( दयानन्द पाण्डेय के बहुचर्चित उपन्यास ‘बांसगांव की मुनमुन’ के भोजपुरी अनुवाद )
(धारावाहिक कड़ी के चउदहवां परोस)
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( पिछला कड़ी में पढ़ले रहीं कि मुनमुन के बिआह तय हो गइल, तिलको चढ़ा दीहल गइल आ अब बिआह के तइयारी शुरु रहे. अब आगे के कहानी पढ़ीं. पिछलका कड़ी अगर ना पढ़ले होखीं त पहिले ओकरा के पढ़ लीं.)
बाकिर अगिला दिने कोहराम मच गइल. चुपेचुपे. कुछ अइसन जइसे कि खामोश अदालत जारी है. घनश्याम राय के फ़ोन आइल रहल. उनुका मुताबिक कवनो विवेक सिंह उनुके के फोन कर के उनुका बेटा राधेश्याम के धमकवले बा कि, ‘बारात ले के बांसगांव मत अइहऽ. ना त पूरा बारात आ तहरो हाथ-गोड़ तूड़ के बांसेगांव में गाड़ देब. मुनमुन हमार हिय आ हमरे रही.’ घनश्याम राय ई डिटेल देत पूछतो रहलन कि, ‘ई विवेक सिंह हवे के?’
जानत त सभे रहुवे कि विवेक सिंह के ह बाकिर सभे अनजान बनल रहल आ कहल कि, ‘चिंता मत करीं कवनो सिरफिरा होखी आ ओकर पता लगवा के इंतज़ाम कर दीहल जाई. रउरा निफिकिर खुशी खुशी बारात ले के आईं.’ यह आश्वासन धीरज अपना ज़िम्मेदारी पर दीहलन. बाकिर घनश्याम राय कहलन, ‘बारात अइसे ना आ पाई. ’
‘तब?’
‘हम पहिले अपना होखे वाली बहू से सीधे बतियाइब आ ओकरा बादे कवनो फ़ैसला करब.’
‘सुनत त रहनी स कि रउरा बड़हन दबंत हईं, ब्लाक प्रमुख रहल बानी. बाकिर रउरा त कायरता वाली बात करत बानी?’ धीरज कहलन.
‘रउरा जे समुझीं बाकिर हम बिना लड़िकी से बतियवले कवनो फ़ैसला नइखीं लेबे वाला.’
‘रुकीं, हम अबहियें बात करवा देत बानी.’
‘ना फ़ोन पर ना. मिल के आमने-सामने बात करब आ आजुवे.’
‘त कब आवत बानी?’
‘बस दू-तीन घंटा भितरे.’
‘आ जाईं!’ धीरजो कड़ेर हो के बोलल.
फेर धीरज राहुल के बोलवलन. राहुल के आवते धीरज बउरा गइल. लागत हे जइसे ऊ राहुले के मार डाली. राहुल कहबो कइलसि कि, ‘भइया हम सम्हारत बानी.’
‘कवनो ज़रूरत नइखे.’ धीरज सख़्ती से कहलन, ‘तूं अबहीं मुनमुन के सम्हारऽ आ समुझावऽ. घनश्याम राय अबहीं थोड़ही देर में आवे वाला बाड़न. ऊ मुनमुन से खुदे बात करिहें. तब फ़ैसला करिहें कि बारात आई कि ना.’ कह के धीरज अम्मा का लगे गइलन आ कहलन कि, ‘अम्मा तूंही समुझावऽ मुनमुन के कि अबहीं त शादी कर लेव. बाद में चाहे जवन करे. एह तरह भरल सभा में हमहन के पगड़ी मत उछाले. मूड़ी मत नवावे.’ फेर धीरज अपना पत्निओ के समुझवलन कि उहो मुनमुन के समुझावे. आ रमेशो के पत्नी का लगे गइल कि, ‘भाभी रउरो समुझाईं.’ एकरा बाद ऊ एस.डी.एम. के फ़ोन कर के बोलववलन आ एस.डी.एम. से अकेले में बात करि के बतवलन कि, ‘विवेक सिंह नाम के लाखैरा शादी में अड़चन बन रहल बा. ओकरा के संजीदगी से बांसगांव का बजाय कवनो दोसरा थाना के पुलिस से तुरते गिरफ़्तार करवा के, हाथ गोड़ तुड़वा के हफ़्ता भर ला बुक करवा द.’ ऊ जोड़लन, ‘हमरा इज़्ज़त के सवाल बा.’
‘सर!’ कहि के एस.डी.एम. चल गइलन. आ धीरज के कहले मुताबिक़ दोसरा थाना के पुलिस से विवेक सिंह के आर्म्स एक्ट में अरेस्ट करवा के निकहा से पिटाई-कुटाई करवा दीहलन. आ मामिला का बा एकर गंधो ना लागे दीहलन. आखिर सीनियर के घर के इज़्ज़त के सवाल रहुवे.
एने मुनमुन एह सब से बेख़बर रहल. बाकिर जब एके साथे अम्मा आ भाभी लोग ओकरा के समुझावे लागल त ऊ बेबस हो के रो पड़ल. बाद में बहिनो सब ओकरा के समुझवलीं. बाकिर मुनमुन जवना तरह पूरा मामिले से अनजान होखे के बात जतवलसि आ पूरा तरह निर्दोष लागल त धीरज गइलन कि दाल में कुछ करिया बा. आ फ़ौरन ओकरा लागल कि कहीं ई सब गिरधारी चाचा के लगावल आग मत होखे. ऊ फ़ौरन घनश्याम राय से कहलसि कि या त ऊ कालर आई डी फ़ोन लगवा लेसु भा फ़ोन पर आवे वाला काल्स के एक्सचेंज का थ्रू जचँवा लेस, जेहसे कि ई शरारत करे वाला के दबोचल जा सके. घनश्याम राय बतवलन कि ऊ पहिलहीं कालर आई डी फ़ोन लगवले बाड़न. आ नंबर चेक करवा लिहले बाड़न. ई नंबर एही बांसेगांव के कवनो पी.सी.ओ. के हवे. फेरू ऊ ई नंबरो दे दीहलन. ओह नंबर वाला पी.सी.ओ. पर धीरज जांच पड़ताल करववलन. तबो कवनो ठोस जानकारी ना हीं मिल सकल कि के फोन कइले रहल. धीरज के मन भइल कि एक बेर गिरधारिओ चाचा के शेख़ी निकलवा देव. करवा दे उनुकरो कुटाई एह बुढ़उतीमें. बाकिर कहीं लेबे का बदले देेबे के मत पड़ जाव आ आपने छिछालेदर हो जाव. से ऊ ज़ब्त कर गइल.
ख़ैर, घनश्याम राय बांसगांव अइलन. गुपचुप उनुका के मुनमुन से मिलवाइओ दीहल गइल. दीहल ट्रेनिंग मुताबिक़ ऊ पल्लू कइले उनुका से मिलल, मिलते गोड़ छूअलसि आ हर सवाल के पूरा शिष्टता से सकारात्मक जवाब दिहलसि आ इहो कहलसि पूरा ताक़त आ विनम्रता से कि, ‘हम कवनो विवेक सिंह के नइखीं जानत.’ घनश्याम राय पूरा तरह संतुष्ट हो के बांसगांव से गइलन. असुविधा करे खातिर क्षमा मंगलन आ कहलन कि, ‘निश्चिंत रहीं कवनो शरारती तत्व का बहकावे में अब हम नइखीं आवे वाला. बारात निश्चित समय से आ जाई.’
धीरज झुक के उनुकर गोड़ छू के उनुकर आभार जतवलन. अतना सब हो गइल बाकिर मुनक्का राय के एह सब के कवनो आहट ना लागे दीहल गइल. जानत-बूझत. कि अइसन मत होखो कि ई सब जान-सुन के उनुकर स्वास्थ्य मत बिगड़ जाव. अम्मो के धीरज समुझा दीहलन कि, ‘बाबू जी के ई बस बतवला के जरुरत नइखे. ना त कहीं उनुकर तबियत बिगड़ गइल त अलगे मुसीबत हो जाई.’
अम्मा मान गइली. फेर धीरज सोचलन कि काहे ना शादी का दिने फ़ोर्सो के व्यवस्था करा लेव. एस.डी.एम. से कहि के सादा कपड़न में पुलिसो लगवावे के व्यवस्था हो गइल आ एस.एस.पी. से कहि के घुड़सवार पुलिसो बारात के स्वागत ला दरवाज़ा पर तैनात करवाने के व्यवस्था करा लीहलन. फेर ओह घड़ी के कोसलन जब बाबू जी बांसेगांव में रहे के तय कइलन. अपनो के कोसलसि कि काहे ई घर बांसगांव जइसन लीचड़ जगह में बनववलसि जहां के गुंडई के खबर पहिले चहुँपेला, आदमी बाद में. एह से नीमन त ई रहीत कि ऊ ई घर गांवे बनववले रहीतन. ख़ैर, अब त जवन होखे वाला रहल, हो गइल, अब आगे के सुधि लेबे के रहल. फ़िलहाल त घर में रौनक़ रहल. लागते ना रहल कि ई उहे घर ह जवना में मुनक्का राय, मुनमुन आ उनुकर अम्मा आपन संघर्ष भरल दिन गुज़ारत रहल बा. एक-एक पइसा जोड़त आ तिल-तिल मरत. कबो दवाई ला त कबो रोजमर्रा के चीझन ला.
अबहीं त घर गुलज़ार रहल आ चकाचक पुताई अउर सजावट से सराबोर. चहकत आ महकत लोगन से भरल ई घर यक़ीन दिआवत रहल कि हँ, एही घर में जज अउर अफ़सरन के बसेरा बावे. चिकना-चुपड़ा बचवो सभ एह बात के तसदीक़ करत रहले सँ. गिरधारीओ राय ले एह घर के ख़ुशी में खनकत सजावट आ चहक के रिपोर्ट मुसलसल चहुँपत रहल. कुछ पट्टीदार अउर रिश्तेदार कबूतर बनल रहलें. बाकिर गिरधारी राय पल-पल बेचैन रहलन. घर के ख़ुशियन आ ओकरा खनक से ना बलुक जवन बबूल ऊ फ़ोन पर घनश्याम राय आ उनुका बेटन के परोसवा चुकल रहलन, ओकरा से आम के फसल कइसे मिलत रहुवे, एह से! उनुका त उमेद रहल कि अबहीं ले त कोहराम मचल होखी. बाकिर एहिजा त सब गुडे-गुड न्यूज़ बरसत रहुवे. एगो रिश्तेदार महिला जे प्रौढ़ा से आगा बूढ़ात रहली. शादी के तइयारियन, इंतज़ामन, ज़ेवरात वग़ैरह के ब्यौरा परोसत रही आ गिरधारी राय का दिमाग़ में माछी भिनभिनात रहली स. जब बहुत हो गइल त ऊ बुदबुदइलन, ‘चार दिन के चांदनी फेर अंधेरी रात!’
‘शुभ-शुभ बोलऽ भइया. अइसन काहें बोलत बाड़ऽ!’ रिश्तेदार महिला बोलल.
‘अरे ना, हम त दोसरा बात पर बोलत रहीं.’ कहि के गिरधारी राय बात बदल दीहलन.
खै़र, तय समय पर बारात आइल. बाकिर द्वारपूजा के ठीक पहिले झमाझम बरखा होखे लागल. सगरी व्यवस्था थोड़िका देर ला हेन-बेना हो गइल. गिरधारी राय के ख़ुशी के ठिकाना ना रहल. केहू मुनक्का राय से कहलसि कि, ‘बरखा त रुकते नइखे? का होई?’
‘कुछ ना. हमार बेटा सब बाड़न स नू! सब सम्हार लिहें सँँ!’
‘ई बरखो?’ पूछे वाला बिदकल.
‘अरे ना, ऊ त भगवान जी सम्हरिहें. हम त इन्तजाम के बात करत रहीं.’
‘अच्छा-अच्छा!’
मुनक्का राय मुदित रहलन. मुदित रहलन; व्यवस्था पर, ताम झाम पर, बेटन के सक्रियता पर.
ख़ैर बरखा रूकल आ द्वारपूजा के तइयारी शुरू भइल. ज़मीन गील हो गइल रहल से चार गो तख़ता बिछा के ओकरे पर द्वारपूजा के तइयारी कइल गइल. द्वारपूजा पर दामाद के गोड़ पूजत मुनक्का के आंखें भर अइली सँ. भर अइली सँ ई सोचि के कि अब मुनमुनवो कुछ दिन बाद चल जाई आ ऊ अकेले रहि जइहें, मुनमुन के अम्मा का साथे. छत से पड़ रहल द्वारचार के अक्षतन का बीच, जवन औरत फेंकत रहली सँ, मुनक्का के ख़ुशी के ठिकान ना रहल. तवना पर बैंड बाजा पर बाजत छपरहिया धुन उनुका के एह बुढ़ौतिओ मेंं मस्त कर दिहलसि. अतना कि द्वारपूजा का बाद तख़त पर से छटक के कूदलन आ अपना पाछे बाजत बैंड का बीचे घुस के नचनिया के नाच देखे लगलन. उनुकर एगो नात बुदबुदा के पूछबो कइलसि आंख मटकावत कि, ‘का हो मुनक्का बाबू?’
‘अरे बड़ा नीमन नाचत बा!’ ऊ बुदबुदइलन आ लजात शरमात ओहिजा से सँसर गइलन.
बरातियन के जलपान वगै़रह हो गइला का बाद बराती इंटर कालेज परिसर में बनावल जनवासा में लवट अइलें. बिआह के बाकी तइयारी आ खाए पीए के व्यवस्था चलत रहल. दरवाजा पर रमेश कुछ लोगन का साथे बइठल रहलन. लोग रमेश जज साहब का लगे आवे आ प्रणाम कहि के भा गोड़ छू के आवत जात रहल. तबहियें मुनक्का राय के एगो सहयोगी वकील दू लोगन का साथे आ गइलन. कुर्सी कम पड़ गइल रहे. तबि एगो खाली कुर्सी देख के वकील साहब ओह पर जन गइलन आ बहुते बेफ़िक्री से बोललन, ‘ऐ रमेश तनी आव ओने से दू तीन गो कुर्सी उठा ली आवऽ.’ ओहिजा मौजूद लोग भौंचकिया के ओह वकील साहब के देखे लागल. बाकिर जतना बेफ़िक्री से वकील साहब रमेश से कुर्सी ले आवे के कहलन, ओही फुर्ती से रमेशे उठलन आ कुर्सी ले आवे चल दीहलन. कुर्सी ले आ के ऊ रखते रहलन तब ले एगो दोसर वकील ओह वकील साहब से बहुते संजीदगी से कहलन, ‘रउरा पता बा वकील साहब, रउरा एगो न्यायाधीश से कुर्सी मंगववनी ह.’
‘अरे, का बोलत बानी?’ शर्मिंदा होत ऊ कहलन, ‘बेटा माफ़ करीहऽ हमरा इयाद ना रहल.’
‘अरे कवनो बाति ना चाचा जी!’ रमेश पूरा विनम्रता से बोललन, ‘रउरा कहीं त दू चार गो कुर्सी अउरी ले आईं?’
‘अरे ना बेटा, बस!’ वकील साहब हाथ जोड़त कहलन.
‘अब ई हाथ जोड़ के हमरा के लजवाईं मत.’ रमेश ख़ुदे हाथ जोड़ के कहलन.
अइसने कुछ न कुछ चलत-घटत रहल. फेर भसुर ताग-पाट आ कन्या निरीक्षण पूरवलन, जयमाल भइल, लोग जम के भोजन कइल. सभे खाना के आ इंतज़ाम के डट के तारीफ़ कइल. का घराती, का बराती सबहीं. ज़्यादातर बाराती चल गइलें. घराती, आ पड़ोसिओ चल गइलें. रिमझिम बारिश का बीचे बिआह के रस्म शुरू भइली सँ. तब ले अधरतियो हो चुकल रहे. कतहीं कुछ अप्रिय ना घटल. सब लोग चैन का सांस लीहल. लावा परिछाई भइल, पांव पुजाई भइल, कन्यादान भइल. सबेर हो गइल बाकिर बारिश के रिमझिम ना थमल. रिमझिम का बीचही नाश्ता कइला का बाद कोहबर में दुल्हा-दुल्हन पासा खेललें. माथ ढंकाई भइल आ मड़वा अस्थिल के रस्म भइल. दुलहा दुलहिन के सखियन आ घर के मेहरारुवन से मिललन. बचल खुचल बारातो जब विदा हो गइल तबहिओं ले बरखा थमल ना रहे. दुलहिन के विेदाई ना भइल काहें कि घनश्याम राय किहां बिआह का साथे विदाई सहत ना रहल से तय भइल रहल गवना एक बरीस भितरे करावे के.
ख़ैर, बिआह ठीक से निपट गइल. ई सोच के सबहीं संतोष कइल. पूरा शादी में हित-नात-परिजन इहो नोट कइल कि रमेश के बड़का भाई होखला के सम्मानो मिल गइल. ना त बाकी बहीनन के बिआह में उनकर हैसियत नौकरो-चाकरन से गइल-बीतल वाली रहल. बाकिर अबकी ना. रमेशो मूड़ी नववले ना, मूड़ी उठवले घूमत रहलन. मुनक्को राय भी खुशी में रहलन.
आ जइसन कि अमूमन सगरी शादियन में होखेला कि बारात का विदाई का बाद जेकरे जहँवे जगह मिल जाव, ओहिजे ओंघट जाला आ जवन नातेदार रात में नींद ले लेले रहेला ऊ विदाई के तइयारी में लागल रहेला. एहिजो उहे मंज़र रहल बाकिर तनिका फरको रहल. दुपहरिया होखत-होखत रमेश, धीरज, आ तरुणो अपना सपरिवार बांसगांव से विदाई मेंं लागल रहलें. अम्मा टोकबो कइलसि कि, ‘अबहीं कइ गो रस्म बाकी बा. फूलसेरऊवा हो गइला का बाद जइतऽ लोग त नीमन रहीत. बाकिर एह सब ला केहू का लगे समय ना रहल. सभे के आपन-आपन व्यस्तताएं रहल. फेर भइल ई कि घर में रिश्तेदार रह गइलें, घर वाला चल गइलें. मुनक्का राय के सगरी हर्ष विषाद में बदल गइल. बीच रिमझिमे में तीनो बेटा सपरिवार चल गइलें. सभ का लगे आपन-आपन गाड़ी रहल. गाड़ी स्टार्ट होखत गइली सँ बारी-बारी. अब रह गइलन राहुल आ उनुकर परिवार. विनीता आ रीता दुनू बहीन, ओहनी के पति आ बाल-बच्चा. छिटपुट कुछ अउर रिश्तेदार. राहुल के अबहीं सगरी बचल खुचल हिसाब-किताब करे के रहल. सभकर विदाई करे के रहल. सबले छोटका भाई होखला का बावजूद उनुके बड़कन के ज़िम्मेदारी निभावे पड़ल. ख़रच-वरच के प्लानिंग त ख़ैर ऊ थाईलैंडे से कर के आइल रहलन बाकिर इहो जिम्मेदारी उनुके निभावे पड़ी, ई ना सोचले रहलन. बड़ भाइयन पर ऊ कुछ क्रोधितो भइलन. अम्मा से कहबो कइलन कि, ‘मत कुछ करीत लोग बस घर में बनल रहीत त नीमन लागीत.’
‘हँ बेटा, बारात जातहीं घर सून हो गइल. हमरो नीक नइखे लागत.’ अम्मा कहली.
दू दिन बाद राहुलो चले के तइयार हो गइलन त अम्मा टोकली कि, ‘तहरा त बेटा अगिला हफ़्ता जहाज़ पकड़े के रहल?’
‘हँ अम्मा, बा त अगलहीं हफ्ता के जहाज़ बाकिर दिल्ली में कुछ ज़रूरी काम करे के बा.’ ऊ बोला, ‘फेर सगरी काम-धाम त होईए गइल बा. कुछऊ त बाकी नइखे रहि गइल अब?’
‘हँ, ऊ त बा बाकिर दू चार दिन अउर ठहर जइतऽ त नीमन लागीत.’
‘ना अम्मा, अब जाए दऽ!’
‘त अब फेरु कब अइबऽ?’ अम्मा बोलली, ‘एकरा गवना में त अइबऽ नू?’
‘कहां अम्मा?’ राहुल बोलल, ‘अतना जल्दी फेरु छुट्टी आ अतना ख़रचा आवे-जाए के. कहां आ पाएब.’
‘हँ, ख़रचा त तोहार ढेरे हो गइल.’ अम्मा बोलली, ‘बाकिर जबे मौक़ा मिले जल्दी अइहऽ.’
‘ठीक अम्मा.’ कह के ऊ बाबूओ जी के गोड़ छूअलन. मुनक्का राय के आंखिन में लोट भर गइल. ऊ फफके के रो दीहलन आ राहुल से लिपट गइलन. रोवते-रोवते बोललन, ‘बुढ़ापा में तूं हमार लाठी बनि के हमार लाज बचा लीहलऽ. अउर का कहीं? तूं बहुते कइलऽ’
‘कुछ ना बाबू जी, ई त हमार धरम रहल.’ कहि के राहुल चले लगलन त मुनमुन ओकरा से लिपट के फफके लागल.
‘अरे अबहीं त तोहर विदाई नइखे होखत, तूं अबहियें से काहें रोवत बाड़ू.’ राहुल हंसत पूछलन. बाकिर ऊ चुपचाप लोर बहावत रहि गइल. कृतज्ञता के आंसू. फेर राहुले ओकर चेहरा हाथ में ले के बोलल, ‘अब घर के लाज तोहरा हाथन में बा. अब कुछ अइसन-वइसन सुने के ना मिले त नीमन रही.’
मुनमुन स्वीकृति में मूड़ी हिला दिहलसि. राहुल का गइला का बाद बाक़ी रिश्तेदारो दू तीन दिन में चल भइलन. रह गइलन त उहे तीन जने – मुनक्का राय, मुनमुन अउर अम्मा. फेर उहे कचहरी, उहे स्कूल, उहे बेमारी, उहे दवाई आ उहे रोज़मर्रा के संघर्ष.
मुनक्का राय एक दिन मुनमुन के अम्मा से बोललन, ‘कइसन सांय-सांय करत बा घर!’
‘हँ, ऐने कुछ दिन त कइसन गुलजार हो गइल रहल घर. सभे जुटल रहल त रौनक़ बढ़ गइल रहल.’ मुनमुन के अम्मा बोलली.
‘लागऽता जइसे ई घर, घर ना कवनो गेस्ट हाऊस हो गइल रहल. कि मुसाफ़िर आए. खाए-पिए, रहे आ चल जाव.’ घर के छत निहारत ऊ कहलन, ‘जइसे कवनो पेड़ पर पतझड़ बरप हो गइल होखे.’
बाकिर मुनमुन के अम्मा चुपे रह गइली. मुनक्का राय के दुख के अपना दुख में मिला के ऊ अउर बड़ ना कइल चहली.
एने मुनमुनो शादी का बाद से विवेक के ख़बर लिहली, ना ही विवेके लिहलसि मुनमुन के. राहे-पेड़ा ऊ कतहीं लउकबो ना कइल मुनमुन के. विवेक ना मिलल. लउकबो कइसे करीत? ऊ त ज़मानत का बाद घर में घायल पड़ल दवाई खात रहल. ओकरा बुझाते ना रहल कि ओकर कसूर का रहल? जे पुलिस ओकरा के फ़र्ज़ी तरीका से आर्म्स एक्ट मेंं गिरफ़्तार करि के पिटाई करि के जेल भेज दिहलसि. बाइक चलावल, पान खाइलम आ थोड़-बहुत सिटियाबाजी बस इहे तीन गो शौक़ रहल ओकर. कट्टा वग़ैरह के शौक़ कबो ना रहल ओकरा. ई बाति ओकरा घरो के लोग जानत-मानत रहल. बाकिर पुलिस ओकरा लगे से कट्टा मिलल देखा के गिरफ़्तार कर लिहलसि.उहो बांसगांव के ना, गगहा के पुलिस. ई सब ओकरा आ ओकरा परिवार का समझ से बाहर रहल.
ख़ैर, बिआह का बाद मुनमुन संयमित जीवन जीयल शुरू कर दिहलसि. ओकर शेख़ी भरल शोख़ी ना जाने कहां बिला गइल. ओकर चालो बदल गइल. अब ऊ पहिले के चपलता, चंचलता आ मादकता जइसे भूला गइल रहल. मांग में ख़ूब चटक सिंदूर लगवले जब ऊ धीर गंभीर चाल में चले त लोगो ताज्ज़ुब करे आ कहे कि. ‘अरे का ई उहे मुनमुन हियऽ? उहे मुनमुन बहीन?’
हँ, अब मुनमुन बदल गइल रहुवे. ई मुनमुन ई पहिले वाली मुनमुन ना रहल. बांसगांव के सड़को इहे दर्ज करत रहे, ओकरा गांव के प्राइमरी स्कूलो आ लोगो. आंख उठा के लप-लप देखे वाली मुनमुन के आंख अब नीचे होके आपन राहे भर देखल करे. ऊ ख़ुदहूं कबो अपना बारे में सोचल करे कि का बिआह एगो लड़िकी के अतना बदल देला? चुटकी भर सेनूर के वज़न का अतना भारी होला कि एगो चंचल शोख़ो लड़िकी गंभीर औरत में बदल जाले? हैरत होखल करे ओकरा अपना आप पर. कि ओकर बाडी लैंगवेज अतना कइसे बदल गइल?
बाकिर बदल त गइले रहल.
(अबहीं ले त एह उपन्यास के भूमिको ठीक से नइखे बन्हाइल आवत रहीं अगिला कड़ी पढ़ल करे – अनुवादक)
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