खेड़ा का बहाने पेड़ा के चरचा – बतंगड़ 105

दुनिया में भोजपुरी भाषा में शुरु होखे वाली पहिल वेबसाइट अंजोरिया डॉट कॉम के तेइस बरीस बादो जितवले राखल आसान ना होखे। जे भोजपुरी के बड़का लिखनिहार बाड़ें से अंजोरिया ला लिखसु ना। काहे कि हम मूलत: एकबग्गा हईं। आ भोजपुरी समाज में सबसे प्रचलन में इहे बा कि तूं हमार पीठ थपथपावऽ, हम तोहार पीठ थपथपावत रहब। हम कबहियों तीन में भा तेरह में ना रहनी। लंगड़ी गईया के अलगे बथान!
ऊ त साधुवाद बा भोजपुरी दिशा-बोध के पत्रिका ‘पाती’ के संस्थापक संपादक डॉ अशोक द्विवेदी जी के उहाँ के स्नेह शुरुआते से मिलत आइल बा आ उनहीं के आशीर्वाद से अंजोरिया पर भोजपुरी साहित्य के बड़हन भंडार मौजूद बा। बाकिर ओहसे का? जब केहू पढ़हीं वाला नइखे। जे पढ़े ला से कुछ बोले ना। उनुका का नीक लागत बा, का बाउर ? उनका चाहीं का? कइसन लेख ? कइसन कहानी? एहसे पते ना चले कि जवन कुछ अंजोर कइल जाला एह वेबसाइट पर ऊ केहू का अङना ले चहुँपत बा कि ना?
अब समस्या ई हो जाला कि अंजोर का करीं? रोज रोज कुछ नया लिखल आसान त होखे ना। खबरन का बहाने कुछ लिखा जाव त ओहू में बहुते सम्हर के रहे के जरुरत बन गइल बा। कब के खेड़ा के पेंड़ा बनावे चल आई कहल ना जा सके! आ सांच बताईं त अगर ई वेबसाइट भोजपुरी में ना होके हिन्दी भा अंगरेजी में रहीत त अबले पता ना कतना नोटिस आ चुकल रहीत। जवन लिखिलां तवन पढ़े केहू आवे ना आ जब अपने लिखलका अपनहीं पढ़त रहे के बा त नोटिस के भेजी!
त सोचनी कि काहें ना फेरू से बतंगड़ के क्रम काहे ना शुरु कर दीं। बरीस 2016 में कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला हिन्दी दैनिक ‘समाज्ञा’ ला ई स्तंभ लिखत रहनी। हिन्दी दैनिक ‘सन्मार्ग’ में बतकुच्चन पहिले से आवत रहल से ‘समाज्ञा’ ला ई नया स्तंभ शुरु कइले रहीं। अलत बात बा कि आगे चलि के बतकुच्चन आ बतंगड़ दुनु के क्रम थथम गइल। बीच बीच में बतकुच्चन त लिखत आइल बानी बाकिर बतंगड़ हमहूं भुला गइल रहीं। आजु जब ई कड़ी लिखे बइठनी त देखनी कि अंजोरिया पर पहिले से बतंगड़ के 104 कड़ी मौजूद बाड़ी सँ। बतंगड़ के पहिल कड़ी के लिंक दे रहल बानी।
चलल रहीं पेड़ा का बहाने खेड़ा के चरचा करे भा खेड़ा का बहाने पेड़ा के आ एही क्रम में ड़ आ ढ़ में अझूरा गइनी। बहुते लोग भोजपुरी भा हिन्दी लिखे ला रोमन लिपि के इस्तेमाल करेला आ ओह लोग ला हमेशा समस्या रहेला कि ड़ लिखीं त कइसे? peda लिखी कि pera? ढ़ ला ई समस्या कुछ कम होला – rh (parhna पढ़ना) से काम चल जाला। समस्या तब होखेला कि ऊ पर्ह लउके लागेला। अगर रउरा में से केहू एह बारे में कुछ सहायता कर सके त नीक लागी।
खेड़ा के पेड़ा बनल कि ना से त अबहीं ले साफ नइखे भइल बाकिर ओही मामिला में रणदीप सूरजेवाला के नोटिस मिल गइल बा कि आवऽ, बतावऽ । हो सकेला कि रणदीप के बतवला का बाद अगिला नोटिस कवनो दोसरा नेता के मिल जाव।
हो सकेला कि पिछलका कड़ियन में कहीं बतकुच्चन आ बतंगड़ के रिश्ता पर चरचा कइले होखब। बाकिर फेरू से रेघरिया दीं त गलत ना रही। बतकुच्चन कवनो बात पर होखेला, बतंगड़ बिना बातो के कइल जा सकेला। बतकुच्चन में हम दू गो भा अधिका शब्दन से खेल के कड़ी बना देनीं। बतंगड़ ला ई मजबूरी नइखे। बतंगड़ बिना बातो के हो सकेला। एगो हिन्दी फिलिम के गीत ईयाद आ रहल बा – बात थी यार एक बेर की, बढ़ के हो गई सवा सेर की ! एह मुखड़ा में कवना बेर के बात बा आ ऊ बढ़ के सवा सेर वाला का हो जाला से रउरो जानते होखब। भोजपुरी के दुअर्थी होखे के शिकायत करे वाला हिन्दी प्रेमियन के अपनो दुअर्थी होखे के अर्थ समुझे के चाहीं। भोजपुरी के बदनाम करि के हिन्दी फिलिम आ संगीत के धंधेबाज आपन एगो बरियार प्रतिद्वन्दी के निकाल बाहर करे में बहुते हद त सफल हो गइलें। बाकिर अंजोरिया के हमेशा से ईहे कहना रहल बा कि भोजपुरी अश्लील भाषा हीयऽ आ हमरा एकरा पर गर्व बा। आम मनई अश्लीले होला। श्लील होखे के मजबूरी ओकरा सोझा ना रहे।
अगर हमरा एह कहलका से केहू के बाउर लागल होखे त ठेंगा से!


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