सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-40
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
लागी त लागी, लगवले बानी अन्हरचटकी

आजु काकी उदास लगली। लभेरन कारन पुछले त अपना परोसिया पर उखरि गइली। “बतावऽ! अपना पुरुखन का जमीन पर हम चार पीढ़ी से रहत आवतानी। पिछला सरवे में अइसन अलबलाह काम कइले सन कर्मचारी कि हमनी के जीयल मुसकिल हो गइल बा, हमनिए के ना, जेकरे से पूछऽ, ओकरा कवनो ना कवनो जमीन के ममिला जरूर अझुराइल बा। खतियान में नाम फलाना के आ दखल हमार। अतने पर फलाना जी चुपे-चुपे तबे से रसिदियो कटवावतारे।”
लभेरनो जइसे ताव में आ गइले- “अतने से जमीनि उनुका नाँवे हो जाई का? ई कवनो लइकन के खेल हटे?” काकी कहली- “लागी त लागी, लगवले बानी अन्हरचटकी। एही उमेदि में कूदऽतारे, उनुका ई नइखे बुझात कि अतने से हमनी के कतना टेंशन बढ़ि गइल बा।” काकी के बड़का नतिया के ना बुझाइल त पूछि दिहलसि कि एह कहाउत के माने का भइल। तब काकी लभेरन का ओर इशारा कइली- “इनिके से पूछऽ लोग।” तब लभेरन बतावे शुरू कइले।
एकर माने भइल कि निशाना लागल त ठीक, नाहीं त अन्हारे में नूँ ढेला चलवले बानी हम? माने सफलता के कवनो गारंटी ना, संजोग से काम बनि गइल त एकरा से नीमन का? ई एक तरह से लॉटरी के पक्ष में अकर्मण्यता के संदेश बाटे। एह कहाउत के जरूरत तब पड़ेला, जब केहूँ बिना कवनो निश्चित योजना भा कौशल के कवनो काम भागि का भरोसे करेला। ई कहाउत ओह लोगन पर व्यंग करेले, जे बिना योग्यता के कवनो काम खाली तुक्का का आधार पर करेलन आ सफल भइला पर ओकरा पर आपन उपलब्धि बतावेलन।
काकी टोकली- “गाँव में जब कवनो लौंडा के नाच मंडली आवत रहे त एकर कॉमिक जरूरे होखत रहे।” अब त दूनों नतिया जिदिया गइले सन कि इसकी कहानी सुनाइए ना काकी। काकी के इशारा पाके लभेरन कहानी सुनावे लगले।
शादी बियाह का मोका पर केहूँ ना केहूँ किहाँ लौंडा नाच जरूर होखत रहे। ओहमें अक्सर एगो कॉमिक होत रहे, जवना में एगो आन्हर एह कहाउत के बोले आ फेरु नगाड़ा बाजे लागे। एहमें नाच मंडली के प्रधान मसखरा अक्सर एगो आन्हर आदमी के पाठ करत रहे। ऊ फाटल-पुरान कपड़ा पहिनि के आ हाथ में एगो लाठी लेके स्टेज पर आवे। ऊ सूरदास अपना लाठी से एने-ओने मारे आ दर्शक का बीचे अइसन स्थिति पैदा कइ दे कि कि लोग हँसे लागसु। एही बीच ऊ लाठी से कवनो चोर के पकड़ ले भा केहूँ के छू दे, माने कवनो अइसन कारनामा कइ दे जवन असंभव लागत रहे। जब लोग ओकरा से पूछसु कि “अरे भाई, तहरा त लउकते नइखे, तबो ई कइसे क देलऽ हा?” त ऊ बड़ा गर्व से चिचिया के गाई- “लागी त लागी, लगवले बानी अन्हरचटकी!” अतने पर नगाड़ा आ झाल के थाप तेज हो जाई आ पब्लिक ताली बजावे लागी। एह अन्हरचटकी में पब्लिक के आम आदमी के ऊ संघर्ष लउकत रहे, जहँवा संसाधन के कमी का बादो ‘तुक्का’ भा ‘भागि’ साथ दे देत रहे।
भोजपुरी समाज में ई खाली एगो कहाउते नइखे, बलुक एगो एटिट्यूड बाटे, जवना से पता चलऽता कि रिस्क लिहला में कवनो खराबी नइखे। रउरा भीरी जो कुछ खोवे के नइखे, त अन्हारे में सही बाकिर एगो कोशिश ज़रूर करे के चाहीं।
आजु का डिजिटल राजनीति में त नेता लोग खुलि के एकर प्रयोग करत बाड़न। सोशल मीडिया पर एही ‘कॉमिक’ नियन कवनो नैरेटिव उछालऽतारन। जो ऊ वायरल हो गइल त ‘लागि गइल’, ना त ‘अन्हरचटकी’… कवन अपना बाप के गइल बा!
काकी कहली- “ठीके कहतारऽ लभेरन! पिछला 2-3 बरिस का भारतीय राजनीति, खास करके 2024 का लोकसभा चुनाव आ आस-पास के विधानसभा चुनाव में त ई कहाउत एगो गंभीर रणनीतिक औजार का रूप में उभरल बा।”
लभेरन कहले- “जी काकी, राजनीति में अब ‘निश्चितता’ से ढेर ‘संभावना’ के खेल शुरू हो गइल बा। अब देखीं ना, पिछला कुछ बरिसन में ‘रेवड़ी’ बाँटे वाली जवना राजनीति के जोर बढ़ल बा, ऊ का हटे? आ कवन पाटी ओकर इस्तमाल नइखे करत? आश्चर्य के बात त ई बा कि नेता लोगन के अइसना लोकलुभावन घोषणा का बजट के तनिको अंदाजो ना होखे। ओह लोगन का मन में ईहे होला कि जो जनता एकरा के पतिया लिहलसि त सत्ता हाथ में आ तब ई ‘मास्टरस्ट्रोक’ का नाँव से जानल जाई। जो जनता ठुकरा दिहलसि त कवन वादा पूरा करे के हमार जिम्मेदारी बा? माने अन्हरचटकी हर हाल में सफले रही।
कई बार त पाटी कवनो अइसना क्षेत्र में, जहाँ ओकरा जीत के संभावना ना के बरोबर होले, ओहिजा कवनो नया आ अनजान चेहरो के उतार देले। ई का हटे? जो ऊ उम्मीदवार कवनो लहर भा जातिगत समीकरण का चलते जीत गइल त पाटी अपना रणनीति के लोहा मनवाई आ नाहीं त ऊ जानते बिया कि ऊ सीट ओकरा हाथ में नइखे।
काकी कपारे हाथ धइ लिहली- केहूँ सुधरेवाला नइखे लभेरन! कर्म पर से अब लोगन के बिसवास उठ रहल बा।
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030


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