चलीं आज भोजपुरी खेलल जाव
Let us play Bhojpuri-1
साहित्यिक सामाजिक राजनीतिक आर्थिक मनोरंजन जइसन विषयन पर रोज बात होला। बाकिर आज हम भोजपुरी खेले के बात करे जात बानी। जानत बानी कि भोजपुरी खेल ना ह, बाकिर खेल-खेल में भोजपुरी के कुछ बात खोजल जा सकेला। आज के कोशिश ओही खातिर बा। भोजपुरी खेलल आसान नइखे। काहे कि एह खेल के कवनो नियम बना के नइखे राखल गइल। ई खिलाड़ियन पर निर्भर करेला कि के कइसे खेलत बा। शायद एही बहाने कुछ नियम निकल जाव त देखल जाई ।

पहिला दौर में आईं बतावल जाव कि वर्णमाला के कतना अक्षर भोजपुरी में बेवहार कइल जा सकेला। (‘बेवहार’ के चरचा ओकरा बाद कइल जाई।)
हर लिपि के वर्णमाला में कुछ अइसन वर्ण माने कि अक्षर होले जवना के भाषा में शब्द का तरह लिखल बोलल जाला। अंगरेजी के A आ I के शब्द का तरह लिखल बोलल जाला। हिन्दी में ई ताकत शायद ‘न’ में बा। तत्क्षण हमरा कवनो दोसर अक्षर इयाद नइखे आवत। आ भोजपुरी में कई अक्षर अपना आप में शब्द बन जालें। जइसे—आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, क, त, थ, द, ध, न, प, ल, ह। एहमें से कतना रउरा रोज बोलत बानी? आज के खेल इहे बा।
‘व्यवहार’ के ‘बेवहार’ लिखल बोलल खूब मिलेला। कवनो शब्द अगर ‘व’ से शुरु होखत बा त कई बेर एकर उच्चारण ‘ब’ क दिहल जाला। बाकिर अगर शब्द का बीच में ‘व’ आवे त ऊ जस के तस रहेला। अब एकरा के उच्चारण दोष कह दिहल आसान रही बाकिर ई उच्चारण दोष ना होके भाषा के प्रकृति मानल बेसी सही रही। एह प्रकृति का चलते ‘उच्चारण’ के ‘उचारल’ कह दिहल जाला। एही तरह भोजपुरी के कई शब्दन के रूप वर्तनी के हेर फेर से बदल जाला। त हो सकेला कि एगो नियम बना लिहल जाव कि जब वर्तनी बदले से माने बदल जाव भा असहज भा बेजरुरत लागे त ओहिजा वर्तनी बदले से परहेज कइल जाव। वइसे हर बदलाव गलती ना होला। कुछ बदलाव भाषा के आपन प्रवाह होला आ ओकरा साथे चले के आदत बनावे के चाहीं।
‘श’ आ ‘ष’का साथहूं ‘व’ जइसन बदलाव मिलेला। भोजपुरी में कई जगहा ‘श’ आ ‘ष’ के ‘स’ बोल दिहल जाला आ कुछ जगहा ‘ष’ के ‘ख’। बोलला तक त सही बा काहे कि तब सुनेवाला ओकरा के संदर्भ अनुसार सही क के समुझ लेला। एहिजा ‘कर के’ का जगहा ‘क के’ लिखले बानी काहे कि कई बेर शब्द का आखिर में आवे वाला ‘र’ आ ‘ह’ के उचारल ना जाव, सुनेवाला ओकरा के समझ लेला। त एगो नियम इहो हो सकेला कि अगर वर्तनी के अइसन बदलाव से माने बदल जात होखे, कवनो विशेष जरुरत ना लागे त वइसन बदलाव करे से बचे के जरुरत होखे के चाहीं। देश के देस लिखल भा वेष के भेस, भाषा के भासा, भाषण के भासन जरुरी ना होला। काहे कि आये दिन एह शब्दन के सहज रूप से पढ़े सुने के मिलत रहेला आ कवनो असहजता ना होखे। हर शब्द के भोजपुरियवला के जरुरत ना होखे के चाहीं।
अब ई खेल अगर हम अकेले खेलीं त ऊ खेल ना रही। एह खेल में रउरो सभे के शामिल होखल जरुरी बा। बेझिझक आपन बात कहीं, लिखीं, आलोचना करीं तब एह खेल से आनन्द आवे लागी। ना त हम एकरा के ‘सालिटेयर’ का तरह अकेलहीं खेलत रह जाएब आ ई ठीक ना कहाई। अब ‘ठीक ना कहाई’ का जगहा ‘ठीक ना होखी’ लिख सकत रहीं बाकिर ‘ठीक ना होखी’ में हमरा चेतावनी जइसन स्वर लागल एहसे ‘ठीक ना कहाई’ लिखनी। काहे कि एहमें बस सलाह जइसन भाव बा।
आखिर एही से कहत बानी कि भोजपुरी में चेतावनी, नियम, दबाव का जगहा अनुशंसा सलाह से आदत बनावल जाव। एह बीच शायद रउरा धेयान दिहले होखब कि अब हम ‘बात’ का जगहा ‘बाति’, ‘आज’ का जगहा ‘आजु’ लिखे से परहेज करत बानी। कोशिश करत बानी कि जबले बहुत जरुरी ना लागे तब ले भोजपुरी के अर्ध ह्रस्व के बिसरा दिहला में हरज नइखे। हो सकेला हम गलत होखी। रउरा टोकीं। हो सकेला रउरे सही निकलीं। भोजपुरी के फायदा ओही में बा। रउरा का कहत बानी ?
आ सबले बड़ बात ई कि हर शब्द के भोजपुरियवला के जरूरत ना होखे के चाहीं।
अब चलत चलत कुछ सवाल करत बानी। बताईं—
(1) “व्यवहार” लिखब कि “बेवहार”?
(2) “देश” कि “देस”?
(3) “भाषा” कि “भासा”?
कारण समेत आपन राय दीं।


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