(लघुकथा )
परमात्मा के पत्नी

ओह लइका दस – एगारह बरिस के रहल होई. माथ के मटिआइल – जटिआइल केस, सुखल – पचकल गाल, मुरझाइल – झुराइल चेहरा, गठरी के ढ़ील – ढ़ाल गेठरी बनल देह, बेबाइल गोड़ के एड़ी, मइल – कुचइल झाँझर बहतर में सिहरल – भयाइल ऊ बाजार का एगो जूता के दोकान के आगु ठार होके बहुत देर से अपना जुगुत जूता के ललचाइल आँखि से एक टक निहारत रहे. कुछ देर बाद एगो सुन्दर – सुथर जनाना ओह दोकान से बाहर अइली त उनकर नजर ओह लइका पर पड़ल. ऊ ओह लइका के नियरा आके पूछली – ” तूं तब से इहाँ काहे लागि खड़ा बाड़ऽ? तोहरा का चाहीं? ”
ओह जनाना के पूछला पर ऊ लइका डेराइल – सकुचाइल अपना मन के बात बोलल – ” हम तब से भगवान से इहे गोहरावत बानीं जे हे भगवान! हे गरमी में खलिया गोड़े चले में बड़ी दिक्कत होता. हमरा के एक जोड़ी जूता दिउवा द, त तोहार बड़ी किरपा होई. ”
ऊ जनाना ओह लइका मुलायम – छोट हाथ अपना हाथ में लेके दोकान के भीतर आ गइली. दोकान के एगो करमचारी के बोलाके एक बाल्टी पानी मङ्गववली. लइका के दूनों पाँव अपना हाथे धो – पोंछ के साफ कइली आ करमचारी से ओकरा नाप के जूता मङ्गववली. फेर बहुते दुलार – प्यार से ओह लइका के पाँव में जूता पहिरा के ओकरा ओर मुस्कात देखली. ओह लइका के चेहरा पर खिलल खुसी निहारे जोग रहे. ऊ लइका पहिले ओह जनाना के आँखि में आपन आँखि डालके एक बेर मुस्कात देखलक आ फेर अपना दूनों हाथे उनकर हाथ पकड़के बहुते उछाह भरल भाव से पूछलस –
” रउरा परमात्मा के पत्नी हईं का ? ” ओह लइका के मुँहे अइसन बात सुनके ऊ जनाना दङ्ग रह गइली आ बहुते दुलार से ओकर दुनों गाल चूम लिहली. दूनों ओर आँखि में लोर डगरे लागल.

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