भोजपुरी के आपन लिंग-बिधान

भोजपुरी के आपन लिंग-बिधान

– प्रो.(डॉ.) जयकान्त सिंह ‘जय’

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‘ लिंग ‘ सब्द संस्कृत के ह. जवना के अर्थ होला – ऊ ‘चिन्ह’ जवना के जरिए कवनो ब्यक्ति, चीज-बतुस भा भाव के नर, मादा आ नपुंसक होखे के भेद पता लागे. सबसे पहिले संस्कृत के ब्याकरन लिखाइल जवना में सबसे पुरान पाणिनि के ‘ अष्टाध्यायी ‘ उपलब्ध बा. एह से भासा के लिंग-बिधान पर सबसे पहिले संस्कृते में बिचार भइल. जवना के चलते भारत के आउरो भासा के लिंग-बिधान पर थोर-ढ़ेर संस्कृत का लिंग-बिधानन के छाया नजर आवेला. अब जइसे कवनो भासा के बोले, लिखे, पढ़े आ सिखे खातिर जवन सूत्र, नियम भा सिधांत गढ़ाला त ऊ ओकरा लोकायते रूप के अनुरूप गढ़ाला ओइसहीं ओकर लिंगो-बिधान लोक-बेवहारे के आधार पर तय होला. अइसे अपवाद के गुंजाइस हर जगे होला. बाकिर अपवाद त अपवादे ह. ऊ सिधांत से अलग एकबागा होला. खैर, अब आईं हमनीं लिंग-बिधान, लिंग तय करे के तरीका आ भोजपुरी का लोकायत लिंग-बिधान के बारीकी पर बिचार कइल जाए.

कवनो भासा में लिंग तय करे के मूल आधार होला ओह भासा के लोक-बेवहारिक रूप. लोक-बेवहार के भासा-रूप में लिंग-भेद के जइसन बेवहार चलन में होला, उहे ओकर ब्याकरनो मानेला. एही से एके चीज-बतुस भा भाव खातिर बेवहार में आवे वाला अलग-अलग सब्द खातिर अलग-अलग लिंग-भेद हो जाला. आईं, संस्कृत आ खड़ी बोली (हिन्दी) होत पूर्बी बोली (भोजपुरी) के लिंग-बिधान पर बिचार कइल जाए.

संस्कृत में लिंग तय करके दूगो आधार मानल बा- प्राकृतिक आ ब्याकरनिक. प्राकृतिक आधार खातिर कहल गइल कि स्तन-केसवाली स्त्रीलिंग, लोमस माने रोआं ( रोम) बाल वाला पुलिंग आ एह दूनो भेद के अभाव वाला नपुंसक लिंग ह. ( स्तनकेशवती स्त्री स्याल्लोमश: पुरुष स्मृति:. उभयोरन्तरं यच्च तद्भावे नपुंसक म्. . – सदाशिव शास्त्री; परमलघुमंजूषा की अर्थदीपिका- पन्ना- 1 1 0). बाकिर लिंग तय करे के ई लक्षन सब जगे आ सब पर ना लागू होखे. जदि अइसन रहित त संस्कृत में स्त्री के वाचक सब्द ‘दारा’ पुलिंग, ‘नारी’ स्त्रीलिंग आ ‘कलत्र’ नपुंसक लिंग ना होइत. सूरज का किरिन खातिर आइल सब्द ‘मयूख’ आ ‘अंशु’ पुलिंग आ ‘मरीचि’ आ ‘दीधिचि’ स्त्रीलिंग ना होइत. अमरित खातिर ‘अमृत’ सब्द नपुंसक आ ‘सुधा’ सब्द स्त्रीलिंग ना होइत. संस्कृत के पुलिंग सब्द ‘आत्मा’ हिन्दी में स्त्रीलिंग ना हो जाइत.

संस्कृत के लिंग तय करे वाला प्राकृतिक आधार के अनुसार तो बेजान चीज नपुंसक लिंग जनाये के चाहीं. बाकिर लोक बेवहार में अइसन ना पावल जाए. काहे कि बेजान चीज का संगे संगे अमूर्त भावो सब खातिर स्त्रीलिंग आ पुलिंग सब्द के बेवहार लोक में पावल जाला; जइसे – सूरज एगो ग्रह ह आ ओकरा खातिर आइल ‘मित्र’ सब्द पुलिंग ह आ सजीव ‘मित्र’ सब्द नपुंसक लिंग बतावल बा. कुछ लोग प्रत्यय के बेवहार के आधार पर लिंग तय करे के बात कहेला. बाकिर प्रत्यय के चलते कवनो सब्द के लिंग तय ना हो सके. प्रत्यय के लगला से सब्द के स्त्रीलिंग भा पुलिंग होखे के द्योतन होला. संस्कृत में एके जाति का बस्तुअन के नाम अलग-अलग लिंग में प्रयुक्त होला; जइसे- पुष्य आ तारका दूगो नक्षत्र ह. पुष्य पुलिंग, तारका स्त्रीलिंग आ खुद नक्षत्र नपुंसक लिंग ह.

एह से ई बात बिचारे जोग बा कि भासा में लिंग तय करेके आधार प्राकृतिक होई कि ब्याकरनिक आ कि लोक भा परम्परागत बड़-बुजुर्ग के बेवहार आधारित?

ई त सभे जानऽता जे भासा आ ओकरा सब्द के बेवहार अपना जीवन-ब्यापार खातिर लोक करेला. फेर ओही लोक बेवहार के आधार पर ओकर नियम भा ब्याकरन बनेला. बाकिर लोक के मानल प्रयोग एक रूप में भइल जरूरी होला ना त एह दिसाईं अराजकता फइल जाई. एही एक रूप के जरूरत के ध्यान में रखला पर, गुन सबके लिंग तय करेके आधार माने के कल्पना बहुत उपयोगी ना हो सके. एह से कई बैयाकरन लोग का विचार के मानत डॉ. दीप्ति शर्मा के मत बा कि भासा के बेवहार में आवे वाला लिंग सब्दनिष्ठे होला, अर्थनिष्ठ ना. एह से ओकर प्राकृतिक लिंग का संगे हर घरी सामानाधिकरण्य ना मिले. लिंग तय करे के एके गो आधार बा लोक बेवहार. जवन ओह लोक आ समय के भासा में लउकेला. संस्कृत आ भोजपुरी के पुलिंग ‘आत्मा’ सब्द हिन्दी में स्त्रीलिंग हो जाला. उर्दू के पुलिंग ‘कलम’ हिन्दी में स्त्रीलिंग हो जाला. हिन्दी के स्त्रीलिंग ‘चर्चा’ उर्दू में पुलिंग हो जाला. एकरा से दूगो तथ्य उभर के सामने आवऽता- एक- भासा बेवहार के लिंग सब्द पर आधारित होला आ दोसर – लिंग तय करे के आधार लोक बेवहार ह.

एह से एगो भासा भा लोक के आधार पर दोसरा भासा भा लोक के लिंग तय करे वाला अनुवादक अराजकता पैदा कर देलन.

जब लिंग के सब्दनिष्ठ मान लिआई तब नाम का सक्ति के ओकरा में ना मानल तर्कहीन हो जाई, खास करके संस्कृत जइसन भासा में, जहाँ अर्थतत्व का संगे रूपतत्व के जोग लिंग के आधार पर होला. जदि लिंग के संकेत लिंग में ना मानल जाई त स्त्रीलिंग, पुलिंग आ नपुंसक लिंग बिभक्तियन के प्रयोग के कवनो आधारे ना रह जाई. लिंग भेद से बिभक्ति भेद होला. अइसन हिन्दियो में होला; जइसे- राजा का लड़का और राजा की लड़की. अइसन भोजपुरी में ना होखे. भोजपुरी में राजा के लरिका आ राजा के लरकी होई. इहाँ लिंग भेद से परसर्ग भेद ना होखे. कहीं कहीं का परसर्ग के प्रयोग होइबो करेला त ओकर स्त्रीलिंग बनावे खातिर की के प्रयोग ना होखे. भोजपुरी में राम का/के घरे आ सीता का/के घरे जइसन राम की बेटी आ सीता की बेटी ना होके राम के बेटी आ सीता के बेटी होला. इहे भोजपुरी के लोक मान्य मानक प्रयोग ह. आम तौर पर भोजपुरी में स्त्रीलिंग भा पुलिंग खातिर के परसर्ग ही चलेला. एक बात आउर, संस्कृत भा हिन्दी में सब्द का लिंग के आधार पर बिभक्ति के बेवहार होला, साकिर, बिभक्ति के आधार पर सब्द के लिंग तय ना कइल जाए. जदि बिभक्ति का प्रयोग के लिंग तय करे के कारन मानल जाई तब सब सब्दन के सर्बलिंगी माने के पड़ी. मतलब, हर सब्दन के स्त्रीलिंग, पुलिंग आ नपुंसक लिंग में बेवहार का संभावना के माने के पड़ी. जइसे सब्द के कवनो आपन लिंग होइबे ना करे. जब जवन बिभक्ति लाग जाई ओकर उहे लिंग हो जाई. पुलिंग बिभक्ति लागल त सब्द पुलिंग आ स्त्रीलिंग बिभक्ति लागल त सब्द स्त्रीलिंग. अइसन स्थिति में भासा में घोर अराजकता फइल जाई.

एके सब्द के दू लिंग वाला अर्थ भइला पर प्रसंग-प्रयोग के आधार पर वाक्य में ओकर लिंग तय करे के पड़ेला. जइसे सूरज के अर्थ में जब मित्र सब्द के प्रयोग संस्कृत में होला तब ऊ पुलिंग आ बन्धु के अर्थ में होला त नपुंसक लिंग में बेवहार कइल जाला. अइसन आउरो सब्द का संगे हो सकेला.

भोजपुरी के लोक साहित्य भा अस्सी का दशक तक के लिखल-छपल साहित्य के अध्ययन से एह तथ्य उभरता कि ओह समय तक का भोजपुरी साहित्यकार लोग के सरोकार आज के हजूरा गांव, समाज आ उहाँके भासा के प्रकृति-प्रवृति से अधिका रहे. जदि ऊ लोग खड़ी बोली हिन्दी में लिखे का सङे-सङे भोजपुरियो में लिखत रहे त उनकर लिंग बिधान लोक बेवहार के नियंत्रित होत रहे. बाकिर अस्सी का दशक के बाद जइसे जइसे खड़ी बोली हिन्दी वाला लोग जल्दबाजी में बहुत कुछ लिख-पा लेवे के चक्कर में पड़के सीधे सीधे हिन्दी से भोजपुरी में उल्था करे लागल त भोजपुरी भासा के क्षेत्र में कई तरह के अराजकता फइलत चल गइल. एगो त एकर ध्वनि प्रकृति आ भाव प्रकृति कसरिआए लागल. एकरा मूल सब्दन के भदेस मानके लोग संस्कृतनिष्ठ आ हिन्दी के तत्सम सब्दन के बहुतायत बेवहार करे लागल. एकरा नाम, सर्बनाम, क्रिया, बिसेसन, क्रिया-बिसेसन, लिंग-बिधान आदि पर खड़ी बोली हिन्दी के छाप साफ दिखे लागल. एने एकइसवीं सदी आवत-आवत जइसे हिन्दी अंगरेजी के प्रभाव में अपना अधिकाधिक सब्दन से बंचित हो गइल ओइसहीं भोजपुरिओ हिन्दी के अनुबाद रूप लेके अपना लोक से दूर होत जा रहल बा. खैर, फिलहाल हमरा भोजपुरी के लिंग बिधान के लेके बात करेके बा.

जइसे ब्रह्मपुत्र आ सोनभद्र नदी स्त्रीलिंग ना बल्कि नद मतलब पुलिंग हवें स ओइसहीं भोजपुरिओ पुलिंग प्रधान भासा ह आ ई तथ्य एकरा लिंग बिधान सम्बन्धी लोक बेवहार से उभर के सामने आवऽता. बाकिर एकर माने ई नइखे कि एकरा में जीवधारी स्त्रीलिंगन के छोड़के आउर कुछ स्त्रीलिंग हइए नइखे. बात पुलिंग के अधिकाधिक बेवहार से बा. जवन भोजपुरी लोक मतलब गांव-देहात में सुने के मिलेला. गाँव-जवार से जीवन्त सरोकार राखे वाला खड़ी बोली हिन्दी के बिद्वान जब भोजपुरी बोले लें भा लिखे लें तब हिन्दिओ के स्त्रीलिंग सब्द के पुलिंगे प्रयोग करत नजर आवेले. जइसे हिन्दी में प्रयुक्त होखे वाला स्त्रीलिंग सब्द पुष्टि, नींद,ब्लेड, कैंची, बात, याद, कहानी, कविता, झोपड़ी, रोशनी, मित्रता, मुराद, भीड़, मृत्यु, दशा, दुर्दशा, चिट्ठी, रचना, अग्नि, तस्बीर, प्रकृति, अध्यक्षता, परम्परा, मर्यादा, कला, दृष्टिकोण, कल्पना, स्थिति आदि के पुलिंग रूप में बेवहार ना होइत.

एह तथ्य के पुष्ट करे खातिर कुछ नामचीन हिन्दी के बिद्वान लोग के कुछ उदाहरन दे रहल बानी; जइसे – पुष्टि – एह से हमरा वक्तव्य के पुष्टि होता. ( जेब ( ललित निबंध)- प्रो. रामेश्वर नाथ तिवारी), नींद – नींद पगहा तुरा के भागि गइल बा. ( अंजोर पत्रिका, अप्रैल-जुलाई 1 9 7 1, पन्ना- 1 8), ब्लेड आ कैंची – ब्लेड आ कैंची चल जाता ( उहे, पन्ना 1 8), बात- बात ई बा ( उहे, पन्ना- 1 8), तोहार कहानी बड़ा लामा-चाकर बा, कविता पितरिआ हो सकेला ( कविता के कसउटी- प्रो. हरिकिशोर पाण्डेय), काव्य कला- काव्य कला के गिनती श्रेष्ठ कला में होला, दृष्टिकोण- ओकर दृष्टिकोण मानवीय होला, अध्यक्षता-कुलपति जी का अध्यक्षता में संगोष्ठी सम्पन्न भइल, परम्परा-परम्परा बा, मर्यादा- मर्यादा बा, आवश्यकता- आवश्यकता बा, दौर- नया दौर बा आदि (स्मारिका, अ. भा. भो. सा. स. तिसरका अधिवेशन सिवान – 1 9 7 7), विश्वसनीयता- ओकर विश्वसनीयता पूरा तरह खुल के उभरल बा ( कुँवर सिंह : दूगो महाकाव्य – डॉ. जितराम पाठक, स्मृति ग्रन्थ, पन्ना- 2 2 2), भीत – नया भीत उठेला पुराना भीत ढ़हेला ( आँधी – सिपाही सिंह श्रीमंत ), लाली आ कविता – ‘पुरब में उतरल लाली बा’ बड़ा तगड़ा कविता बा ( भोजपुरी पद्य संग्रह’- डॉ. रिपुसूदन श्रीवास्तव, पन्ना- 8 ), रचना- संतलोग अपना रचना में भाषा के खिचड़ी पकवले बा ( निरगुन बानी – कुलदीप नारायण झड़प ), अनुभूति- अनुभूतियो ओइसने ओजनगर होला, तस्बीर – तस्बीर उभरेला, प्रकृति – राम के प्रकृति अलग बा ( काव्य आ जीवन- डॉ. कुमार बसंत, निबंध निकुंज, पन्ना- 4 4- 4 2), आह- बिपतिआ के आहो बा आदि.

अइसन अनगिनत उदाहरन बा जवना में लिंग बिधान के दिसाईं भोजपुरी के आपन अलग प्रकृति नजर आवत बा. जवना के आधार लोक बेवहार बा. बाकिर आज खड़ी बोली हिन्दी से प्रभावित जन एह सब्दन के सङे ह के बदले हिअ, होला के बदले होले, भइल के जगे भइली, ता के जगे तिआ, बा के जगे बिआ अपना के बदले अपनी, उनका के बदले उनकी जइसन स्त्रीबाची सर्बनाम आ क्रियापद लगाके भोजपुरी के हिन्दिआवे के उतजोग में लागल बाड़न. हमरा समझ से एह दिसाईं बिना कवनो जोर-जबर्दस्ती के लोक बेवहार के अनुसरन कइल उचित कहाई. काहे कि भासा लोक के सम्पत्ति ह आ ओकर नियमन लोक बेवहार के आधारे पर तय होला. ना त देस-दुनिया के हर भासा खातिर एके गो बिधान बनित आ सब पर लागू होइत. इहाँ हम इहो कहेब कि जब कवनो एक भासा दोसरा भासा से प्रभावित होला त ओकरा के प्रभावित करेवाला भासा का प्रकृति के प्रभाव ओकरा पर थोड़-ढ़ेर जरूर पड़ेला. बाकिर एतना ना पड़े के चाहीं कि ओकर मूल प्रकृतिए पर गरहन लाग जाव.
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– विभागाध्यक्ष-स्नातकोत्तर भोजपुरी विभाग, बी. आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर ( बिहार )
पिनकोड-842001
मो. न. -9430014688
राष्ट्रीय महामंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना ( बिहार )
ई-मेल-indjaikantsinghjai@gmail.com

आवासीय पत्राचार-‘प्रताप भवन ‘महाराणा प्रताप नगर
मार्ग सं. -1( सी ) भिखनपुरा, मुजफ्फरपुर ( बिहार )
पिनकोड-842001

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