सुदामा चरित
- स्व. कैलाश चंद्र चौधरी

सुदामा चरित

भूमिका–

पांडे सुदामा बइठल एक दिन, घरे पड़ताइन साथ,
बतियात निज दीन-दुखड़ा, अवरु बचपन के बात।

कहे सुदामा सुन पड़ियाइन, आपन आपन भाग,
हमरे संगे एके गुरु से, पढ़लें द्वारिका नाथ।

करम हीन तकदीर के छोटा,खोरी खोरी डोलत आज,
उ ग्वाला नन्दलाल कन्हैया, पवले द्वारिका राज।

पड़िआइन कहली–

एक बात हमरी मानऽ ,दिलदार हे बलमुआ,
जब आपन खुद संघतिया, द्वारिका के नाथ हउवन,
तब आन दुआरे जालऽ तू बेकार हे बलमुआ।
दुखियन के दीनबन्धु, मालिक ऊ त्रिभुवन के,
चहिहें त तुरते करिहें बेड़ा पार हे बलमुआ।
सांचे कहतानी,मानी चाहे जनि मानी,
दुखवा ना हमसे सहात मोरे स्वामी जी।
बितले छछाइल हमर जिनगी के आधा उमर,
मिले ना एको जुन भात मोरे स्वामी जी।
रहे के मकान नाहीं, बिहटी पुरान नाहीं,
रुखिया के खोंता अस माथ मोरे स्वामी जी।
बाबा के दिहल साड़ी आजु ले पहिनऽतानी,
तोहरा त भगही मोहाल मोरे स्वामी जी।
भीख मांगि जिअला से निमन बाटे मुअला में,
लमहर बा दुखवा के रात मोरे स्वामी जी।

सुदामा कहलें –

सुन सुन प्रान प्यारी, बात तनिक हमारी,
होइहें इज्जत उघारी, एहि कमवा में।
हमनी बाभन कहाईं,सउसे दुनिया के पढ़ाई,
आपन रखऽ चतुराई अपने संगवा में।
बाभन चाहे नाही धन,नाहीं राज सिंहासन,
मांगी मुठी भर अन अपना झोरवा में।

पड़ियाइन कहली –

सांचे कहऽतानी,मानी चाहे जनि मानी,
दुखवा ना हमसे सहात मोरे स्वामी जी.
बितले छछाइल हमर जिनगी के आधा उमर,
मिले ना एको जुन भात मोरे स्वामी जी.
रहे के मकान नाहीं, बिहटी पुरान नाहीं,
रुखिया के खोंता अस माथ मोरे स्वामी जी.
बाबा के दिहल साड़ी आजु ले पहिनऽतानी,
तोहरे त भगही मोहाल मोरे स्वामी जी.
भीख मांगि जिअला से निमन बाटे मुअला में,
लमहर बा दुखवा के रात मोरे स्वामी जी

सुदामा तब कहलें –

जहाँ बाजऽताटे बड़े बड़े ढोल धनिया,
उहाँ टिमकी के बाटे कौन मोल धनिया।
अब उ राजा महराजा हम त दीन रंक राजा ,
कइसे बइठी उहाँ कवनो मेल जोल धनिया.
इहे बाटे जग के रीत, निबहे बराबर के प्रीत,
उन्हकर इयारी बा बे-तोल धनिया।
अइसे रोवऽ ना बछोह,छोड़ऽ दौलत के मोह,
अइसे बनऽ ना तुहुँ बकलोल धनिया।

बाकिर पंडिताइन अड़ल रहली –

सुनिला कि दीनबन्धु हवें जदुराई जी,
इन्द्र घनघोर जब मेघ बरसाई जी,
लिहलें उठाइ गिरिराज के कन्हाई जी।
नागवा के नाथि कान्हा ब्रज के बचाई जी,
रउरे मुँहे सुनले बानी उन्हकर कहानी जी।
कहऽतानी ओतना हमरा जतना बुझाई जी,
ताहि घरे गइले सभ भाँति बा भलाई जी।

सुदामा कहलन –

जब अन्तरजामी जदुराई,
तब द्वारिका जाके का होई?
जैसे गज प्रहलाद अरू द्रौपदी के
सुनि टेर कन्हैया सुधि लिहलन,
तस हमरो जब याद परी त
हमरो सुधि लीहें अकुला का होई?
जब मंगले पर उहो दीहें,
तब दीन दयालु कइसन ऊ?
जब हाथ पसारी यार धरे
तब अइसन मिताई का होई?

पंडिताइन समुझवली –

बेरि- बेरि कहऽतानी मान ना कहनवा,
तू नदनवा बाड़ऽ हो बलमु।
जिनगी भ तकल तू नील असमनवा,
धरती प ताकऽ तनि देखऽ ना जमनवा,
उहे बाटे सुखी जेकर भरल बा खजनवा,
तू नदनवा बाड़ हो बलमु।
देहि प ना कपड़ा , बा छान्हि प ना खपड़ा,
दिनवा कटेला तोहर , भीखिये के असरा,
ओढे के गांती बाटे , टाट ना लेहनवा,
तू नदनवा बाड़ हो बलमु।
लोक में पवलऽ, परलोक में का पइबऽ,
तले तू दलिदरा के जिनगी बितइबऽ,
हमर जदि बात मानऽ त तू कर ई जतनवा,
तु नदानवा बाड़ हो बलमु।
जाते दुअरिया सैंया , काहे अलसालऽ,
साफ साफ कहऽ काहे अतना लजालऽ,
कवना दिन काम आई अइसन इयारी हो सजनवा,
तु नदनवा बाड़ऽ हो बलमु।

सुदामा –

जाईं दुअरिका, जाईं दुअरिका,
आठो पहर इहे रटन तिहारी,
कहल ना करीं त उहो दुख भारी,
देखऽ ना तनिक आपन दसवा निहारी।
यार से मिल के ठाठ चाहे ल इयार जस,
अपने जे खाईं सो यार के खिलाईं।
ईहां ठठपाल घरे मुसरी करें डंड,
एको मुठी चाउर ना कि लेके हम जाईं।

कथा-सूत्र

सुनि के पंडताइन झटपट गई पड़ोसन पास,
पुरे सवा सेर चाउर लेके अइली मारे हुलास।

चललें सुदामा हरि जी से मिलने.
सवा सेर चउरा के गठरी बना के,
लोटा अरु गठिया बगल में दबा के।
सुमिरत चललें हो गनपति नामा।
हाथ के सुमिरिनी, माला गरदनवा,
घंसि के लगवलें लिलार प चननवा,
मांगत खात पहुंचे द्वारिका धामा।

गीत-

सोनवा के बनले भवनवा न हो,
धनि द्वारिका के धाम।
एक से एक बाटे महल अटारी,
संगे संगे सोभेला बगनवा नु हो,
धनि द्वारिका के धाम।
द्वारिका के वासी सब देव डोले,
बिना पुछे केकरो से केहु नाहिं बोले,
चकित सुदामा जी के मनवा नु हो
धनि द्वारिका धाम।
अतने एगो सज्जन आई गोइलें,
पाय लागि पांडे सुदामा से पुछलें
के हईं, कहाँ बा मकनवा नु हो,
केकर खोजिला धाम।

कवित-

नाही देवलोक बासी नाही यक्ष किन्नर कोई,
कहत सुदामा महराज तनि सुनिए।
नाहीं मै बसिष्ट इश्ट नाहीं मै मुनि वाल्मीकि ,
नाहीं मुझे नारद विशारद ही जानिए.
नाहीं देवराज रिशिराज मुनिराज कोई,
मै तो हूं सुदामा रंकराज पहचानिए.
यार जदुनाथ पढ़े गुरु घरे साथ एके,
क्रिपा करि मोहि ओहि यार से मिलाइए.

दोहा-

दीन जानि के तब उ सज्जन, हाथ पकड़ि के ले आये,
खाड़ किये हरि के द्वारे प द्वारपाल से बताये.

गीत-

आइल दुअरा प एगो भिखार प्रभु जी।
देहिया में कुरुता ना सिर प पगरिया,
भगई पुरान फटल लटकल लुगरिया।
फटलि बेवाई गोड़ उघार प्रभु जी।
कहलें कि हवें राउर नन्हे के संघतिया,
नाम सुदामा कहले बभन के जतिया.
राउरे से भेंट के दरकार प्रभु जी.

– स्व. कैलाश चंद्र चौधरी

सुदामा चरित, स्व. कैलाश चंद्र चौधरी,

 

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