जे कान छेदाई, ऊ गुड़ खाई

–डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

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सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-25
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

जे कान छेदाई, ऊ गुड़ खाई

आजु लभेरन के हाफ सुइटर प देखते काकी कमेंट मरली – “अब ठंढा के दिन चलि गइल का लभेरन?” लभेरन बोलले – ठंढवा कम त होइए नु गइल बा काकी! घरवा में तनिका अधिका लागऽता, बहरिया निकलबि त अब ओइसन ठंढा नइखे रहि गइल. जब हवा चलऽतिया तबे तनी कँपकँपी लेसि देतिया, ना त घाम त अब कड़ेरे होखे लागल बा.

काकी घर के सर-समाचार पुछली त बतावे लगले कि पड़ोस के मिसिर जी का बेटी खातिर एगो ठीक-ठाक एसी वाली लाइब्रेरी देखे गइल रहलीं हा. काकी से रहाइल ना. एसी वाली लाइब्रेरी! हमनी के त कवनो पुस्तकालय में कबहुँओ असुविधा ना लागल. अब ई कइसन पुस्तकालय होखे लगले सन? ई का हो रहल बा लभेरन?

लभेरनो अपना माथा पर हाथ धइले रहन. बोलले – जानऽतानी काकी, आजु का डेट में संयुक्त परिवार अब इतिहास बनत जा रहल बा. संयुक्त परिवार कबो भारतीय समाज के पहचान रहे, ओहमें तीन पीढ़ी एके छत का नीचे रहत रहे – दादा-दादी, माई-बाबूजी, चाचा-चाची, भाई-बहिन आ ढेर खानी बच्चा. ओह भीड़ में हँसी रहे, झगड़ा रहे, प्रेम रहे, अनुशासन रहे आ सबसे बड़ बात – एक दोसरा के सहे के संस्कार रहे. बाकिर आजु त “छोटा परिवार सुखी परिवार” जइसन स्लोगन एतना रच-बस गइल बा कि संयुक्त परिवार के अवधारणा लगभग समाप्त हो गइल बा. ई स्लोगन सुने में त बड़ा नीमन लागता, बाकिर एकरा भीतर का साँच पर नजर डालबि तब ओकर दुष्परिणाम देखिके रूह काँपि जाई.

आजु का छोटहन परिवारन में बच्चा गिनती में कम भले होखे, बाकिर ओकर अकेलापन बेहिसाब बढ़ गइल बा. विडंबना त ई बा कि जवन बच्चा परिवार का भीड़ में, सभके साथ रहत पढ़ाई करे में खुद के असमर्थ महसूस करे लागल बा, ओही बच्चा का नाँव पर हमनी का आधुनिकता के ढोल पीट रहल बानी जा. पहिले का समय में पढ़ाई खातिर घर के कोना, बरामदा, आङन, छत भा दीया-बाती अउर ढिबरी-लमटेन के रोशनी काफी होत रहे. हलो-गुला में पढ़े में मन लग जाउ – एह कला के बच्चा परिवारे से सीख जात रहे. आज त स्थितिए उलट गइल बिया. बच्चा के चुप्पी चाहीं, एकांत चाहीं, एसी चाहीं, आरामदेह कुर्सी चाहीं आ अतनो पर पढ़ाई में मन नइखे लागत.

पहिले पुस्तकालय के मतलब होत रहे – किताब, ज्ञान, शांति आ अनुशासन. बच्चा पुस्तकालय जात रहे किताब लेबे खातिर, पढ़े, नोट बनावे आ संदर्भ खोजे खातिर. लाइब्रेरियन के डर, समय के पाबंदी आ किताब के सम्मान जइसन बात अपने आप संस्कार बन जात रहे. बाकिर आजु सहरन में जवन नया-नया पुस्तकालय बन रहल बाड़े स, ऊ असल में पढ़ाई से ज्यादा आराम के केंद्र बन चुकल बाड़न स. एयरकंडीशनर, सॉफ्ट लाइट, आरामदेह कुर्सी, वाई-फाई – सब कुछ बा, बस पुस्तक ना के बराबर. बच्चा किताब पढ़े खातिर ना, पढ़ाई के माहौल खोजे खातिर पुस्तकालय जात बा. ई स्थिति उन्नति ना, बलुक गंभीर अवनति के संकेत बाटे. जहाँ सुविधा, सुरक्षा आ अपनापन बा, अइसन अपना घर में जब पढ़े में मन ना लागी त हमनी का कवना तरह के समाज गढ़ रहल बानी जा, ई सोचेवाली बात बिया.

साँच पूछीं त असल समस्या असंतोष के बाटे. आजु हमनी का लगातार असंतोष का ओर बढ़ रहल बानी जा. जवन मिलत बा, ओह से संतुष्टि नइखे. घर में चैन ना, बाहरो चैन ना, सुविधा बढ़ रहल बा आ सुख घट रहल बा. आवेवाला दिन अउरी भयावह हो सकेला, काहेंकि बाजारवाद के संरक्षक लगातार नया-नया जरूरत गढ़े में लागल बाड़न. आजु एसी चाहीं, काल्हु स्मार्ट चेयर आ परसो वर्चुअल लाइब्रेरी – जरूरत के कवनो अंत नइखे.

असंतोष के ई बीआ बचपने से बोआ रहल बा. पहिले बच्चा गुड़ के टुकड़ा पाके खुश हो जात रहे. भोजपुरी में एगो कहाउत बा नू –
“जे कान छेदाई, ऊ गुड़ खाई. ”

माने छोटहनो सुख उत्सव बन जात रहे. बाकिर आजु समय का सङे-सङे मिठाइयो के स्वाद बदलत गइल. लड्डू, पेड़ा से आगे बढ़के केक, चॉकलेट, आ अब पिज्जा-बर्गर. अब हालत ई बा कि मिठाइयो से मन नइखे भरत. बच्चा के स्वाद जीभ से उतर के ब्रांड तक पहुँच गइल बा. आजु का बच्चा के खुशी मोबाइल स्क्रीन में बंद बा. खेलौना से ज्यादा गेम, दोस्त से ज्यादा वर्चुअल दुनिया, परिवार से ज्यादा सोशल मीडिया. ऊ हँसत त जरूर बा बाकिर भीतर से खाली बा. ई सब देख के बार-बार ईहे सवाल मन में उठत बा – हमनीका केने जातानी जा? का सचमुच हमनी का एह आधुनिकता से सुखी हो रहल बानी जा?

काकी कहली – जवन आधुनिकता सुविधा त दे बाकिर संवेदना छीन ले, ओह पर सवाल त उठहीं के चाहीं? जवन आधुनिकता परिवार तूरि दे, संवाद खत्म कर दे आ बच्चा के अकेला बना दे, त ओह पर पुनर्विचार त होखहीं के चाहीं.

लभेरन कहले – काकी, आजु जरूरी ई बा कि पीछे मुड़ के देखल जाउ अपना संस्कार, अपना परिवार, अपना समाज के आ सोचल जाउ कि हमनी का का खो रहल बानी जा, नाहीं त ऊ दिन दूर नइखे, जब सुविधा का पहाड़ पर खड़ा मनुष्य भीतर से सबसे गरीब हो जाई.
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030 मो. 9831649817
ई मेल : rmishravimal@gmail. com

 

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