पिछला दिने गोरखपुर के संस्था ‘भोजपुरी संगम’ के 181 वीं बइठकी चन्द्रगुप्त वर्मा अकिंचन के अध्यक्षता, सुरेन्द्र कुमार सिंह के मुख्य आतिथ्य अउर धर्मेन्द्र त्रिपाठी के कुशल संचालन का साथे संस्था कार्यालय 66, खरैया पोखरा, बशारतपुर में बइठल.
बइठकी के समीक्षा सत्र में मऊ से पधारल कृष्णदेव ‘घायल’ के भोजपुरी ग़ज़ल संग्रह ‘दरद के सोन्हाई’ के समीक्षा कइल गइल. एह दौरान वरिष्ठ कवि सुभाष चन्द्र यादव कहलन कि ‘घायल’ के ग़ज़लगोई समाज, मानवता, प्रकृति आ देश-दुनिया के प्रति जवाबदेही के बखूबी निर्वाह करेले आ बुझाला जइसे जेठ के तपत धरती पर बरखा के पानी गिराके राहत के सोंन्ह सुगंध से मानवता के सुवासित कइल गइल होखो. इनका हृदया में मरुथल के तपन बा त वसंत के बयारो बा, सावनी फुहारो बा. ई इनका के एगो सफल शब्द चित्रकार बनावत बा.
सुरेन्द्र कुमार सिंह के कहना रहल कि घायल के ग़ज़ल आजु का परिवेश में आम आदमी, ओकरा पर परिवेश के प्रभाव, आ एह प्रभाव पर ओह आम आदमी के प्रतिक्रिया से रूबरू करावेले.
आजमगढ़ से पधारल प्रो. जितेन्द्र कुमार ‘नूर’ कहलन कि घायल के ग़ज़ल जन संवेदना से जुड़ल भूख, गरीबी, राजनैतिक छद्म, पूँजीवाद के मनमानी, नैतिक पतन आ तार-तार मानवता से पीड़ित आम आदमी के गहन पहचान करावेले.
मुकेश आचार्य कहलन कि घायल के ग़ज़ल देश, काल, परिस्थिति पर बेजोड़ पकड़ राखेली सँ आ दशकन से जारी उनुकर रचना यात्रा एही में समाहित बा. जीवन के सगरी पक्षन पर कवि के बहुते सूक्ष्म दृष्टि बा जवना से कुछऊ अलोता नइखे रह गइल.
डा. चेतना पाण्डेय के कहना रहल कि घायल के ग़ज़लन में देश-दुनिया के ज्वलंत विषयन के व्यापक समावेश ई प्रमाणित करत बा कि भोजपुरी में कतना कुछ भा कहीं त सबकुछ रचल जा सकऽता.
बइठकी के काव्य-सत्र में पढ़ल गइल कुछ कवियन के खास उद्गार :-
अजय यादव –
चार दिन जिनगी क संगवाँ गुजारि के
उड़ि गइला सुगना हो खोतवा उजारि के
राम सुधार सैंथवार –
फागुन महीना ह प्रेम बरसावा
ऊँच-नीच सबके गले से लगावा
अरविन्द अकेला –
लिखि पाँती दुइ-चार, पिया के पठाव तानी गोरी.
राजेश मृदुल –
अपने आँचल क छाँव दऽ हमके
घाम से तिलमिला रहल बानी
राम समुझ साँवरा –
ककही से माथ झारिके, ऐना निहारि के
मेला में घूमे जात हऊ, रहिहऽ सँभारि के
अवधेश नन्द –
महुआ, मधु, मोजरि, मउज, हवें बसंती जोग.
पिउ बिनु भरमित नेहि बा, बिरहिन बढ़त बिजोग.
नर्वदेश्वर सिंह –
आइल महीना मधुमास, भोरहिएँ अजोर हो गइल
ठूँठओ में उठता हुमास, भोरहिएँ अजोर हो गइल
डा. फूलचन्द प्रसाद गुप्त –
भोजपुरी में नाहीं केहू बाटें जेकर सानी
धन्निभागि धरती पर अइलें, धरती पूत जुगानी
डा. अजय राय अनजान –
कवन रे ठगवा, ठगिनि पे लुभाइल बाटें
हर छन हर पल, नजदीक आइल बाटें
सन्तोष कुमार श्रीवास्तव –
माई रे माई काहें देले मरवाई?
पेटवे में जिनिगी क करेले बिदाई?
सुभाष चन्द्र यादव –
जेतना बिसवास हमरा गीता पर
ओतना हमके कुरान पर बाटें
सुरेन्द्र कुमार सिंह –
अब ना चलिहें कउनो बहाना, गुलमिया सुराज कहे खातिर
अब ना चलिहें कउनो बहाना, अन्हरिया बिहान कहे खातिर.
एह पंक्तियन का अलावा बइठकी में सृजन गोरखपुरी, अरुण ब्रह्मचारी, रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी, वागेश्वरी मिश्र वागीश, प्रदीप मिश्र, दिनेश गोरखपुरी, अखिल मिश्र, नगीना यादव के महत्वपूर्ण रचनात्मक उपस्थिति रहल. मेजबानी संयोजक कुमार अभिनीत अउर डॉ.विनीत मिश्र कइलन.
संस्था संरक्षक इं.राजेश्वर सिंह के आभार ज्ञापन का बाद आखिर में सभे दू मिनिट के मौन राखि के रवीन्द्र श्रीवास्तव जुगानी जी के श्रद्धांजलि अर्पित कइल गइल.
( भोजपुरी संगम के प्रसार प्रमुख सृजन गोरखपुरी के भेजल विज्ञप्ति का आधार पर )
(उमेद त नइखे, बाकिर अगर कवनो कवि जी एकरा के पढ़त बानी त निहोरा बा कि आपन एगो रंगीन फोटो का साथे पूरा कविता भेज दीं – ह्वाट्सअप का माध्यम से भा editor@anjoria.com पर – संपादक)
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