– प्रेमशीला शुक्ल
#महादेव #भोजपुरी
(महाशिवरात्रि परब पर)
भोजपुरी समाज में देवाधिदेव महादेव

देवाधिदेव महादेव शिव अनोखा देवता हवें, तैंतीस कोटि देवता में सबसे अनोखा शिव की लिलार पर दुइज के चान सोऽता, जटा में गंगा बाड़ी, गला में साँप बा। देह पर चिता भस्म लगवले, मृगछाला लपेटले शिव आँख मूंद के योग की मुद्रा में बइठल रहेलें। शिव महान योगी हवें। एकरा साथे शिव परम परिवारी हवें। पत्नी गौरा, पुत्र गणेश-कार्तिकेय, वाहन नन्दी का साथे अनेक गण शिवजी के परिवार के सदस्य हवें। सब देवी-देवता अकेल चाहे अपना जोड़ा का साथे पुजालें, शिवजी परिवार समेत पुजालें। एतने नाहीं शिवपरिवार के सदस्य एतना विशिष्ट हवें कि उनुकर पूजा अलगो-अलगो होला। गौरा, गणेश आ कार्तिकेय के महिमा जगविदित बा। इ सब अपने आप में पूजनीय हवें। शिव जी के खान-पान, पहिरन-ओढ़न, रहन-सुभाव सब बाकी देवता लोगन से अलग ह। सब देवता के बढ़िया भोग लागेला शिव जी के भांग-धतूर चाहीं। सब देवता सुन्दर वस्त्र धारण करिहें शिवजी दिगंबर हईं। क्रोध में शिवजी के जब तीसर आँख खुली त कामदेव जरि जइहें, रति के विलाप से शिव में अस करूणा जागी कि अनंग रूप में कामदेव का जीवन मिलि जाई। शिवजी के जब डमरू बाजी तब नाद के रचना हो जाई, जब ताण्डव होई तब प्रलय आ जाई। ऊपर-ऊपर से देखि के अइसन लागेला कि शिव जी अनेक विरोधन के देवता हवें, जब भीतर तनिका झांकि के देखल जाला तब बुझाला कि विरोध के निरा आभास बा, इहाँ त हर तरह के विरोध के शमन बा, शमन का अबाध आनन्द बा- लहरत, अगाध।
वास्तव में शिव अनोखा देवता हवें। इहे शिव भोजपुरी क्षेत्र के प्रिय देवता हवें जवन महातम अवध क्षेत्र में राम के आ ब्रज क्षेत्र में कृष्ण के बा, उहे महातम भोजपुरी क्षेत्र में महादेव शिव के बा। भोजपुरी क्षेत्र में सबसे ज्यादा मंदिर शिव जी के बा। इहो अनोखापन देखल जाए कि मंदिर में शिव अरधा (पीठम) सहित लिंग रूप में विराजमान रहेलें। शिव परिवार के लोग अलगे-अलगे मूर्त्ति रूप में रहेलें। नन्दी अलगे निवास का ओर विराजमान रहेलें। एह क्षेत्र में शिव आ शिव परिवार के चित्र घर-घर मिलेला। लोक विश्वास का अनुसार शिवलिंग घर में ना राखल जाला, एसे घर में शिवलिंग ना रहेला। अँगना चाहे दुआरे महावीरी धाजा का पास शिव रूप में गोल आ तनी लमाहूत, चिक्कन, विशेष आकार के पुजालें। ई शिव जी नर्मदा से आइल होखें, कवनो जरूरी नइखे। इहाँ बस भक्ति भावना काम करेले। महावीरो जी शिव जी के अंश हवें। हर अँगना में धाजा पर महावीर हनुमानजी विराजमान रहेलें। देखल जाय त शिवजी भोजपुरी समाज आ जीवन में अनेक रूप में विराजमान बाडे़। गौर करेके बात इहो बा कि ‘पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार’ कहि के मूर्त्ति पूजा के खुलहा विरोध करेवाला कबीर भोजपुरी समाज के पथ प्रदर्शक हवेें बाकी आजो भोजपुरी लोक जीवन में शिव के महातम आ महत्ता में कवनो कमी नइखे आइल बल्कि आज-कल त ‘शिवचर्चा’ नाम से एगो नया सामाजिक अनुष्ठान शुरू भइल बा, जवना के फैलाव बहुत शीघ्रता से हो रहल बा। जइसे टोला-मोहल्ला में कबो केहू के घरे, कबो केहू के घरे कीर्त्तन भइल करेला, ओइसे ‘शिव चर्चा’ होता, जवना में शिव से जुड़ल नया-पुरान गीत-कथा कहल-सुनल जाता। तारीफ ई कि ई गीत-कथा आजकल के समाजो के अपना दायरा में समेटताड़े सँ। एहसे भोजपुरी संस्कृति के जीवन्तता के परिचय मिलऽता।
शिव के निर्गुण रूप सगुण रूप के समझे में मदद करेला आ सगुण रूप निर्गुण रूप भोजपुरिया समाज में दूनू रूप से जुड़ल कथा-कहानी मिलेला। शिवलिंग निर्गुण ब्रह्म के प्रतीक मानल जाला। अइसन कथा-कहानी में आवेला कि एक बेर ब्रह्म-विष्णु में ‘हम बड़-हम बड़’ के बहस छिड़ गइल। ए बहस के सझुरावे खातिर भगवान शिव एगो ‘अग्निस्तंभ’ के रूप में प्रगट भइनी। एह अग्निस्तंभ के कवनो आदि-अंत ना रहे। स्तंभ से ओंकार के ध्वनि निकलत रहे। एही स्तंभ के सगुण रूप में मानल गइल। शिव के सगुणो रूप में अजन्मा, अनादि, अनन्त मानल गइल बा। शिवलिंग के अंडाकार पत्थर आकाश सहित ब्रह्मांड के प्रतीक ह आ पीठम् (अरघा) ब्रह्मांड के आधार देबे वाली, पुष्ट करे वाली शक्ति के प्रतीक ह। स्कंद पुराण का अनुसार अनंत आकाश (ऊ महाशून्य, जेमे सगरो ब्रह्मांड बसल बा) शिवलिंग ह आ पृथ्वी ओकर आधार ह। शिवलिंग में शिव आ शक्ति दूनू समाहित बा। शिव चेतना के खाली आकाश
हवें, समाधि के अवस्था हवें- गतिहीन, आवेशहीन। शक्ति ऊर्जा हई, क्रिया हई, गति हई। शिव आ शक्ति के सम्मिलित से सृष्टि होले। हर महायुग के बाद प्रलयकाल में सगरो संसार शिवलिंग में समाजाला। फेर एही शिवलिंग से संसार के सृजन होला। वेद में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर खातिर आइल बा। सूक्ष्म शरीर सत्रह तत्व से बनल बा। स्थूल शरीर पाँच तत्व से बनल
बा। इहो सब शिवलिंग से जुड़ल बा। दक्षिण भारत में क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर- ये सब पंचतत्व से जुड़ल शिवलिंग के पूजा होला आ अलग-अलग स्थान पर मंदिर बा। तमिलनाड के कांचीपुरम में एकाम्बरेश्वर मंदिर क्षिति तत्व, श्री रंगम में जम्बुकेश्वर मंदिर जल तत्व, थिरूवन्नमलाई में झन्नामलाइथर मंदिर अग्नि तत्व, चिदम्वरम में नटराज मंदिर अकाश तत्व आ आंध्रप्रदेश में चित्तूर जिला के कालहस्ती मंदिर समीर तत्व से संबंधित हवें।
भोजपुरी समाज शिव के सनेस के जीवन में उतारे के कोशिश करेला। इ समाज परिग्रही आ वैभव का पीछे भागे वाला ना ह, सहजता से अपना मौज में रहे वाला ह। शिव भोजपुरी समाज के जिनिगी के राहि हवें, ओकरी संस्कृति के हिस्सा हवें। समाज के रीति-रियाज, विश्वास, भाषा, साहित्य सब में शिव बाड़ेः इनकर बात बा, चर्चा बा। इहाँ लइका के तिलक चढ़े
के बेरा सबसे पहिले शिव जी के गीत होला, लइकी के मनजोग बर मिलला पर ओकर शिव पुजला के फल मानल जाला ‘माटी के महादेव’, ‘शिव जी कोहबरे ना जात रहेलें आ गइलें त छः महीना कोहबर से निकलबे ना कइलें‘- ए तरह के अनिबन मुहाबरा आ लोकोक्ति बा जवन भोजपुरी भाषा के सिंगार हवे। साहित्य के बात कइल जाए त शिष्ट आ लोक साहित्य-दूनू में शिव के महत्वपूर्ण स्थान बा। विशेष रूप से लोक गीत में शिव बेर-बेर आवेले। शिव से जुड़ल भजन, कजरी, फगुवा, विवाह गीत भोजपुरी क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय ह। एह गीतन में कुछ
अनेक गीत साहित्य आ संगीत के मानदंड पर एतना खरा उतरेलें कि नामी-गिरामी गायक लोग अपना हिसाब से राग में उतार के गावेलें। शिव से भोजपुरिया आदमी के रिश्ता एतना गाढ़ अपनापा के ह कि जब शिव के उपासना से उठा के भोजपुरिया आदमी अपना जीवन आ संस्कृति में स्थान देला त शिव में अपने जीवन आ समाज के कई रूप डाल देला। शिव गृहस्थ देवता हवें, परिवारी देवता हवें एहसे आदमी का कई स्तर पर ऊ अपने अइसन लागेेलें, शिव के चरित्र में अपना समाज के गुण-दोष डाल दिहले में अपने अइसन मान लिहले
में आदमी का कवनो ऊँच-नीच सोचे के ना पड़ेला।

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