गीता के पढ़ाई होखे अनिवार्य
– मनोज भावुक
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जीवन अनिश्चित बा त का सपना देखल छोड़ दीहल जाय, योजना बनावल छोड़ दीहल जाय, काल्हु के सोचल छोड़ दीहल जाय? …ना, बिल्कुल ना. तब? हाय-हाय कइल छोड़ दीहल जाय. जिनिगी हलुक हो जाई, बोझा ना लागी. अनावश्यक बटोरल, लूटल-खसोटल छोड़ दीहल जाय.
जवन छोड़े के बा ऊ छोड़ल जात नइखे. जवन पकड़े के बा, ऊ पकड़ात नइखे, दुख के मूल कारण ईहे बा. योगेश्वर कृष्ण के मुखारविंद से निकलल पूरा गीता एही पर बा कि का पकड़े के बा, का छोड़े के बा. ऊ बार-बार कहत बाड़न कि व्यर्थ के चिन्ता नइखे करे के आ अपना वर्तमान पर फोकस करे के बा. बाकिर होत उल्टा बा. आदमी भूत-भविष्य में एतना ना अझूराइल बा कि एकरा चक्कर में ओकर वर्तमान खराब होखत बा. जबकि आनन्द वर्तमान में बा.
‘योग वशिष्ठ’ में कहल गइल बा, ‘नानुसंधते भविष्यम नातीतं चिन्त्यते स:। येन सन्दृश्यते विश्वं स एव सुखमश्नुते॥’ (माने कि जे व्यक्ति ना त भविष्य के चिन्ता करेला ना अतीत का बारे में सोचेला ना, जे आपन चैतन्य स्वरूप से एह संसार के देखेला, उहे सच्चा सुख के अनुभव करेला.)
कहे के मतलब ई कि वर्तमान के पकड़े के बा आ भूत-भविष्य के छोड़े के बा. वर्तमान में जीही आ आत्मा में स्थित रहीं. भविष्य के त कुछ पते नइखे. भविष्य अनिश्चित बा. आ भविष्य में कुछ निश्चित बनावहूं के बा, कुछ हासिल करे के त वर्तमाने पर फोकस करे के पड़ी. भविष्य के सोच के त खाली योजना बनेला, रणनीति बनेला. ताकि भविष्य में कुछ निश्चित हो सके. कृष्ण सबसे बड़ रणनीतिकार रहलें, मैनेजमेंट गुरू. उनका जीवन से मैनेजमेंट सीखल जा सकेला. ऊ मैनेजमेंट, जवन आदमी के डर, भय, क्रोध आ पीड़ा से मुक्त करे.
कृष्ण के दीहल सीख आजुओ सक्सेस मंत्र जइसन बा. सबसे बड़का सक्सेस टिप्स त ई बा कि जीवन में सुदर्शन चक्र आ बाँसुरी दुनों के जरुरत बा. आ सुदर्शन चक्र के जरुरत सबसे अंत में. निनान्बे बेर गारी सुनला बर्दाश्त कइला का बादे, अति भइला का बादे. युद्ध अंतिम विकल्प होखे के चाहीं. बाँसुरी बहुत जरुरी बा. चैन-सकून, प्रेम-करुणा बहुत जरुरी बा. ई मनुष्य के मूल स्वरूप ह. युद्ध जब कवनो उपाय ना बाँचे तब…. मजबूरी में. युद्ध मजबूरी के नाम ह.युद्ध का समयो में घृणा आ नफरत से से बाँचल जा सके त का कहे के बा! राम आ कृष्ण के जीवनो में युद्ध बा बाकिर कतहूं घृणा-नफरत नइखे. कष्ट बा, संघर्ष बा, समस्या बा आ ओकरा समाधान खातिर देश, काल, आ परिस्थिति का हिसाब से रणनीति बा. ओह रणनीति में, राम-कृष्ण के जीवन-संघर्ष में मानव-जीवन के लगभग हर समस्या के समाधान बा. एही से राम-कृष्ण के पढ़ल-गुनल बहुत जरुरी बा. रामलीला आ कृष्णलीला के मंचन बहुत जरुरी बा, साथही गीता आ योग त हर स्कूल-कॉलेज के कोर्स में अनिवार्य कर देबे के चाहीं. ईहे मनुष्यता के बचाई. आदमी के भीतर से मजबूत करी.
ना त हालत देखते बानी – पाँच बरीस के कन्या के रेप होखत बा आ हॉस्टल का छत से कूद के छात्र आत्महत्या करत बाड़न. पइसा कमाए के सिखावे वाला स्कूल आ कोर्स बढ़ते जात बा आ आदमी के आदमी बनावे वाला स्कूल खोजलो नइखे मिलत. देश-दुनिया के संचालन के पढ़ाई होता बाकिर अपना देह के आ मन के संचालन कइसे होखी, एकर पढ़ाई नइखे होखत. जबकि दुनिया में हरेक चौक ले संचालन एही देहिए आ मनवा से होखे के बा. राम आ कृष्ण के जीवन, गीता आ योग, मनुष्यता सिखावे वाला साधन ह. ई ऊ स्कूल ह जवन देह आ मन के संचालन का साथही आत्मा आ परमात्मा तक चहुँपे के हुनर सिखावेला. एह स्कूल में सबके दाखिला लेबे के चाहीं. विशेष रूप से गीता के!
गीता धार्मिक भा आध्यात्मिक ग्रन्थ ना ह. ई मनोविज्ञान ह, दर्शन शास्त्र ह, व्यावहारिक विज्ञान ह, नीति शास्त्र ह. कुल मिला के जीवन-ग्रन्थ ह. भगवान के चेला ना, साक्षात भगवान के मुँह से निकलल प्रवचन भा मार्गदर्शन ह. एह से गीता के पढ़ाई हर स्कूल-कॉलेज में अनिवार्य कर देबे के चाहीं.
(भोजपुरी जंक्शन पत्रिका के कृष्ण कवितावली विशेषांक में प्रकाशित संपादकीय.)

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