सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-35
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
सासु जी के छेरि हऊ, हमरो जेठानी
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भोरहीं-भोरे एगो लइका के भेजिके काकी लभेरन के बोलवले रहली। दस बजे तक जब ऊ ना अइले आ परोसिया रामसिङार के छवरि ओरि जात देखली त उनुके से लभेरन खातिर सनेस पेठवली। लभेरन हाँफत-गिरत अइले। बतावे लगले कि कइसे उनुकर भतीजा रातहीं से धरना-उठान परल रहे। सभ केहूँ मनावल बाकिर बिना कुछ खइले सूति गइल। भोरे सभ दुखी रहे, चाहो ना चूल्हा पर बइठल। आजु जसहीं दस बजल हा, त ओकरा भूखि ना अड़ाइल हा आ चुहानी से बासिए रोटी गुर का ढेली सङे खाए लागल हा। सोचीं, ई ऊ लइका रहे, जवन सभ खाना में नुक्से निकालत रहे। सब कुछ ठीके रहल हा तले मुहल्ला के जोखनी फुआ ओकरा पर टुभुकि दिहली- सासु जी के छेरि हऊ, हमरो जेठानी…। अब ई ओकरा से बरदास होखो? लागल थरिया-गिलास आ कुरसी फेंके। ओकरे के मनावे में देर हो गइल हा।
काकी कहली- जोखनी फुआ के हती चुकी लइका पर टोन ना नु मारेके चाहत रहल हा। चलऽ, घर-परिवार में त ई कुल्हि होते रहेला। आच्छा, ई बतावऽ कि एह कहाउत का पीछे कवन कहानी बिया। काकी के नतियो सुने खातिर कान लगवले रहले सन। लभेरन सुनावे लगले।
एक जना अपना ससुरारी गइले। उनुकर मान-आदर त बहुत भइल बाकिर सासु जी से एगो साइकिल मङले रहन आ सासुजी ओह घरी नकारि दिहली। कहली कि अगहन बीते द त कीनि देबि। पाहुन के जिद पूरा ना भइल त ऊ रूसि गइले। सासु जी खूब मनवली। राति में खीर-पुड़ी बनल रहे। जब ऊ ना खइले त सब केहूँ खा-पी के सूति गइल। पाहुन के मेहरारू ढूका लागलि रहे। ऊ जानत रहे कि इनिका से भूखि ना अड़ाई, कबो ना कबो त खइबे करिहें। अतने में सासुजी के बकरी मेमियाए लागलि। उनुकर मेहरारू कान लगवलसि। पाहुन बकरिया के सुहरावत रहलन आ बोलत रहन-
सासु जी के छेरि हऊ, हमरो जेठानी
तहरा मनवले ना मानीं त केकरा से मानीं?
फेरु ऊ उठले आ सीधे चुहानी जाइके खाना निकाले लगले। जब थरिया-पलेट खनखनाइल त अङना में जे-जे सूतल रहे, चद्दरि में मुँह लुकवा के देखत रहे कि पाहुन हाऊ-हाऊ खाए में लागल बाड़े।
अतना सुनते काकी का सङे-सङे उनुकर नतियो ताली पीटि-पीटि के हँसे लगले सन। काकी कहली- त एह रुसला में का फायदा भइल?
लभेरन कहले- रउओं ठीके कहऽतानी काकी! एही प एगो भोजपुरी कवि लिखले बाड़न –
छनहीं में रूसा-फूली छनहीं में यारी
हाय राम अइसना रहन के कहीँ का।
ई रूसा-फूली आ मान-मनउअल कवनो एक दिन के बात थोरे हउए? एकर आरंभ मानव सभ्यता का सुरुआते से भइल होई। ई असहजो नइखे। रुसला में आदमी अपना प्रेम भा मान्यता का प्रभाव के परीक्षण खातिर चंचल होला अउर मनवला में संबंध के बँचावे आ मजबूत करे के प्रयत्न लउकेला। रहल रुसला आ मनवला के फायदा आ नुकसान के त जो संबंध के ई भावनात्मक तंत्र सही संतुलन में रही त रिश्ता मजबूत होई आ जहाँ अति भइल कि नुकसाने नुकसान!
फायदा
रूसा-फूली आ मान-मनउअल से प्रेम के गहराई बढ़ेले। मनावत खा भावनात्मक जुड़ाव अउर बढ़ि जाला। एकरा से संबंध में नयापन बनल रहेला। एहमें जवन मान-मनउवल आ खास करके नखड़ा होला, ऊ संबंध का प्यार के प्रगाढ़ त करबे करेला, संबंध के रोचक आ जीवंतो बनावेला। अउर त अउर एकरा से आपसी समझ भी बढ़ेले। मनावत खा लोग एक दोसरा के रुचि आ संवेदना के नीमन से जाने लागेलन। एकरा से अहंकार के विसर्जन भी होला। मनावेवाला के आपन मान-अपमान ताखा पर राखे के परेला। एह तरह से आपसी रिश्ता अउर टिकाऊ बनि जाला।
नुकसान
जहाँ तक नुकसान के बात बा त बार-बार रुसला से सामने वाला आदमी मानसिक रूप से थाकि जाला। एकरा से असमानतो बढ़े लागेला। जो हमेशा एके आदमी मनावत रहे आ दोसरका रूसत रहे, त धीरे-धीरे नकारात्मकतो बढ़े लागेला। एकरा से इमोशनल ब्लैकमेलिंगो के खतरा बढ़ि जाला। कुछ लोग जान-बूझ के एही खातिर रूसेलन कि आपन बात मनवा सकसु। जो एक बार एह तरह के बात सामनेवाला का मन में बइठि गइल त एह रिश्ता के धीरे-धीरे कमजोर आ बनावटी होखे में समय ना लागी। एकरा सङहीं ईहो साँच बा कि जो समय पर मनावल ना गइल त झूठ-मूठ के खिसियाइल लमहर दूरियो में बदलि सकता।
अइसना में का करेके चाहीं
तब सवाल उठता कि अइसना में का करेके चाहीं। कुछु ना, रूसल-मनावल स्वाभाविक होखे के चाहीं। खतरा ओकरा अस्वाभाविक भा स्वार्थपरक भइला में बा।
अतना में काकी रूसा-फूली वाला सिनेमा के एगो गीत सुनावे लगली।
ना जाओ सैंया छुड़ा के बैयाँ
कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी
मचल रहा है सुहाग मेरा
जो तुम न हो तो क्या करूँगी।
काकी के गावल गीत सुनिके लइका सभ बड़ा खुश भइले आ लभेरनो का खुशी के ठिकाना ना रहे। ऊ कहले- रूसल-मनावल दाल भा तरकारी में नीमक नियन बाटे, सही मात्रा में होखे त संबंध स्वादिष्ट आ ढेर होखे त हर-हर जहर।
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030


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