कुचुर कुचुर आँख करे बाल भइल झँऊवा

– टीम अंजोरिया

#फगुआ #फूहरपन #गीत-गवनई #कुचुर-कुचुर-आँखि-करे

कुचुर कुचुर आँख करे बाल भइल झँऊवा

kuchur kuchur aankh kare baal bhail jhauwan

पिछलका लेख में आदरणीय विमल जी के चिट्टियन के पढ़ि के मन गजबजाए लागल। बीचे-बीच में मन कर देव कि आपन कुछ टिप्पणी लिख दीं। बाकिर सोचनी कि लिखनिहार के प्रवाह में बाधा ना पड़े के चाहीं आ पढ़निहारन के बीच में आपन टँगड़ी फँसावल बेजाँय हो जाई। अब जब रउरा सभे एह चिट्ठियन के पढ़ लिहनी त अब आपनो बात लिख दिहल चाहत बानी।

अंजोरिया हमेशा से भोजपुरी गीत गवनई के आम अश्लील अंदाज के समर्थक रहल बिया। भोजपुरी आम आदमी के भाषा हियऽ आ तथाकथित श्लील समाज भोजपुरी में बोलल-बतियावल पसन्द ना करे। दुनिया में शायद भोजपुरी अकेला अइसन माई भाषा हियऽ जवना के सबसे बेसी ओकरे पूत गरियावेलें। अगर भोजपुरी आम भोजपुरियन का इस्तेमाल में ना रहीत त कहिए मर गइल रहीत। विमल जी के उमिर हमरा अगले-बगल के होखी भा हो सकेला कि हमरा से कमे होखे।

हमहूं गाँव-जवार देखले बानी। हमरो बचपन गँवईए माहौल में गुजरल बा. हमहुं फगुआ आ चइता के गीत-गवनई करीब साठ बरीस से सुनत आइल बानी। आगा लिखे से पहिले एगो छोटहन वाकया सुना दीहल चाहत बानी। रेलगाड़ी के एगो डिब्बा में कुछ नवहियन के बातचीत चलत रहुवे। ओही दौर में एगो नवही कहाउत सुना दिहलसि – भवे भाव से पतोह चाव से!
कान में पड़ते एगो बूढ़ऊ के लगर चढ़ गइल। चढ़ बइठलन ओह नवही पर का बेहूदा बतियावत बाड़ऽ। लाज नइखे लागत? बाप-महतारी से इहे सिखले बाड़ऽ? नवही पलटि के जबाब दिहलसि – बाबा ई कहाउत हमार बनावल ना हऽ, रउरे लोगन का जमाना से चलत आइल बा।

हँ मानत बानीं कि फगुआ गीतन में हर तरह के रस मिल जाला। भक्ति के रंग से लगवले आसक्ति के रंग ले। अइसहीं ना नू कहला – बुरा न मानो होली है!
हमरो इयाद बा कि जब सती माई किहां से फगुआ गावल शुरु होखे त शुरु में –
अम्बिका हो भवानी के बन्दनी,
आ हो बन्दनी बन्दनी बन्दनी,
अम्बिका हो भवानी के बन्दनी।

भा,
सदा आनन्द रहे एही द्वारे, मोहन खेले होरी हो।
एक ओरि खेलें कुँवर कन्हाई, एक ओर राधा गोरी हो।

कुछ अइसने भक्ति गीतन का बाद आसक्ति गीतन के दौर शुरु हो जाव। बीच-बीच में जोगीरा सारा रा रा रा के दौरो चलल करे। कुछ अइसने गीतन के मुखड़ा सुनत जाईं –

कहँवा से आवेला सिलिया कहँवा के लोढ़ा पुरान हो।
ससुरा से आवेला सिलिया एहिजा के लोढ़ा पुरान हो।

अब रउरा सोचीं कि सील का रहुवे आ लोढ़ा कवना चीज के प्रतीक रहुवे।

अब कइसे जियबू भउजियो भईया गइले नयपाल।

आ भऊजी का तरफ से गवाइल करे –
लागल फुफुती में आगि बुताईं कइसे?
पिया परदेश, देवर घरे लइका, सूतल भसुर के जगाईं कइसे?
लागल फुफुती में आगि बुताईं कइसे?

आ औरतन के समस्या परोस गवाइल करे –
कवन अभागा गाँजा बोवलसि रे पियवा बउरा गइलें।
कवन पापी घोर के पिअवलसि रे पियवा बउरा गइलें।

किसान के औरत का तरफ से गवाइल करे –
ऊँखि जनि बोवऽ हो गएड़वा
कोड़त-झोड़त बीति छव रे महिनवा,
बरीस दिनवा बीति रे कोल्हूवरिया।

बाकिर जब किसान माने ना तब पत्नी बैलन से गोहार कइल करे –
गोड़ तोर जोड़िलें जोड़ा हो बयलवा, पगहा तूड़ा के घरे चलि अइह।
तोरा के देबो बयला खुदी रे खोयरिया संगे बलमू के लेले चलि अइह।

आ एही बीच कवनो आदमी गावल शुरु कर देव-
झूलवा झारि के पहिर, झूलवा झारि के पहिर।
झूलवा के नीचे गुलगुलवा।
झूलवा झारि के पहिर।

त कवनो गा देव –
चुनरी में लागत बाटे हावा, बलम बेलबॉटम सिवा द।

आ कबो ना देखनी कि कवनो बूढ़वा काँड़े आ जाव। काहे कि ओकरा इहो डर लागत रहे कि कवनी ई फरमाइश मत कर देव अपना भतार से –
बूढ़वा के घर से निकाल दऽ सईयाँ हो, बूढ़वा के घर से निकाल दऽ।

काहे कि –
हिरि-फिरि आवे बूढ़वा, घुसेला चुहनिया
बूढ़वा के घर से निकाल दऽ सईयाँ हो, बूढ़वा के घर से निकाल दऽ।

आ जब मरद पूछे कि चुहनिया में काहे जालें त बतावे कि –
अगिया बहाने बूढ़वा घुसेला चुहनिया,
बूढ़वा के घर से निकाल दऽ सईयाँ हो, बूढ़वा के घर से निकाल दऽ।

त अइसनका माहौल मेंं कवन बूढ़वा हिमाकत करे काँड़े आवे खातिर।

खैर अइसनका ढेरे गीतन के बाद जब रात हो जाव त चइता गा के फगुआ गवाइल बन्द होखल करे। आ चइतो के शुरुआत होखे त –

कंठे सुरवा,
कंठे सुरवा होखऽ ना सहईया हो रामा,
कंठे सुरवा।

आ अइसने कुछ बन्दना से बाकिर तुरते माहौल अपना रंग में आ जाव –
महुवा बीने ना हम जाइब हो रामा
देवरु का संगवा।
एक हाथे देवरा महुआ बीने
आ दूजे हाथे मिसे जोबनवा हो रामा।
देवरा के संगवा।
महुवा बीने ना हम जाइब हो रामा
देवरु का संगवा।

लिखल त शुरु कइले रहीं एगो छोटहन टिप्पणी का रूप में। बाकिर बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी आ चलिए गइल।

भोजपुरी पर अश्लीलता के आरोप हिन्दीवालन के साजिश से शुरु भइल आ देखते-देखत बहुते भोजपुरिया एह बह में बहि गइलें। आ परिणाम का भइल- भोजपुरी गीत-गवनई के मौत होखे लागल। श्लील लोग ला श्लील रचना कम पड़त गइली सँ काहें कि श्लील लोगन के गिनती कमे होखेला। भोजपुरी अश्लील लोग आजुओ बचवले रखले बा। रउरो कभी श्लील आ अश्लील के परिभाषा में जाईं आ सोचीं कि हम कवना संदर्भ में ई बात लिखले बानी।

चलत चलत एगो अउर छोटहन वाकिया सुनावत चलीं –
चाय का दुकान पर एगो औरत चहुँपल। चायवाला से पूछलसि – लेबऽ का?
चायवाला कहलसि – ना। काल्हु लिहले रहीं त फाट गइल रहुवे। अब तोर ना लेब।
ओरत जिदियाइल – काहे ना लेबऽ। उघारि के देख लऽ एकदम से ठीक बा।

अगल -बगल के लोग एने ओने ताके लागल रहुवे। काहे कि ओह लोग के संदर्भ मालूमे ना रहुवे। काल्हु दूध फाट गइल रहुवे आ ऊ औरत दूध के बाल्टी उघार के दूध देखे के बात करत रहुवे। त अश्लीलत ओहनी के बात में ना रहल सुनेवाला श्लीलन के सोच में दबाइल रहल अश्लीलता।

मेडिकल कालेज में एनाटोमी के प्रोफेसर एगो छात्रा से पूछलन –
शरीर का वह कौन सा अंग है जो उत्तेजना के क्षण में अपने सामान्य आकार का आठगुना हो जाता है?
छात्रा के गाल लाल हो गइल, नजर नीचे झुक गइल आ ऊ गोड़ के अंगूठा से जमीन खुरेदे लागल।
प्रोफेसर बोललन –
तीन बात। पहला तो यह कि तुम्हारी सोच गन्दी है। दूसरी यह कि तुम्हें सही जबाब मालूम नहींं है। और तिसरे कि तु्म कभी खुश नहीं हो पाओगी क्योंकि तुम्हारी आशा के अनुसार वैसा नहीं पाएगा।
सही जबाब है – आँख की पुतली।

अब रउरा बताईं कि रउरा दिमाग में कवन जबाब आइल रहल?

आ आखिर में ई गीत सुनत जाईं –
कुचुर कुचुर आँख करे बाल भइल झँऊवा, बलम हो ले अवतऽ तेल गमकउवा।
तोहरा फूहरपन के शोर पूरा गँउवा, छछूनरो का करबू तेल गमकउवा?

1 Comment

  1. Editor

    ई चलल त रहल टिप्पणी बने खातिर बाकिर पूरा लेखे बन गइल एहसे एकरा के अलग से अंजोर कइल जा रहल बा। रउरो सभे से निहोरा बा कि एह बतकुच्चन में शामिल होखीं।

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