चार गो गजल

– बरमेश्वर सिंह

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(एक)

सोच जब सहक गइल, मन तनी बहक गइल।
जे रहे दबल-दबल, आग उ दहक गइल।

चांद के नजर उठल,चांदनी चहक गइल।
मन पलाश हो गइल, खिल गइल, टहक गइल।

रूप-गंध का कहीं, रात भर महक गइल।
जब गइल घटा घटे, मोर-मन डहक गइल।

(दो)

मन तनी बेमार बा, दुख मगर अपार बा।
घर पुरान हो चलल, ढह चलल दुआर बा।

पोर-पोर पीर अब, हो चलल पहाड़ बा।
भीड़ -भाड़ बा मगर, के भला हमार बा।

बा सवाल खाड़ अब, जीत बा कि हार बा।
एक बात हम कहब, जिन्दगी से प्यार बा।

(तीन)

आग जब नरम भइल, राख तब करम भइल।
दांव कुल्हि हारि के, जीत के भरम भइल।

अब त बस कुभाव बा, आज के धरम भइल।
पेट के हिसाब में, माथ बा गरम भइल।

बा झुकल-झुकल नजर, खाड़ बा शरम भइल।
का कहीं, ए जिन्दगी, एक ना मरम भइल।

(चार)

बा अजब लहर चलल, गांव उठ शहर चलल।
राह ई रूकी कहां, सोच बा हहर चलल।

अनचिन्हार बा हवा, सांस बा सिहर चलल।
हाल-चाल देख लीं, पांत में जहर चलल।

पीर बा कि तीर बा, आंख से नहर चलल।
का गजल कहीं भला, रूठ के बहर चलल।
——
बरमेश्वर सिंह,
धनडीहा, भोजपुर- 802160
(भोजपुरी में दुनिया के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर नवम्बर 2003 में प्रकाशित भइल रहल.)

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