में ना आवे कि ई वेबसाइट का होला आ ओकरा ला कुछ लिखला के का फायदा जब हमहीं ना देख सकीं. दोसरे लिखनिहार लोग के ना त टाइपिंग के सुविधा रहल ना आ दोसरा से टाइप करवावे में खरचा लागी. अंजोरिया के बेंवत ना रहल कि लिखनिहारन के पत्रम-पुष्पम दे सको. हालांकि कई बेर सोचनी कि लिखनिहार के कुछ दे पाईं बाकिर लंगटा पहिरी का आ निचोड़ी का वाला हाल रहुवे.

शायदे भोजपुरी के कवनो अइसन लिखनिहार, लड़निहार, कलाकार होखिहें जिनका के अंजोरिया पर जगह ना मिलल होखे. बाकिर अंगुरिओ पर गिने जोग लोग ना मिली जे अंजोरिया के अंजोर कइले होखे भा करे के कोशिशो कइले होखे. हमरा किहां अइबऽ त को का ले अइबऽ, तोहरा किहां आएब त का का खियइबऽ !

रउरा आर्थिक सहजोग कर सकीं त बहुते आभार बाकिर अजोरिया पर अंजोर भइल सामग्री के रउरा अपना सोशल पोस्ट पर साझा त करिए सकीलें बशर्ते रउरा भोजपुरी के कवनो लेख कहानी कविता रचना के साझा करे में लाज ना लागत होखे. काहे कि अपना माई के छिनार कहे के हिमाकत करे वाला लोगन का चलते भोजपुरी के बदनाम करे के कोशिशो कम नइखे भइल. आ एह साजिश खातिर ओह लोगो के सहजोग भरपूर मिलेला जिनकर धंधा भोजपुरी का चलते मार खात होखे. हिन्दी सिनेमा आ संगीत के बिजनेस में लागल लोग सभले बेसी परेशान होला भोजपुरी के लोकप्रियता से.

हमेशा का तरह आजुओ बात बहक गइल आ लमहर हो गइल. एहसे ओह पर लवटत बानी जवना पर लिखे चलल रहनी.

राजनीति में काम करे वाला भोजपुरियन के अनगिन नाम बा बाकिर भोजपुरी के राजनीति करे वालन के बहुते कम लोग जानेला. अपना मोहल्ला में रउरा के लोग जोनत होखो भा ना बाकिर रउरा भोजपुरी के फलां अनंतर्राष्ट्रीय भा विश्व संस्था के संस्थापक, अध्यक्ष, महामंत्री जरुरे हो सकेनी. आजु का रोजनीति में एगो जानल-पहिचानल (जानल-मानल लिखे से सकुचा गइनी काहे कि जरुरी नइखे कि जेकरा के रउरा जानत-पहिचानत बानी ओकरा के मानतो होखीं.) नाम हवे नेहा सिंह राठौर के.

बमुश्किल 27 बरीस के नेहा भोजपुरी लोकगायकी में आपन जगहा बना चुकल बाड़ी. कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातक नेहा के नामे पता ना सांच कि झूठ कवनो हॉस्टल कांडो के जिकिर क के उनुकर छवि बिगाड़े के कोशिश होखल करेला.

खुद नेहा सिंह बतावेली कि कवि दू तरह के होलें. एगो होलें सरकारी कवि आ दोसरका होलें असर-कारी कवि. लोक में लोकप्रियता का चलते एह लोग के लोक कवि के दरजा मिल जाला. लोक कवि चारण-भाँट ना होखे. ऊ त लोक के दुख-दरद उजागर करे के काम करेला.

एही तरह कहल जाला कि जवना के रउरा छपवावल चाहीं ऊ त विज्ञापन सरीखा होखी बाकिर जवना के केहू लुकवावल चाहे ऊ उजागर हो जाव त खबर बन जाला.

राजनीति में नेहा के नाम आ गवनई के धूम मचे के शुरुआत भइल बिहार में का बा गीत से. बाकिर छा गइली यूपी में का बा गीत से. मोदी-योगी विरोधी उनुका के लपक लिहलें आ राजनीति का खिलाड़ियन में उनुकर नाम जानकारी में आ गइल. नेहा सिंह का गायकी से रोजनीतिक गोलन के फायदा उठावत देख नेहो सिंह चहली कि उनुको कांग्रेस से लोकसभा के टिकट मिल जाव दिल्ली में मनोज तिवारी का खिलाफ लड़े खातिर. बाकिर मिलल ना. आ ना मिलला का बावजूद अबहीं उनुकर कवनो गीत कांग्रेस का खिलाफ नइखे आइल आ शायद अइबो ना करी काहें कि ऊ आपन असर-कारी कवि वाला छवि बिगाड़ल ना चहिहें. इंडी के राजनीति में आवहूं के शायद इहे सोच के कोशिश कइले होखिहें कि हाल-फिलहाल ओहिजा रहि के सरकारी कवि होखे के ठप्पा नइखे लागे वाला.

त लीं पहिले त नेहा सिंह के गावल गाना यूपी में का बा सुन लीं. एकरा जवाबो में कई गो गाना बनल कि यूपी में बाबा बाकिर खोजा चलनी त पनरोहा में उतर के पाँकी उलीचे वाला एगो कॉमेडियन कवि – प्रीतम रितु – के गाना भेंटा गइल. चहनी कि उनकरो गाना रउरा के एहिजे सुनवा दीं बाकिर प्रीतम ना चाहसु कि उनुकर कवनो पोस्ट दोसरो वेबासाइट पर देखावल जा सके. एहसे उनुका गाना के लिंक नेहा का गाना का नीचे दे देब.

पनरोहा में उतरल कवि प्रीतम रितु के गाना –

1 Comment

  1. Editor

    पप्पू मिश्र जी त एगो कविते भेज दिहले बानी –

    बिहार में का नइखे

    सिरिजन डॉटकॉम के सुभाष पाण्डेय जी के टिप्पणी ह्वाट्सएप से मिलल बा. लिखले बानी कि –

    हमरा त नेहा ना गायिका लागेली ना कवि। गायिका खातिर ना विधिवत शिक्षा त कम से कम बढ़िया आवाज त होखहीं के चाहीं। कविता के व्याकरण बा, विधि विधान बा। इनका कवितन (गीतन) में एकर एकदम कमी बा। सरकार के आलोचना कइल इनकर संविधान से मिलल अधिकार बा, जवन इनका फैन लोग का रूचेला। ए पर हमार कवनो आपत्ति नइखे। लेकिन, नेहा ना गायिका हई ना कवि हम दुबारा कहत बानीं। अपना के ऊ कुछ कहत रहसु, ए से हमरा कुछ लेना देना नइखे। राउर लेख पढ़नीं हँ त मन में आइल ह कि अपना मन के बात लिखि दीं। हमार बात चाहीं त अपना लेख के कमेंटबाक्स में चढ़ा सकिले।

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