भोजपुरी के मानक वर्तनी आ क्षेत्रीय विविधता
भोजपुरी भाषा में दुनिया के पहिलका वेबसाइट होखला का चलते आ अँजोरिआ डॉटकॉम anjoria.com के प्रकाशन करत अपना 23 बरीस से अधिका के अनुभव का आधार पर सोचनी कि काहे ना एगो मानक वर्तनी के अनुशंसा तइयार कइल जाव। अनुशंसा एह से कि नियम बनावे के औकात नइखे हमार। साहित्य आ भाषा के कवनो अध्ययन का बिना व्याकरण भा भाषा के नियम बना पावल हमरा सामर्थ्य के बाहर बा। बाकिर एह तेइस बरीस के प्रकाशन अनुभव से एगो शैली जरुर बनावे के कोशिश कइनी। एह कोशिश में कुछ विद्वान साहित्यकारन से मतभेदो भइल। कुछ लोग के हमार संशोधन अतना बेजाँय लागल कि ऊ ओकरा बाद अँजोरिआ पर प्रकाशन ला कुछ भेजले बन्द कर दिहलें। कुछ लोग अपना स्नेहवश हमार अनधिकार चेष्टा के सहन करत आपन रचना भेजल जारी रखलें। अइसनका लिखनिहारन के हमार अभिनन्दन।

भोजपुरी बहुत बड़हन भूभाग में बोलल जाले। अलग-अलग इलाका, सामाजिक परिवेश, शिक्षा आ बोलचाल के परंपरा के कारण ओकरा रूपन में विविधता स्वाभाविक बा। ई विविधता खाली शब्दन में नइखे; क्रिया के रूप, सहायक क्रिया, उच्चारण आ वाक्य के बनावटो में दिखाई पड़ सकेले। बा, बावे, बाटे, बाने, बड़ुवे जइसन रूप एह समस्या के साफ उदाहरण बाड़ें। सवाल ई नइखे कि एहमें से कवन रूप के लिखाई सही बा आ कवन गलत। असल सवाल ई बा कि मानक वर्तनी एह तरह के क्षेत्रीय विविधता के साथे व्यवहार कइसे करे। आ शायद एही चलते भोजपुरी व्याकरण के त अनेके पुस्तक मिल जाले, वर्तनी के ना। आ व्याकरणो में अतना विविधता बा कि एहू पर कवनो सर्वसम्मत राय नइखे कि भोजपुरी वर्णमाला में स्वर कतना राखल जाव। अलग अलग व्याकरण में एह स्वर संख्या में निकहा अन्तर देखे के मिल जाई। शुरुआती काल में हम अर्द्ध ह्रस्व वाला स्वरन के व्यवहार करत रहीं। बाकिर आजु, काल्हु, बाति जइसन शब्द लिखला का बाद हमरो लागे कि बहुते पढ़वनिया एकर सही उच्चारण ना कर पावेलें। एने कुछ दिन से हम एह अर्द्ध ह्रस्व के व्यवहार बन्द कर दिहले बानी। आज हमार मानक वर्तनी के अनुशंसा वाली किताब के लेखन के समापन करत मन में आइल कि रउरो सभे के राय ले लिहल जरुरी बा। आज के एह लेख पर रउरा सभे के टिप्पणी के प्रतीक्षा करब आ हर दमदार टिप्पणी करे वाला नेही पढ़निहारन के प्रकाशन पूर्व एह पुस्तक के .pdf संस्करण भेंट कर के हमरा खुशी होखी। बाकिर ओकरा ला जरुरी होखी कि टिप्पणी करे से पहले अँजोरिआ पर लागिन कर लीं हमरा ई मेल से। काहे कि पीडीएफ ओही ईमेल पर भेजल जाई। चलीं अब विषय के चरचा पर —
मानक वर्तनी के सीमा
मानक वर्तनी के उद्देश्य भोजपुरी के सगरी क्षेत्रीय रूपन के मिटा के एगो रूप में ढालल नइखे। ओकर काम लिखाई में अइसन व्यवस्था बनावल ह जवना से पाठक शब्द आ वाक्य के आसानी से समझ सके आ बेमतलब वर्तनी-विविधता कम होखे। एहसे बा, बावे, बाटे, बाने, बड़ुवे में से कवनो एगो रूप चुन के बाकी सभका के अमानक घोषित कर दिहल वर्तनी के सीमा से आगे के फैसला हो जाई। एह रूपन के पीछे क्षेत्रीय आ व्याकरणिक व्यवहार बा। जहाँ ई रूप अपना-अपना क्षेत्र में स्वाभाविक आ स्थापित बाड़ें, उहाँ उनका सम्मान मिलल चाहीं। एही तरह रहल / रहुवे जइसन भेदो के खाली वर्तनी के गलती मान के निपटावल ठीक नइखे।
लेखक अपना चुनाव में एकरूप रहे
क्षेत्रीय विविधता स्वीकार करे के मतलब ई नइखे कि एके लेखक एके तरह के प्रसंग में बिना कारण कबो बा, कबो बाटे, कबो बावे लिखत चले। लेखक अपना स्वाभाविक भाषिक व्यवहार के अनुसार कवनो रूप चुने त सामान्यतः अपना रचना में ओही रूप के लगातार व्यवहार करे। एहिजा एकरूपता के मतलब सब लेखकन के एके रूप लिखावल नइखे; मतलब बा कि लेखक अपना चुनल रूप के व्यवहार में सुसंगत रहे। अगर अर्थ, पात्र, प्रसंग भा व्याकरणिक काम के कारण रूप बदलऽता त ऊ अलग बात बा। पात्र के भाषा अलग-अलग हो सकेले। कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण भा संवाद-प्रधान रचना में लेखक के भाषा आ पात्र के भाषा एक होखल जरूरी नइखे। अलग-अलग क्षेत्र के पात्र अपना इलाकाई रूप में बोल सकेलें। अइसन रचना में सभका मुँह से एके मानक रूप बुलवावल भाषा के स्वाभाविकता घटा सकेला।एहसे रचना के सामान्य वर्णन में लेखक आपन चुनल रूप बरते आ पात्र के संवाद में ओकर क्षेत्र, परिवेश आ व्यक्तित्व के अनुसार भाषिक विविधता बचावे।
प्रकाशन के आपन शैली हो सकेले
अखबार, पत्रिका, वेबसाइट, प्रकाशन संस्थान, रेडियो-टेलीविजन भा दोसरा माध्यम के आपन शैली-नीति हो सकेले। नियमित प्रकाशन में पाठक खातिर कुछ एकरूपता उपयोगी होला। कवन शब्द कइसे लिखल जाव, विराम-चिह्न कइसे लागे, अंक कवन रूप में लिखल जाव, संक्षेप के तरीका का होखे—एह बारे में माध्यम आपन संपादकीय शैली बना सकेला। बाकिर शैली-नीति के सीमा बा। अगर संपादक लेखक के स्वाभाविक बा के हर जगह बाटे, भा बाटे के हर जगह बा करे लागे, त सवाल उठी कि ऊ वर्तनी सुधार रहल बा कि लेखक के भाषा अपना पसंद के अनुसार बदल रहल बा। एहिजा सावधानी जरूरी बा।
संपादक कहाँ तक जाए?
संपादक के अधिकार लेखक के भाषा पर मालिकाना हक नइखे। साफ वर्तनी-दोष, अनजाने में आइल असंगति, गलत विराम-चिह्न, टाइपिंग के गलती आदि सुधारल संपादन के सामान्य काम ह। प्रकाशन के घोषित शैली के अनुसार स्वीकार्य विकल्पन में एकरूपता लावलो उचित हो सकेला। बाकिर लेखक के स्थापित क्षेत्रीय शब्द, क्रिया-रूप, मुहावरा भा भाषिक स्वरूप के बदलल अलग मामला बा। अगर अइसन बदलाव जरूरी लागत होखे त लेखक से सहमति बेहतर राह ह। लिखनिहार अपना भाषा के ले के संवेदनशील हो सकेलें। संपादन अगर सुधार के बजाय उनकर भाषिक पहचान बदलत दिखाई पड़ी त टकराव स्वाभाविक बा। एहसे संपादकीय नीति के एगो उपयोगी कसौटी हो सकेले—जहाँ गलती बा उहाँ सुधार; जहाँ स्वीकार्य विकल्प बा उहाँ शैली के अनुसार एकरूपता; आ जहाँ क्षेत्रीय पहचान बा उहाँ सम्मान।
भाषिक क्षेत्र के उल्लेख
भोजपुरी के क्षेत्रीय विविधता के समझे में लेखक के भाषिक क्षेत्र के जानकारी उपयोगी हो सकेले। कवनो पत्रिका, वेबसाइट भा प्रकाशन लेखक से निहोरा कर सकेला कि ऊ चाहे त अपना रचना के आखिर में छोट रूप में आपन भाषिक क्षेत्र लिख दे—(भाषिक क्षेत्र : सारण, बिहार आ कर्म क्षेत्र : बलिया, उत्तरप्रदेश) एह सूचना के स्वैच्छिक राखल बेहतर बा। भाषिक क्षेत्र के मतलब लेखक के जन्मस्थान भा वर्तमान निवास अनिवार्य रूप से नइखे। लेखक खुद ओह क्षेत्र के पहचान सकेला जहाँ के भोजपुरी से ओकर भाषिक व्यवहार मुख्य रूप से बनल बा। अइसन सूचना लगातार जुटत रहे त समय के साथे भोजपुरी के अलग-अलग क्षेत्रीय रूपन के एगो उपयोगी लिखित अभिलेख बन सकेला। भविष्य में भाषा के अध्ययन करत घरी एहसे ई समझे में मदद मिली कि कवन रूप कवन क्षेत्र में अधिक स्वाभाविक भा प्रचलित रहल बा। बाकिर भाषिक क्षेत्र के उल्लेख के आधार पर लेखक के भाषा के पहिले से तय खाँचा में ना बाँटल जाव। ई जानकारी समझे खातिर होखे, फैसला सुनावे खातिर ना।
भविष्य के मानक के जल्दी तय मत करीं
आज भोजपुरी में जहाँ कई स्थापित क्षेत्रीय रूप मौजूद बाड़ें, उहाँ भविष्य के एगो अकेला मानक रूप आजे घोषित कर देवे के जल्दी उचित नइखे। भोजपुरी में लिखाई, पढ़ाई, प्रकाशन आ डिजिटल व्यवहार जइसे-जइसे बढ़ी, अलग-अलग रूपन के वास्तविक प्रचलन अउरी साफ होत जाई। गँवे-गँवे कुछ रूप व्यापक स्वीकार्यता पा सकेलें आ भविष्य में सामान्य मानक के रूप ले सकेलें। बाकिर खाली छपाई में अधिक दिखाई पड़ल रूप के बहुमत के रूप मान लिहलो ठीक नइखे। कवनो क्षेत्र में प्रकाशन अधिक आ दोसरा में कम हो सकेला। भविष्य में कवनो सामान्य रूप के स्वीकार करे खातिर व्यापक प्रचलन, भौगोलिक विस्तार, सहजता, लिखित व्यवहार आ भाषिक स्वीकार्यता सबके देखल जरूरी होई।
आज खातिर राह
आज के जरूरत विविधता मिटावल ना, ओकरा बीच लिखाई के अनुशासन बनावल बा। लेखक अपना स्वाभाविक रूप के सम्मान करे आ ओकर व्यवहार में एकरूप रहे। पात्र के जरूरत होखे त ओकर क्षेत्रीय भाषा बचावे। संपादक वर्तनी के साफ करे, बाकिर लेखक के आवाज पर अनावश्यक कब्जा ना करे। माध्यम आपन शैली बना सके, बाकिर शैली के नाँव पर भोजपुरी के जीवित क्षेत्रीय विविधता के अमानक घोषित करे से बचे। समय आ व्यापक भाषिक व्यवहार के आपन काम करे दिहल जाव। आज जहाँ स्वाभाविक विविधता बा, उहाँ जल्दबाजी में एकरूपता मत थोपीं। लिखित व्यवहार बढ़े दीं; समय, प्रचलन आ व्यापक स्वीकार्यता भविष्य के मानक रूप के राह साफ करिहें।
एहीसे हमार लिखल “भोजपुरी मानक वर्तनी” नियम ना हो के अनुशंसा रही जेहसे कि ओकरा पर विचार-विमर्श कइल जाव आ लिखनिहार अपना पसन्द के चुने ला स्वतंत्र त रहे बाकिर स्वछंद ना।

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