– प्रो.(डॉ.) जयकान्त सिंह ‘जय’
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कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी

‘ कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी ‘ मतलब एक एक कौड़ी जोड़ के धन – धान्य से खुद के सम्पन्न कइल। काहे कि बिना कौड़ी के एह दुनिया में केहू के कवनो सांसारिक इच्छा पूरा ना हो सके। बाकिर एकरा खातिर पगलाइलो जिनिगी के नरक बना देवेला। काहे कवनो चीज में अति दुर्गति के आधार बनेला। एकरे के कवि कहलें –
‘ अति के भला न बोलना, अति के भला न चूप।
अति के भला न बरसना, अति के भला न धूप।। ‘
‘कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी’ ई भोजपुरी सिनेमा ‘बलम परदेसिया’ ला प्रसिद्ध गीतकार समीर के बाबूजी आ सुख्यात गीतकार लालजी पाण्डेय अंजान के लिखल गीत रहे। जवना के आवाज देले रहस मोहम्मद रफी आ संगीत से सजवलें चित्रगुप्त। जवना में भारत के जीवन-दर्शन आ पारम्परिक मुद्रा व्यापार का इतिहास के बहुते सहज-सरल अभिव्यक्ति मिलल रहे। इहाँ हमरा भारतीय जीवन-दर्शन पर बात नइखे करेके। बात करेके बा कौड़ी के माध्यम से होत रहल भारतीय मुद्रा व्यापार के। पहिले गीत के कुछ कड़ी देख लीं सभे –
‘कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी करके जतन छुपाए।
जनम जनम तोर कमइया चोरवा ना ले जाएं।।
त जागत रह भइया तूं सोए मत जइहऽ
पसेना के कमइया मूफत ना गँवइहऽ।। —‘
आदमी तब कठिन से कठिन हालत में खट के एक एक कौड़ी जोड़त रहे। एक एक कौड़ी जोड़े-कमाए में पसेना छूट जात रहे। भोजपुरी में केतना लोकोक्ति-मुहावरा एह कौड़ी, धेला आना पाई से जुड़ल मिलेला; जइसे –
‘केतनो करबऽ दौड़ा-दौड़ी, ना देहब हम फूटलो कौड़ी।’
‘पइसा ना कौड़ी, बीच बाजार में दौड़ा – दौड़ी। ‘
‘ना देबऽ जो आना-पाई, बूझऽ ज्ञान गरहे में जाई। ‘
‘पाले नइखे धेला-पाई, तब कइसन बबुआनी भाई।’
आदि आदि।
एह कौड़ी, धेला, पाई, आना सब से हम भारतीय जन के नाता पुराना बा। एकरा मोल-महातम के पुरखा-पुरनिया लोग खूब जानत रहे। रउओ सभे का लरिकाईं इयाद होई। आजी-माई का जब अपना पोता-पोती आ बेटा-बेटी का डांड़ में डाले-पहिरावे खातिर सोना-चानी के कमरधनी पहिरावे के औकात ना होत रहे त करिया सूत के बनल डांड़ा ( नाड़ा ) में कौड़ी, धेला, छेदल पाई, मूंगा, मोती आदि डाल देत रहे। जब कवनो लइकी के बिआह होखे त झांपी के कुछ कौड़ी रख दियात रहे। लइका-लइकी के बीच पानी में कौड़ी डाल के पहिले खोज निकाले के खेला होत रहे जे के केतना कौड़ी चुन के निकालऽता।
एह तरह से कौड़ी के मोल-महातम रहे। फेर जब एकरा बारे में जनलीं त एकर से जुड़ल जानकारी दूर के कौड़ी बुझाइल। दरअसल भारत में पहिले जलमार्ग ( समुद्र मार्ग ) से दुनिया का आउर देसन से व्यापार होत रहे। जलमार्ग के राजा मछुआरा समाज भा निषाद समाज होत रहे। ओह समय जल में मिले वाला कौड़ी आ मूंगा आदि के प्रयोग मुद्रा के रूप होत रहे। तब फूटलो कौड़ी के मोल रहे। तबे नू आजो लोग कहेला कि तोहरा के फुटलो कौड़ी ना देहब। बतावल जाला सन् 1830 ई. के पहिले एह कौड़ी के माध्यमे से व्यापार होत रहे। तब तीन गो फूटल कौड़ी के एगो साबूत कौड़ी, दस गो साबूत कौड़ी के एक दमड़ी, दू दमड़ी के एक धेला, एक धेला के अढ़ाई पाई, तीन पाई के एक पइसा, चार पइसा के एक आना, चउसठ पइसा यानी सोलह आना के एक रुपइया होत रहे।
जब देश आजाद हो गइल तब भारतीय मुद्रा संशोधन अधिनियम 1955 के तहत 1 अप्रील 1957 ई. भारत में मुद्रा के दशमलव प्रणाली लागू हो गइल आ पुरान कौड़ी, आना, पाई के मुद्रा प्रणाली खतम हो गइल। चंउसठ पइसा भा सोलह आना के जगहा सौ पइसा के एक रुपइया हो गइल। 1, 2, 5, 10, 25, 50 पइसा के सिक्का जारी भइल। जवना पर सन् 1964 ई. ‘नया पैसा’ लिखके छापल जात रहे ताकि एकरा के पुरान मुद्रा से अलग कइल जा सके। फेर सन् 1968 ई. में ताँबा-निकेल धातु के गोल आकार वाला 20 पइसा के सिक्का जारी भइल जवना पर कमल का फूल के छाप रहत रहे। बाद में ऊ एलमुनिया के सिक्का के रूप में छपल। बाकिर सन् 1990 ई. आवत-आवत ऊ बीस के सिक्का चलन से बाहर हो गइल। 30 जून सन् 2011 ई. से 1, 2, 5, 10 आ 25 सिक्को चलल बन हो गइली सँ। बाकिर सब के बावजूद आजुओ कौड़ी लोक मानस में आपन जगह बनवले बा आ कहाउत-मुहावरा के माध्यम से अदोबदो के जुबान पर आइए जाला।
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प्रो. जयकान्त-सिंह-जय,
विभागाध्यक्ष-स्नातकोत्तर भोजपुरी विभाग, बी. आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर ( बिहार )
पिनकोड-842001
राष्ट्रीय महामंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना ( बिहार )
ई-मेल-indjaikantsinghjai@gmail.com
आवासीय पत्राचार-‘प्रताप भवन ‘महाराणा प्रताप नगर
मार्ग सं. -1( सी ) भिखनपुरा, मुजफ्फरपुर ( बिहार )
पिनकोड-842001


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