– डॉ. प्रकाश उदय
#संस्मरण #अरुणेश-नीरन #भोजपुरी
(सरधांजलि/संस्मरन)
ई त कवनो बात ना भइल

का नाँव रहे उनुकर, से त नइखे इयाद, बाकिर काशी विश्वनाथ मंदिर के सेवादार रहन ऊ, हालाँकि उनुकर सेवकाई अभी पक्का ना भइल रहे। पक्का हो जाय, एकरे खातिर त ना, बाकिर एकरो खातिर, विश्वनाथ जी के अलावा विश्वनाथ मंदिर के तब के मुख्य कार्यपालक अधिकारी जे रहन, उनहूँ के सेवा के मोका ऊ जोहत रहत रहन। तब मुख्य कार्यपालक अधिकारी रहन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय। पाण्डेय जी भरसक त केहू के अपना सेवा के मोके ना लहावे देस, बाकिर का, कि रउआ हाथ धो के तौलिया-ओर हाथ बढ़ाईं आ केहू ओह तौलिया के खींच के रउआ हाथ में रख देबे, त एह आ अइसन सेवा से बाँच के रउआ कहँवा जाइब! अइसने-अइसन कुछ सेवा-टहल के बले ऊ सेवादार, पाँड़े जी के घरबारी-मतिन हो गइल रहन, बाकिर
पाँड़े जी कैदा-कानून के अइसन पक्का कि ऊ पक्कापन उनुका नाक के नोक प झलकल करे, आ ओकरा दँवक के मारे, अपना सेवादारी के पक्का करे के अरदास ऊ बेचारू करे ना पावस; कबो-कबो, कुछ-कुछ, कहे-कहे कइला-लेखा क के रह जास।
एही बीचे, बुला बाबा बिसनाथेजी के दया-माया, कि नीरन जी पहुँच गइले अपना मित्र किहाँ, दुचार दिन खातिर। ओही नीरन-काल में सेवादार बेचारू के पहिला बेर पता चलल कि राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय असल में कवनो राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय ना हवन, ‘रजिन्नर’ हवन, आ अतने ना, ऊ हँसबो करेले ठठा के, मुस्कइबो करेले देर ले, आ खाली झरहेटबे ना करस बेबात के बात प, बेबात के बात प झरहेटइबो करेले। सेवादार अदेर पाण्डेय जी के छोड़ले, आ नीरन जी के पकड़ लेले, आ जवन अचंभा के बात रहे एह कांड में, तवन ई कि उनुका एह पाण्डेय जी के छोड़ला आ नीरन जी के पकड़ लिहला के बात नीरन जी के बाद में पता चलल, सेवादार भाई के अपनहुँओ बादे में पता चलल, पाण्डेय जी के पहिले पता चल गइल। आ एकरा बाद ईहो पता चलल कि पता रहे उनुका कि सेवादार जी के का चाहत रहे, आ केहू कुछ एकरा बारे में उनुका से कहे, एकरा से पहिलहिंए, अपनहिंए ऊ उनुका के नीरन जी के सामने बइठा के कहले कि चिंता मत करऽ, पक्का बा कि बाबा के तहार सेवकाई पक्का हो जाई। अगिला बेर भइल जब नीरन जी के उनुका किहाँ अवाई, त फेरू कहले, ओसहीं बइठा के कि चिंता मत करऽ तहार पक्का हो जाई। ओकरो अगिलका बेर ईहे कहले, ओसहीं, बाकिर ओकरा अगिलका बेर ना कहे पवले, एह से कि नीरन जी अड़ गइले कि अबकी अपना एह पुनरुक्ति दोष से मुक्ति पावऽ, फेरू से ऊहे वाला ‘हो जाई’ मत सुनावऽ, साफ-साफ कह द कि ‘ना होई’,कि ई छोड़स तहार आस, सीधे विस्नाथे जी किहाँ जास, उनुके से लगावस अरदास।
पाण्डेय जी एह बात प चार बात सुनइले, चार बात भुनभुनइले, बाकिर ईहो भइल कि सेवादार के सेवादारी पक्का हो गइल। ओही सेवादार भाई से नीरन जी के एगो आउर नाँव सुने के मिलल। मन्दुरुस्ती जी। नीरन जी कबो-कबो चुपचाप बनारस आवस, आ गोदौलिया प गंगा लॉज में टिक जास। एकर जानकारी बनारस के बस तीन जन के होखे, एगो प्रकाश उदय के,
दुसरे ओह सेवादार के, आ तिसरे बाबा विश्वनाथ के। बाते-बाते उदय जी पुछले कि एह लॉज के बाथरूम में साबुन बा कि ले आवे के परी, त नीरन जी के जबाब रहे कि ‘तन्दुरुस्ती है वहाँ, लाइफब्वाय है जहाँ’। आ सेवादार जी, जिनका साथे उनुका विश्वनाथ जी से भेंट करे जाय के रहे, ऊ एकरा आगे के एगो बात बतवले, ‘मन्दुरुस्ती है वहाँ, नीरन नाम है जहाँ’। हालाँकि नीरन जी के एह ‘मन्दुरुस्ती जी’ वाला नाँव के तीने जन जाने पावल, एगो उदय जी, एगो विश्वनाथ जी के ऊ सेवादार, आ एगो खुद विश्वनाथ जी। ओंइसे, एह मन्दुरुस्ती के तर्ज प नीरन जी एगो आउर पद ईजाद कइले रहन, ‘जन्दुरुस्ती’। बलभद्र खातिर।
बलभद्र के जुड़ाव जन संस्कृति मंच से, ओही से जोड़ के। नीरन जी उनके मनबो करस बहुत, आ उनसे बहसबो करस मनमान। अपना-अपना वैचारिक प्रतिबद्धता के लेके ई बहसबाजी एह दूनो जन के अपना तरह के आपन मनसायन रहे। ओंइसे, नीरन जी किहाँ अपना बारे में आपन जवन कुछेक सूक्ति रहे ओमें से एगो ईहो रहे कि भाई, प्रतिबद्धता-पीड़ित हम ना हईं। बलभद्र से उनुकर बहस बहस ना रहे, एक तरह के ‘बिहँस बहस’ रहे, आ ऊ, जइसन जन्दुरुस्त बलभद्र पहिले रहन, आजो, अबहुँओ, ओइसने जन्दुरुस्त बाड़े कि कुछ हिल-डोल आइल बा, ई अंदाजे खातिर रहे। ओंइसे, तन्दुरुस्त भा मनदुरुस्त भा जन्दुरुस्त कुल्हि ऊ अपने रहन, उनुके प ई कुल्हि सोभत रहे। तन्दुरुस्त ऊ अपना के सबका से जादे मानत रहले, स्वास्थ्य के लेके केहू के देल कवनो सलाह कबो सुनले ना, माने के बात त दूर। एगो प्राकृतिक चिकित्सक बतवले कि रउआ हप्ता में एकाध दिन अनघा पानी पीके वमन क लेबे के चाहीं। नीरन जी कहले कि अछा ई बतावऽ, कि मुँह से ‘खाइल’ प्राकृतिक ह कि ‘उल्टी कइल’ ? आ जेकरा के जन्दुरुस्ती ऊ कहत रहन, ऊहो उनुकर आपने खासियत। उनुका आपन जन में ऊहो, जे सुर-नर-मुनि-किन्नर-गंधर्व… आ ऊहो जे भूत-प्रेत-बैताल-बूड़ा.। उनुका अपनन में ऊहो लोग जेकर आपस में अनघा अनबन-अबोला। आ मन्दुरुस्ती के ममिला में, हमरा नइखे लागत कि केहू के एह बात से इन्कार होई कि ‘मन्दुरुस्ती है वहाँ, नीरन नाम है जहाँ’।

जहाँ नीरन जी, उहाँ मन-मिजाज, असहीं, अनासे, कुछ-कुछ उपराहुत। दीन-दुनिया के दंद-फंद से कुछ ऊपर। लगभग-लगभग चिंता नॉट फिकिर नास्ति वाला आलम। नीरन जी जहाँ, उहाँ बाकी सब, सबकुछ, उनुका इर्द-गिर्द। अगल-बगल। आगे-पीछे। बीच में उनुका अलावा केहू ना दोसर। कुच्छो ना। एह से ना कि ऊ अद-बद के बीच के जगहा चुन लेत रहले, एह से, कि बाकी सब, उनुका अगल-बगल, आगे-पीछे हो लेत रहे, आ एत्तरे, बीच में ‘आ’ ना जात रहन ऊ, ‘हो’ जात रहन। सभे बोलल, ऊ ना बोलले, त चर्चा में केकरो बोललका ना ओतना, जतना उनुकर ना बोललका। देवरिया के देन रहन ऊ, त ईहो ना कि बाहर खातिर त ऊ नीरनजी इय्यह, नीरनजी उव्वह; देवरिया खातिर कवन नीरन जी, कहाँ के नीरन जी ! ‘घर के जोगी जोगड़ा’ वाला कहाउत उनुका खातिर बनले ना रहे बुला। देवरिया में त अइसन, कि ‘आन गाँव के सिद्ध’ तब्बे सिद्ध मनाइल जब ओकरा सिद्धि प देवरिया के अपना नीरन जी के ठप्पा लाग गइल।
हमरा तरफ से त ऊ अपना देवरिया जनपद के मीडिया माफिया मतिन। उनुका अतना त ना, बाकिर कवनो कमो ना, साहित्यिक दुनिया के एगो मीडिया माफिया के हम बनारसो में चिन्हले बानीं। संजोग से ऊहो नीरने जी के हली-जली। डॉ. रामसुधार सिंह। ऊ ओह कुछेकन में से एक, जे नीरन जी से छोट भाई के रूप में जतना नेह-छोह पावल, ओकरा से जादे उनुका तीसे-बत्तिस के उमिर में दिवंगता पत्नी से, देवर के रूप में। आज के कवनो आयोजन के काल्ह के अखबार में आवे वाला रपट में, राउर मन कि राउरो थोबड़ा थोर-बहुत आवे, त कुछ
मत करीं, देवरिया में नीरन जी से, बनारस में रामसुधार जी से, बस सटल रहीं, ऊ चाहे आयोजन के चउकी प होखस, चाहे चउक प, चाहे चउका में। तय बा कि रपट के मथेला उनुके वक्तव्य से लियाई, ऊ चाहे वक्तव्य होखे चाहे वक्तुल्ली, आ फोटो अद-बद के उनुके आई, आ उनुकर आई त राउरो आई, सट के सटल रहब त समूचा आई, ना त तिनपइए सही, अधवाड़े सही, डेलिए सही, भरेठे सही! कुछ त रहले रहन नीरनो जी के गुरुजन, गिनती के, जइसे विद्यानिवास जी, शिवप्रसाद जी, बाकिर अपने ऊ केकर-केकर गुरुजी रहन, एकर कवनो गिनती ना रहे। देख के अचंभा होखे कि कवना-कवना बिरादरी के कइसन-कइसन लोग उनुका चेलवाही में! केहू अफसरस्य अफसर बिरादरी के, त केहू ओही अफसर के चपरासियो के चपरासी बिरादरी के। ऊहो जे लिखला के मारे सभत्तर धरती के कागद आ सातो समुंदर के सियाही करे प परल रहत रहे, आ ऊहो जे लिखे के नाँव प लोढ़ा रहे, पढ़े के नाँव प पत्थल। उनुका गुरुआई के एही जलवा-जलाल में नीके तरी नहा के मनोहर श्याम जोशी आपन उपन्यास ‘हरिया हरिक्यूलिस की हैरानी’ के प्रति उनुका के, हमरा सामने के बात, कि ई लिख केेे देले कि ”हैरान हूँ गुरू, कि तुम्हारे ही बताए मुताबिक, तुम्हारा मैं गुरु हूँ !“
एक दिन, देवरिया में, उनुका घरे, गुरुजी हो गुरुजी के गोहार लगावत एगो अइसन चेला पहुँचले जिनका के नीरन जी चीन्हत ना रहन। नीरन जी ना चीन्हत रहन, से त ठीक बा, एकरो से जादे ठीक बात ई रहे कि ऊहो नीरन जी के ना चीन्हत रहन। उनुका चेला भइला के कहानी ई रहे कि उनुकर मेहरारू, संजोग से, ओही कॉलेज के पढ़ल रही, जवना कॉलेज में नीरन जी पढ़ावत रहन, आ जवना संजोग से ई, तवने संजोग से ईहो कि ऊ ओह विषय के पढ़निहारिन ना रही, जवना विषय के पढ़वनिहार रहन नीरन जी। तब्बो ऊ अपना कॉलेज के एह गुरुजी के अतना बेर, अतना तरह से, अतना बखान कइले रही अपना पतिदेव से, कि पतिदेव मने-मने उनुका के आपनो गुरु मान लेले रहन। एह मने-मने मनला से जतना दिन चलल चलल, एक दिन ना चलल, जाने कवना बात से, घर-परिवार के के-जाने कवना कुफुत से डिप्रेशन में जाय-जाय भइले, कवनो राह-रस्ता ना सूझल, त गुरुजी हो गुरुजी के गोहार लगावत नीरन जी के घरे पहुँच अइले।
शुरू भइल गुरु-शिष्य संवाद। एक-से-एक सवाल आ एक-से-एक जबाब। कुछ अइसनो सवाल आइल जवन पूछेवाला पुछलस ना, ओकरा से पुछा गइल, आ जबबवो में से जाने कतने जबाब, नीरने जी के बतवले हम जनलीं, कि एह से ना आइल कि नीरन जी किहाँ ओह सवाल के जबाब रहे, एह से आइल कि पूछेवाला के भरोसा रहे कि जेकरा से पूछत बानीं ओकरा
किहाँ एकर जबाब बा। बहरहाल, सवाल-जबाब खतम भइल आ थोरे घरी खातिर गुरु आ शिष्य दूनो जन, जबाब आ सवाल दूनो से खलियाऽ के अपना-अपना में डूब गइले। गुरुजी के आँख खुलल त देखले कि चुपचाप चेला के दूनो आँख से ढरऽ-ढरऽ लोर चलऽता। गुरुजी के हक-बक बन। कुछ ढाँढ़स-अस बन्हावल चहले त अउरू उपट परल, हिचिकी बन्हा गइल।
बहुत बाद में, बहुत पुछला-तछला प, कि कवन अइसन बात जवना से तहार दिल दुखाइल, ऊ अपना एह रुदन-रहस्य से परदा हटवले। बतवले कि गुरुजी, रउरा कवनो बात से ना, अपने मन के एगो अनेसा से। कवना अनेसा से ? बतवले कि एह अनेसा से कि एक दिन रउआ जब ना रहब, मरि जाइब, त हम कहाँ जाइब, केकरा से अतना पूछे पाइब, के अतना बतावे पाई, अतना सरियाऽ के, अतना सझुराऽ के ! के देखले बा कि ओकरा मरला प, के, कतना कइसे रोई! नीरन जी ओह दिन देखले। बाजार से महँगा-से-महँगावाला मिठाई मँगवा के एकर
महोच्छव-मतिन मनवले। मिठाई त ठीक बा, काहे अतना महँगा मिठाई ? जबाब रहे उनुकर कि जियते जब मूँए के मोका मिलल, त सोचलीं कि लगे हाथ श्राद्धो सँपरा लीं। त तवना में कइसन चिरकुटाही ! सोच के देखऽ त महँगा ना परल, उल्टे बहुत सस्ते में निपट गइल। ओंइसे, अउला परोसल उनुका आदत में रहे।
रउआ लाख के बात बतियाईं, उनुका करोड़ में पहुँचावत देर नइखे लागे के। चिरकुटाही जवना के कहल जाला, तवना के त ऊ हाले ना जनले। कवनो योजना बनावस त अतना पसार के दसो दिसाईं, कि हदस हो जाय कि समेटाई कइसे ! जवन ना समेटाइल तवन त खैर, नाहिंए समेटाइल, तवनो के गिनती कम नइखे, बाकिर जवन समेटाइल, विश्व भोजपुरी सम्मेलन के देवरिया आ मारिशस आ कोलकाता में आयोजित अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन से लेके दिल्ली, मुंबई, भोपाल, भिलाई, आगरा, पटना, बनारस तक के राष्ट्रीय अधिवेशन तक, तवनो के
गिनती कवनो कम नइखे। एह कुल्हि में उनुका अपना मशक्कत के, अपना दुइए गो बाँह के हजार-हजार बाँह में बदल देबे वाला जादू के गवाही हमरा से बेसी आदरणीय जगदीश उपाध्याय किहाँ बा। एक बे के बात, कि भइल कि देवरिया में विद्यानिवास जी के नागरिक अभिनंदन कइल जाय। पहिला काम रहे विद्यानिवास जी के एकरा खातिर तइयार कइल। एकर जिम्मा नीरन जी के। विद्यानिवास जी के कहनाम कि सामने से आपन बखान सुने खातिर मंच प बइठ जइहें छँउक के, अतना बँउक तू बुझले बाड़ऽ का अपना गुरु के ? नीरन जी के कहनाम कि अइसन करिहें, अतना बँउक बुझले बानीं का रउआ अपना चेला के ? आ एही बात प अभिनंदन तय हो गइल। तय भइल कि भाषण-भूषण कुछ ना, बस गुरुजी के असिरबादी आ माला-शाल, आउर कवनो ढंढ-कमंडल इचिक ना। एगो गाड़ी क दिआई, बस रउआ आ जाईं। गुरुजी कहलीं कि गाड़ी त ले जाई, लिवा के जाई? नीरन जी कहले कि ईहे उदैवा, दोसर के। आ लोग-लुगाई से ठसाठस देवरिया के ओह खुला मैदान वाला विशाल मंच प गुरुजी के असिरबादी के बाद माला-शाल से जब अभिनंदन शुरू भइल त पता चलल कि नीरन जी कवना कटेगरी के नीरन जी। जतना संस्था रहे एह जनपद में, तब, का सरकारी, का गैरसरकारी, तवना सबके तरफ से माला-शाल। जेकरा कवनो संस्था के अलम ना मिलल ऊ अपना कुल-खंदान के तरफ से पहिरावल। ना कवनो माला दुकड़िहा, ना कवनो शाल टुटपुँजिया। जे नाँव पुकारत रहे, ओकरा के जाने कतने बेर पानी पीए के परल। खुद गुरुजी के खड़े-खड़े गोड़ बथे लागल, कइक बेर बइठ-बइठ के सुस्ताय परल। दुचार आदमी त खाली ए खातिर खड़ा रहन कि माला आ शाल गरदन आ कान्ह से उतार के एकोर कइले जाय। पहाड़ खड़ा हो गइल। अभिभूत रहे सभे, सब बस एह दृश्य के निहारत रहे। केहू, बुझाय जइसे बोली, त बोली का, रो दी।
जब चले के भइल त एगो गाड़ी में भर गाड़ी शॉल। दुसरका गाड़ी में आगे गुरुजी बइठलीं, पीछे हम, ओहू में शाल ठुँसाय लागल त हमार दशा नारी-बीच-सारी-है-कि-सारी-बीच-नारी वाला। गाड़ी चले के तइयार,गुरुजी के मुँह ताकल जाता कि इशारा मिले त चलल जाय, आ गुरुजी के नजर दहिने-बाँवे कि कहाँ बा निरनवा। तले कार के दरवाजा भड़ाक् से खुलल आ नीरन जी भितरे। हई हतना शाल कहाँ लेके जाइब, कवनो शाल के दोकान खोले के बा… हई लीं, उदैवा के कान्हा पर राखीं; हई लीं, डराइबर साहेब के कान्हा प राखीं; आ हई लीं, हमरा कान्हा प राखीं, आ एगो हमरा के दीं, हमहूँ उदैवा के कान्हा प राखीं… आ जइसे प्रगटल रहन नीरन जी, ओसहीं बिलोपित हो गइले, अपना गुरुजी से ‘जतना-जनले-रहीं-ओकरा-से-जा दहीं-बँउक-तें-बाड़े-रे-निरनवा’ के असीस सहेज के।
नीरन जी के एक आवाहन पर सँउसे देवरिया उपट परल, अपना गुरुजी के गुरुजी के सम्मान में, आपन मकान-दोकान में ताला लगा के, सपरिवार, सज-सँवर के– सोचीं तनी, कि नीरन जी किहाँ का रहे, ना कद, ना पद। ना ऊ नेता-परेता, ना हाकिम-हुकाम, ना उनुका जर-जजात अफरात। ना ऊ बड़का भारी कवि, कहानीकार, आलोचक। लिखले त कुछ-कुछ कवितो,
कहानियो, आलोचनो आ अउरियो कुछ-कुछ, बाकिर कविता लिख के ढाह ना देले, भा कहानी, भा कुछुओ, ढाही मारे भ, खुरछारे भ ना लिखले। एगो उपन्यास लिखलचाहत रहन, कबीर के बीच में राख के, ओकर कुछ हिस्सा लिखलहूँ रहन, बाकिर ऊ कुछ, कुछ से आगे ना बढ़ल। संस्मरण अतना रहे उनुका लगे, कि लिखिते त कमाले लिखिते, बाकिर कुछुए लिखले, ऊहो
बड़ा झरहेटला प। ई बा, कि जतने लिखले, जवने, तवन सचहूँ कमाले लिखले। हालाँकि, उनुका ओहू कमाल के लेके साहित्य के इलाका में अइसन कवनो जालिम जैजैकार ना भइल, ना अइसन कवनो छूट के छीमानुख-छीमानुख भइल, कि उनुकर नाँव अतना लहराय भा अतना लसराय, कि सुधीजन के कवनो जमात उनुका के सरियावे में सिराय, कवनो जमात उनका के
गरियावे में गरमाय। जाहिर बात कि नीरन जी भाषा आ साहित्य के संसार-सागर में कवनो हल्फा उठा के ना गइले, बाकिर ईहो ना कि चुपे-चुपे अइले आ चुपे-चुपे चल गइले। जीनियस जवना के कहल जाला, तवन त ऊ रहन, उनुका लिखा-पढ़ी, उनुका बोली-ब्यवहार, ला. लोगन से उनुकर लगाव आ उनुका से लोगन के लगाव– एह सबसे उनुकर जिनियसई उपरवँछ के आपन हाजिरी जनावे, बाकिर का, कि ई जीनियसई कपार प मत चढ़े पावे, सोरहो घरी के सोहबत में आके दिकदिकावे मत पावे, एकरा खातिर ऊ, ना कुछ अवरू, त मुँह में पान जरूर घुलवले रखले, कि ना बोलब, ना घोंटब। कि ना ना-बोले-लायक के बोलब, ना ना-घोंटे-लायक के घोंटब। कहे के एक माने ईहो कि जेकरा ई लागत होे कि ऊ नीरन जी के भरमन सुनवले बा, देर ले उनुकर बोल्ती बन्न क के रखले बा, ओकरा ईहो जनले रहे के चाहीं कि ओकरा एह दूनो उपलब्धि के श्रेय नीरन पहिलहिंए से पान भा पान पराग जइसन कवनो जिनिस पदारथ के नाँवे रजिस्ट्री क के, बाकायदा दाखिल-खारिज करवा के रखले रहत रहन। एगो जवन बहसावलंबित विद्वत्ताई होला, तवना के कायल ऊ रहले ना रहन, ना तवना से केहू के कायल करे के कबो कवनो कोशिश ऊ कइले। अपना साहित्यिक जीवन में नीरन जी लिखले बहुत कम, बोलबो कमे कइले, हालाँकि अपना लिखलका से जादे त बोलबे कइले, बाकिर सबसे जादे जवन कइले, जवना के साहित्येतिहास में दर्ज करे के कवनो तरीका अभी तइयार नइखे होखे पावल, तवन ई रहे कि ऊ साहित्य के बतियवले। ईहो ना कि खाली महादेवी वर्मा से, अज्ञेय से, अमृतलाल नागर से, विद्यानिवास मिश्र से, शिवप्रसाद सिंह से, मनोहर श्याम जोशी से, आ अइसन ख्यात-प्रख्यात अनेकन से; ओकरो से जेकरा साहित्य-वाहित्य से बहुत लेना-देना ना। जइसे कि संजय कानोडिया किहाँ आवा-जाही वाला एगो यादव जी रहन, एक्यूप्रेशर-विशेषज्ञ, ऊ अक्सर नीरनो जी किहाँ आइल करें। हमरो से उनुका घरहीं, कइक बेर भेंट भइल। नीरन जी जब हमरा के उनुकर खासियत बतवले, त ऊ लगले कहे कि इनिका के हमार खासियत बतवलीं, त हमरो के इनिकर खासियत बताईं। नीरन जी पुछले कि कह सुनाईं कि आँखिन देखाईं ? कहले कि आँखिन देखाईं।
त धरीक्षण मिसिर के कविता, ‘कवना दुखे डोली में रोवत जाली कनिया’ निकाल के हमरा सोझा ध देले कि ल, पढ़ के सुनावऽ। पढ़ के सुनवलीं। यादव जी सुनत-सुनत आँख मूँद लिहले। हमरा जनाइल जे बोर हो तारे, लिहाजे सुनत बाड़े, त पढ़ते-पढ़त नीरन जी के तकलीं कि इशारा पाईं त एह बलाते के काव्य-पाठ से निजात पाईं। जबाब में नीरन जी जवन इशारा कइले तवना के पाछा-पाछा जब यादव जी के ध्यान से देखलीं त लोर के दूगो बड़-बड़ बून उनुका गाल प चमकत रहे। आ हमरा जनाइल कि एकरा बाद के हमार पढ़लका ऊहे पढ़लका ना रह गइल, कवितवो ऊहे कवितवा ना रह गइल। बाद में नीरन जी पुछले कि क हो यादव जी, का बा एह कवितवा में कि…। कहले यादव जी कि का बा ई त ना कह सकीं, बाकी जवन बा तवन एह कवितवे में नइखे खाली, इनिका पढ़लको में बा। नीरन जी कहले कि इनिका पढ़लके में नइखे खाली, तहरा सुनलको में बा। आ यादव जी एहू बात के समझले। एहू बात के समझले कि जवन बा कवितवा में, आ कवितवा के पढ़लका में, तवन सुनलका में जवन बा तवने के नाते बा। कहे में का जाता, एहू से, आ सुनले बानीं कि कबो-कबो सरसत्ती सवार हो जाली जीभ प, एहू से, इहँवे एगो ईहो बात कह के आ जतन से चपेत के रख देल चाहत बानीं, कि हमरा कबो सकत भइल, त साहित्यालोचन में नीरन जी के अइसन-जइसन कुल्हि साहित्य-वार्ता के जरूर-से-जरूर शामिल करे के कोशिश करब।
आदमी के कदर रहे नीरन जी किहाँ, आदमी के आदमी समझे वाला आदमी के कदर रहे, कद के कवनो कदर ना रहे, पद के कवनो कदर ना रहे। बड़-बड़ पदस्वी लोग से उनुकर परिचय-बात, बाकिर केहू के ओकरा पद के चलते अतिरिक्त आदर देत उनुका के ना पवलीं। एगो कॉलेज में लेक्चरर भइले, लेक्चरर लोग होत-होत होइए जाला, एकरा चलते रीडर भइले, सिनियरिटी में आ गइले त कुछ दिन खातिर प्राचार्याे हो गइले, बाकिर कुछुओ पावे खाती कबो कवनो उधामत ना कइले, रिज्यूमे बनावे आ ओकरा के मोटवावत रहे के बेमारी से हमेशा दूरे रहले। ओहदेदारी में अपना सर-संघातीलोग के कवनो ऊँचाई से कवनो कमतरी के अहसास में ऊ कबो ना लउकले। राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय उनुका खातिर ‘रजिन्नर’ से अधिका ना भइले, ना विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ‘बिस्नाथ’ से अधिका भइले। अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में कुछ दिन खातिर अतिथि होके गइले त कुलपति के उनुका नाँव से ‘गिरीश्वर’ कह के बोलावेवाला पूरा कैम्पस में ऊहे अकेल रहन। सबके त ना, बाकिर केहू-केहू के, हरदम त ना, बाकिर कबो-कबो, उनुकर एह बिना बाँव-दहिन तकले, बिना बिचरले कि अगल-बगल के बा, के ना; ई नान्हे के नाँव से गोहरावल अखड़ियो जाय, भले ऊ आपन ई अखड़लका जनाय ना देबे। नीरन जी के साथे रहत-रहत हमरा जब एकर कुछ अहसास भइल, आ हम एकर कुछ इशारा कइलीं, त कहले कि अब हम त ना सुधरब। आ कहले कि एकरा पीछे एगो तर्क बा। कि हम सबका से तनी ऊँच परींला। होला ई कि हमार कवनो आपन जब कवनो ऊँचाई प पहुँचेला त ओकर ऊँचाई आपरूप हमरा से आके सट जाला। त सोच ले उदैवा, कि सबका लगे त खाली ओकर आपन ऊँचाई बा, हमरा लगे त सबकर ऊँचाई बा, त कइसे ना हम सबका से ऊँच ! उनुका एही अन्यतम ऊँचाई के मेल में रहत रहे उनुकर बग-बग धोती आ शानदारतम कुरता प शानदारतम सदरी आ ता-ऊपर डिजाइनदार उत्तरीय। सबकुछ मेजन मिला के, आ ओही मेजन में अक्सर एगो अइसन बैग, जवना के जे देखे पहिले-पहिल, छू के देखे, आ पूछे जरूर, कि जी, कहँवा से मँगववलीं हा, कतना के परल हा ? उनुका कुरता आ सदरी प हमरो दावा रहत रहे आ अपना दावेदारी के पक्ष में हमरो किहाँ एगो वाजिब तर्क रहे। कि नीरन जी के छोटे गो त घर बा, हमरा लेखा कुछ लोग उनुकर कुरता-सदरी झीटत ना रही बेर-बागर, त घर में कुरता-सदरी के अलावा कुछ राखे के जगहा ना रह जाई। बहरहाल, ई उनुकर अइसन धज रहे, जवना में उनुका के देखे के हमन के लत लाग गइल रहे। मुम्बई में एगो आयोजन रहे, ओमें पाती के यशस्वी संपादक अशोक द्विवेदी आ हमहूँ शामिल रहीं, हमनी के कविता पढ़े के रहे, उनुका भाषण झारे के रहे। होटल से तीनो जन अपना-अपना हिसाब से झार के चललीं जा, आ कार कुछ दूर चल लेलस तले अशोक भइया के मुँह से निकल गइल कि बाकी सब त ठीक बा, बाकिर आज राउर सदरी, ओतना नइखे दमकत जतना काल्ह वाला दमकत रहे। आ ओकरा बाद त कतनो हमनी के मिल-जुल के कहे के कोशिश कइनी जा कि जी, ‘दमकत नइखे’ के मतलब ई ना कि ‘दमकत नइखे’, बस अतनवे कि काल्ह तनी जादे दमकत रहे, बाकिर नीरन जी कार घुमवाइए के मनले, कि अब त कविवरद्वय, ना जो बदलब हम ई सदरी त हमार त भषणवे बिगड़ जाई ! तर्क ई कि झार के ना जाइब, त झार के का आइब ! अपना एह सजग वस्त्र-विन्यास के पीछे उनुकर एगो आउर तर्क रहे। तर्क कि हमार जवन रंग बा, पक्का वाला, ओकर काम पितम्मर से कम में त द्वापरो में ना चलल रहे, त भला कलियुग में कइसे चले पाई ! ई रंग वाला बात एक बे कुछ दूर तक चलल रहे, बाकिर ओकर बात बाद में, पहिले उनुका एह तर्कपारायण भइला के एक उदाहरण आउर।
एक बे कहलीं कि हमरा तीन बेर फर-फराकित के आदत। रउआ की त कवनो दवा-बिरो बताईं, ई आदत छोड़वाईं, ना त एकरा समर्थन में कवनो जबर्दस्त किस्म के तर्क लहवाईं। त कहले कि आदत त तब छोड़वावे पइतीं जब हम अपने एह आदत से बरी होइतीं। इहाँ त जो हाल तोरा सो हाल मोरा। एक बे त उठि-सुति, दोसरका बे नहाय के पहिले, तिसरका बे कुछ हल्का-फुल्का खइला के बाद। तर्क तोरा चाहीं त ईहे तोरो कामे आई, ईहे हमरो कामे आवेला कि तीतर तिसरके उड़ान में धराला, कि जवना लोक के लोग हमन हईं ओह लोक के काम ‘एक बन गइलीं’ से ना चले, दोसरको में जाय परेला आ काम बनेला तिसरका बन में– एक बन गइली, दोसर बन गइलीं, तिसर बनवा…। ओंइसे एक तरीका आउर बा,कि हमरे लेखा तेहूँ एह तीनो के एक मनबे मत कर। पहिलका के नाँव दे ‘रुचिकर’, दुसरका के ‘शुचिकर’ आ तिसरका के ‘स्वास्थ्यकर’ !
आ अब रंग के बात। तब के बात, जब उनुका अपना गुरुजी, पं. विद्यानिवास मिश्र के लेके एगो डाक्यूमेंट्री बनावे के जिम्मा मिलल रहे। साथी लोग के साथे ओकर ताना-बाना तय होत रहे। बात आइल कि गुरुजी के साथे नीरनो जी के एगो बातचीत ओमें रहे के चाहीं, त उनुका परम मित्रन में से एगो, बैरिस्टर तिवारी, कहले कि जरूर रहे के चाहीं, ना देखी दर्शक लोग एह दूनो जन के एक्के साथे, एक्के फ्रेम में, त पता कइसे चली कि कवना गोराई के गोराई कहल जाला आ कवना करियाई के करियाई ! नेचुरल कंट्रास्ट कलर का कहाला, ई त केहू तब्बे जाने पाई जब कैमरा के सोझा, आमने-सामने होके, ऐन नीरने जी बतियइहें आ ऐन गुरुए जी से बतियइहें !
तिवारी जी के ई गोर-करिया वाला बतकही ओह दिन उनुका मित्र-मंडली में देर ले खिंचाइल। बात-बात में जाने कतने लतीफा आइल, उधियाइल। एगो बात हमरो लगे रहे, अपना छोट भाई मुन्ना के, हमहूँ सुनवलीं। मुन्ना के सामने कुछ मेहरारू लोग बतियावत रहे कि अलनिया के गोराई उजरकी गोराई, फलनिया के गोराई पियरकी गोराई, चिलनिया के गोराई ललकी गोराई। त मुन्ना कहले कि तनी हेने देखऽ लोग भाई, हमरो गोराई, हमार गोराई करियक्की गोराई ! नीरन जी ढेर दिन ले धइले रहले एह ‘करियक्की गोराई’ के।
एक बे सुनलीं कि ऊ, केहू के, कविवर रविकेश मिश्र के बारे में बतावत रहन, कि हमरे कद-काठी के, हमरे अइसन करियक्की गोराई वाला मनई ऊहो हवे, हमरा के मन में राख के उनुका के चिन्हबऽ त चीन्ह जइबऽ! बाकिर, बैरिस्टर तिवारी के एह करिया-गोर के कंट्रास्ट वाला बात के, तिवारी जी के लाख मना कइला के आ मनवला के बावजूद, बावजूद निकहा धिरवला के, तिवारी जी के मौजूदगी में, नीरन जी अपना गुरुवर विद्यानिवास जी के सामने परोस देले, आ जइसन कि उनुका सुभाव में शामिल रहे, अपना ओर से झूठ-साँच अनघा जोड़-घटाऽ के। अपना एह झूठ-साँच के नीरनो जी, आ उनुका एह झूठ-साँच के अउरियो-अउरियो उनुकर हीत-नात ‘निरामिष’ आ ‘अहिंसक’ आ ‘परम पावन’ जइसन कतने विशेषण से सटले-सटवले रहत रहे, आ केहू ना कह सके कि एमें से कवनो विशेषण उनुका झूठ-साँच से कब्बो मिसमैच कइल। बहरहाल, गुरुजी के बादशाह बाग वाला दरबार में, तिवारी जी के एह मौलिक उद्भावना के लेके जवन हँसी-ठाठा होखे के रहे, भइल, आ ओमें नीरन जी के जोड़ला-घटवला प तिवारी जी के जवन एतराज रहे तवनो के सुनल गइल, उनुका एह दुहाई के साथे कि गुरुजी, रउआ-त-नीरन-के-जानते-बानी-कि-कइसन-ई-झुट्ठा-लबार, आ गुरुजी के एह दिलासा के साथे कि कहऽ भला, हमहीं-ना-जानब-कि-कइसन-ई-झुट्ठा-लबार ! ई कहबे ना कइलीं उहाँ के, हाथ-के-हाथ साबितो कइलीं। अपना कवनो सद्यः प्रकाशित किताब के एगो प्रति उठवलीं, ओकरा पहिला पेज प तिवारिए जी से कलम लेके कुछ लिखलीं, आ लिख के किताब तिवारी जी के थमा दिहलीं कि ल, पढ़ ल कि का लिखल बा, आ पढ़ के नीरन के दे द। लिखल रहे ‘अनृताचार्य अरुणेश को ससनेह’। बहरहाल, एकरा साथे-साथे बाते-बाते गुरुजी एह रंग-चर्चा के एगो अइसन दिशा दिहलीं कि बाते बदल गइल। कहलीं कि महेन्दर मिसिर के एगो पूरबी ह, ”एके गो मटिया के दुइ रे खेलवना, मोर बलमुआ हो, गढ़े वाला एके गो कोंहार“। ओमें आवेला कि ”कवनो खेलवना के अटपट गढ़निया, मोर बलमुआ हो, कवनो खेलवना लहरदार“। आ ओही में ईहो आवेला कि ”कवनो खेलवना के रंग बाटे गोर, मोर बलमुआ हो,
कवनो खेलवना जिउआमार“। त ई ना भुलाय के चाहीं कि करिया रंग के एगो आउर नाँव ह ‘जिउआमार’।
आ बाते-बाते बतवलीं गुरुजी, कि केहू बतावत रहे कि हजारी प्रसाद जी के मुँह से उनुका आखिरी समय में जवन एगो बात बेर-बेर सुनाइल, तवन ई रहे कि ‘काहे दो करियट्ठा आवत नइखे, हलकान क के धइले बा!’ आ जे विद्यानिवास जी के जानत बा, ऊ ईहो जानत बा कि राम-चर्चा चले त उहाँ के सम्हर जात रहीं, कृष्ण-चर्चा चले त बह जात रहीं, भरसक त बहक जात रहीं। त भइल ई, कि सामान्य दिन के सामान्य एगो बइठकी, ओह दिन कन्हाई आ उनुकर जिउआमार करियाई के चर्चा में अइसन डूब के नहाइल कि बइठकी के बाद, का नीरन जी आ का आरपी पांडे जी आ का वशिष्ठ मुनि ओझा जी, सभे बैरिस्टर तिवारी के बाकायदा बोल-बोल के आभार जनावल कि भाई, ना तू उठवले रहितऽ ई बात, त आज, कइसे भेंटाइत, बात-बात में बात के अइसन सौगात ! तिवारी जी बाकिर, कहले, कि घामड़ बाड़ऽ लोग तू, ई नइखऽ देखत कि गुरुजी सहित्ते, हमन में से केहू नइखे अइसन जे महेन्दर मिसिर के ‘जिउआमार’ से जुड़ पावे, एगो नीरन के छोड़ के, त भारी-आभारी जेकरा जवन होखे के होखे, इनिके होखऽ जा, हमार जान छोड़ऽ जा…।
ओंइसे, ‘जान छोड़ऽ हमार’, नीरन जी के ई अक्सर अपना साथी लोग से सुने के मिले। हँ, त नीरन जी जेकरा जवना बात के पीछे पड़ जास, अँइसे पड़ जास कि कहहीं के पड़े अक्सर कि भाई, जान छोड़ऽ हमार। जइसे, किरपिनाही के जतना किस्सा रहे उनुका किहाँ, आ ओकर कवनो गिनती ना रहे, एह से कि ऊ नित्यप्रति उपजल करे, ओह कुल्हि के ऊ अपना मित्र, उनुका खातिर बिस्नाथ, हमन खातिर आदरणीय प्रोफेसर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी से सटा देत रहन। ओह कुल्हि कथवन के अनेक में से एक श्रोता अक्सर त खुद तिवारियो जी रहत रहन, एगो स्थायी किसिम के, भुवनमोहन मधुर मुस्कान के साथे। हमरा त एकाध बे के ईहो इयाद बा कि दुचार किस्सा हो जाए त जवन छूटल रहे, तवना में से एकाध गो के इयाद त खुद तिवारिए जी करवावस। ऊ कुल्हि किस्सा त अभी हम नइखीं सुनावत, हालाँकि एकर माने ईहो ना कि अभी नइखीं सुनावत त कभी ना सुनाइब, बाकिर ओमें से एगो त अइसन बा कि अभिए ना सुनाइब, त नीरने जी के ना, तिवारियो जी के कवन मुँह देखाइब ! नीरन जी के सबसे छोटका लइका, जनमेजय, दु-का-दो कीने खातिर नीरन जी से कुछ पसा मँगले, नीरन जी टरका दिहले, कहले कि काल्ह। अगिला दिन फेरू मँगले, फेरू टरका दिहले, कहले कि काल्ह। जब तिसरको दिन टरकावे लगले त जनमेजय खिसिया गइले, फटकार के कहले कि पापा, तू पापा ना हवऽ, तू बिस्नाथ प्रसाद तिवारी हवऽ!
एगो किस्सा त हमरा देखते-देखत, हमरा आँखिन के सामने उपजल। गोरखपुर विश्वविद्यालय में रिफ्रेशर कोर्स चलत रहे, हमहूँ ओमें शामिल रहीं। देवरिया नीरने जी किहाँ रह के, ओइजे से गोरखपुर रोज आईं-जाईं। रिफ्रेशर कोर्स में एक दिन मैनेजर पाण्डेय जी के अवाई भइल। ओह दिन विश्वनाथ जी कवनो बाझ के चलते आवे ना पवले रहन। त पाण्डेय जी, व्याख्यान के बाद उनुका के घेर के ठाढ़ तमाम नवही अध्यापक लोग के शंका-समाधान करत-करत जब उबिया गइले, त कहले कि भाई, तू लोग अब जा, हमहूँ तनी विश्वनाथ जी किहाँ उनसे भेंट करे जाइब। सुने के देर रहे कि नवही अध्यापक लोग तड़-से तइयार, कि चलीं, हमनियो के चलब जा। आ विश्वनाथ जी के खबर क दियाइल, सभे पहुँचल, चाह-पानी भइल, देर ले चलल बतकूचन, आ आज के दिन सचहूँ सभे रिफ्रेश हो गइल। जाहिर बात कि देर से लवटलीं देवरिया, आ नीरन जी से विस्तार से कइलीं एह बतकही के रिपोर्टिंग। पुछले कि चाह पियवले हा बिस्नाथ ? बतवलीं कि चाहे ना खाली, भर थारी मकई के लावा, ऊ ओराइल त एक थारी आउर। तले दु-के-दो नीरन जी से मिले आ गइल, आ नीरन जी हमरे सामने हमरे सुनावल किस्सा उनुको के सुनवले। कि ई प्रकाश उदय हवन। इनिका से बिस्नाथ के किरपिनाही के कथा सुनाईं त हँसत रहन कि रउआ बस बात बनावत बानीं, बाकिर आज जब अपना आँखिन देखले हा त बुझाइल हा कि हम बढ़ा के ना बतावत रहीं, बलु घटाइए के बतावत रहीं। एने हमार हालत खराब कि ई का नधले महाराज जी, ओने नीरन जी जारी, कि सतरह जने पहुँचले हा मिले बिस्नाथ से, बिस्नाथ के घरे, त बिस्नाथ भर थारी मकई के लावा परोस देले हा। सभे लावा खात रहे, आ साहित्य बतियावत रहे, आ पता बा बिस्नाथ का करत रहन ? जतना मन से साहित्य बतियावत रहन, ओतने मन से जवन लावा दरी प गिर जाय तवना के उठा-उठा के थारी में डलले जात रहन ! आगंतुक जब बिदा हो गइले, त नीरन जी से कहलीं कि ई का कइलीं महाराज, रउआ ओइजा रहीं ना, हम रउआ से अइसन कुछ कहलीं ना, आ रउआ हमरे नाँव प ई दु-का-का कह गइलीं ? कहले कि गलत सवाल। तहरा ई पूछे के चाहीं कि रउआ ओइजा रहलीं ना, आ हम रउआ से कहलीं ना, त रउआ जनलीं कइसे ? हम कहलीं कि ईहे बताईं, रउआ जनलीं कइसे ? कहले कि भाई, बिस्नाथ हमार जिगरी, जनम-जनम के साथ टाइप के हमनी के साथ, हम ना जानब उनुकर रहन-चाल, त के जानीं ! अब तूँ बतावऽ, जवन बतवलीं हा, ओमें कुछ गलती रहे ? दबले जुबान कहलीं हम कि थोर-बहुत गलती त रहले रहे। अइसन ना रहे कि उहाँ के लावा बीन-बीन के थारी में डलले जात रहीं। एक हाथ से उठावत रहीं त दुसरका हाथ में बटोरले जात रहीं, जब भर जात रहे तब जाके थारी में डालत रहीं, खुदरा में बिलकुल ना, थोक में।
आ नीरन जी के महानता देखीं, कि आपन गलती मान लेले, बिना कवनो किन्तु-परन्तु के। बाकिर ईहो एगो साँच, कि अइसन कुल्हि कथा-कहानी के चलते तिवारी जी त कम-से-कम कब्बो ना कहले कि भाई, जान छोड़ऽ हमार। कवनो दोसरा बात प कहले होखस, त हमरा ओकर जानकारी नइखे, बाकिर जतना हम जानत बानीं ओकरा बले ई उमेद त कइए सकेलीं कि तिवारी जी मने-मने जवना परमहंस पद के पा लेले बाड़े, शुरुए से, तवना के बाद, नीरने जी के ना, केहुओ के, कवनो बात प, ‘जान-छोड़ऽ हमार’ जइसन कुछुओ ऊ कहिए ना सकस।
अलबत्ता, उनुका दोसर-दोसर मित्रन के मुँहे, आ मित्रेतरन तक के मुँहे हम नीरन जी से ‘जान छोड़ऽ हमार’ के गोहार लगावत सुनले बानीं। खुद हम, उनुकर पुत्रवत मित्र भइला के नाते, भले कबो ई ना कहलीं, बाकिर ईहो ना कह सकीं कि कहे-कहे कइलीं ना, ना ईहे कह सकीं कि नाहिंयो कह के कबो कहलीं ना। बात कइसे ‘जान-छोड़ऽ-हमार’ तक पहुँच जाय, एकर कुछेक किस्सा। एगो दोसर तिवारी जी, बैरिस्टर तिवारी जी के संस्कृत विश्वविद्यालय वाला आवास में चोरी हो गइल। पुलिस गोड़-प-गोड़ ध के आइल, आ गइल त हाथ-प-हाथ ध के बइठ गइल। नीरन जी देवरिया से फोन क के पुछले कि का हो, का भइल, त तिवारी जी कहले कि हम का बताईं कि का भइल, तूँ बतावऽ, तहार मित्र काशी के कमिश्नर।
कमिश्नर रहन तब मनोज कुमार जी। नीरन जी उनुका से बतियवले, ऊ कहले कि तिवारी जी से कह दीं कि एक दिन हमरा से आ के मिल लीं। नीरन जी कह देले कि जा के मिल ल, तिवारी जी कहले कि ठीक बा, जा के मिल लेब। दुचार दिन बाद पुछले कि का हो, मिललऽ? कहले कि अबहीं त ना, काल्ह जाइब। परसों पुछले कि गइल रहऽ ? कहले कि ना हो, गइल त ना रहीं। पुछले कि काहे, त कहले कि पेट खराब हो गइल रहे। कहले कि काल्ह जइबऽ ? कहले कि ठीक हो जाई त जाइब काहे ना ! पेट दुचार दिन खराबे रहल। ओकरा बाद का-दो बोखार लाग गइल। तवना के बाद कहले के गाँवे जाय के बा, उहाँ से लवटि के आइब त जाइब। लवटि के आ गइले, आ नीरन जी लगले फोन प झटहेरे कि आज-के-आज अभी-के-अभी जा, मनोज से हम कह देले बानीं, इंतजार करत बाड़े ऊ तहार। त तिवारी जी कहले कि नीरन, भाई, जान छोड़ऽ हमार, आ जे तहार कमिश्नर इयार, उनुको। जीए द, हमरो के आ जवन के-जाने-कवना संजोग से चोर हो गइल बाड़न स उन्हनियो के, आ जवन के-जाने-कवना संजोग से चोर ना होके पुलिस में बहाल हो गइल बाड़न स, उन्हनियो के…।
असहीं, वशिष्ठमुनि ओझा जी, उहाँ के डायरी लिखे के सवख रहे, आ एह ममिला में अतना ईमानदार रहीं उहाँ के, कि डायरी में ईहो लिख दीं कि आज, गुरुजी के यहाँ जाना हुआ, लोक अपने गीतों में कैसे भगवान को अपनी भूमि पर लेकर आता है, इस पर सघन बातचीत हुई, चलते समय गुरुजी की चौकी के नीचे से एक उपन्यास खिसका लिया। आगे उपन्यास के नाम, प्रकाशन, संस्करण वगैरह के पूरा विवरण रहत रहे। नीरन जी के उनुका एह सवख के खबर रहे। ओझा जी तनी भ एहर-ओहर होखस, त नीरन जी उनुकर डायरी निकाल के देख लेस कि कहाँ-कहाँ से कवन-कवन किताब खसकवले बाड़े। आ बाते-बाते ओही में से कवनो माँग देस, कि बसीठ, फलनवा किताब कहिए से जोहत बानीं, मिलत नइखे, तहरा किहाँ होखे त दे द, पढ़ के लौटा देब। ओझा जी किताब के अपना किहाँ भइला से इन्कार करस त नीरन जी उनुके डायरी उनुका मुँह प खोल देस, आ भलमनसाही में दे देस, त किताब त लौटे से रहल। तूँ उनुका किहाँ से खसकवलऽ, हम तहरा किहाँ से खसकवलीं, अंतर बस अतने कि तूँ चुप्पे, हम डिठार; तूँ लिखतंग में, हम बकतंग में।
ई कइक बेर भइल त ओझो जी के एक दिन कहहीं के परल, कि की त तूँ हमार जान छोड़ऽ, ना त कहऽ त हम डायरिए लिखल छोड़ दीं, कहऽ त कुछुओ लिखल छोड़ दीं, जियले छोड़ दीं ! असहीं, विश्व भोजपुरी सम्मेलन के मुखपत्र ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ के कार्यभार नीरन जी देवरिया से अपना कपार प उठवले आ बनारस आके अपना मित्र मनोविज्ञान के परम पंडित चंद्रभाल द्विवेदी जी के कपार प पटक दिहले। लागल बइठकी बइठे। चंद्रभाल जी के लगे कहीं आवे-जाय के टाइम नइखे त उनुके घरे, पत्रिका खातिर रेखाचित्र के जिम्मेदारी जे उठवले रहे, ब्रह्मदेव मधुर, उनुका मुँह से निकल गइल कि टाइम नइखे, त उनुके घरे। ओहिजे प्रकाश उदय के बोला लियाइल, पं. हरिराम द्विवेदी के बोला लियाइल, बलभद्र के बोला लियाइल, आ जे सुनल कि नीरन जी आइल बाड़े, ऊ बिना बोलवले आ गइल। बतकूचन चलत बा; चाह-पानी, पोहा-पकौड़ा के लर लागल बा, जे जाइल चाहत बा ओकरो के जाय नइखे दियात, कहाता कि जेकरा से भेंट करे जाए के बा, ओकरो के एहिजे बोला ल। समकालीन भोजपुरी साहित्य के दुचार अंक तक त ई कुल्हि घींचघाँच के चलल, फेर चंद्रभालो जी कहले,
ब्रह्मदेवो जी कहले कि जान छोड़ऽ हमार…।
बहुत दिन बाद के बात। नीरन जी अपना किताबाकीर्ण कोठरी में सोफा प गोड़ लटका के बइठल रहन। चुपचाप। चंद्रभाल जी, आरपी पांडे जी, बैरिस्टर तिवारी जी, तिवराइन जी, वशिष्ठ मुनि ओझा जी, देवरिया के साथी-संघाती देवी सिंह जी, मन्नन जी, सिद्धेश्वर जी, आमोद जी– ऊ लगभग सब लोग, जे नीरन जी के नीरन जी ना, नीरन कहे वाला रहे, नीरन जी के छोड़ के जा चुकल रहे। उन्हनिए लोग के बात निकलल रहे, आ नीरन जी सबके बारे में अँइसे बतियवले कि लगबे ना कइल कि ऊ लोग धरा-धाम से विदा हो गइल बा, देवता लोग के जमात में
शामिल गइल बा, निंदा-प्रशंसा से परे पहुँच गइल बा। आ बतियावत-बतियावत, बलुक बोलत-बतावत अचक्के चुप हो गइले। थोरे देर बाद कहले कि उदैवा, देख, कि सबकर जान हम छोड़ दिहलीं। आ चुप लगा गइले। आ कहले कि उदैवा, देख सब जना हमरा से जान छोड़वा लिहले। आ चुप लगा गइले।
ओह दिन के उनुका ओही चुप्पी के, दिल्ली से लौट के देवरिया में, उनुका बिस्तर पकड़ लेला के बाद, दादा के साथे मिले गइलीं तहियो, सत्यदेव जी आ ब्रजेंद्र जी के साथे मिले गइलीं तहियो आ रामसुधार जी के साथे मिले गइलीं तहियो महसूस कइलीं। तीनो बेरा हम भाग के ऊपर उनुका कमरा में गइलीं। आ ओनिए मुँह क के जेने ऊ बइठल रहन, उहँवे बइठलीं जहाँ बइठल रहलीं, आ बारी-बारी से ओह सब लोग के इयाद कइलीं जेकरा बारे में बोलत-बतावत अचक्के एगो चुपचाप में चल गइल रहन ऊ। आ जवन बात आइल मन में, पता ना कि ओकर का मतलब, बाकिर ऊ खाली अतनवे रहे आ ईहे रहे कि ‘ई त कवनो बात ना भइल’। श्राद्ध वाला दिने दादा आ रामसुधार जी के साथे हमहूँ पहुँचल रहीं। असहीं, थकाने मिटावे खातिर बुला, चुपचाप ओह कमरा में पहुँचलीं आ जवना दरी प, के जाने कतने बेर उनका रहता भ में सूतल-परल रहीं, असहीं ओलर गइलीं, कि थोर-बहुत हाथ-गोड़ सोझ हो जाय। आ के जाने कहाँ से, कइसे, काहें, ऊहे बतिया फेरू से आइल आ धँस गइल– ‘ई त कवनो बात ना भइल…’।
अभिधा में त नाहिंए, लक्षणो-व्यंजना में, नीरन जी के हम कबो कहीं रोअत नइखीं देखले। हमरो कबो उनुका सोझा अपना रोअला के नइखे इयाद। ओंइसे, उनुकर कुछ प्रिय कवितन में से एगो ऊहो रहे जवना में रहे कि ”मैं रो लेता आसपास जब कोई कहीं नहीं होता है“। मजमा लगावे में माहिर रहन नीरन जी, बाकिर हम, उनुका ओहू महारत के गवाह रहल बानीं, जवना से ऊ आपन एगो एकांत जोह लेत रहन। कबो-कबो त भरल भीड़ में। कॉरिडोर के पहिले वाला विश्वनाथ मंदिर में पिंडी के सोझा वाला एगो देवार में चार-पाँच आदमी के टिक के बइठे लायक एगो ओटा रहे। ओह प नीरन जी बइठ जास त अक्सर आँख मूँद के अकेले कहीं निकल लेस।
एक दिन त हद हो गइल। घंटा भ बीत गइल। कवनो हिल-डुल ना, कवनो हरकत ना। मन कइल कि झँझोर के जगा दीं। हाथ बढ़वलीं, तले एगो बात आ गइल मन में, कि मान लीं कि झँझोरलीं, आ झँझोरलो से ना जगले तब! दहिने से हाथ लगवलीं आ बाँए लोंघड़ गइले तब! सोचिए के सिहरन-अस हो गइल। ऊ त कहऽ कि ठीक ओही घरी ऊ उठ के खड़ा हो गइले कि चल, ना त तोरा घरे जाय में देर हो जाई, लगबे डँटाय। आ विश्वनाथ गली से निकलत-निकलत एगो अइसन बात ऊ कहले, जवन आज अचक्के इयाद आइल त ऊहे सिहरन-अस जनाइल। कहले कि बढ़िया कइले हा कि हमरा के झँझोर के जगा देले हा, ना त हमार का बिगड़ित, हमरा के के डाँटे वाला, तोरा के तोर मेहरारू अतना देर से अइला खातिर धउरा के मारित। हम कहबो कइलीं कि बाकिर हम झँझोर के जगवलीं हा ना, बाकिर हमरा बात के अइसन ना कि ऊ ना मनले, बाकिर अइसनो ना कि मान लिहले। बतिए बदल देले। आज जब ओह दिन के ई बात इयाद आइल हा त मनवा में आइल हा कि बाबूजी परल रहन सोझा, बहिन परल रहे, भाई परल रहे, नीरन जी परल रहन, हम काहे एक बे झँझोरलीं ना ! पता ना कि एह प्रमाद के कबो, कहीं-कवनो क्षमादान बड़लो बा कि ना !
भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के जनवरी 2026 अंक से साभार
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प्रकाश उदय,
शिव 5/41, आर- 2, लक्ष्मणपुर, शिवपुर, वाराणसी- 221002

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