सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-44
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
टेकुआ के टाँय

आजु छुट्टी के दिन रहे। दुपहरिया में दलानी में लभेरनो पहुँचि गइले। ऊ देखले कि काकी अपना दूनो नतियन के कहनी सुनावे जात रही। ऊ मौन होके शुरू करे के काकी के इशारा कइले। काकी सुनावे शुरू कइली।
एक बेरि के बात हटे। एगो गाँव में दू गो भाई रहत रहले। बड़का भाई बुझावन आ छोटका भाई सुझावन। बाबूजी के गुजरला का बादे दूनो भाई अलगा हो गइलन। घर-दुआर, खेत-बारी सभ बँटा गइल। बुझावन सुरुए से मेहनती रहले। भोरे-भोरे खेत प जासु, खेत पटावसु आ खेत के मेड़ सुधारसु। सुझावन के काम टारेवाला आदत रहे, अस्कतियाहो ओइसहीं। “आजु छोड़ऽ, काल्हु से शुरू करबि” उनुकर मूल सुभाव रहे। उनुका गतरे गतर अस्कतियाही अतना भरल रहे कि उनुकर काल्हु अइबे ना करे। अइसना में खेत से घासो पतवार ना बिंछाइल। दिन पर दिन उनुकर लापरवाहियो बढ़त गइल। कुछ दिन बाद बुझावन के खेत त लहलहाए लागल, बाकिर सुझावन के खेत घास-पात से भरिके जंगल हो गइल। एक दिन सुझावन के एगो दोस्त सलाह दिहलसि-
“भइया, अबहियों समय बा। तनी खेत पर ध्यान द।”
सुझावन खइनी पर ताल देत ओकर बात हँसि के उड़ा दिहले- “अरे, ई हमरा खातिर टेकुआ के टाँय हटे। एक दिन लागबि आ सभ ठीक हो जाई।”
उनुकर दोस्तवा फेरु एक दिन समुझवलसि, बाकिर उनुका ओहसे कवनो फरक ना परल।
बरखा के दिन आइल। बुझावन के खेत में फसल लहलहाए लागल, बाकिर सुझावन के खेत में कुछुओ काम जोग ना भइल। तब सुझावन दुखी होके बड़का भाई से पुछले-
“हमरा से गलती कहाँ भइल हा भइया?”
बुझावन समुझवले-
“तोहार सबसे बड़ गलती ईहे रहे कि तू मेहनत, समय आ सलाह- तीनों के टेकुआ के टाँय बूझत रहलऽ हा। ऊ बात छोट भलहीं लागत रहल हा बाकिर ऊहे सबसे जरूरी रहे। जीवन में कवनो जरूरी बात के छोट-मोट समुझि के अनदेखा ना करे के चाहीं। अबो से आपन आदति सुधारि लऽ, आगे सभ अपने आप ठीक हो जाई।”
बड़का नतिया के ‘टेकुआ के टाँय’ के माने ना बुझाइल रहे। कहनी खतम होते ऊ सवाल दगलसि- “टेकुआ के टाँय के माने का भइल?” अब ऊ आस्ते-आस्ते भोजपुरियो बोले लागल रहे। काकी कहली कि तोहन लोग के अब एकर माने-मतलब लभेरने बतइहें। अब त दूनो लइका लभेरन का ओरि टुकुर-टुकुर ताके लगले सन आ लभेरन शांतचित्त होके बतावे लगले।
पहिले एह मुहावरा में आइल ‘टेकुआ’ शब्द का बारे में जानऽ लोग। टेकुआ एगो बहुत पुरान आ पारंपरिक देहाती औजार हटे। एकरा के टिकुरी भा टेकारी भी कहल जाला। ई लोहा के एगो छोट, पातर आ नोकदार सूआ नियर होला, जेकरा पाछा धरे खातिर लकड़ी के मूठ लागल रहेला। ई मोट कपड़ा, बोरा-चट्टी, चमड़ा के जूता-चप्पल भा कथरी आ लेवा-गुदरी सिए का काम में आवेला। ई ऑफिस का फाइल में छेद करे खातिर भा डलिया-दउरी बनावे का काम में भी आवेला। चरखा काते वाला तकुआ से ई तनिका अलग होला। ई खाली छेद करे आ सिए का कामे आवेला।
टेकुआ के नोक बहुत पातर होला। जब एकरा से कवनो कड़ा चीज में छेद कइल जाला भा बेढंगा तरीका से दबावल जाला, त एकर नोकदार मुँह मुड़ जाला भा टूट जाला आ ओह स्थिति में ई कवनो काम लायक ना रहि जाला। एकरे कारन ‘टाँय’ शब्द के प्रयोग भइल बा। ओकरा खातिर ‘टाँय’ शब्द का प्रयोग के समानता ‘टें बोलि गइल’ भा ‘टाँय-टाँय फिस’ मुहावरा का ध्वनि से कइल जा सकत बा। लागता, ओही से ई मुहावरा बनल। जेकर कवनो भरोसा ना होखे भा जे बेमतलब अड़ जाइ आ बाद में छितरा जाइ, ओकरा के ‘टेकुआ के टाँय’ कहल जात होई, माने कमजोर, बहुत मामूली चीज भा तुच्छ। अइसने एगो अउरी मुहावरा बा- ‘टेकुआ नियन सोझ’। ई मुहावरा टेकुआ के बनावट का स्वरूप से बनल बा आ ‘टेकुआ के टाँय’ ओकरा कम मजबूती के प्रकट करे खातिर।
जानतारऽ लोग, काम के महत्त्व ओकरा आकार से ना, ओकरा जरूरत से तय होला। कवनो काम के छोट समुझि के टारे के ना चाहीं। जवना काम के समय पर ना कइल जाला त बाद में ऊ काम बड़हन समस्या बन जाला। एक बेरि एगो किसान के ओकरा खेत का मेड़ में परल छोट दरार बहुत छोट बात बुझाइल। ऊ सोचलसि कि काल्हु भरि दियाई। राति खा अचानक भारी बरखा भइल आ दरार नाला बन गइल, बूझऽ कि मए फसल बरबाद हो गइल। पहिले त बुझाइल कि काम छोट ना रहे, बाकिर अब के ओकर रूप देखि के किसान के दाँत चिअरा गइल।”
काकी अपना नतियन से पुछली कि अतना बात सुनि के तहन लोग का बुझल? लइका बतवले सन कि कवनो काम के छोट ना बूझे के चाहीं आ समय पर क लेबे के चाहीं। काकी उहनी के पीठि ठोकली आ कहली-
“किसान खेत जोतेला, मजदूर मकान बनावेला, दुकानदार दोकान चलावेला, शिक्षक पढ़ावेला, सफाईकर्मी सफाई करेला, डॉक्टर इलाज करेला- एहमें से कवनो काम छोट ना हटे। कवनो रुकल त जीयल मोहाल हो जाई।”
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030


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