भाषा हऽ कि विषबेल हऽ भाई?

✍️ – रामसागर सिंह

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भाषा हऽ कि विषबेल हऽ भाई?

मारा-पिटी, गारा गारी,
नफ़रत वाला खेल हऽ भाई,
करत बाड़ऽ जवने खातिर,
भाषा हऽ कि विषबेल हऽ भाई?

बरियारी बोलवावे चललऽ,
झुठो शान देखावे चललऽ,
जवना पर केहु चढ़ते नईखे,
बोलऽ कइसन रेल हऽ भाई,
करत बाड़ऽ जवने खातिर,
भाषा हऽ कि विषबेल हऽ भाई?

कबले अइसन इरखा चली,
शेर बनेलऽ अपने गली,
पानी पर जवन पसरत नईखे,
देखऽ कइसन तेल हऽ भाई,
करत बाड़ऽ जवने खातिर,
भाषा हऽ कि विषबेल हऽ भाई?

बेंचले माल बिकाते नईखे,
पनियो के संगे घोंटाते नईखे,
अब तऽ एगो बात बता दऽ
लागल कइसन सेल हऽ भाई,
करत बाड़ऽ जवने खातिर,
भाषा हऽ कि विषबेल हऽ भाई?

गजब के इ मेहमानी बाटे,
गिरल आँख के पानी बाटे,
डर डर के जहवाँ आदमी जिये,
रामसागर लागे जेल हऽ भाई,
करत बाड़ऽ जवने खातिर
भाषा हऽ कि विषबेल हऽ भाई?


– रामसागर सिंह, सिवान, बिहार

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