बांसगांव की मुनमुन – आखिरी कड़ी

बांसगांव की मुनमुन – आखिरी कड़ी

( दयानन्द पाण्डेय के बहुचर्चित उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद )

( पिछला कड़ी में पढ़ले रहीं कि मुनमुन के सलाह मिले लागल रहल कि ऊ दोसर बिआह कर लेब. शुरुआत ऊ कइलसि जेकरा के मुनमुन दोसर बिआह करे के सलाह दिहले रही आ ऊ मान गइल रहल. बाद में जब आभार करे आइल त मुनमुन के सलाह दे दिहलसि कि उहो नया बिआह कर लेसु. अब आगे पढ़ीं. अगर पिछला कड़ी नइखीं पढ़ले त पहिले पिछलका कड़ी पढ़ लीं.)

समुझावत त रहली मुनमुन के अम्मो कि, ‘मुनमुन, या त अपना ससुरारी जाए के मन बनावऽ आ चलि जा. आ जे ओहिजा नइखे जाए के जिद बा त दोसर बिआह खोज लऽ. एकरा ओकरा साथे घुमला से नीक इहे होखी.’
‘का करीं अम्मा!’ मुनमुन कहली, ‘साथे घूमे फिरे सूते ला त सभे हमेशा तइयारे रहेला! बाकिर बिआह करे खातिर केहू ना. आ एकरा खातिर सभका दहेज चाहीं!’
‘त दोसरा के दहेज बिटोरे के टोटका बता सकेलू, दहेज के मुकदमा लिखवा के, गुजारा भत्ता के मुकदमा करवा के लाखों के मुआवजा पावे के रास्ता बता सकेलू आ ओह मुआवजा से दहेज के खरचा उठावत दोसर बिआह करे के सलाह दे सकेलू त खुद अपना ला इहे राह काहें नइखू खोज लेत?’
‘ई काम हम एह चलते नइखीं कर सकत कि ई सब करिके हम अपना तौर पर ओह शादी के मान्यता दे देब जवना के हम बिआह मनबे ना करीं! एही चलते अम्मा हम ई नइखीँ करे वाला!’
‘लोग बदल गइल, चीझु सब बदल गइल. तोहार भाईं ले बदल गइलें. बाकिर तूं आ तोहार बाबूजी ना बदललन.’
‘अइसे त बदलबो ना करब सऽ अम्मा!’ मुनुमन कहलसि, ‘कि बेबात सभका सोझा ठेहुनिया जाएब सँ, आपन मान सम्मान गिरवी राख देब सँ? हमनी का अइसे नइखीं बदले वाला अम्मा!’

आखिर मुनमुन बदलत काहे नइखी? आ ओकर बाबूजी! ई सवाल एकाधे लोग ना अनेके लोग ला यक्ष प्रश्न बन गइल रहुवे. घनश्यामो राय के इहे सवाल रहल. भलहीं अब ऊ एह सवाल के जबाब साथे लिहले घूमे लागल बाड़ें. जइसे कि एक बेर बात निकलल कि, ‘जब राउर बेटा लुक्कड़, पियक्कड़ आ सनकाह हवे त मुनमुन जइसन लईकी कइसे रहि सकेले ओकरा साथे?’ त घनश्याम राय के जबाब रहल कि, ‘लड़िका हमार पागल पियक्कड़ ह, हम त ना! हम राखि लेब मुनमुन के. दिक्कत का बा?’

सवाल करे वाला लजा के रहि गइल बाकिर घनश्याम राय ना. सवाल करे वाला टोकबो कइलसि कि,’का कहत बानी राय साहब. पतोहो बेटी जइसन होखेले.’
‘त?’ घनश्याम राय तरेरलन.

घनश्याम राय के ई जवाब बड़ी तेज़ी से सभका लगे ले चहुँप गइल. मुनमुनो का लगे. सुनि के कहलसि कि, ‘हम त शुरुए से जानत बानी कि ऊ कुकुर हऽ, अघोड़ी हऽ.’

फेर ऊ घनश्याम राय के फ़ोन करि के उनुकर जतना फजीहत कर सकत रहुवे कइलसि आ कहलसि कि , ‘आइन्दा जे अइसन ओइसन बात कहलऽ त जइसे अपना दुआरी तोहरा बेटा के जुतियवले रहीं, वइसहीं तोहरे दुअरा आ के तोहरो के जूतिया देब!’
‘तोर अतना हिम्मत हो गइल बा!’ घनश्याम राय हुंकरले त बाकिर डेराइओ गइलन आ फोन काट दिहलन.

फेर एगो वकील से मशविरा लिहलन आ मुनमुन के विदाई ला मुक़दमा दायर करवा दिहलन. मुनमुन के जब एह मुकदमा के सम्मन मिलल त ऊ मुसुका के रहि गइल. वकील के बेटी रहल से तुरते जबाब दिहला का जगहा तारीख पर तारीख लेबे लागल. तारीख आ अछरंगन के मकड़जाला में ऊ घनश्याम राय के अइसन अझूरवलसि कि ऊ हताश हो गइलन. कचहरी में घनश्याम राय आ उनुका बेटा के मुनमुन अइसे तरेर के देखे कि दुनु भाग के अपना वकील का पीछे लुका जासु कि कहीं मुनमुन ओहनी के पीट मत देव. बाकिर मुनमुन के सगरी जोश, सगरी बहादुरी घरे चहुँपते अलोप हो जाव. अम्मा त पहिलहीं कंकाल बनि के रह गइल रहुवी. बाबूओजी अब कंकाल बने लागल रहलन. कान्ह आ कमर उनुको नवे लागल रहल. गाल पिचक गइल रहल. एक त मुनमुन के चिन्ता, ओह पर से बेटन के अनदेखा, तिसरे माली हालत आ बेमारी उनुका के झिंझोड़ के राख दिहले रहल. ई सब देखि के मुनमुनो टूट जाव. अतना कि अब ऊ मीरा बनल चाहे लागल रहुवे. ख़ास क के तब आ जब केहू अम्मा बाबू जी से पूछ देव, ‘जवान बेटी के कहिया ले घरे बइठा के राखब?’

ऊ मीरा बनि के नाचल चाहत बिया. मीरा के नाच में आपन तनाव, आपन घाव,अपना मनोभावन के धोवल चाहत बिया. बाकिर धोआ नइखे पावत ई सभ कुछ. ऊ अम्मा बाबू जी दुनूं के ले के अस्पताल जात बिया. दूनो जने बेमार बाड़ें. डाक्टर भर्ती कर लेत बाड़ें. एक वार्ड में बाबू जी, दोसरा वार्ड में अम्मा. ऊ चाहत बिया कि दुनू जने के एकही वार्ड मिल जाइत त बढ़िया होखीत. डॉक्टरन से कहतो बिया बाकिर डॉक्टर मना कर देत बाड़ें. बतावत बा लोग कि पुरुष वार्ड में पुरुष, स्त्री वार्ड में स्त्री. अब जब ओकर अम्मा बाबू जी पुरुष आ स्त्री में तब्दील हो गइलें त ऊ खुद का हिय? ऊ सोचत बिया, सोचते सोचत सुबुके लागत बिया. हार थाक के रीता दिदिया के फोन क के सब कुछ बतावत बिया. बतावत बिया कि कइसे ऊ अकेले सभ सम्हार नइखे पावत. दोसरे ओकरा लगे पइसो नइखे रहि गइल.

‘भइया लोगन के बतवलू हऽ?’ रीता पूछलसि.
‘हम भईया लोगन के बतावहूँ के नइखीं सोचत दिदिया. पता ना तोहरा के कइसे बता दिहनी. आ अब हमरा फोनो के बैलेंस खतम होखे वाला बा. बाते करत में कबो कट सकेला!’
‘ठीक बा. तूं राखऽ हम मिलावत बानी.’ रीता बोलल.

बाकिर रीता के फोन ना आइल. मुनमुने अम्मा बाबू जी को ले के घरे आवत बिया. स्कूल के हेड मास्टर मदद क दिहलन. पइसो से आ अस्पताल से छुट्टी करावहूं में. घरे आ के बाबूजी आँख फइला के मुनमुन से पूछत बाड़न, ‘बेटी अइसे कब ले चल पाई भला?’
‘जब ले चल पाई चलाएब. बाकिर अगर जे रउरा चाहत होखब कि हम अन्यायी आ अत्याचारियन का आगा झुक जाईं. त हम ई नइखीं करे वाला चाहे जवन हो जाव!’ कहि के मुनमुन किचेन में चल जात बिया. चाय बनावे.

बिजली चल गइल बा. ऊ किचेन से देखत बिया. अङना मे चांदनी उतर आइल बा. ऊ फुदुक के अङना में आ जात बिया. चांदनी में नहाए. अइसे जइसे ऊ मुनमुन ना हो के कवनो गौरैया होखो! ओने किचेन में चाय खदक रहल बा आ ऊ सोचत बिया कि सबेरे सूरज उगी तबो का ऊ अइसहीं नहाई सूरज का रोशनी में, जइसे अबहीं नहा रहल बिया चांदनी में. ओने चांदनी में बइठल अपना बेटी के देखि के अम्मा का मन में ओकर बीतल दिन, बचपन के दिन पँवड़े लागत बा कवनो सपना का तरह आ ऊ गावल चाहत बाड़ी कि, ‘मेरे घर आई एक नन्हीं परी, चांदनी के हसीन रथ पे सवार!’ बाकिर ऊ गा नइखी पावत. ना त मन साथ देत बा, ना आवाज! से ऊ सूत जात बाड़ी. किचेन में चाय अबहियों खदकत बावे!

आ देखीं सबेरे के सूरज सचहीं मुनमुन खातिर खुशियन के खजाना ले के ऊगल. अखबार में खबर छपल रहुवे कि सगरी शिक्षा मित्रन के ट्रेनिंग दे के नियमित क दीहल जाई. दुपहरिया ले एगो डाकिया एगो चिट्ठी दे गइल. चिट्ठी ना ई पी. सी. एस. परीक्षा के प्रवेश पत्र रहुवे. मुनमुन प्रवेश पत्र चहकि के अम्मा के देखवलसि त अम्मा रोवाइन हो गइली. बोलली, ‘त अब तूं अधिकारी बन जइबू?’ आ फेर उनुकर मन काँप उठल रहुवे आ बोल दिहली, ‘अपना भइया लोगन का तरह!’

मुनमुन अम्मा के डर समुझ गइल. अम्मा के अंकवारी में लेत बोलल, ‘ना अम्मा, भईया लोगन का तरह ना, तहरा बेटी का तरह! बाकिर अबहीं त दिल्ली दूर बा. देखऽ का होखत बा?’

पीसीएस के तइयारी त पहिलहीं से थोड़-बहुत करत आइल रहुवे मुनमुन. बाकिर बाबूजी के सलाह मान के ऊ स्कूल से छुट्टी ले लिहलसि. लमहर मेडिकल लीव आ लाग गइल तइयारी में. दिन-रात एक कर दिहलसि. भुला गइल बाकी सभ कुछ. जइसे ओकरा जिनिगी मे पीसीएस के इम्तहान छोड़ कुछ रहिए ना गइल होखो. बाँसगांव के लोग तरस गइल मुनमुन के एक झलक भर पावे खातिर. बांसगांव के धूल भरल सड़क जइसे ओकर राह देखत रह गइल बाकिर ऊ निकलल ना. ऊ भितरे-भीतर अपना के नया तरीका से रचत रहुवे. मानो अपने कोख में होखो, अपनहीं महतारी, अपनहीं कोख. जइसे सिरजन करे वाला आपने सिरजन करत होखो. बिखरल सिरजन में संवरत -बनत अगर देखे के होखो त मुनमुन के देखल जा सकत रहुवे. ऊ कबीर के गुनगुनावे, ‘खुद ही डंडी, खुद ही तराजू, खुद ही बैठा तोलता.’ ऊ अपनहीं के जोखत रहुवे. एगो नया आगि आ एगो नया अगिन परीक्षा से गुजरत मुनमुन जानत रहल कि जे अबकी ना उबरल त फेर कबो ना उबर पाई. जिनिगी जिए के बा कि नरक जिए पड़ी सभ कुछ एही परीक्षा परिणाम पर टिकल बा, ई ऊ जानत रहल. अम्मा कबो टोकसु त बाबूजी रोकत बोलसु, ‘मत रोकऽ, सोना आग में तप रहल बा, तपे दऽ!’

जाने ई संजोगे रहल आ कि मुनमुन ला प्रेम कि मुनमुन के एह तइयारी का दौरान ना त बाबू जी ना अम्मा बेमार पड़लन, ना कवनो आर्थिक समस्या आइल. हँ एह बीच राहुल के भेजल रुपिया आ गइल त मुनमुन के वेतन ना मिलला का बावजूद घर खर्च में बाधा ना आइल. बीच मे दू बेर मुनमुन के स्कूल के हेड मास्टरो अइलन ‘बेमार’ मुनमुन के देखे ला. बाकिर उनुको से ना मिलल मुनमुन. मुनक्के राय से मिल के ऊ लवटि गइलन.

कहल जाला नू कि जइसे सभकर दिन पलटेला वइसहीं मुनमुनो के दिन पलटल. समय जरुर लागल. बाकिर जवन मुनक्का राय कहत रहलन कि, ‘सोना आग में तपत बा, तपे दऽ!’ त सचहूं सोना तप गइल. मुनमुन पीसीएस मेन में आ गइल. अखबारन के खबर से बांसगांव जानल. बाकिर अब एह खबर पर आह भरे ला गिरधारी राय ना रहलन. ना ही ललकारत चना जोर गरम बेचे वाला तिवारी जी. मुनमुन तिवारी जी के एह मौका पर बहुते मिस कइलसि. बधाई देबे वाला, लड्डू खाए वाला बहुते लोग आइल बांसगांव में मुनमुन का घरे. बाकिर मुनमुन के भाईयन के फोनो ले ना आइल. ना ही घनश्याम राय भा राधेश्याम राय के फ़ोन. दीपक के फ़ोन करि के मुनमुन जरूर आशीर्वाद मँगलसि. दीपको दिल खोल के आशीर्वाद दिहलें. हँ रीता अइली आ थाईलैंड से विनिता के बधाई वाला फोनो. बहुत बाद में राहुलो फ़ोन क के खुशी जतवलसि.

ट्रेनिंग-व्रेनिंग पूरा भइला का बाद मुनमुन अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एगो तहसील में एसडीएम तैनात हो गइल बिया. बांसगांव से आवत घरी ऊ अम्मा, बाबू जी के अकेले ना छोड़लसि. बाबू जी से बोलल, ‘छोड़ीं एह प्रेक्टिस के मोह आ चलीं अपना रानी बिटिया का साथे!’
‘अब बेटी के कमाई के अन्न खाएब हमनी का?’ अम्मा बोलल, ‘राम-राम, पाप ना लागी!’
बाकिर मुनक्का राय चुपे रहलन. बाकिर जब मुनमुन बहुत रिगिर कइलसि त ऊ गँवे से बोललन, ‘त का एह घर में ताला लगा दीं?’
‘अउर का करब?’ मुनमुन बोलल, ‘अब हम रउरा लोगन के एह तरह अकेला ना छोड़ब! हँ छुट्टी में आवत रहल जाई!’
‘फेर त ठीक बा!’ मुनक्का राय के जइसे राह भेंटा गइल.
‘बाकिर!’ मुनमुन के अम्मा अबहियों प्रतिवाद कइली.
‘कुछ ना, अब चलऽ!’ मुनक्का राय बोललन, ‘एकरो हमनी पर हक बा. अबहीं ले ई हमनी का कहला पर चलल. अब समय आ गइल बा कि हमनी का एकरा कहला पर चलल जाव!’ ऊ तनिका रुकलन आ पत्नी के हाथ थाम के बोललन, ‘चलऽ बेटी चलत बानीं सँ. ’

मुकदमन के सगरी फाइल वगैरह मुनक्का राय अपना जूनियरन आ मुंशी का जिम्मा लगवलन. घर के बहरी वाला कोठरी जूनियरन के चैम्बर बनावे ला दे दिहलन आ आपन नेमप्लेट देखावत जूनियरन से कहलन, ‘ई नाम एहिजा आ बांसगांव में बनल रहे के चाहीं. उतरही लोग मत एह नेमप्लेट के आ ना हमरा नाम पर कवनो बट्टा लगइहऽ लोग. आ हँ, घर में दीया-बत्ती करत रहीहऽ लोग. मतलब लाइट जलावत रहीह लोग.’ जूनियरो हँ में हँ मिला दिहलें.

बाक़ी घर में ताला लगावत मुनक्का राय बांसगांव से विदा भइलन सपत्नीक मुनमुन बेटी का साथे. आ बोललन, ‘देखत बानी कि आबोदाना अब कहां-कहां ले जात बावे!’ फेर एगो लमहर साँस लिहलें. संजोगे रहल कि पड़ोसी ज़िला में धीरजो अब सीडीओ हो गइल रहल. कभो-कभार कमिश्नर का मीटिंग में धीरज, मुनमुन आमने-सामने पड़ जासु त मुनमुन झुक के धीरज के गोड़ छू लेव आ धीरजो मुनमुन का माथ पर हाथ राखि के आशीष दे देसु. बाकिर कवनो बातचीत ना होखे दुनु का बीचे. ना त व्यक्तिगत रुप से ना सार्वजनिक रुप से.

अइसने कवनो मीटिंग का दिने जब मुनमुन कलफ लागल साड़ी में गॉगल्स लगवले अपना जीप से उतरत रहल त ऊ बीएसए सोझा पड़ गइल जे सुनीता के पति का शिकायत पर ओकरा से जवाब तलब करे ला ओकरा के बोलवले रहल. देखते ऊ चिहुँकल आ अदब से बोलल, ‘मैम आप !’ आ फेर जइसे उछलत बोलल, ‘आप त बांसगांव वाली मुनमुन मैम हैं!’
‘हूं. ’ मुनमुन गॉगल्स तनिका उतारत बोलल, ‘आप?’
‘अरे मैम मैं वह बीएसए. ’ ऊ तनिका अदब से बोल, ‘जब आप ……. !’
‘शिक्षा मित्र थी….!’
‘जी मैम, जी…. जी!’
‘तो?’ मुनमुन तनिका तरेरलसि!
‘कुछ नहीं मैम, कुछ नहीं. प्रणाम!’ ऊ जइसे हकला पड़ल.
‘इट्स ओ.के.!’ कहिक मुनमुन एकदम से अफ़सराना अंदाज़ में आगे निकलल. तब ले अपना कार से उतरत धीरजो सोझा पड़ गइल. त हमेशा का तरह ऊ झुक के पगोड़ छुअलसि. आ हमेशा का तरह धीरजो ओकरा माथ पर हाथ धर के आशीष दिहलसि, निःशब्द! एह बीच मुनमुन कानूनी रूप से राधेश्याम के गुपचुप तलाको दे दिहलसि. बहुते खामोशी से. भाइयनो के ई पता ना चलल.

हँ, राधेश्याम अबहियों कभी कभार पी-पा के बांसगांव आ जाला. कबो मुनक्का राय के ताला लागल घर के दरवाज़ा पीटेला त कबो पड़ोसियन के दरवाजा. एह फेर में ऊ अकसरहाँ पिटा जाला बाकिर ओकरा पर कवनो असर ना पड़े. ऊ बुदबुदात रहेला कि, ‘मुनमुन हमार हियऽ’ लोग ओकरा के बताइओ देला कि मुनमुन अब एहिजा ना रहे. उहो अपना भाईयन का तरह अफसर बन गइल बिया. राधेश्याम बहकत लड़खड़ात आवाज़ में कहल करेला, ‘त का भइल! हवे त हमरे मुनमुन!’

मुनमुनो कभी कभार अम्मा बाबू जी के ले के बांसगांव आ जाले. का करे, ऊ बेबस हो जाले. ऊ रहे कतहूं बाकिर ओकरा दिल में धड़केला त बांसेगांव. बांसगांव के बेचैनी ओकरा मन से कबो ना जाव. कबो कबो ऊ हेरेले ओह तिवारी जी के बांसगांव का बस स्टैंड पर जे मुनमुन नाम से एक समय चनाजोर गरम बेचत रहलन. ऊ तिवारी जी जिनका बारे में ओकरा मालूम बा कि ऊ अब नइखन. तबहियों. करबो करे त का करे ऊ! सुख-दुख, मान-अपमान, सफलता-असफलता सब कुछ देखवलसि इहे बांसगांव. अल्हड़ जवानिओ बांसेगांव का बांसुरी पर गवलसि, सुनलसि, आ गुनगुनवलसि. आ फेर बांसगांव के बरगद के छांव में ओकर जिनिगी बरबादो भइल. ओह घरी ऊ गावतो रहल, ‘बरबाद कजरवा हो गइलैं !’ त भला कइसे भूला जाव एह आबाद आ बरबाद बांसगांव के ई ‘बांसगांव के मुनमुन’. संभवे नइखे. जब ले ऊ जीही, जइसहूं जीही, बांसगांंव त ओकरा सीना में धड़कले करी. लोग जब तब ओकरा बदलल अंदाज भा साहबी ठाट-बाट पर चकित होखेला भा ओकरा से ओकरा संघर्ष पर बतियावेला त ऊ लोगन से कहेले, ‘स्थाई त कुछऊ ना होखे. सभ कुछ बदलत रहेला. सुख होखो, दुख होखो भा समय. बदले के त सभका बड़ले बा.’फेर जइसे ऊ बुदबुदाले, ‘हँ, ई बांसगांव नइखे बदलत त ऊ का करो?’

‘उ त सब ठीक बा.’ एगो पड़ोसिन पूछत बिया, ‘मुनमुन बहिनी शादी कब करबू?’

मुनमुन चुप लगा जात बिया. जहँवा मुनमुन एस. डी. एम. बिया ओहिजो के अधिकारी कॉलोनी में ओकर एगो पड़ोसिन ओकरा घर में ठीक मुनक्का राय का सामनहीं पूछ लिहली, ‘दीदी आप ने अब तक शादी क्यों नहीं की?’ ऊ मुनमुन के बिआह भा तलाक का बारे में नइखे जानत. एहिजा केहू नइखे जानत. मुनमुन जनावलो ना चाहे. बाकिर जब ऊ औरत आपन सवाल दोहरावत बिया कि, ‘दीदी आप ने अब तक शादी क्यों नहीं की?’
‘इन्हीं से पूछिए !’ मुनमुन धीरे से बाबू जी का ओर इशारा कर के कहत बिया.

कवनो जबाब दिहला बिना मुनक्का राय आपन छड़ी उठा लेत बाड़न आ टहले निकल जात बाड़न. राह में सोचत जात बाड़न कि का मुनमुन अब आपन दुलहो खुदे ना खोज सके? का ऊ फेरु से खोजल शुरु कर देसु. मुनमुन खातिर कवनो सही वर. का अखबारन में विज्ञापन दे देसु? भा इंटरनेट पर? घर लवटत घरी ऊ तय कर लेत बाड़न कि आजु ऊ एह बारे में मुनमुन से साफ बात करीहें. ऊ अपने से बुदबुदातो बाड़न, ‘चाहे जवन होखे शादी त करहीं के बा मुनमुन बिटिया के!’

—- समाप्‍त —-

(आ एकरा साथही पूरा हो रहल बा आपन वादा कि पाण्डेय जी के एहू उपन्यास ‘बाँसगाँव की मुनमुन’ के भोजपुरी अनुवाद हम करब जइसे उनुका एगो अउर उपन्यास ‘लोक कवि अब गाते नहीं’ के अनुवाद कइले रहीं. दयानन्द पाण्डेय जी ओह अनुवाद के किताबो का रूप में छपवा लिहले बानी. ई हमार सौभाग्य रहल. बाकिर अब कवनो उपन्यास के अनुवाद कइल ना शुरु करब, पता ना हमार कहानी कहिया खतम हो जाई!

रउरो सभे के धन्यवाद कि रउरा अँजोरिया पर आपन छोह बनवले रखले बानीं. बाकिर एगो शिकायत जरूर बा रउरा सभे से कि रउरा लोग कवनो टिप्पणी ना करीं. एकरा ला ना त रउरा आपन नाम बतावे के बा, ना आपन ई मेल देबे के बा, ना कवनो तरह के चंदा भा सहजोग. बस आपन कमेंट क के बतावे के बा कि कइसन लागल रउरा. – संपादक)

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