संबूक-सूर्पनखा कथा

संबूक-सूर्पनखा कथा

story of shambuk and shurpnakha

– प्रो.(डॉ.) जयकान्त सिंह ‘जय’

#संबुक #सूर्पनखा #भोजपुरी #जयकान्त-सिंह-जय

 

संबूक बारह बरिस से दंडकारण्य में क्रौचरव नदी के बगल में बांस का झुरमुट के बीचे एके आसन में तपस्या करत रहे. ऊ ई तपस्या एगो अलौकिक शस्त्र सूर्रहास तलवार के सिद्धि खातिर करत रहे. जवना के उद्देश्य रहे अपना पिता विद्युतजिह्वा के हत्यारा आ अपना आततायी मामा लंकापति रावण के मार के अपना पिता के मौत के बदला लीहल. एह गुप्त तप-साधना के जानकारी राक्षसराज महापंडित रावण के ना रहे. बाकिर संबूक के मतारी सूर्पनखा ( चंदर्नखा ) के रहे आ ऊ अपना बेटा के दोसरा दानव भा राक्षस से रक्षा खातिर ओकरा अगल-बगल मड़रात रहत रही.

संजोग से एक समय दसरथ नंदन राम के छोट भाई लछुमन वनवास के समय ओही राह से गुजरत रहस. संबूक द्वारा सिद्ध होखे वाला ओह अलौकिक शस्त्र सूर्रहास के सुगंध उनका मिलल आ ऊ ओह बांस के झुरमुट के लगे पहुंच गइलन. जब उनकर नजर ओह अलौकिक शस्त्र सूर्रहास पर पड़ल त उनका बहुते अचंभा भइल. ऊ सूर्यहास अपना हाथ में लेके ओकर परीक्षण करे के उद्देश्य से बांस का झुरमुटन पर चलवलें त ओकरा अचूक वार से बांस सब त कटिए गइल. ओह झुरमुट में तपस्या करत संबूक के मूड़ियो ओकरा धड़ से अलग होके गिर पड़ल. संबूक का गरदन के खून पिचकारी जइसन ऊपर उठे लागल. ई देख के लछुमन अवाक् रह गइलें. फेर ऊ अफसोस करत सूर्यहास के सङ्गे लवट गइलें. बड़ भाई राम आ उनकर पत्नी सीता लछुमन द्वारा अंजान में भइल संबूक के हत्या के बात सुनके बहुत दुखी भइल लोग. राम लछुमन से कहलें कि संत-सज्जन आ तपस्वी रिसि-मुनि के रक्छा कइल रघुकुल के रीति रहल बा. अंजाने में सही, एह तपस्वी के हत्या बांव ना जाई. ई आगे कवनो ना कवनो अमंगल के वजह जरुर हो सकेला. एह वन में तरह-तरह के दानव-राक्छसो अपना मनोकामना के पूर्ति खातिर तपस्या करत रहेलें. अब तनी आउर सावधानी बरते के होई.

एने राम, सीता आ लछुमन में ई सब बतकही होते रहे कि सूर्पनखा अपना बेटा संबूक के देखे दंडकारण्य के ओह बांसी झुरमुट में पहुंचल. उहाँ के नजारा देखके ऊ अछोधाह होके रोये लागल. कुछ देर के बाद ऊ बेटा द्वारा सिद्ध होखे वाला सूर्यहास तलवार के ढ़ूंढ़े लागल. सूर्यहास कहीं नजर ना आइल त ऊ पागल होके घावाहिल नागिन नियन दंडकारण्य में उत्पात मचावे लागल.   ओकरा ई सोच के आउर दुख होत रहे कि अब हम अपना पति विद्युतजिह्वा का मौत के बदला अपना आततायी भाई लंकापति रावण से कइसे ले सकब.   फेर ऊ मन मार के अपना मायावी शक्ति के सहारे आकाश मार्ग से उड़त पूरे दंडकारण्य के मुआयना करे लागल. ओकर नजर वन में बनल एगो कुटिया पर पड़ल. ऊ देखलस कि दूगो गठल बदन वाला सुन्दर राजकुमार आपुस में कुछ बात कर रहल बाड़ें. एगो के तीर-कमान बगल में धइल बा आ दूसर के धनुष कान्ह पर बा. पीठ पर तीर भरल तुनीर बा आ दहिना हाथ में उहे सूर्यहासे जइसन तलवार बा. ओकरा बात बूझत देर ना लागल. ऊ एगो सुन्दरी के रूप लेके कुटिया के अगल-बगल भटकत इका-दूका लोग से राम-लछुमन के बारे में सवाचे लागल. ओकरा पता चलल कि दूनों राजकुमार अयोध्या के राजा दसरथ के बहुत प्रतापी पुत्र बाड़ें. एह लोग का सङ्गे सीता नाम के एगो सुन्दर स्त्री बाड़ी. जे जनकपुर के राजा जनक के अलौकिक बेटी हई जेकरा के राम धनुष भंग करके बिअहले बाड़न आ इहे दूनों भाई रावण का बक्सर छावनी में खर-दूषण आ ताड़का आदि राक्छसन के मरले रहस.

ई सब सुनके सूर्पनखा दंग रह गइल. ओकरा मन में कई तरह के बात होखे लागल. ऊ सोचलस कि जदि ई दूनों भाई एतना बलवान वीर बाड़ें त कुछ अइसन करीं कि एह दूनों से हमार सम्बन्ध हो जाए फेर जब समय आई त एही दूनो के मदद से अपना पति का मौत के बदला रावण से ले लेहब.

सूर्पनखा अपना बदलल ओही सुन्दर रूप में राम-लछुमन के कुटिया में पहुंच गइल आ राम का रूप-गुण के प्रशंसा करत अपना से बिआह के प्रस्ताव दिहलस. राम असहज होत रहलें. बाकिर ऊ कुछ कौतूहल बस कहलें कि हमार बिआह हो चुकल बा. हमार पत्नी हमरा सङ्गे कुटिया में रहेली. ऊ हमार छोट भाई लछुमन अकेले बाड़न. तूं उनका पास जाके आपन प्रस्ताव देके देखऽ. फेर सूर्पनखा आपन उहे प्रस्ताव लछुमन के पास जाके रखली त लछुमन कहलें कि हम त उनकर छोट सेवक हईं. हमरा से बिआह करके तोहरो उनकरे सेवा करेके पड़ी. तोहर रानी बने के इच्छा हमरा से बिआह करके पूरा ना हो सके. एतने में सीता कुटिया से बाहर आके राम के बगल में खड़ा होके ई सब देखे-समुझे लगली. सूर्पनखा सीता के सुघरता-सुन्दरता देखलस त देखते रह गइल. ऊ रावण किहां एक से बढ़के एक स्त्री के देखले रहे बाकिर अइसन अलौकिक रूप के स्त्री ऊ पहिला बेर देखलस. एह सोच के बीचे ओकर मन कुछ थिर भइल त लछुमन से खीजल मन के चलते फेर राम के पास जाके आपन उहे प्रस्ताव दुहरावत सीता के घूरे लागल. सीता टोकत कहली कि तूं केतना निर्लज्ज मेहरारू बाड़ू. तोहरा कवनो गतर लाज नइखे कि इहां आके तब से नौटंकी कइले बाड़ू. एतने में लछुमनो उहां के खड़ा हो गइलें. सूर्पनखा का सीता के बात नागवार गुजरल आ सोचलस कि इहे हमरा राह के कांटा बिया. एकरे के खतम करब तब बात बनीं. फेर ऊ सीता के ओर वार करे का नीयत से झपटल कि राम लछुमन के संकेत कइलें आ लछुमन अपना हाथ में लिहले संबूक वाला सूर्यहास तलवार के सूर्पनखा के ओर झटाक से तनलें. एही धड़फरी में सूर्यहास तलवार सूर्पनखा के नाक पर लाग गइल. नाक कटते ऊ छटपटाए लागल आ उहाँ से भाग चलल.   जात समय राह में सोचत रहे कि काहे ना एह घटना के खबर आ सीता का सुन्दरता के बारे में अपना भाई रावण के बताके सुझाव दीं कि एह दू वनवासियन से सीता के हर लऽ. जदि राम-लछुमन से रावण के जुद्ध होई आ ई दूनों सचमुच वीर होइहें आ रावण के मार जइहें आ हमार आ हमरा बेटा शंबूक के सपना पूरा हो जाई.

( ई कथा आठवीं सदी में जैन कवि स्वयंभू के लिखल ‘पउमचरिउ’ आ ( पद्मपुराण ) के आधार पर लिखल बा. एकरा अनुसार संबूक शूद्र ना रहस आ ना राम उनकर बध कइले रहस.   बलुक बाद में बाल्मीकि रामायण में आ  तुलसीदास का रामचरितमानस में राम का चरित में खोट देखावे आ सनातन समाज में विभेद पैदा करे के नीयत से जोड़ दिहल गइल. रामायण आ रामचरितमानस में संबूक बध के प्रसंग जोड़े के पहिलहीं रामराज के स्थापना के बाद कथा पूरा गइल रहे. अइसहूं रामायण आ रामचरितमानस में संबूक के माई-बाप भा जनम स्थान आदि के कहीं कवनो जिक्र नइखे. )
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प्रो. जयकान्त-सिंह-जय,
विभागाध्यक्ष-स्नातकोत्तर भोजपुरी विभाग, बी. आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर ( बिहार )

पिनकोड-842001
राष्ट्रीय महामंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना ( बिहार )
ई-मेल-indjaikantsinghjai@gmail.com

आवासीय पत्राचार-‘प्रताप भवन ‘महाराणा प्रताप नगर
मार्ग सं. -1( सी ) भिखनपुरा, मुजफ्फरपुर ( बिहार )
पिनकोड-842001

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