–डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
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सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-26
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
बाघ-बकरी के कहानी कबो बन्न होखेवाली नइखे

काकी चाय पियत रही, ओही घरी लभेरनो आ गइले. काकी लइकन के आवाज लगवली- एगो अउरी चाह भेजऽ सन. लभेरन के स्वाद बड़ा पसऽन परल. पुछले– “कवना कंपनी के चाह हटे?” भीतर से एगो लइका चाय के डिब्बा लेके आइल. अच्छा, बाघ बकरी चाय! लभेरन खिल गइले.
काकी कहली – बड़ा विचित्र नाँव बा! भला बाघ-बकरी चाह पियेले सन? ई कइसन कंपनी ह भाई?
लभेरन समुझवले – बहुत पुरान ह काकी, आजादियो से पहिले के कंपनी हटे. वाघ बकरी चाय एगो प्रसिद्ध भारतीय चाय ब्रांड हटे. ई ब्रांड अहमदाबाद में 1934 में लंच भइल रहे.
काकी के पुरान दिन याद आ गइल. “हमनी का समय में बाघ-बकरी के कहानी बड़ा चाव से पढ़ल जात रहे. बघवा कइसे अनखुन खोजिके बकरिया के मारिके खा जात रहे!”
लभेरन बोलले – ऊ कहनिया आजुओ पुरान नइखे भइल.
काकी का भउँ पर बल आ गइल. “कइसे हो? तनी विस्तार में बताव. “
लभेरन बतावे शुरू कइले.
एह कहानी का पहिलका दौर में बाघ दबंग रहे, जंगल में सभका पता रहे. एगो बहुत पुरान नदी रहे. ओकर पानी ठंढा रहत रहे, किनारे हरियर घास रहे आ दूर-दूर ले ओकर आवाज सुने में आवे. नदी का एगो मोड़ पर रोज सबेरे एगो बकरी आवे. ओकर काम बस अतने रहे कि पेट भर पानी पिए, दू-चार पत्ता चर ले आ साँझ होते-होते झुंड में लवट जाए.
एक दिन बकरी नदी का किनारा पर पानी पीयत रहे. ओही घरी अचके में पीछे से गरज सुनाई पड़ल—
“ए बकरी! तू पानी के जूठ आ गंदा करतारू!”
बाघ के सामने देखिके बकरी के होश उड़ि गइल.
बकरी थरथराते बोलली, “मालिक, हम त नीचे पानी पियतानी, रउआँ त ऊपर बानी, पानी त ऊपरे से नु नीचे आवता…”
बघवा हँसलस. “बहुत जबान चलावतारू. ढेर ज्ञानी हो गइल बाड़ू ? तहार बाप हमरा बाप से पइसा लेले रहे, ऊ अब तक तहन लोग ना चुकवलू. आजु त तहरा के हम ना छोड़बि. अतना कहिके बघवा बकरी के मारि के खा गइल. ”
समय बदलल. अब खाली बाघे दबंग ना रहि गइल. राजनीति के ताकत सभका ऊपर हो गइल. चुनाव के समय आइल. बाघ अपना के सामाजिक, परोपकारी, सहमिल्लू देखावे में जुटि गइल. अब ऊ बकरी के देखे त मुस्कराए, ओकरा खातिर फेड़ से पतइयो तूरि के दे दे. अतने ना ऊ बकरी का छोट-छोट बच्चन के गोदियो में उठाके खेलावे लागल. अब बकरी बाघ से डेराइल बन्न क दिहली स. बाघ जब कवनो बकरी के नदी का किनारे पानी पीयत देखे त मुस्करा के हटि जाइ- पहिले तहन लोग पानी पी ल, हम बाद में पी लेबि.
अब बाघ बोले लागल- “हम त लोकतांत्रिक बानी. हम त सबके भलाई चाहत बानी. ” बाघ का एह भाषण पर बकरी सभ खुश हो जा सन. ऊ मानि लिहली सन कि अब बाघ हमार दुश्मन नइखे.
अब बाघ मंच से मुस्कराए, नियम बनावे, नारा दे, बाकिर ओकर भूख थोरहीं कम भइल रहे.
चुनाव तक आपन लार चुवल रोकल आ बकरी के गरमा के बोलल चुपचाप सुन लिहल, कवनो साधारन काम ना रहे. बहुत तपस्या कइलसि बाघ आ चुनाव जितते एक-एक क के
अपना चमचा बकरन से रोजे काम भरि बकरी मङवावे लागल आ खाए लागल. अब नु केहूँके पता चले आ नु केहूँ विरोध करे.
एकरा बाद का दौर में बाघ का तिसरकी पीढ़ी के बुझा गइल कि बकरी का समाज में ओकरा जाति के भी नया नेता लोकप्रिय होखे लगले. बाघ एह खतरा के भाँपि गइल. ऊ देखलसि कि बकरियन में सब एके जइसन नइखे. कुछ मोट, कुछ दूबर-पातर. कुछ झुंड का आगा-पीछा चलेवाली, कुछ तेज बोलेवाली आ कुछ चुपचाप. बाघ आपन दिमाग चलवलसि. ऊ कुछ बकरियन के लालच देखाके आ कुछ के डेरा-धमका के बाकी बकरियन का बीच में फुसफुसाहट फइलावे लागल.
“देखीं, हई मोटकी बकरिया रउआँ सभ के हक खा जातरी सन. ”
“हे मोटकी बकरियन का विरोध में आवाज उठाव लोग, हम तोहन लोग का साथे बानी.
एह तरह से बाघ अब बकरी के वर्ग बनावे शुरू कइलसि. एक बकरी से कहे- “तोहार दुश्मन हऊ बकरी हटे. ” दोसरकी से कहे- “तोहार दुश्मन ईहे बकरी हटे. ” बकरी आपस में लड़े लगली आ बाघ पंचाइति करे लागल.
कुछ बकरी के विशेष सुविधा मिलल, कुछ के सिर्फ आश्वासन आ बाकी बकरी चुपचाप अपना जाति का लोगन के खतम होखत देखऽ सन बाकिर आपसी विरोध के भाव एतना प्रबल रहे कि ईहे सोचिके संतुष्ट हो जा सन कि नीमन होता, ई लोग अइसहीं खतम हो जाउ.
अब बाघ हर मंच पर बोले कि हम त सभके एके आँखि से देखींले. विकास होई त सभकर, अब दबंगई ना चली. सभ बकरी खुश. अउर का चाहीं!. दबंगई अबहिंयो बनल बा. अब त बिना हरे-फिटिकिरी के मए काम हो रहल बा. अब शिकार करे गइला के कवन काम बा? मतलब बकरी काल्हुओ बाघ के चारा रहली आ आजुओ बेचारी का भीरी अब अउर कवनो चारा नइखे.
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030 मो. 9831649817
ई मेल : rmishravimal@gmail. com

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