हमार आत्म-संघर्ष आ स्व. अरुणेश ‘नीरन’

– अशोक द्विवेदी

#संस्मरण #अरुणेश-नीरन #भोजपुरी

(सरधांजलि/संस्मरन)

हमार आत्म-संघर्ष आ स्व. अरुणेश ‘नीरन’

रुचि आ लगाव अछइत, परिस्थितिवश कहीं आवे-जाये के सिलसिला आ संवाद टूट जाला त लिखे-पढ़े वाला कइसे हाशिया पर चल जाला, एकर छछात उदाहरन हम खुदे हईं। दइब क अतने किरपा रहे कि हमार रचनात्मक उर्जा आ उछाह बनल रह गइल। सुदूर एगो छोट जिला में, रोजी-रोजगार विहीन अदिमी के, साधन-सुबिधा आ अर्थाभाव, जमाना का दउड़ में पाछा ढकेल देला। 1972 से 1982 तक हमार इहे स्थिति रहे-एकेडमिक जगत छूट गइल रहे आ हम खेती-बारी आ घरकच तक अझुराइल, कोना-अँतरा में परल, खुद अपने से लड़त-जूझत रहनी। अतने रहे कि मनवा हार ना मनलस आ हमार भितरी रचनात्मक उर्जा आ स्वाभिमान दूनों धीर-धरम से बाँचल रहे।

अरुणेश नीरन जी से हमार चीन्हा-पर्ची पचास बरिस पहिले से रहे- बनारस में पढ़ाई का दौरान हम आचार्य विद्यानिवास मिश्रजी किहाँ उनुका दर्शन खातिर पहिले-पहिल गइल रहनी, तबसे। आचार्य विद्यानिवास जी त भाषा-साहित्य के प्रकाण्ड पण्डित रहले बाकि हमा-सुमा जइसन नवसिखियन का दिसाईं बहुत सरल आ नरम रहले। ‘प्रिया नीलकंठी’ हमके अनासो ओह लोगन से उनकर ललित निबन्ध कबिताइयो से नीक लागे। ‘छितवन की छाँह’ आ कुबेरनाथ राय के से जोरि देले रहे। ‘नीरन’ जी आचार्य विद्यानिवास जी के प्रिय रहलन। प्रतिभा संपन्न आ चलबिधर। मिश्र जी का जवरे साहित्यिक-जगत में उनकर सम्पर्क-सम्बन्ध हमा-सुमा जस साधारण लेखक आ विद्यार्थी से बहुत ज्यादा रहे। खास कर हिन्दी लेखक वर्ग में।

1974 में जब हम आपन शोध-प्रबन्ध बी.एच.यू. में जमा कइला का बाद बनारस छोड़ि के गाजीपुर में अपना गाँवें रहे लगनी त साहित्यिक लोगन से हमार सम्पर्क आ बात-ब्यौहार लगभग टूटि गइल। सुबिधा-विहीन आ अर्थाभाव त कारन रहबे कइल। जियका-जोगाड़ खातिर घर-गृहस्थी में बन्हाइ के रहि गइलीं। ‘टेक्स्चुअल’ लेखन का कारन नजदीकी जिला-बलिया में गुजर-बसर के कुछ ठेकान जरूर मिलल, बाकि ऊहो स्थायी ना रहे। खेतिए-बारी में अझुराइल, अपना मातृभाषा आ बोली में कहत-सुनत, ओही भाषा में लिखे-पढ़े के सुभाव बन गइल। अइसन ना कि पहिले हम भोजपुरी में ना लिखत रहीं, बनारस में रहलीं त, भोजपुरी कविता पहिलहूँ लिखत रहीं, पत्र-पत्रिकन में प्रकाशन खातिर भेजत ना रहीं। अस्सी घाट वाला हमरा डेरा के एगो मूल्यवान उपलब्धि, जवना के अनुभव हमके बहुत बाद में भइल, ऊ ई रहे कि श्रद्धेय त्रिलोचन शास्त्री प्रायः सबेर आ साँझ के जरूर बी.एच.यू. भ्रमण करत आ जासु आ उनका से बात-बतकही में अक्सर ‘कविता’ आ जाय। एक दिन उनके हम आपन भोजपुरी में लिखल कुछ सानेट सुनवलीं, ऊ बहुत खुश भइले। कहले, ”पंडित आप अपनी मातृभाषा में अच्छा लिख लेते हैं। आप ने शेक्सपीरियन सानेट लिखा है, भोजपुरी में श्री मोती बी.ए. ने अच्छे सानेट लिखे हैं।“ हमार उछाह बढ़ल। ऊहे हमके ‘मिल्टन’, ‘स्पेन्सर’ आ ‘रिल्के’ के छन्दविधान बतवले। अपना गाँवें रहत खा हम गीत का अलावा मिल्टन, स्पेन्सर आ रिल्के के छन्द-विधान में कई गो सानेट लिखनीं। कुछ कहानियों लिखाइल। अस्सी वाला डेरा एहू माने में यादगार बनल कि उहें हमके अविनाशचंद्र विद्यार्थी हमरा गाँव में अवधेश प्रधान का सँगे मिलले। ऊ त्रिलोचन जी के खोजत आइल रहे लोग। त्रिलोचन जी हमरे इहाँ बइठल चाय पीयत रहले। एगो अस्त-व्यस्त विद्यार्थी का डेरा में बइठहूँ के सुबिधान साधन ना रहे। ले-देके दू गो एकहरी खटिया। सब बइठल। बाद में मालूम भइल कि अविनाचंद्र जी अपना किताब ‘सेवकायन’ के भूमिका त्रिलोचन जी से लिखवावे आइल रहले। त्रिलोचन जी का कहला पर हम आपन एगो भोजपुरी सानेट उनके दिहलीं, जवना के ऊ महीना भर बाद ‘अँजोर’ पत्रिका के पहिल पेज पर प्रकाशित कइले। भोजपुरी में हमार रचना पहिले पहिल ”अँजोर“ में छपल, ओकर संपादक पाण्डेय नर्मदेश्वर सहाय जी रहले आ उप संपादक विद्यार्थी जी।

त्रिलोचन जी भाषा प्रवीन आ सर्जनात्कता के अनुरागी रहले- अवधी के लोक-संस्कार से संस्कारित, बाकी भोजपुरी, ब्रजी, बुन्देलखण्डी आदि कई लोकभाषा से उनकर प्रेम सहजे लउके। संस्कृत, उर्दू, अंगरेजी आदि अनेक भाषा के जानकार आ उनहन के भाषा प्रयोग के मर्मज्ञ। सहजता आ सादगी के अन्य साधक कवि त्रिलोचन से हमरा बहुत कुछ जाने आ सीखे के मिलल। ओह दौर में हमार भेंट अक्सरहा अउरियो चर्चित कवियन आ लेखक लोगन से होखे बाकिर एगो सीमा में काहेकि हम विश्वविद्यालय के छात्र रहलीं। धूमिल त प्रायः अस्सी आ भदैनी पर मिल जासु बाकि मंचीय कवि लोगन में चन्द्रशेखर मिश्र, हरिराम द्विवेदी, श्रीकृष्ण तिवारी, उमाशंकर तिवारी आदि लोगन से भेंट-मुलाकात आ चीन्हा-पर्ची हमरा के आगा कामे आइल। परमानन्द आनन्द, वशिष्ट मुनि ओझा, बुद्धिनाथ मिश्र आदि लोग त हमरे अस नवहा बाकि उत्साही आ रचनाशील मित्र-बन्धु लोग रहबे कइल। गोरख पाण्डेय ओघरी हमरे नियर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्यार्थी रहले। गाँवें अइला का बाद अइसनका बहुत लोगन से हमार सम्पर्क-संबाद लगभग एकदमे टूटि गइल, जवना के मलाल आ कचोट आजो हमके बेकल कर देला।

कठिन परिस्थिति आ सुबिधाहीनता में अपना मन के सहज संकोच आ लाचारगी आदमी के बहुत अब्बर बना देला ओहू में तब जब लेखक/कवि के, ओकर आपने परिवार कवनो भाव ना देला। हमरा भीतर हीनता के भाव जगबो करे, त हम अपना संघर्षशीलता आदत का कारन हीन भाव के दरकचत आगा बढ़े के कोसिस कइनी। ओघरी भोजपुरी में पत्रिका निकाले के ललसा जोर मारे बाकि आपन सामरथ आ साधनहीनता हमरा के दुतकार देव। इहे ना हमरा मन में भोजपुरी साहित्य प्रकाशन आ ओकरा प्रति भोजपुरिहा लोगन के उदासीनता से उलझन आ खिन्नता रहे। भोजपुरी कवि-लेखकन का नाँव पर गिनल चुनल लोगन से संपर्क रहे। हिन्दी का पत्र-पत्रिकन में प्रकाशित रचनन के पारिश्रमिक (मेहनताना) हमार संबल रहे। ओही घरी भोजपुरी अकादमी पटना में एगो वैकेन्सी पर पटना गइलीं। हमार पहिल भोजपुरी कविता-संग्रह ”अढ़ाई आखर“ छपल रहे, ओह के कुछ कॉपी लेले गइनी। उहाँ नगेन्द्र प्रसाद सिंह आ जगन्नाथ जी मिलले। जगन्नाथ जी आपन गजल संग्रह ”लर मोतिन के“ दिहले आ नगेन्द्र जी अपना एक फार्मा के पत्रिका ”भोजपुरी उचार“ के दू गो अंक दिहले। रात खा हम उनहीं का ”जयदुर्गा प्रेस“ में रुकलीं, लवटलीं तऽ बलिया जाके ”पाती“ के तिमाही अंक वाला पत्रिका के रजिस्ट्रेशन-आवेदन कइलीं। एक डेढ़ महीना बाद दिल्ली से हमरा पत्रिका के रजिस्ट्रेशन भइला के सूचना मिलल त बलिया से ‘पाती’ के पहिला अंक छपववनी। मोबाइल आ फोन वाला सूचनातन्त्र त रहे ना, खाली पोस्टकार्ड आ अन्तर्देशी सहारा रहे ओही का बले रचनाकार आ लेखक लोग संपर्क साधे। संपर्क होइयो जाव, तऽ स्तरीय रचना खातिर छपिटाए के परे। पहिला अंक जइसे-तइसे निकलि गइल बाकि आगा क हाल हमहीं जानत बानी। तब, तवना घरी ‘नीरन’ जी से हमार कवनो खास संपर्क-संबंध ना रहे। एतने सम्बल हमरा खातिर बहुत रहे कि हमरा संघर्ष में कुछ सुधी-सहृदय यशस्वी साहित्यकार आ गिनती के नेही जन के सहजोग आ असिरबाद हमरा के हारे ना दिहलस।

एगो लमहर अन्तराल का बाद 1995 में हमके सूचना मिलल कि नीरन जी देवरिया में भोजपुरी साहित्य, कला-संस्कृति खातिर एगो बिराट आयोजन कर रहल बाड़न, ओमे प्रदेश के राज्यपाल आ प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर का अलावा देश के नामी गिरामी कहाए वाला विभूतियन के जुटान होई। आचार्य विद्यानिवास मिश्र का अलावा बड़-बड़ लेखक-कवियन के आगमन होई। तब हमरा भीतर अचानक ओइजा जाए के ललसा जागल। कई गो पुरान लेखक आ कवियन से एक बेर मिले के उत्कण्ठा हमके देवरिया खींच ले गइल। हम उहाँ गइलीं आ दू दिन रुकबो कइलीं। साँचो ऊ भोजपुरी के अद्भुत आ ना भुलाये वाला विशाल आयोजन रहे। पूरा देवरिया शहर जइसे भोजपुरीमय हो गइल रहे। हर स्कूल, कॉलेज आ सड़क चौराहा विश्व भोजपुरी सम्मेलन का झण्डा बैनर से सजल। जगहे जगह जुटल भोजपुरी प्रेमी लोगन खातिर, जलपान आ भोजन के इन्तजाम सूते-बइठे आ बोले-बतियावे के ‘आटोमेटिक’ व्यवस्था। जिला प्रशासन, जनपद के शिक्षण-संस्थान आ नगरवासियन का सहजोग के बिना हजारन लोगन के ई सम्मेलन संभव ना रहे। लम्बा समय तक चर्चा में बनल रहे वाला एह आयोजन का पाछा आदरनीय पण्डित परमहंस त्रिपाठी उनकर पुत्र श्री सतीश त्रिपाठी आ डॉ. अरूणेश नीरन क अथक प्रयास आ परिश्रम रहे। बड़का मैदान में सभा, जहाँ वक्ता लोगन आ कवि सम्मेलन आदि के मंच बनल रहे। एक ओर भोजपुरी कला आ सांस्कृतिक चीन्हा खातिर डाली-मउनी, सूप-चालन, ओखर-मूसर, दउरा, खाँची, पंखी-पंखा वगैरह के प्रदर्शनी रहे। हमके एक्के जगह भोजपुरिया पहिचान के ई समिलात समागम बड़ा आकर्षक लागल। सुने में आइल कि इहवाँ एगो पुरान भोजपुरी साहित्यकार के भोजपुरी में अप्रतिम योजदान खातिर ”सेतु सम्मान“ से सम्मानित कइल जाई। हमके अनुमान रहल कि मोती बी.ए. के ‘सेतु सम्मान’ मिली, बाकिर बाद में पता लागल कि ई सम्मान आचार्य धरीक्षन मिसिर जी के मिली। देवरिया समागम में, मोती जी साइत अस्वस्थता का कारन ना आइल रहले। कुछ किलोमीटर दूर रहे बरहज। हम उनसे मिले खातिर बरहज पहुँचनी त उहाँ बइठल भाई अनिरुद्ध त्रिपाठी जी क विनम्र सुभाव अनासो खिंचलस। मोती जी से त हमार चिट्ठी-चपाती पहिलहीं से चलत रहे। सोझा बइठि के उनका से बतियवला के एगो अलगे सुख-सकून भेंटाइल। बरहज से देवरिया लवटत खा हिन्दी प्रचारिणी सभा देवरिया का गेट पर डॉ. विवेकी राय जी भेंटइनी। सलाम-बन्दगी आ कुशल क्षेम का बाद उहाँ का बतवनी कि ( स्व. ) रामनाथ पाण्डेय जी आपन नवका भोजपुरी उपन्यास ”महेन्द्र मिसिर“ हमके देबे खातिर हमरा के खोज रहल बानी। बाद में उनसे हमार भेंट एगो इन्टर कॉलेज का परिसर में भइल। हमार भागि अच्छा रहे कि ओइजे भितरी हाल में हमार देखादेखी आदरनीय चन्द्रशेखर मिश्र, श्रीकृष्ण तिवारी, माहेश्वर तिवारी, हरिराम जी आदि चर्चित कवि लोगन से भइल। ओह लोगन के नेह आ आत्मीय बतकही से जीउ जुड़ा गइल। बाकी हम ओही दिने साँझि खा बलिया लवटि गइनी, एसे कि रात का कवि सम्मेलन में हमार कवनो नाँव भा प्रतिभागिता ना रहे। आ छुट्टियो के संकट रहे। 19़95 में देवरिया के भोजपुरी सम्मेलन का आयोजन के लेके बिहार के कुछ भोजुपरी-साहित्यकारन के आलोचना एह सम्मेलन के अउरी व्यापक बनवलस। लाखन रुपया खरच कइ के होखे वाला जलसा से आखिर का भेंटाइल भोजपुरिया जगत के? जबाब मिलल कि करोड़न लोगन का मातृभाषा के गौरव बढ़ल उछाह बढ़ल। भोजपुरी साहित्यकारन खातिर भोजपुरी के सर्वोच्च सम्मान ”सेतु-सम्मान“ आ लोक गायकन कलाकारन खातिर ”भिखारी ठाकुर सम्मान“ के घोषणा भइल जवना में क्रमशः 21 हजार आ 11 हजार के पुरस्कार राशि देबे के प्रावधान रहे। भोजपुरी साहित्य आ क्षेत्रीय समस्यन के लेके आपुसी विमर्श खातिर सेमिनार आ संवाद-गोष्ठी के दू-दिवसीय आयोजन का साथ, दूनो दिन क्रमशः साँझ खा लोकगायन,
नाटक आ कवि सम्मेलन होखे क योजना रहे। विभिन्न प्रदेश आ स्थलन पर विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अइसनका आयोजन के एगो अउर खास प्रयोजन रहे, ऊ ई कि भोजपुरिया लोगन का भीतर अपना मातृभाषा लेके प्रेम-सम्मान आ स्वाभिमान जागे आ हीन भाव खतम होखे।

देवरिया अधिवेशन का कुछ समय बाद श्रीमती राजेश्वरी शाण्डिल्य के एगो साहित्यिक आयोजन में डॉ. अरुणेश नीरन से लखनऊ में हमार फेरु भेंट भइल। दिन में एगो मीटिंग रहे- कहे खातिर विश्व भोजपुरी सम्मेलन के कार्यकारिणी के बइठक। उहाँ, देवरिया सम्मेलन का बाद भोजपुरी जगत में भइल टीका-टिप्पनी आ प्रतिक्रिया का विषय में जवन तनी तिक्खर रहे। नीरन जी के बुझला हमार विचार उपयोगी बुझाइल। ऊ देर रात खा होटल का हमरा कमरा में अइले आ आसन लगा के बइठ गइले। हमार कहनाम रहे कि आयोजन में होखे वाला खर्चा में भलहीं कटौती करे के परे, बाकि सम्मेलन के मुखपत्र का रूप में एगो बढ़िया पत्रिका निकले, भोजपुरी साहित्य के हर विधा में एगो प्रतिनिधि संकलन निकले, भोजपुरी शब्दकोष आ व्याकरण पर काम होखे, भोजपुरी अध्ययन-अध्यापन के लेके विश्वविद्यालय आ अकादमिक स्तर पर प्रयास कइल जाव। नीरन जी देर रात ले हमसे विचार-विमर्श कइले आ हमके आश्वस्त कइले कि जल्दिए एह सब पर काम सुरु होई, बनारस में मीटिंग होई।

कुछ महीना बाद ”काशी ग्राफिक्स“ बनारस में फेरु हमनी क जुटान भइल। ”समकालीन भोजपुरी साहित्य“ पत्रिका के अप्रैल 1996 वाला भव्य अंक प्रेस जाए के काम संपन्न भइला का बाद साँझ खा जब हम जाए लगनी त ‘नीरन’ जी हमार बाँहि धइले हमरा सँगहीं निकललन। बाकि दोसरे मूड में, ‘अशोक, चलऽ तनी बाबा क दर्शन कइल जाव!’ हम कहनी, ‘अरे साँझ हो गइल, छव बजे जाता।’ कहले- ‘ओसे का असली आनन्द त एही बेरा आई, तूँ चुपचाप चलऽ।’ साँचो बड़ा बाबा विश्वनाथ जी के दिव्य दर्शन भइल। आरती भइल, बाद ओकरा बाबा के परसाद आ भर लिलार सुगन्धित चनन्न लागल त मन्दिर से बहरियात, विसनाथ गली के झुरझुर चलत हवा लगते मिजाज तर। बुझइबे ना कइल कि गरमी कहाँ गइल? पान खियवले ओकरा बाद हम नमस्ते करत चले के भइनी त टोकले- ‘रुकऽ हमहूँ ओहरे चलब।’ हम कहनी- ‘अरे हमके मडु़वाडीह जाए के बा।“ त मुस्कियात कहले- ‘चलऽ रेक्सवा पर, हमहूँ रथयात्रा तक चलब।’

रेक्सा ऊहे रोकले। रथयात्रा पर हम उतरि गइलीं आ ऊ ओही रेक्सवे से अपना गन्तव्य तक चल गइले। डेढ़-दू घण्टा में अपना प्रति उनकर नेह-छोह हमके अइसन बन्हलस कि हम तमाम तरह के आपुसी कहासुनी आ अन्तर्विरोध के भुला गइनी। अरुणेश नीरन का व्यक्तित्व के ई अइसन नायाब पहलू रहे जवना के अनुभव हमरा के आगा भी विश्व भोजपुरी सम्मेलन के होखे वाला राष्ट्रीय आयोजनन में अनेक बार देखे के मिलल। ऊ तमाम भीड़-भाड़ आ बाझ का बावजूद, हमके अचके बोलाइ के अकेला में बइठ के बतियावसु उघटा पुरान सुनस आ अपना आत्मीयता से बान्हि के जिमवारी सउँपि देसु। ”समकालीन भोजपुरी साहित्य“ के स्तरीय आ सुन्दर बनावे खातिर ‘रचना सामग्री’ के अभाव ना होखे, एकरा खातिर हम कई बेर ”पाती“ खातिर आइल रचना-सामग्री सम्मेलन का एह पत्रिका में भेज दिहल करीं। ई बात दोसर रहे कि फेरु ”समकालीन भोजपुरी साहित्य“ के प्रिन्टेड प्रति ओमे छपल रचनाकारन के भेजे आ पहुँचावे के मानसिक दबाव हमरे पर आ जाय। हम चौबीस-पचीस अंक तकले एह पत्रिका के सम्पादक मण्डल में आपन भूमिका निभवनी।

वर्ष 1996 में विश्व भोजपुरी सम्मेलन के पटना अधिवेशन तक हमनी के बीच संवाद-सहयोग आ तदनुरुप क्रियाशीलता के सुखद परिणाम मिले शुरू हो गइल रहे। पत्रिका अपना आकर्षक एकेडमिक गेट-अप आ चयनित सामग्री का कारन साहित्यिक जगत में आपन विशेष स्थान बनावे शुरू कर चुकल रहे। एकरा में, अनूदित होके छपे वाली सामग्री हिन्दी के चर्चित यशस्वी कवि-लेखकन के आकर्षित कइलस। आचार्य विद्यानिवास मिश्र, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, शिवप्रसाद सिंह, केदारनाथ सिंह, रामदेव शुक्ल, शुकदेव सिंह आ ज्ञानेन्द्रपति आदि प्रतिष्ठित लोगन के रचना छपल।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन के आयोजन सचिव का रूप में हम कार्यालय सचिव आदरनीय जगदीश नारायण उपाध्याय का सँगे पटना, नई दिल्ली, भोपाल, अँधेरी (मुम्बई), भिलाई, नागपुर, थाणे (महाराष्ट्र), कोलकाता, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस, ऋषीकेश आदि कई जगह सक्रिय भागीदारी कइली। दस से अधिक राष्ट्रीय अधिवेशन में हम हमेशा अपना राष्ट्रीय महासचिव आ बाद में अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव नीरनजी के अपना करीब पवनी। ऊ हमेशा आपुसी बिचार-विमर्श का बाद अपना सुझाव/निर्देश का साथ हमहन के एकजुट आ तत्पर कइले रहसु। उनका नेह, आत्मीयंता आ अनौपचारिक बात-बतकही के एगो अलगे प्रभाव रहे। अधिवेशन से हमरा बड़का फायदा ई भइल कि एमे हमरा केदाननाथ सिंह आदरनीय विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी रामदेव शुक्ल जी, चितरंजन मिश्र जी, विमलेश कुमार मिश्र, डॉ. ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, सत्यदेव त्रिपाठी, प्रेमशीला शुक्ल आदि का साथ-साथ मारीशस के सुचिता रामदीन, सरिता बुद्धू, सूरीनामी जीतनराइन आदि से संबंध गाढ़ भइल। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी त हमरा आग्रह पर अपना प्रसिद्ध पत्रिका ”दस्तावेज“ के दू गो अंक (65 आ 67) भोजपुरी साहित्य पर (केन्द्रित) निकलले। भोजपुरी साहित्य के रचनात्मक उठान वाला आन्दोलन खातिर ई सहयोग आ एकजुटता बहुत काम लाएक रहे।

पछिला बीस-बाइस साल के अपना रचनाशील यात्रा में डॉ. अरुणेश नीरन जी के संग-साथ दूर-नगीच रहत हमरा इहे बुझाइल कि उनकर सम्पर्क-संवाद आ प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर बड़हन आ प्रभावी रहे। ऊ कई गो समाजिक साहित्यिक संस्था आ लोगन से जुड़ल रहलन। भोजपुरी खातिर ऊ अपना हर सुपरिचित लोगन के मदद लिहलन। कवनो साहित्यकार अपना रचनात्मक लेखन का जोरिये नाम-जस कमा लेव ई बड़ बात नइखे बड़ काम तब होला जब ऊ अपना साथ के लोगन के कवनो बड़ उद्देश्य खातिर जोरि के सामूहिक शक्ति का साथ कवनो रचनात्मक आ संगठनात्मक काम करेला त ओकर सुफल नतीजा निकलबे करेला। डॉ. अरुणेश नीरन अइसने साहित्यकार रहलन। पहिल राष्ट्रीय अध्यक्ष परमहंस त्रिपाठी आ अरुणेश नीरन जी का सुझाव पर हम विश्व भोजपुरी सम्मेलन का जनपदीय संगठन खातिर जवन प्रयास कइलीं- ओमे बलिया, गाजीपुर आ मऊ में सम्मेलन का इकाई के गठन कइनी। स्व. परमहंस त्रिपाठी जी त एह इकाइयन के गठन समारोह में आइ के इकाइयन के मान बढ़वले रहले। ई कहल सही बा कि पछिला तीन दशकन में साहित्य, समाज आ संस्कृति से जुड़ल लोगन में हम विशेष तौर पर- अगर कवनो खास रचनात्मक व्यक्तित्व के सबसे नगीची के संग-साथ पवनी त औह चुम्बकी व्यक्तित्व क नाँव रहे अरुणेश नीरन। एह अदिमी में न जाने कवन जादू रहे कि, उनका जवना बात पर हमार विरोध आ आपत्ति रहे, ओहू के माने खातिर हम अक्सरहा बेबस महसूस करीं। ‘नीरन’ जी साँचो के चतुर सुजान आ प्रभावपूर्ण बात-ब्योहार वाला जीव रहलन। गुनी आ धुनी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी एह अदिमी में सिरजन, संगठन आ सन्तुलन बइठावे के अद्भुत शक्ति रहे। साहित्यिक जगत में, गहिर पइठ वाला नीरन जी देखे में कठिन लागे वाला सब इन्तजामी-समारोह अइसे निपटा देस, जइसे ऊ उनका खातिर छोटहन काम होखे। एह तरह से ऊ अइसन हरफन मौला रहले कि ‘नाचीजो’ के चीज बना देस, ‘मनेजमेन्ट’ के ‘टेक्टिस’ त उनका में रहले कइल, तबे नू ऊ हर तरह के लोगन में आपुसी ताल-मतरा बइठा के कवनो आयोजन सफलता से संपन्न कऽ लेसु।

विगत पनरह-बीस बरिस में, नीरन जी का साथ संगत में हमरा इहे बुझाइल कि उनकर सम्पर्क आ प्रभाव क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ आ विस्तार वाला रहे। ऊ कई गो समाजिक, साहित्यिक संस्था आ ओमे काम करे वाला लोगन से जुड़ल रहलन, तब्बो भोजपुरी खातिर ”विश्व भोजपुरी सम्मेलन“ का जरिए बहुत कुछ अच्छा आ नया कइला के कोशिश कइलन। कवनो रचनाकार भा लेखक अपना रचनाकर्म से भलहीं बड़ हो जाय, पुरस्कार आ सम्माने पा जाय, बाकिर ओसे बड़हन बात एम्में बा कि ऊ अपना साथ लोगन के जोरि के, प्रेरित क के, रचनात्मक रूप में सामूहिकता का साथ आगे बढ़े खातिर उर्जावान उछाह भरे वाला काम करे। हमके ईहो कहे में कवनो हिचकिचाहट नइखे कि नीरन जी ना खाली हमरा से कई गो रचनात्मक काम करवलन। जब कबो कवनो साहित्यिक भा संगठन कार्य खातिर हम उनसे आग्रह कइलीं, ऊ समय निकाल के सदल-बल हाजिर भइलन। दू-चार बेर उनका सँगे हमके यात्रा के अवसर मिलल, ओम्मे उनकर अनौपचारिक आ सहज-सुभाव के व्यावहारिक रूप लउकल। उनका घरे हम दू-तीन बेर गइलीं, उहवाँ रहलीं आ अपना प्रति उनकर नेह आ अपनाइत से परिचित भइनी। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से प्रकाशित हमरा दू गो मोनोग्राफ (मोती बी.ए. आ रामजियावन दास बावला) के लेखन खातिर ऊ परोक्षतः प्रेरित कइलन। ऊ जानत रहले कि ई काम हम कर सकेनी। ऊ हमरे से ना, कई एक लोगन का रचनात्मक क्षमता आ जिम्मेदारी उठावे का सामरथ से परिचित रहलन आ सबसे जथाजोग भोजपुरी-साहित्य के संपन्न करावे के कोसिस कइलन। संकलन-सम्पादन, शब्दकोष आदि महत्वपूर्ण काम एकर उदाहरन बा।

भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के जनवरी 2026 अंक से साभार

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