अपने-अपने युद्ध के तिसरकी कड़ी
- दयानंद पांडेय

अपने-अपने युद्ध के तिसरकी कड़ी

(दयानंद पांडेय के हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

(जानत बानीं कि रउरा पिछला कड़ी पढ़ लिहले बानी तबहियों इयाद करावल जरुरी लागल कि नइखीं पढ़लें त शुरुआत ओहिजे से करीं – अनुवादक)

कुछ अइसने-वइसने सोचत, सिगरेट फूँकत जब दोसरा दिन ऊ एन. एस. डी. के कैंटीन में पहुँचल त विभा दियासलाई के डिबिया कैरम के गोटी लेखा उछाल के गिलास में गोल करे वाला खेल खेलत चाय पियले जात रहली। आज खुशो रहली। ऊ संजय के विशो कइली आ परनामो। कहली, ‘‘चाय पीअब?’’
‘‘ना, हम चाय ना पीहीं।’’
‘‘अजीब बात बा, सिगरेट पिएनी आ चाय ना!’’ आ कान्हा उचकावत कहली, ‘‘कुछ अउरी मँगाईं का?’’
‘‘नो थैंक्यू। साँझ के कबो।’’
‘‘त ऊ साँझ नइखे आवे वाला।’’ कहत ऊ इतरइली आ उठ खड़ा भइली। संजय टोकलसि त कहली, ‘‘डायलॉग याद करे के बा आ रूम रिहर्सलो।’’

संजय आज विभा के खुश मिजाज देख के काल्हु का तरह फेर मौका ना चूके चाहत रहल। सिगरेट, जे ऊ अइसहीं कबो-कबो पियत रहल, फूँकत-झाड़त उनुका साथे-साथे हो लिहलसि।
चलत-चलत विभा कहली, ‘‘सुनले बानीं, रउरा एन. एस. डी. पर फीचर लिखत बानीं?’’
‘‘हँ।’’
‘‘कवना बात पर फोकस करत बानीं?’’
‘‘फोकस का, प्राब्लम फीचर हवे। मेनली सुसाइड।’’
‘‘का मतलब?’’ कहत विभा लगभग बिदक गइली।
‘‘कुछ मदद करब?’’
‘‘मतलब?’’
‘‘कुछ जानकारी….।’’
‘‘सॉरी। हमरा के माफ करीं। एह बारे में हम राउर कुछ मदद ना क सकीं।’’
‘‘देखीं, रउरा लखनऊ के हईं….।’’
‘‘त?’’ ऊ अजीब नजर से घुरली आ कहली, ‘‘रउरा एक्टिंग, नाटक, स्क्रिप्ट वगैरह का बारे में, इहाँ के पढ़ाई-लिखाई, रिहर्सल एटसेट्रा—आई मीन, एकेडमिक प्वाइंट्स, डिटेल्स—जाने के होखे त जरूर बताइब। फालतू बात मत बताइब।’’
‘‘राउर संगी मरत बाड़ें। आ रउरा एकरा के फालतू बतावत बानीं।’’
‘‘हँ।’’ कह के ऊ चलत-चलत रुक गइली। कहली, ‘‘हमरा खातिर ई तबो फालतू बा। हम इहाँ पढ़े आइल बानीं। एन. एस. डी. के पॉलिटिक्स डील करे ना।’’
‘‘बाकिर मुश्किल का बा?’’
‘‘मुश्किल ई बा कि हम रउरा के गंभीर किसिम के पत्रकार माने के भूल कइनी। राउर कुछ रिपोर्ट आ समीक्षा पढ़ले बानीं। बाकिर रउरा ‘मनोहर कहानियाँ’ ब्रांड रिपोर्टिंगो करेनी, ई ना जानत रहीं।’’ कहत-कहत ऊ चले लगली आ कहली, ‘‘गुडबाई कहीं?’’

संजय का साथे एगो दिक्कत हमेशे से ई रहल कि अगर ओकरा से केहू तनी तिरछा हो के बोले त ऊ ओकरा से अउरी तिरछा हो के कट जाव। चाहे ऊ लड़किए काहे ना होखे, चाहे संपादके काहे ना होखे। ओकर बापे काहे ना होखे। त जब विभा ओकरा से कहली कि, ‘‘गुडबाई कहीं?’’ त हालाँकि उनुका एह कहला में मिठास तिरत रहल, तबो संजय पसर गइल आ ‘‘यस, गुडबाई’’ कहे का बदले ‘‘हँ, गुडबाई!’’ कह के तुरन्त पलटल आ सिगरेट फेंकत अइसन चल दिहलसि, जइसे ऊ सिगरेट ना, विभा के फेंकले होखे आ उनुका के रउँदत चलल जात होखे। जाहिर बा, विभा के अइसन उमेद ना रहल।

‘‘सुनीं।’’ ऊ जइसे बुदबुदइली।
बाकिर संजय चिल्लाइल, ‘‘फेर कबो!’’ लगभग कैंटीन वाला अंदाज में। बाकिर ओकर बोली अतना करकस रहल कि दू-तीन गो एनएसडियन, जे ओनिए से जात रहलें, अचकचा के ठिठकलें आ ओकरा के घूरे लगलें।
विभा सकपका गइली। आ कमरा में भाग गइली। संजय रास्ता मुड़त कनखियन से ई देखलसि।

संजय फेर एन. एस. डी. ना गइल। चार-पाँच दिन हो गइल त ओह पत्रिका के संपादक फोन पर टोकलें कि, ‘‘एन. एस. डी. वाली रिपोर्ट अबले ना दिहलऽ?’’
संजय के बड़ा बुरा लागल।
दुसरके पल ऊ आपन फोन घुमावे लागल। सोचलसि, अब टेलीफोनिए रिपोर्टिंग काहे ना क डालल जाव। ऊ फटाफट एन. एस. डी. के चेयरमैन, डायरेक्टर समेत दू-तीन गो लेक्चरर के फोन मिलवलसि। बाकिर केहू फोन पर तुरन्त ना मिलल। बाकिर ऊ फोन पर जूझत रहल। आखिर थोड़ी देर बाद डायरेक्टर मिललें आ एक दिन बाद के समय देत कहलें, ‘‘रउरा बुझ सकत बानीं, फोन पर डिसकशन ठीक नइखे। इत्मीनान से भेंट करीं।’’

संजय के निदेशक के एह तरह बतियावल नीमन लागल। निदेशक शाह अपने एगो बढ़िया अभिनेता आ निर्देशक त रहबे कइलें, कुछ नाटको लिखले रहलें। मिललो बहुते प्यार आ अपनापा से। आधा घंटा के तय मुलाकात बतियावत-बतियावत कब दू घंटा से जादे में बदल गइल, दुनु के पते ना चलल।
एकदमे ना।
शाह बड़ी देर ले स्कूल के योजना, परियोजना, सिस्टम, इतिहास, तकनीक, रंगकर्मियन के लाचारी, बेरोजगारी, दर्शक घटला के समस्या, अल्काजी, शंभु मित्र आ कबो-कबो निवर्तमान निदेशक कारंत का बारे में बड़ी मन आ अपनापा से बतियावत रहलें। संजय उनुका बात में अतना अझुरा गइल कि मुख्य बात—छात्रन के आत्महत्या के सवाल—बहुते कोशिश का बावजूद बातचीत में शामिल ना क पावत रहल।

त का विभा के ‘मनोहर कहानियाँ’ वाला तंज ओकरा के तबाह कइले रहल? कि कुछ अउरी रहल? भा शाह के वाचन का वश में आ के ऊ आत्महत्या वाला सवाल के बाहर ले आवे का बदले भीतर धकेलले जात रहल? आखिर का रहल? शायद ई सब कुछ रहल, गड्डमड्ड। बाकिर तबे अनायास बात छात्रन के समस्या पर आ गइल त शाह तौल-तौल के कहे लगलें, ‘‘हम अपने एह स्कूल के छात्र रह चुकल बानीं। इहाँ पढ़वले बानीं। चिल्ड्रन एकेडमी का बावजूद जिनिगी इहँवे गुजरल बा, एहसे छात्रन के समस्या से खूब वाकिफ बानीं। आ रउरा देखब, जल्दिए कवनो समस्या ना रह जाई। एकदमे ना। बस बजट अतना कम बा कि का बताईं?’’ ऊ कहते रहलें कि संजय पूछिए बइठल, ‘‘बाकिर राउर छात्र आत्महत्या काहे कइले जात बाड़ें?’’

शाह एकदमे अचकचा गइलें। जइसे उनुका एह सवाल के उमेद ना रहल। शायद एहीसे ऊ अकादमिक बाते लगातार पसरवले जात रहलें। बाकिर आत्महत्या के सवाल पर ऊ सचहूँ जइसे हिल गइलें, ‘‘ई त हमनी के बच्चा हउवें!’’ शाह जइसे छटपटात रहलें। आ संजय गौर कइलसि कि उनुका एह छटपटाहट में अभिनय ना, कातरता रहल, असहायता रहल, आह रहल आ ऊ कठुआ गइल रहलें। साथहीं विह्वलो। ऊ भावावेश में संजय के अउरी नगीच आ गइलें। आ ‘‘ई हमरे बच्चा हउवें। हम एहनी का बीच बइठत बानीं, एक-एक गो के सुनत बानीं, समझत बानीं, वन बाई वन।’’ जइसन भावुक बात करत-करत अचानक जइसे उनुकर निदेशक पद जाग गइल, ‘‘देखीं, हमरा ई जिम्मेदारी सम्हरले अबहीं दू महीना भइल बा। आ ई आत्महत्या हमरा कार्यकाल में नइखी सँ भइल।’’ ऊ तनी रुकलें आ संजय का लगे से हटत कुरसी पीछे सरका लिहलें। कहलें, ‘‘तबो हम देखत बानीं। आई विल डू माई बेस्ट।’’ कह के ऊ अइसन साँस भरलें कि संजय बुझ गइल, अब ऊ अउरी बातचीत करे का मूड में नइखन। ऊ चले चाहत रहल आ निदेशक महोदयो चाहत रहलें कि अब ऊ फूटे। बाकिर एही बीच दुबारा कॉफी आ गइल। आ ‘‘ना-ना’’ कहतो ओकरा कॉफी पिए खातिर रुके के पड़ल। एह कॉफी के फायदा ई भइल कि आत्महत्या प्रकरण से गंभीर आ कसाइल माहौल के औपचारिक बातचीत तनी सहज कइलसि। अतना कि निदेशक महोदय ओकरा के बाहर ले छोड़ देबे अइलें। हँ, जे आदमी ओकरा के बाहर ले छोड़ देबे आइल रहल, ऊ शाह ना, निदेशके आइल रहल।

ई आत्महत्या प्रसंग के त्रासदी रहल।

बाहर आइल त देखलसि कि कुछ एनएसडियन निदेशक के कमरा का बाहर जमघट लगवले रहलें आ संजय के देखते सब के सब खिन्न हो उठलें। पता चलल कि ऊ सब करीब एक घंटा से ओहिजा खड़ा रहलें। आ निदेशक से मिले के उनुकर एप्वाइंटमेंट रहल। एहसे उनुकर खिन्नता संजय के समझ में आइल। ऊ सभका से माफी मँगलसि त ऊ सब बड़ी हिकारत से कहल लोग, ‘‘जाईं-जाईं।’’ आ एह भीड़ में वानी आ उपेंद्रो रहलें। एहसे संजय के तनी तकलीफ भइल। ऊ दुबारा ‘‘सॉरी, वेरी सॉरी’’ कहलसि आ बहावलपुर हाउस से बाहर आ गइल। बाहर निकलत-निकलत ऊ फेर मुड़ के रिपोर्ट के मरियल शीर्षको सोचलसि—‘‘बहावलपुर हाउस के भीतर के सच’’। साथहीं ईहो सोचलसि कि शीर्षक तय करे वाला ऊ साला होला के? सोचत-सोचत मन अतना कसैला भइल कि बस स्टॉप जाए का बदले बगल से जात ऑटो के रोक के बइठ गइल। पहिले त ऑटोवाला से आई. टी. ओ. चले ला कहलसि, बाकिर गोल चक्कर ले आवत-आवत कहलसि, ‘‘ना, इहँवे बंगाली मार्केट।’’ ऑटो के ड्राइवर, जे सरदार रहल, भुनभुनाइल। आ एगो भद्दा गारी बकलसि। त संजय डपटलसि, ‘‘गारी काहे बकत बाड़ऽ?’’ त ऊ खालिस पंजाबी लहजा में कहलसि, ‘‘तोहरा के थोड़े देत बानीं, अपना नसीब के देत बानीं। नसीबे खोट्टा बा जी हमार।’’ संजयो अपना पर भुनभुनाइल कि दू कदम के दूरी खातिर ऑटो लेबे के का जरूरत रहल। बेकारे पइसा बरबाद करे खातिर।

अलका-अजय का घरे जब पहुँचल त अजय ना रहल। बाकिर अलका रहली। गजरा बन्हले, इत्र लगवले चहकली, ‘‘भीतर आ जाईं। अजय अबहीं आवते होखिहें।’’ ऊ भीतर जा के सोफा का बदले मोढ़ा पर बइठ गइल। अलका कॉफी खातिर पूछली त संजय मना क दिहलसि। जब दुबारा कॉफी के रट लगवली त कहलसि, ‘‘ना, अबहीं पी के आवत बानीं।’’ तबो अलका ना मनली, शिकंजी बना ले अइली। शिकंजी पियत संजय चहकत अलका से पूछिए बइठल, ‘‘आज कवनो खास बात बा का?’’
‘‘ना त!’’ कहत ऊ चोटी से लटकत गजरा हाथ में ले लिहली।
‘‘ना, कुछ त बात बा।’’
‘‘ना, कुछ खास नइखे।’’ कहत ऊ तनी सकुचइली।
‘‘खास ना सही। अइसहीं सही?’’
‘‘रउरा त बस पिछवे पड़ जाइले।’’ कहत ऊ उठली त कलफ लागल साड़ी फड़फड़ा उठल। अलका के साड़ी के रंग, ओकरा पर कलफ, गजरा, फेर इत्र आ एह सबसे ऊपर उनुकर मोहकता—सब मिल-जुल के अइसन कोलाज रचत रहल कि सब कुछ सामान्य ना लागत रहल। हालाँकि अलका के मोहकता में हरदम सौम्यता झलके, उनुकर सुन्दरता में सादगी समाइल रहे आ चाल में सलीका। आजो ई सब कुछ रहल, बाकिर एह सबका साथे, हाशिए पर सही, भावुक आ कामुक शोखियो आज अलका के अंग-अंग से अइसन फूटत रहल कि नीरज के लिखल ऊ फिलिमी गीत संजय के जबान पर आ गइल। ऊ अपनी आँख में इसरार भरलसि आ अलका से कहलसि, ‘‘आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन! गीत त रउरा सुनले होखब?’’
अलका के संजय से अइसन सवाल के उमेद ना रहल, एहसे चिहुँक के कहली, ‘‘का?’’ आ लजा गइली। कहली, ‘‘असल में हम आ अजय आजुए का दिन मिलल रहीं जा।’’
‘‘त आज मैरिज एनिवर्सरी बा?’’
‘‘ना-ना।’’ ऊ इठलइली, ‘‘माने, पहिला बेर भेंट भइल रहल।’’
‘‘अच्छा-अच्छा।’’ कहत संजय आँखि चाकर कइलसि आ होंठ गोल।
‘‘बाकिर प्लीज, रउरा अजय से एकर चरचा मत करब।’’
‘‘काहे? आज त बीयर का, कॉकटेल ओकरा ओर से।’’
‘‘ना, आज ई सब ना। आ देखीं, फेर कहत बानीं कि अजय से रउरा एकर चरचा ना करब।’’ अलका हुकुम देबे वाला लहजा में कहली।
‘‘बाकिर काहे?’’ संजय उदासी के रंग जमावत बुदबुदाइल।
‘‘ऊ एहसे कि देखल चाहत बानीं, अजय के ई दिन इयाद बा कि ना।’’
‘‘ओह! त हमरा फूटे के चाहीं।’’
‘‘काहे?’’ ऊ अचकचइली।
‘‘अरे भाई, महाराज जी वाला हश्र हमरा इयाद बा।’’
‘‘धत्, रउरो का बात ले बइठनी। आ रउरा ओइसन थोड़े हईं।’’ कहत जइसे ऊ अपनहीं के निश्चिन्त करत रहली।
‘‘हईं त ना। काहे कि हमरा नृत्य ना आवे। आ कथक के मुद्रा त एकदमे ना। बाकिर ई मत भुलाईं अलका जी कि हमहूँ पुरुष हईं। आ पुरुष के मानसिकता केहू ना बदल सके।’’ कहत संजय गंभीर होखे लागल। आगे अबहीं ऊ पुरुष मानसिकता पर अलका के अउरी ज्ञान देबे चाहत रहल। बाकिर अलके ब्रेक लगा दिहली, ‘‘बस-बस! अजय नइखन, एहसे रउरा अपनी रजनीशी फिलासफी पर विराम लगाईं। काहे कि हम एह पुरुष मानसिकता वाली बहस में अझुरा के आपन मूड ऑफ ना कइल चाहत बानीं।’’
‘‘आखिर महिला मनोविज्ञान काम करिए गइल नू! आ क गइनी पलाबो।’’
‘‘ई पलाबो का हवे?’’ ऊ तनी खीझली।
‘‘पलाबो!’’ ऊ कहलसि, ‘‘का बा कि एगो चुटकुला हवे।’’
‘‘त सुनाईं एकरा के। कि मूड साफ होखे। सगरी मूड ऑफ क दिहनी।’’
‘‘हद हो गइल। हम राउर सुन्दरता के तारीफ करत बानीं। आ तबो राउर मूड ऑफ होत बा। त हम त चलब।’’ कहत संजय उठे लागल त अलका लगभग नृत्य मुद्रा में आ गइली। जइसे शिव के तांडव करे जात होखसु। बाकिर दुसरके पल ना जाने का भइल कि बड़ी नरमी से संजय के हाथ पकड़ के बइठा दिहली आ कहली, ‘‘यस पलाबो!’’

उनुका छुअन में अतना मादकता रहल कि संजय के मन भइल, अलका के पकड़ के चूस लेव। बाकिर ओकरा अजय के धेयान आ गइल। नैतिकता के धेयान आ गइल। एगो पुरान कहावत इयाद आ गइल कि ‘‘डायनो सात घर छोड़ देले।’’ हालाँकि अलको ओकर दोस्त रहली। बाकिर अजयो दोस्त रहल। आ संजय अतना नैतिकता त निभावल जानत रहल। हालाँकि देह-संबंध का मामला में ऊ ऊपरे-ऊपर एह तरह के नैतिकता के मापदंड स्वीकार ना करत रहल आ रजनीश दर्शन के कायल रहल, बाकिर भीतरी आ पारिवारिक संस्कार तबो आड़े आ जात रहलें। इहँवो आ गइलें। फेर सोचलसि कि अलका आज ओकरा सुन्दर लागत बाड़ी आ अगर उनुका के चूमे के ओकर इच्छा अतने प्रबल बा त अबहीं जब अजय आ जाई त ऊ अजय से कह दी कि भाई, आज अलका बहुते सुन्दर लागत बाड़ी आ हम उनुका के चूमल चाहत बानीं। एकदमे नैसर्गिक सौन्दर्य लेखा। आ ऊ जानत रहल कि अजय खुशी से ओकरा के चूमे दी, मना ना करी। सपनो में ना।
बाकिर का अलको एह तरह ओकरा के चूमे दिहें?

संजय सोचलसि। एह परो सोचलसि कि का जइसन ऊ अबहीं सोचत बा, ओइसहीं निश्छल हो के अजय से सचहूँ कह पाई कि ‘‘हम अलका के चूमल चाहत बानीं।’’ आ अगर सब कुछ ओइसहीं हो जाव जइसन ऊ सोचत बा, त एह बात के का गारंटी कि काल्हु ओकर अलका का साथे सूते के इच्छा ना हो जाव? परसों कहे कि, ‘‘चलऽ, तू हटऽ, कहीं अउरी जा के रहऽ। अब इहाँ हम अलका का साथे रहल चाहत बानीं।’’

का पता?

कुछुओ हो सकेला। आ सहसा संजय के अपना पर, अपनी एह सोच पर अतना लाज आइल कि लागल, फिलहाल ओकरा कहीं चुल्लू भर पानी खोजे के चाहीं आ ओह में डूब मरे के चाहीं। ऊ इहे सब सोचत रहल कि अलका पहिले उदास हो के, फेर बिंदास हो के कहली, ‘‘यस-यस पलाबो।’’ आ सोफा से उठ के दोसर मोढ़ा ले के संजय के एकदमे सोझा आ के बइठ गइली। व्यंग्य के लहजा में कहली, ‘‘लेबिल बराबर क दिहले बानीं। अब त कवनो दिक्कत नइखे।’’ ऊ बेफिकिर हँसत फेर उच्चारे लगली, ‘‘यस-यस पलाबो।’’ दोहरवली आ तनी जोर से, ‘‘ओह यस!’’ एकदमे ठसका का साथे। उनुका हाथ में बाल में गुँथाइल गजरा फेर खेले लागल रहल। आ ऊ रह-रह के ‘‘यस-यस पलाबो’’, ‘‘ओह यस’’ जइसन शब्द उच्चारत कहत जात रहली, ‘‘अब त लेबिल में आ गइल बानीं भई।’’
‘‘लेबिल’’ आ ‘‘ओह यस’’, ‘‘ओह यस’’ कह-कह के ऊ जइसे संजय के मन सुलगवले जात रहली। मन के भीतरे-भीतर ओकर नैतिकता के देवाल रह-रह ढहत रहल, रह-रह गिरत रहल, दुष्यंत कुमार के तर्ज पर—‘‘मैं इधर से बन रहा हूं, मैं इधर से ढह रहा हूं।’’

‘‘लेबिल’’ में त अइसन कवनो बात ना रहल। अकसर संजय आ अजय पियत-पियत चउथा-पाँचवा पेग का बाद एह ‘‘लेबिल’’ पर आ जात रहलें। संजय कबो अजय से कहे कि ‘‘तोहार कम बा’’, त कबो अजय संजय से कहे कि ‘‘तोहार कम बा’’। त ‘‘लेबिल’’ में ले आवे के बात चले। आ अन्त में दुनु गिलास मिला के ‘‘लेबिल’’ अलका तय करस। काहे कि दुनु एक-दोसरा से कहे लोग, ‘‘तोहरा चढ़ गइल बा’’, ‘‘तू साला बदमाशी करत बाड़ऽ।’’ आ एक बेर त अजय हद क दिहलसि। ऊ चीख के कहलसि, ‘‘अलका! तू संजय के फेवर करत बाड़ू।’’ सुन के संजय त चौंकबे कइल, आम बातचीत में अंगरेजी ना बोले वाली अलको चीख पड़ली, ‘‘ह्वाट यू मीन?’’ त अजय आधा सुर में आ गइल, ‘‘तनी तूहूँ आधा सुर कम क लऽ आ लेबिल में आ जाऽ।’’ कह के हँसल, ‘‘संजय के गिलास में कम बा आ तू लेबिल में बतावत बाड़ू।’’
अलका तबो ना मनली आ कहत रहली कि ‘‘लेबिल में बा!’’ बाकिर अजयो माने वाला ना रहल। ऊ चम्मच मँगवलसि आ चम्मच-चम्मच ह्विस्की नपवलसि। सचहूँ संजय के गिलास में चार भा पाँच चम्मच ह्विस्की कम निकलल। आ अजय घूरत अलका का ओर देखलसि आ कहलसि, ‘‘यस मैडम?’’
अलका जइसे सफाई देबे पर उतर अइली। कहे लगली, ‘‘ऊ त एहसे कि हम जानत बानीं, इनका दूर जाए के बा। सही-सलामत घर पहुँच जास, अउर का?’’ ऊ बिफरली, ‘‘त एह में फेवर का हो गइल?’’

संजय देखलसि, तनिका-सा बातचीत दुनु का बीच झगड़ा में बदलत बा। पहिले सोचलसि, अब फूटे। बाकिर ना जाने का भइल कि बोल पड़ल, ‘‘तू लोग के चिकचिक से हमार सगरी नशा काफूर हो गइल। अब एगो पटियाला अउरी बनावल जाव।’’ फेर त ओह दिन जे पटियाला पेग चलल त रात के दू बज गइल। आ ऊ दुनु तबे उठलें जब बोतल दगा दे दिहलसि। माने, पूरा डेढ़ बोतल दुनु डकार लिहले रहलें।

‘‘त चलत बानीं भई।’’ कह के संजय उठल आ दरवाजा ले पहुँचत-पहुँचत लुढ़क के गिर पड़ल। अलका दउड़ के उठवली आ बुदबुदइली, ‘‘अतना पिए के का जरूरत रहल?’’ ऊ जइसे नाराज रहली। लाख नशा का बावजूद संजय अपना एह लुढ़कला पर बहुते लजाइल। ऊ जल्दी से जल्दी ओहिजा से भाग लिहल चाहत रहल। बाकिर गोड़ रहे कि भागे चाहते ना रहे। भा शायद चाहलो पर भाग ना पावत रहे। जवन होखे, ऊ तनिके दूर गइल कि पीछे से अजय ‘‘संजय-संजय’’ पुकारत मिलल। संजय रुक के ओहिजे सड़क पर बइठ गइल। पालथी मार के। अजय हँफत आइल आ ऊहो ओहिजे पालथी मार के बइठ गइल। संजय कुछ नशा में, कुछ भावुकता में कहलसि, ‘‘का बात बा डियर?’’
‘‘तोहरा के अकेले ना जाए देब। तोहार हालत ठीक नइखे। हम पहुँचा देत बानीं। उठऽ!’’ अजय बाँह पकड़ के संजय के उठावे लागल।
‘‘ना, हम चल जाइब।’’
‘‘हम छोड़ आवत बानीं। तू एक मिनट घर चलऽ।’’
‘‘एगो पेग अउरी ना मिल सके कहीं से?’’ अजय का घरे लवट के ऊ कहलसि, ‘‘बस एगो पेग!’’ कहत ऊ फेर ढप से फर्शे पर बइठ गइल।

अबले अलका एकदमे बोर हो गइल रहली। आ अजय उनुका से लैंब्रेटा के चाभी पूछत रहल, ‘‘कहाँ बा, बता त सही।’’ आ अलका के कहनाम रहल कि एक त छोड़े मत जाऽ। दोसरे, अगर जइबऽ त स्कूटर से एकदमे ना। ना त दुनु जने मर जइबऽ। बाकिर अजय मानत ना रहल। अचानक अलका धम-धम करत संजय का लगे अइली, आ जाहिर बा कि धम-धम करत कवनो नृत्य मुद्रा में ना आइल रहली। धम-धम अन्दाजे में बुदबुदइली, बउराइल, ‘‘तू त कुँवार बाड़ऽ, बाकिर हमरा के काहे विधवा बनावे पर तुलल बाड़ऽ?’’ सुनते जइसे संजय के साँप सूँघ गइल। आ ऊ ‘मुगले आजम’ के पृथ्वीराज कपूर वाला अन्दाज में ऐलान क दिहलसि कि ‘‘ऊ अजय का साथे ना जाई। आ जइबो करी त स्कूटर से एकदमे ना।’’

अजय पर एह ऐलान के असर पड़ल। ऊ पायजामा उतार के जींस पहिनलसि, हवाई चप्पल उतार के कोल्हापुरी पहिनलसि आ बाहर आ गइल। दरवाजा बन्द करत अलका कहली, ‘‘संजय, तू इहँवे काहे नइखऽ सूत जात? एह तरह गइला से त नीमने रहित!’’ बाकिर संजय अलका के बात अनसुन करत अजय से पूछत रहल, ‘‘एगो पेग अउरी कहीं से ना मिल सके?’’ कहत ऊ लगभग लहरात रहल आ बोलत रहल, ‘‘प्लीज! एगो पेग!’’ ओकर एक-एक शब्द में नशा रहल। आ अजय कहले जात रहल, ‘‘मिली डियर, मिली, एक ना दू पेग।’’

‘‘जाऽ, अब तू दुनु लेबिल में बाड़ऽ।’’ कहत अलका भड़भड़ा के दरवाजा बन्द क लिहली। हालाँकि ओह रात तुरन्त ओहिजा कवनो सवारी ना मिलला का चलते ऊ दुनु कहीं ना गइलें। लगहीं सड़क पर एगो बिजली के खंभा से पीठ टिकवले दुनु बइठल सिगरेट फूँकत रहलें। आ नाटक, शायरी, सेक्स, बचपन आ आखिर में आपन-आपन बेचारगी बतियावत-बतियावत दुनु ओहिजे भोर क दिहलें।

ओह रात अजय बड़ी देर ले मैकबेथ के डायलॉग सुनावत रहल, कई-कई अंदाज में। डायलॉग सुनत-सुनत संजय दुष्यंत कुमार के शेर सुनावे लागल। फेर ना जाने कब फिलिमी गाना पर बात आ गइल आ दुनु गावे का, गुनगुनाए लगलें। एक बेर हेमंत के गावल कवनो गीत पर झगड़ा हो गइल कि साहिर लिखले बाड़ें कि शैलेंद्र। झगड़ा निपटत ना रहल कि संजय फेर एगो गीत छेड़ दिहलसि, ‘‘न हम तुम्हें जाने न तुम हमें जानो मगर लगता है कुछ ऐसा, मेरा हमदम मिल गया।’’ बाकिर एह गानो पर झगड़ा बनल रहल कि फीमेल वॉयस सुमन कल्याणपुर के हवे कि लता मंगेशकर के? आ बात सेक्स पर आ गइल। दुनु आपन-आपन किस्सा बतावे लगलें। जाहिर बा, अजय का लगे सेक्स के अनुभव जादे रहल। ऊ एगो अफसर के बीवी का बारे में बतावे लागल, जवना के एक्टिंग के शौक रहल। कि कइसे जब ओकर हसबैंड बाहर टूर पर जाए त ऊ ओकरा के बोलवा भेजे। आ ओह तीन-चार घंटा में जबले ऊ तीन-चार बेर सवार ना होखे, ऊ छोड़े ना। साली एकदमे चूस लेव। संजय एह पर बिदकल, ‘‘बड़ चूतिया बाड़ऽ। तू तीन-चार घंटा में तीन-चार बेर ओकरा पर का चढ़त रहलऽ, लागता जइसे एहसान करत रहलऽ। अरे, हमरा से कहतऽ, हम एके घंटा में तीन-चार बेर चढ़ जइतीं।’’ सुन के अजय कहलसि, ‘‘बेटा, जब बियाह हो जाई तब बुझबऽ। अबहीं जबाने-जबाने एक घंटा में तीन-चार बेर जवन करत बाड़ऽ, ऊ तीन-चार दिन में एक बेर हो जाई।’’

बाकिर संजय ई माने के तइयार ना रहल। ऊ आपन अनुभव बखनलसि कि ‘‘आधे घंटा में तीन गो अटेंप्ट ले चुकल बानीं। आ कम से कम अइसन छव-सात चांस।’’
अजय हँसल, ‘‘त बस कबड्डी-कबड्डी। गइल आ आइल। आइल आ गइल।’’ तनी रुकल आ कहलसि, ‘‘ई कब के बात करत बाड़ऽ तू? पन्द्रह-सोलह बरीस के उमिर के त ना?’’
‘‘एक्जैक्टली।’’
‘‘हँ, उहे त कहीं। त अब क के देखऽ।’’
‘‘केहू मिले तब नू।’’
‘‘अच्छा, त एहीसे एन. एस. डी. के फेरा मारत बाड़ऽ?’’ घूरत अजय हँसल।
‘‘ना-ना, ओहिजा त बस प्रोफेशनली।’’
‘‘त ठीक बा। ना त मर जइबऽ साले।’’ फेर ना जाने ओकरा का सूझल कि ब्लू फिलिमन के फ्रेम पर बतियावत-बतियावत बतावे लागल कि ऊ दू-तीन बेर अलको के ब्लू फिलिम देखा चुकल बा। घरे पर वी. सी. आर. भाड़ा पर ले आ के। आ ऊ खूब बारीकी वाला ब्यौरा में उतर गइल कि शुरू में अलका कइसे सकुचइली। पहिले त चद्दर से मुँह ढाँक लिहली। फेर धीरे-धीरे देखे लगली। देखत-देखत अमलो करे लगली। पहिले ‘‘सक’’ ना करत रहली, अब ‘‘सकिंग’’ में हमरा से जादे उनुका मजा आवेला। आ त आ, क्लाइमेक्स का घरी ब्लू फिलिमन के मेहरारुअन लेखा बाकायदा ‘‘ओह यस, ओह यस’’ करतो रहेली। बतावत-बतावत अजय कहे लागल, ‘‘सच डियर, सेक्स लाइफ के मजे बढ़ गइल बा।’’
‘‘अच्छा!’’ संजय ठेका लगवलसि।
‘‘बाकिर यार, एक बेर एगो झंझट हो गइल।’’
‘‘का?’’ संजय चकित हो के पूछलसि।
‘‘एक दिन अलका पूछे लगली, तोहार छोट काहे बा?’’
‘‘का मतलब?’’
‘‘पेनिस।’’
‘‘अच्छा-अच्छा। त सचहूँ छोट बा तोहार?’’
‘‘ना भाई।’’ ऊ तनी रुक के पीठ खुजवावे लागल आ बोलत रहल, ‘‘पहिले त उनुकर सवाल सुन के हमहूँ चौंक गइनी। बाकिर दुसरके पल ठिठोली सूझल आ पूछ लिहनी कि कतना बड़-बड़ झेल चुकल बाड़ू। त ऊ लजा के हमरा से लिपट गइली आ कहली, ‘धत्।’ ’’
‘‘फेर का भइल?’’ संजय उत्सुकता से पूछलसि।
‘‘होखे के का रहल। खूब कुरेदला पर कसम खाए लगली कि केहू के नइखी देखले, ना उनुका अइसन कवनो अनुभव बा।’’ अजय अब जाँघ खुजवावे लागल रहल, ‘‘त हम डपट के पूछनी कि फेर तोहरा कइसे पता चलल कि हमार छोट बा?’’ ऊ रुकल आ संजय के निनियाइल, अलसाइल, नशाइल आँख में झाँक के कहलसि, ‘‘जानेलऽ, ऊ का जवाब दिहली?’’
‘‘का?’’
‘‘ऊ एकदमे मासूम हो गइली आ शरमात-सकुचात कहली, ब्लू फिलिमन से। ऊ कवनो हब्शी के देखले रहली।’’
‘‘ओह यस!’’ जोर से बोलत संजय तब ठहाका लगवले रहल।
संजय के ठहाका का साथहीं पौ फाट गइल रहल।

‘‘बहुते दिन बाद अइसन भोर देखत बानीं।’’ संजय कहलसि त अजय हामी भरलसि, ‘‘हमहूँ।’’ चलत-चलत संजय अजय से ठिठोली कइलसि, ‘‘घबराऽ मत। अइसन होला आ संजोग से हमार बड़ बा।’’ कहत मजाकिया भइल, ‘‘जरूरत पड़े त कह दीहऽ। बंदा तइयार मिली।’’ अजय संजय के बात मजाके में लिहलसि, ‘‘भाग साले, कबड्डी-कबड्डी। तोहार त….।’’ संजय मजाक चालू रखलसि आ अजय से कहलसि, ‘‘जादे मायूस मत होखऽ। अइसन बहुते लोग का साथे होला। लऽ, एही बात पर एगो सरदार वाला चुटकुला सुनऽ।’’
‘‘सुना, का हवे?’’
‘‘सच।’’
‘‘हँ, सुना डालऽ।’’ कहत अजय बहुते जोर से हवा छोड़लसि। जइसे केहू कपड़ा के थान फाड़त होखे।

संजय के मूड ऑफ हो गइल। काहे कि रात भर त रह-रह के अजय थान फाड़ते रहल, अब चलत-चलतो भोर बिगाड़ दिहलसि। हालाँकि रात भर रह-रह के या त अजय हवा छोड़ के मूड ऑफ करे, भा आवत-जात रेलगाड़ी। अजय त खैर इहँवे घर होखला का चलते एह रेलगाड़ियन के आवल-जावल के आदी रहल, बाकिर संजय के रह-रह के ई आवत-जात रेलगाड़ी बहुते डिस्टर्ब करत रहली सँ। अतना कि अनायास ओकरा एम. के. रैना के ऊ किरदार इयाद आ गइल, जे ऊ रमेश बक्षी के कहानी पर बनल ‘27 डाऊन’ फिलिम में कइले रहलें। जवना में ऊ किरदार अपना भइँस लेखा पगुरात बीवी से पिंड छोड़ावे खातिर लगातार भागत रहल बा आ ओकर सगरी तनाव चलत रेलगाड़ी के गड़गड़ाहट में गूँजत रहल बा। फिलिम के ई पूरा फ्रेम अतना बढ़िया बनल रहल कि सचहूँ दर्शको ओह तनाव के आँच ओतने तीखाई से महसूस क सके। बाकिर बंगाली मार्केट में रेल के पटरी का लगे एह सुनसान सड़क पर आवत-जात रेलगाड़ी तनाव ना, मन में खीझ भरत रहली सँ। ओह पर अजय के रह-रह के हवा छोड़े के ई आदत! संजय सोचे लागल कि लोग अतना बेशर्मी से सभका सोझा कइसे पाद लेला? आ अजय के ई आदत बेचारी अलका कइसे बर्दाश्त करत होखी? ओकरा अपना से जादे अलका के परेशानी के चिन्ता भइल। कि उनुका एह कमबख्त का साथे रात-दिन गुजारे के पड़ेला। दाढ़ी त बेचारी झेल लेत होखी, बाकिर ई पादल? अबहीं संजय एह चिन्ता में दुबराइले जात रहल कि अजय टिपियवलसि, ‘‘अबे, सरदार वाला किस्सा सुना नू?’’

‘‘किस्सा ना, चुटकुला! बाकिर बा नॉनवेज।’’
‘‘उहे-उहे।’’ ऊ जोड़लसि, ‘‘त प्रोसीड!’’
‘‘त सुनऽ।’’ कहत ओकर मन भइल कि ऊहो जोर से पाद दे। बाकिर अइसन ना क पावल। करियो ना सकत रहल। एहसे कहलसि, ‘‘एगो सरदार जी के बियाह भइल। विदाई का बाद भोर में दुलहिन ले के घरे अइलें। घर में भीड़ बहुते रहल, बाकिर बीवी से मिले ला बेताब सरदार जी ई जुगत निकाललें कि बीवी के बाजार घुमा ले आवसु। त बाजार में बीवी के हाथ में हाथ धइले घूमत रहलें। एगो जगहा उनुका तनी मजाक सूझल। पैंट के दुनु जेब ब्लेड से काट दिहलें। आ सरदारनी से जेब में हाथ डाले ला कहलें। सरदारनी जेब में हाथ डलली त जेब फाटल रहल, एहसे सीधे ‘उहे’ हाथ में आ गइल। सरदार जी के मजा आ गइल। फेर सरदार जी के सरदारनी पर रौब गाँठे के सूझल। ऊ शरमात दोसरो जेब में हाथ डलवा दिहलें। आ फेर उहे ‘घटना’ भइल। सरदार जी सरदारनी पर रौब जमावत कहलें, ‘देखलू, दू-दू गो बा।’ सरदारनी शरमा के चुन्नी होंठ में दाब लिहली। एह तरह सरदार जी सरदारनी पर रौब त गाँठ लिहलें। बाकिर दुसरके पल उनुका रात के चिन्ता सतावे लागल। कि रात में सरदारनी के कहाँ से दू-दू गो देखइहें?’’
‘‘फेर का भइल?’’ अजय जम्हाई लेत पूछलसि।
‘‘साले, सुनऽ त सही। अब तोहरे वाला मामला आवत बा।’’
‘‘का मतलब?’’
‘‘पूरा चुटकुला सुने के होखे त सुनऽ, ना त हम चलीं।’’ संजय अजय पर धौंस जमवलसि।
‘‘ना-ना, सुनावऽ। अब ना बोलब।’’
‘‘त सरदार जी परेशान त रहबे कइलें कि रात में सरदारनी के दू-दू गो कहाँ से देखइहें। तबले उनुकर दोस्त एगो दोसर सरदार बाजार में लउक गइल। ऊ ओकरा के बोलवलें। ऊ पहिलहीं से सरदार जी से कुछ पइसा उधार ले रखले रहल। एहसे सरदार जी के रौब में भागल-भागल आइल। सरदार जी ओह दोसरा सरदार के सरदारनी से तनी दूर एगो कोना में ले गइलें। आ लगलें हड़कावे। ऊ हाथ-पाँव जोड़े लागल। सरदार जी के काम हो गइल रहल। एहसे ओकरा के बख्श के सरदारनी का लगे आ गइलें। सरदारनी पूछली, ‘की गल है?’ सरदार जी बड़ी मासूमियत से सरदारनी के बतवलें, ‘आपन यार हवे। हमरा लगे जवन दू गो बा, ओकरा लगे एको नइखे। त एगो माँगत रहल।’ त सरदारनी पूछली, ‘तू का कइलऽ?’ सरदार जी कहलें, ‘करे के का रहल, यार हवे, मदद क दिहनी। एगो ओकरा के दे दिहनी।’ सरदारनी कहली, ‘बड़े रहमदिल हईं जी रउरा।’ आ मुसका के चुन्नी फेर होंठ से दाब लिहली।’’ कह के संजय तनी रुकल त अजय कहे लागल, ‘‘एह में चुटकुला का भइल?’’
‘‘अबे, अबहीं खतम कहाँ भइल बा?’’ संजय कहलसि।
‘‘बड़ा लमहर बा?’’
‘‘हँ। आ चुपचाप सुनऽ, अब खतम होखे वाला बा। बोलिहऽ मत।’’
‘‘हँ, सुनावऽ भाई।’’
‘‘त सरदार जी के बिजनेस रहल।’’ ऊ रुकल आ कहलसि, ‘‘तोहरे लेखा।’’ आ दुनु हँसलें।

फेर संजय कहलसि, ‘‘सरदार जी एक बेर बिजनेस टूर पर गइलें। बहुते दिन हो गइल, लवटलें ना। ऊपरे से फोन क-क के सरदारनी के सतावत रहस। सरदारनी के सरदार जी के तलब लागे लागल। एही बीच एक दिन ऊ दोसरका सरदार जी, जे पहिले बाजार में मिलल रहलें, इनुका घरे अइलें। सरदारनी के लागल, मौका बढ़िया बा। आ इनुका लगे जवन बा उहो त अपने सरदार जी के हवे। कवनो हरज नइखे। एहसे ऊ दोसरा सरदार का साथे स्टार्ट हो गइली। अब ई दोसरका सरदार जी सरदारनी के सेवा में रोज आवे लगलें। कुछ दिन बाद सरदारनी के असली सरदार बिजनेस टूर से लवट अइलें। रात में सरदारनी का साथे एने-ओने के जब हाँके लगलें त सरदारनी से रहल ना गइल। ऊ सरदार से कहली, ‘जी, तू निरा बेवकूफ हउवऽ। बिजनेस का करबऽ?’ सरदार जी भौंचक्क रह गइलें। कहलें, ‘भइल का?’ सरदारनी कहली, ‘तोहरा से बड़ बेवकूफ के होई जी। तू आपन बड़ सामान त दोस्त के दे देलऽ आ छोटका से आपन काम चलावेलऽ।’ ’’

‘‘ओह यस!’’ सुन के अजय झूम गइल। कहलसि, ‘‘मजा आ गइल।’’
‘‘त चलीं? कि अबहियो तोहार एकाध बम बाकी बा?’’
‘‘ना-ना, जाऽ।’’ अजय झेंपत कहलसि, ‘‘अब भोर हो गइल बा।’’ भोर सचहूँ हो गइल रहल।
‘‘ओह यस!’’ जब अलका फेर कहली त संजय के मुँह से अनायास निकल गइल, ‘‘ह्वाट?’’
‘‘यस पलाबो।’’ ऊ चहकली।
‘‘अच्छा-अच्छा।’’ कह के ऊ कहलसि, ‘‘पहिले एगो शिकंजी अउरी हो जाव?’’
‘‘हँ-हँ, बिलकुल।’’ आ अलका शिकंजी बनावे लगली।

संजय सोचे लागल कि अलका के हो का गइल बा। जे बेर-बेर ‘‘ओह यस, ओह यस’’ उच्चारत बाड़ी, बेझिझक आ ओही ब्लू फिलिम वाला अंदाज में। का ऊ ओकरा के नेवता देत बाड़ी? ऊ सोचलसि। बाकिर अपनी सोच पर ओकरा फेर लाज आइल आ घिनो। मनहीं-मन कहलसि, ना, अलका अइसन नइखी। चीप आ चालू नइखी। ऊ सोचलसि। फेर ईहो सोचलसि कि का पता, अजय के सचहूँ ‘‘छोट’’ होखे। बहुते छोट। हो सकेला। कुछुओ हो सकेला। बाकिर अलका तबो अइसन ना हो सकसु।

‘‘लीं।’’
‘‘आयं।’’ संजय चिहुँकल। अलका शिकंजी के गिलास लिहले खड़ा रहली। संजय गिलास ले लिहलसि आ अलका ‘‘ओह यस’’ भा ‘‘यस पलाबो’’ कहसु कि संजय चुटकुला शुरू क दिहलसि, ‘‘मिलेट्री में सिख रेजीमेंट के नाम त सुनले होखब।’’ ऊ कहबे करत रहल कि अलका पीछे मुड़ली आ संजय के नजर अनायास उनुका नितंब पर पड़ गइल। अब त ऊ एकदमे पीछे से पकड़ के चूम लिहल चाहत रहल, बाकिर अलका तबले फेर मुड़ के मोढ़ा पर बइठे लगली। बइठत बड़ी बेमन से कहली, ‘‘सरदारन वाला चुटकुला हवे त रहे दीं। अजय के सुनाइब।’’
‘‘काहे?’’ संजय के आँख में इसरार रहल।
‘‘अइसहीं।’’ ऊ झिझकत कहली।
‘‘ना-ना, घबराईं मत। ई नॉनवेज नइखे। आ सरदारन वाला मिजाजो नइखे।’’ संजय ललचाइल नजर से उनुका के देखत कहलसि। ऊ ई त बुझिए गइल रहल कि अजय अलका के ऊ सरदार जी वाला चुटकुला सुना चुकल बा। आ ईहो बुझ गइल रहल कि अजय ईहो बता रखले बा कि संजय सुनवले बा। एह बीच ऊ देखलसि, अलका तनी असुरक्षित महसूस करत बेर-बेर पल्लू खींचले जात बाड़ी। उनुकर गजरो एह फेर में गड़बड़ाइले जात रहल। संजय बुझ गइल कि अलका ओकरा ललचाइल नजर के मतलब बुझ गइल बाड़ी। एहसे ऊ अपनी गंभीरता के ठंढा खोल में लवट आइल। निर्विकार भाव से चुटकुला शुरू कइलसि, ‘‘बीच लड़ाई में सिख रेजीमेंट के कमांडर अपनी सिख बटालियन से बिछुड़ गइल। खोजत-खोजत बंगाल रेजीमेंट से जा मिलल। ओने बंगाल रेजीमेंट से ओकर कमांडरो बिछुड़ गइल रहल। त तय भइल कि सिख रेजीमेंट के कमांडर बंगाल रेजीमेंट के कमान सम्हार लेव। आ लड़ाई में आम तौर पर कमांडर बटालियन का पीछे रहेला। आ आगे के पोजीशन पूछत जरूरी आदेश देत रहेला। इहँवो इहे भइल। सिख रेजीमेंट के कमांडर पीछे से लगातार दुश्मन के पोजीशन पूछत रहे। बंगाल रेजीमेंट के जवान लगातार दुश्मन के पोजीशन बतावस आ पूछ लेस, ‘पलाबो?’ सिख रेजीमेंट के कमांडर के बंगाली ना आवत रहल। एहसे ऊ मनहीं-मन सोचलसि, हो ना हो, पलाबो के मतलब फायरिंग होखे। त जब जवान बतावस, ‘दोसमन, दोसमन एक हजार मीटर! पलाबो?’ त कमांडर बोले, ‘नो पलाबो।’
‘‘ ‘दोसमन, दोसमन पाँच सौ मीटर, पलाबो?’ जवान बतावस आ कमांडर कहे, ‘नो पलाबो।’ सिलसिला चलत रहल। आखिर जब जवान कहले, ‘दोसमन, दोसमन सौ मीटर, पलाबो?’ त कमांडर कहलसि, ‘यस पलाबो!’ आ कमांडर के ‘यस पलाबो!’ कहल भर रहल कि सगरी जवान पीछे का ओर भाग लिहले। पलाबो बंगला के शब्द हवे आ पलाबो के मतलब भाग लिहल। त ओह जवानन के योजना शुरुए से भाग लिहला के रहल।’’ चुटकुला सुनते अलका खिलखिला के हँस पड़ली। कहली, ‘‘मजा आ गइल।’’ ऊ एकदमे अजय का तरह बोलली।

‘‘मजा का खाक आ गइल?’’ संजय अलका से कहलसि कि ‘‘अपना देश में अधिकतर पढ़ल-लिखल मेहरारुअनो के इहे हाल बा कि पलाबो।’’
‘‘ना, हम ना मानीं।’’ अलका एकदमे कवनो फिलासफर लेखा कहली। आ गंभीर हो गइली।
‘‘अब देवी जी, रउरा मानीं भा मत मानीं। कवनो जबरदस्ती त बा ना। बाकिर असलियत इहे बा कि मेहरारू चीज के सामना करे का बदले, ना जाने काहे, भाग लिहले में भलाई बुझेली सँ।’’
‘‘नो। एकदमे ना।’’
‘‘कइसे ना?’’ संजय कहलसि, ‘‘रउरा अपनहीं के ले लीं। दिल्ली अइनी कथक सीखे खातिर। आ नृत्य के एगो ठेकेदार के ना झेल पवनी। ना झुक पवनी, ना लड़ पवनी। पलाबो क गइनी।’’
‘‘संजय! का ले बइठनी?’’ ऊ रुआँसा हो गइली आ कहली, ‘‘रउरो!’’
‘‘ना, अपना देश के मेहरारुअन के इतिहासे इहे रहल। रानी पद्मावती के किस्से ले लीं।’’ संजय अब चालू हो गइल रहल, ‘‘बीस हजार रानियन का साथे जौहर व्रत लिहली आ चिता में कूद के जर मुअली।’’ संजय खीझत रहल, ‘‘अरे, मरहीं के रहल त जर के काहे? लड़ के काहे ना मर सकत रहली सँ? आ हो सकेला कि लड़ के मरबे ना करितीं सँ, ओह आक्रमणकारिए के मार दितीं सँ।’’
‘‘वीर रस में आवे के जरूरत नइखे प्रभु! आधा सुर में काम चल सकेला।’’ कहत अलका बोलली, ‘‘मेहरारुअन पर आक्षेप लगावल अउर बात हवे, परिस्थिति के जानल अउर बात।’’ कह के ऊ तनी रुकली आ बोलली, ‘‘बाकिर हम अबहीं डिबेट का मूड में नइखीं। फेर कबो।’’
‘‘फेर कबो का, कबो ना। हरदम पलाबो।’’ ऊ एक बेर फेर भरपूर नजर से अलका के देखत कहलसि, ‘‘शायद एहीसे लोहियो मेहरारुअन के दलित कहले बाड़ें।’’
‘‘ई लोहिया के हवे?’’ अलका बिसूरत पूछ बइठली, ‘‘जे मेहरारुअन के दलित कहेला।’’ सुन के संजय माथा पीट लिहलसि आ हाथ जोड़त कहलसि, ‘‘रउरा मार्क्स के जान सकत बानीं, माओ, लेनिन आ मैक्सिम गोर्की के जान सकत बानीं। ओह लोग के किताब पढ़ सकत बानीं। बाकिर लोहिया के नामो ना जान सकत बानीं। धन्य बानीं रउरा, नृत्यांगना जी। धन्य बानीं।’’ कह के संजय अलका से आज्ञा माँगत कहलसि, ‘‘त हम अब चलीं?’’
‘‘ना, रुकीं। अजय आवत होखिहें।’’
‘‘ना, अब चलब।’’ कह के संजय चले लागल त अलका कहली, ‘‘एह बेर रक्षा बंधन पर रउरा हमरा से राखी बन्हवा लीं।’’
‘‘का मतलब?’’ संजय भड़क उठल।
‘‘ना, आदमी त रउरा बढ़िया हईं, पूरा विश्वासो बा रउरा पर। बाकिर कबो-कबो देखीले कि रउरो पुरुष मानसिकता से संचालित होखे लागेनी त ठीक ना लागे।’’ सुन के संजय लजा गइल। कहलसि, ‘‘सॉरी।’’
‘‘ना, कवनो बात नइखे। प्लीज, रउरा माइंड मत करब।’’
‘‘अरे ना-ना।’’ कहत संजय बाहर आ गइल। बाहर का आ गइल, ओकरा लागल जइसे ऊ भहरा गइल। सोचे लागल कि कवनो मेहरारू लोहिया के जाने भा मत जाने, पुरुष के आँख में लुकाइल अर्थ जरूर जान लेले। फरक अतने बा कि कहीं चुप रह जाले आ कहीं कह देले।

(बात चूमल चूसल आ पलाबो के चरचा मे कब लोहिया पर आ गइल पता ना चलल। बाकिर एहिजा से आगे बढ़े ला फेर कवनो दिने आवे के होखी। आएब नू ? – अनुवादक)

अपने-अपने युद्ध, दयानंद पांडेय, हिन्दी उपन्यास, भोजपुरी अनुवाद, चूमल-चूसल, पलाबो,

 

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