होरी आइल बा आ खुलल मुँह बा : 2 गो कविता

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

JaishankarDwivedi

होरी आइल बा

जरत देश बा-धू धू कईके
सद्बुद्धि बिलाइल बा.
कइसे कहीं कि होरी आइल बा.

चंद फितरती लोग बिगाड़ें
मनई इनकर नियत न ताड़ें
मगज मराइल ए बेरा मे
भा कवनों चुरइल समाइल बा.
कइसे कहीं कि होरी आइल बा.

बुढ़ पुरनियाँ लईका औरत
आग लगावत सगरों दउरत
सरकारी गेहूं के संगे
घुनवो अब पिसाइल बा.
कइसे कहीं कि होरी आइल बा.

ढहल जाता समाज के मड़ई
सूखल जाता प्रेम के गडही
मारे डर के दुबकल घरहीं
बिन पानी के झुराइल बा.
कइसे कहीं कि होरी आइल बा.

नवटंकी बहुते बा भारी
रउन्दाइल बा नेह के क्यारी
नोट-वोट के जोड़-तोड़ मे
भर देशवा अइठाइल बा.
कइसे कहीं कि होरी आइल बा.

खुलल मुँह बा

कंहवा से लाई कवन तरकीब,
खुलल मुँह बा.
केकर केकर पकड़ी जीभ,
खुलल मुँह बा.

केहु धरम फरमावे,
खाली रगड़ा बढ़ावे.
भइल बाउर बा दुनिया क प्रीत,
खुलल मुँह बा.

केहु भगती देखावे,
आपन पचरा सुनावे.
भरल माहुर से सबनी क रीत,
खुलल मुँह बा.

केहु हमरा रिगावे,
खाली ठेंगा दिखावे.
खीझल बिलाई क बा ई प्रतीक,
खुलल मुँह बा.

जेकरे क ख ना आवे,
उहो उपदेश सुनावे.
जरत हियरा मे पड़ी ना शीत,
खुलल मुँह बा.

राग-रंगत भुलाइल
उहो संगत मे पिसाइल.
फेर त सपनों मे होई ना जीत,
खुलल मुँह बा.

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