बालापन के छन्द

लेख

बालापन के छन्द

– महेन्द्र सिंह प्रभाकर

छन्द गीत के उप-कारक हऽ आ छन्दे गावल जाला. ई जीवन के हर पहलू से जुटल रहेला. अब ई वैज्ञानिक सत्य मानल जा रहल बा कि गीत संगीत का प्रभाव से रोग के निदान हो सकेला. दुधारु से अधिका दूध पावल जा सकेला. फलदार से अधिका फल पावल जा सकेला. एह से स्पष्ट बा कि गीत संगीत में ढेरे शक्ति बा. प्रसव वेदना में हजार बिच्छियन के डंक के पीड़ा मानल गइल बा. ओह बेदना के अंगेजे में सोहर के हाथ बा. सोहर के छन्द के धुन, स्वर, लहर आ तालके प्रभाव बेजोड़ होला. सोहर जच्चा बच्चा दूनू प सोहावन प्रभाव डालेला. दूधमुंहा बच्चा जब बेलगना रोवे लागेला तब ओकरा के सुतावे भा ओकर मन बहलावे खातिर लय में थपकी दे दे के लोरी गवाला जेहसे ऊ सुत जाला. भोजपुरी के परंपरित लोरी में सभ्यता संस्कृति के, ज्ञान विज्ञान के अपार भंडार बा. बानगी देखीं :

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अरर गरर पुआ पाकेला,
चिलरा खोईंछा नाचेला.
जइहे चिलरा खेत खरिहान,
ले अईहे सिरहंटिया धान.
ओहि धान के चूरा कुटाय,
ऊ चूरा मोरा बभना खाय.
बभना के पूतवा देला आशीष,
जीये बबुआ लाख बरिस.

एह गीत प धेयान देला से मालूम होति बा कि एकर छन्द सोरह मात्रा के तुकान्त बा. मात्रिक छन्द के संबंध प्राकृत काल से बा. तुकान्त भइल अपभ्रंश से पहिले ना रहे. एकरा शब्दावली प धेयान देला से मालूम होति बा कि आदिवासी शब्द ‘चिलरा’ के प्रयोग एकरा में आदिवासी प्रभाव के झलका देति बा. आदिवासी भाषा में चिलरा भा चिल्लर छोट लइकन भा रेजगारी के कहाला. सिरहंट धान के नामो ओहकाल के देखावत बा जब सिरहंट, बरांटी, साठी, सेरहा वगैरह धान के प्रजातियन के प्रधानता रहे. आजु काल्ह ई सब प्रजाति लुप्त होखे के कगार प बाड़ी स. दोसर बाति जवन एह गीत से झलकत बा उ ई कि पहिले ब्राह्मण के नेवान – नव अन्न – कराके तब दोसर लोग खात रहे. दुआ आशीरवाद से उमिर बढ़े के बाति अब विज्ञान सम्मत मानल जात बा. एहतरे देखीं त परंपरित लोकगीतन में हमनी के संस्कृति आ समाज के इतिहास भरल बा. साथे साथ भोजपुरी मात्रिक आ तुकान्त छन्द के ई एगो पुरान नमूना बा जवन कंठे कंठे पुश्त दर पुश्त से चलल आ रहल बा. छोट लइकन के खिआवे पिआवे में छन्दन के उपयोग गीत रूप में कइल जाला. एह गीतन में वात्सल्य रस के धारा प्रवाहित होत रहेला. जइसे :

ऐ चन्दा मामा,
आरे आवऽ
पारे आवऽ
नदिया किनारे आवऽ.
सोना के कटोरवा में,
दूध भाति ले ले आवऽ
बबुआ के मुंहवा में घुटुक.

बच्चा के खड़ा होखे खातिर ‘धा ती ना, धा ती ना’ कह के उत्साहित कइल जाला जवना में छह मात्रा के दादरा ताल ध्वनित होला. एह में ‘धा ती ना’ तबला के तीव्र जाति के बोल ह जवना के दोहरा दीहला से छव मात्रा के दादरा ताल बन जाता. एह से स्पष्ट बा कि दादरा ताल के जड़ पाताल तक में धंसल बा. दुआर प भा खोरी में लइकन के खेले खातिर कवनो दोसर उपकरण के जरुरत ना होखे. ओह में सभ खेल छन्दात्मक आउर गेय बाड़न स. जइसे ‘ओका बोका’ के खेल तीन चरण में समाप्त होला. पहिलका चरण में :

ओका बोका तीन तलोका,
लउआ लाठी चन्दन काठी,
बाग में बगडोला डोले,
सावन में करइला फरे.
उ करइला के नांव का ?
इजई बिजई पनवा फुलवा,
ढोढ़िया पुचुक जा.

दोसरका चरण में :

थापुर थापुर तेलिया,
घीव में चमोरिया,
हम खाईं कि भउजी खाए?
भउजी पतरेंगिया,
धई कान ममोरिया.

तिसरका चरण में :

चूँटा हो चूँटा,
मामा के घइलवा
काहे फोरलऽ हो चूँईटा ?

आ आखिर में लाता लूती कर के खेल खतम कइल जाला. ई सभ छन्द ताल कहरवा के गीत बाड़न स. एह में पहिलका चरण के पहिलकी आ दोसरकर पांति सोरह सोरह मात्रा के बा जवना में आठ आठ मात्रा प यति आ तुक मिलत बा. हरेक में दू दू गो सम चतुष्पदी रहला अवरु तुक मिलला से ‘मदन’ छन्द बा जवना के संबंध प्राकृत अवरु अपभ्रंश से बा. हिन्दी में ई मदन छन्द नइखे लउकत.

दोसरका खेल ‘तार काटो’ के बा. ईहो तीन चरण में समाप्त होला. जइसे पहिलका चरण में :

तार काटो, तरकुल काटो,
काटो रे मोर खाजा.
हाथी प के घुघुआ चमकि चले राजा.
राजा के रजइया काटो,
भईया के दोपाटा.
हिंच मारो हिंच मारो
मूसर लेखा बेटा.

दोसरका चरण में :

तलवा खुलबे ना करे,
चभिया मिलबे ना करे.
चभिया मिल गइल,
तलवा खुल गइल.

आ तिसरका चरण में :

एह में का बाऽ बबुआ?
का खालाऽ दूध भाता?

आदि. एकर पहिलका चरण के छन्द ताल छन्द के बा. दोसरका में पहिला तेरह छन्द के मात्रा बा जवना के मात्रिक संबंध प्राकृत के अप्सरोविलसित छन्द से बा. बाकि एकरा में तुक भइला से अपभ्रंश से संबंधित हो जात बा. एकर अन्तिम भाग में नवमात्रा के छन्द बा. एह प्रकार से मात्रिक छन्दन के प्रारम्भिक प्रभाव लइकन के खेल से बा जवन कंठे कंठे पुश्त दर पुश्त से चलल आ रहल बा. बाहरी खेलन में चिका, कबड्डी आदि बा जवना में कवनो उपस्कर के जरुरत ना पड़े. कबड्डी में दूगो दल रहेला जवना के सदस्य दोसरका दल के पाला में जाके आपन शक्ति बल के प्रदर्शन करेला. एहमें तरह तरह के छन्छ पढ़ल जालन स. जइसे :

आवतानी हो, परइह मत हो.
कान जाई टूटी, कपार जाई फूटी,
लड़िकपन छूटी.

भा,

चल कबड्डी रेता,
भगत मोर बेटा,
भगताइन मोर जोड़ी,
चरावेली घोड़ी.

चाहे,

चल कबड्डी आरा,
सुल्तानगंज मारा,
कोई नाम ले हमारा.

भा,

कबडी में लबडी, पताल में पुआ,
मालिन के बेटिआ खेलत बाड़ी जुआ.

एही तरह से अनेक छन्द बाड़न स जवन ताल छन्द के बाड़न स. खेले में ‘दाव पुरवल’ जरुरी होला. कंहू अपने खेल के दोसरका के दाव ना पुराई त दोसरका किरिआ धरा दिही. पहिलका अपना प चढ़ल किरिआ छोड़ावे खातिर कहे लागी :

बकुला बकुला कहॉं जालऽ
मुरई का खेत में.
सेर भर सतुआ ले ले जा,
गंगा में दहववले जा.
गंगा में के खूंटा खूंटी, लोहे के मचान,
हमरो किरिअवा उतरीहऽ हो भगवान.

ई कह देला प किरिआ उतरि जाला. जब लइका कुछ मजगुत रहेला त ओकर दाव ना पुरवईला प कहेला :

हमार दउवा ना पुरावे, सेकर माई भुजरी,
खाले गिरिगिटिआ बिआले मुसरी.

अतना कहला प दाव पुरावल जरुरी हो जाला काहे कि एह में गाली के पुट बा. लइकन के इहो विश्वास रहेला कि दाव ना पुरवला प ‘लिट’ चढ़ जाला जवन बराबर चढ़ल रहेला. ऊ लिट का हऽ से केहू का मालूम नइखे. फेर किरिआ भा लिट उतारे के सरल उपाय इहे छन्द में रहे कि :

एक मुठी सुतरी, हजार किरिआ उतरी.

बालापन के विश्वास में ई बइठल बा कि एकरा से सभ किरिआ उतरि जाला. गोल गोल घुमला से घुमरी चढ़ जाला. घुमरी खेलत खानी लइका बोलेलन :

चकवा चकइया, हम दूनू भईया,
भईया के बिआह में, दूई सव रुपईया.

कवनो सयान भा बूढ़ जब सुताने सुत के अपना ठेहुना प बच्चा के सुताके खेलावेलन त गावेलन :

घुघुआ मन्ना उपजे धन्ना,
नया भीति उठेला, पुरान भीति ढहेला,
सम्हरिहे बुढ़िया रे.

खेले भा घुमे फिरे के क्रम में बहुत तरह के छन्दन के प्रयोग होला. जइसे सांढ़ के देखि के लइका हल्ला मचावेलन कि :

संढ़वा के पीठ प बदुरि बिआले.

पण्डित जी के रिगावत घरी कहेलन स :

पंडी जी पंडी जी गोड़ लागीलेऽ
रउवा छोटकी पतोहिआ के
ले भागी लेऽ

चाहे आकाश में बगुला देखिके :

बकुला बकुला दाम दऽ
चिनिआ बादाम दऽ.

जाड़ा में घाम तापत घरी :

रामजी रामजी घाम करऽ
सुगवा सलाम करे,
तहरा लड़िकवन के जड़वत बा.

बच्चवन के सभ कहानी छन्दात्मक भा चम्पू बाड़ी स. अधिकतर त कल्पित कथा हई स. एहमें पशु पक्षिअन के आदमी लेखा सोचत आ बोलत बतिआवत देखावल रहेला. गीतात्मक भईला से पुनरावृति में साहचर्य से काम लिहल जाला. छन्दात्मक कथा सुनावे के प्रचलन चिरकाल से बा. मनोविज्ञान के मुताबिक याद करे खातिर लयात्मक पाठ जरुरी ह. मस्तिष्क के विकास खातिर कथा-कथन के महत्वो मनोविज्ञान मानेला. हमनी किहां आचार्य विष्णु शर्मा के कथा संग्रह ‘पंचतन्त्र’ के आजुवो महत्व बा. जवन परम्परा हमनी किहां संस्कृतकाल से चलल आवत बा ओकरा ओरि पाश्चात्य वैज्ञानिक लोग के आंखि अब खुलल हऽ. लइकाईं में सुनल पहिलका गीत कथा ‘बढ़ई बढ़ई खूंटा चीर’ आजुले याद बा :

बढ़ई बढ़ई खूंटा चीरऽ
खूंटा में मोर दाल बा.
का खाईं का पीहीं,
का ले के परदेस जाईं ?

बाकिर बढ़ई त अपना काम मे मशगूल बा. एगो चिरई खातिर ओकरा लगे टाईम कहां बा? त चिरई राजा के लगे जात बिआ :

राजा राजा बढ़ई दण्डऽ
बढ़ई ना खूंटा चीरे.
खूंटा में मोर दाल बा.
का खाईं का पीहीं,
का ले के परदेस जाईं ?

लेकिन राजा के लगहूं फुरसत कहां बा? तब चिरई रानी का लगे जा के आपन दुख सुनावत बिआ :

रानी रानी राज बुझावऽ
राजा ना बढ़ई दण्डे,
बढ़ई ना खूंटा चीरे.
खूंटा में मोर दाल बा.
का खाईं का पीहीं,
का ले के परदेस जाईं ?

एही क्रम में ऊ सांप, लाठी, आग, समुन्दर, हाथी, रस्सी, मूस, बिलाई ओगैरह का लगे जा के आपन दुखड़ा सुनावत बिआ :

बिलाई बिलाई मूस मारऽ
मूस ना रस्सी काटे,
रस्सी ना हाथी बान्हे,
हाथी ना समुन्दर सोखे,
समुन्दर ना आग बुझावे,
आग ना लाठी जारे,
लाठी ना सांप मारे,
सांप ना रानी डंसे,
रानी ना राज बुझावे,
राजा ना बढ़ई दण्डे,
बढ़ई ना खूंटा चीरे.
खूंटा में मोर दाल बा.
का खाईं का पीहीं,
का ले के परदेस जाईं?

आ जब एगो तैयार हो जात बा त दोसरका तुरन्ते डर से तैयार हो जात बा :

हमरा के चीरऽ उरऽ जनि कोई,
हम अपने से फाटबि लोई.

खूंटा फाट जात बा आ चिरई आपन दाना ले के उड़ि जात बा अपना राह.

एह कथा में बिलाई तक चहुंपे में ताल कहरवा आ अवरोही में खूंटा फटला तक ताल दीपचन्दी में बा. एहतरे हमनी का पावत बानी जा कि बालापन के हर पहलू में छन्द के छांह भरल बा.
——–
करनौल, भोजपुर, बिहार

(दुनिया के भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर ई जनवरी 2004 में अंजोर भइल रहल)

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