– प्रो.(डॉ.) जयकान्त सिंह ‘जय’
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लघुकथा
कलाम के सलाम

आज भीड़-तंत्र के कब्जा हर जगह नजर आ रहल बा. योग्य लेहाजे सकपका जाता आ अयोग्य जोगाड़ से पद, पइसा आ प्रतिष्ठा पाके मोका-कुमोका उनका पर धौंस जमा जा ता. ई सब देख के तब ऊ दिन इयाद आ जाता.
भोजपुरी माटी के अजगूत लाल बिस्मिल्ला खां जी अपना शहनाई वादन के चलते एतना ना लोकप्रिय भइनीं कि उनका के ई देस पद्मश्री, पद्म भूषण आ पद्म विभूषणे से सम्मानित ना क के, सन् दू हजार एक में भारतो रत्न से सम्मानित कइलस. एक बेर बनारस में उनका घरे उनकर दरसन करे देस के राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम साहेब पहुँचलें. बिस्मिल्ला खां जी अपना दुआर पर खटिया पर बइठल रहलें. कलाम साहेब बहुते सम्मान के सङ्गे उनका के ओही पर बइठे के कहके चादर आदि से सम्मानित कइलें. बिस्मिल्ला खां जी उनको के बइठे के इसारा कइलन, त कलाम साहेब आपन दसो नोह जोड़के विनयी भाव से बोललें – ” रउरा अइसन कलाकार – संगीतकार के सोझा आ बरोबर बइठे के हमार हैसियत नइखे। ”
अइसना कलाम के सलाम के ना करी!
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प्रो. जयकान्त-सिंह-जय,
विभागाध्यक्ष-स्नातकोत्तर भोजपुरी विभाग, बी. आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर ( बिहार )
पिनकोड-842001
राष्ट्रीय महामंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना ( बिहार )
ई-मेल-indjaikantsinghjai@gmail.com
आवासीय पत्राचार-‘प्रताप भवन ‘महाराणा प्रताप नगर
मार्ग सं. -1( सी ) भिखनपुरा, मुजफ्फरपुर ( बिहार )
पिनकोड-842001

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