डॉ. अर्जुन दास केसरी के निधन

रामरक्षा मिश्र विमल जी के ह्वाट्सअप संदेश से भोजपुरी लोकगाथा आ लोकसाहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. अर्जुन दास केसरी के निधन के समाचार मिलल। विमल जी लिखले बानी कि, ‘लोरिकायन पर अपने के काम बड़ा महत्वपूर्ण बा। अपने के अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के सतरहवाँ अध्यक्ष रहीं। वर्तमान में सम्मेलन के प्रवर समिति के पदेन सदस्य आ स्थायी समिति के संरक्षक रहनी ह।
भोजपुरी खातिर ई अपुर्णीय क्षति बा।
विनम्र श्रद्धांजलि।’
विमल जी बतवनी कि उहाँ के ई समाचार निराला बिदेसिया (Nirala Bidesia) के फेसबुक वाल से मिलल। ओही वाल पर अपना कमेंट में निराला जी लिखले बानी, ‘ओह। Shashikant Yadawa भाई से अभी दुखद खबर मिली। भोजपुरी जगत के लिए अपूरणीय क्षति। कजरी साहित्य के शीर्ष व्यक्तित्व अर्जुन दास केसरी नहीं रहे।’
एही वॉल पर योेगेन्द्र नारायण शर्मा (yogendra narayan sharma) लिखले बानी कि केसरी जी का निधन का साथही सोनभद्र से योगेन्द्र जी के जुड़ाव के पहिलका कड़ी टूट गइल। योगेन्द्र जी लिखले बानी, ‘सोनभद्र से जुड़ाव की पहली कड़ी टूट गयी। इसी के साथ लोक जीवन और लौक साहित्य का एक कुशल अन्वेषक भी चला गया। सन् 1973-74 से केसरीजी के साथ एस अतिबल, योगेन्द्र नारायण और सुधेन्दु पटेल की एक चौकड़ी बन गयी थी जो साल में दो-तीन बार सोनभद्र के जंगलों की धूल खाने केलिए रावर्ट्सगंज पहुंच ही जाती थी। ट़ोली के सदस्यों में कभी डा मंजीत चतुर्वेदी, वीरेंद्र शुक्ल भी जुट जाते थे। वहां से शेख जैनुल आब्दीन कवि शुष्क, एम खान भी इकट्ठे हो लेते थे। केसरीजी उस समय लोरिकी और अन्य आदिवासी लोक गीतों में जुटे थे। अतिबल स्थानीय जन जीवन के छाया चित्र खींचने में लगे थे तो मैं और पटेल स्वतंत्र पत्रकारिता में। कहना न होगा कि हम सब फक्कड़। बस का किराया जुटाया और रावर्ट्सगंज केसरीजी के घर हाजिर। हमारे खाने और रात में सोने की व्यवस्था केसरीजी के जिम्मे, परन्तु अपनी अल्प आय में भी उन्होंने हम सबका बोझ अत्यंत प्रेम से उठाया।
समय बदला हम सबकी व्यस्तता अलग-अलग क्षेत्रों में हो गयी। साथ मिलना कम हुआ परन्तु प्रेम में कमी नहीं आयी। करीब तीन साल पहले मैंने मोबाइल फोन पर बताया कि मैं इस तारीख को आ रहा हूं, तो उस तारीख को जब तक मैं उनके घर पहुंचू तब तक उनका फोन करीब आधा दर्जन बारफोन आ चुका कि-कहां पहुंच्य।
‘वह आदर, वह उठि मिलन, वह पहिले की बात’ ।केसरीजी हम लोगों केलिए साक्षात कृष्ण थे।
केसरीजी मुझसे और पटेल से करीब नौ साल बड़े थे परन्तु व्यवहार मित्रवत था। काल प्रवाह सबको अपने में समेट लेता है। पहले अतिबल गये अब केसरीजी। दोनों बन्धुओं को बार-बार नमन। हार्दिक श्रद्धांजलि।’
जयकान्त सिंह जय जी अपना पोस्ट पर लिखले बानी, ‘अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष, प्रवर समिति के सम्मानित सदस्य, शोध पत्रिका ‘लोक वार्ता’ के यशस्वी सम्पादक आ हिन्दी – भोजपुरी के अध्येता विद्वान लेखक – साहित्यकार डॉ. अर्जुन दास केसरी जी के निधन साहित्य जगत खातिर अपूरणीय क्षति बा। ईश्वर उनका दिवंगत आत्मा के परम शांति आ आत्मीय जन के ई शोक सहे शक्ति देस। सम्मेलन सहित समस्त भोजपुरी सेवी सभे के ओर से विनम्र श्रद्धांजलि 💐
सादर नमन 🙏’
भोजपुरी 24 का फेसबुक वॉल पर बा –
“नहीं रहे भोजपुरी पुरोधा अर्जुन दास केसरी
लोकगाथाओं से जनजातीय संस्कृति तक… भोजपुरी के पुरोधा डॉ. अर्जुन दास केशरी का साहित्यिक सफर
भोजपुरी लोकसाहित्य, लोकगाथाओं और जनजातीय संस्कृति को सहेजने में डॉ. अर्जुन दास केसरी का योगदान उल्लेखनीय है। सोनभद्र के इस वरिष्ठ साहित्यकार ने अपना जीवन लोकपरंपराओं के अध्ययन, संकलन और संरक्षण के लिए समर्पित किया।
📖 जनजातीय जीवन, लोककथा, लोकगाथा, लोकसंस्कृति और पुरातत्व पर 60 से अधिक पुस्तकें।
🏆 शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रपति पुरस्कार सहित अनेक सम्मान।
🎓 उनकी पुस्तकों पर पीएचडी और शोधकार्य—लोकसाहित्य की अकादमिक दुनिया में भी उनकी कृतियों की खास पहचान।
‘लोरिकायन’, ‘विंध्य क्षेत्र का सांस्कृतिक वैभव’ और ‘विजयमल’ जैसी कृतियां उनकी साहित्यिक यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
अपनी मिट्टी, अपनी बोली और अपनी लोकसंस्कृति को सहेजना ही हमारी विरासत को जीवित रखना है।”
अउरी जानकारी <a href=”https://bhojpuri24.com/bhojpuri-purodha-arjun-das-keshari-folk-literature/ target=”new””>Bhojpuri24.com</a>
पर हिन्दी में पढ़ल जा सकेला। भोजपुरी के बात हिन्दी में कइल बढ़िया प्रभाव डालेला। शायद एही चलते लोग अँजोरिआ के भाव ना देव। गँवारू भाषा में आपन बात कहे वाला के कवनो सभ्य आदमी काहे सुनी।

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