गज़ल Posted by Editor | मार्च 21, 2013 | कविता, साहित्य | – मिथिलेश गहमरी जरूर चाँदनी बिहँसी सुतार होखे दीं, उदास चान के गरहन से पार होखे दीं. बन्हाई काँहे ना जिनगी क पीर मूट्ठी में, हिया के पीर त अउरी सयार होखे दीं. इहे बा साँच कि, ओहारो बेच के खइहन, हुजूर, डोलीके उनके कहाँर... Read More
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