भोजपुरी के भाषा माने ला तइयार नइखे सरकार

भोजपुरी के तमाम संस्था एह बात ला आन्दोलन करत रहेली सँ जवना में सरकार से भोजपुरी के संविधान के अठवीं अनुसूची में शामिल करे के माँग होखेला। आ ऊ लोग भुला जाला भा भूला देला कि संविधान के अठवीं अनुसूची में भाषा के शामिल कइल जाला, बोलियन के ना। आ भोजपुरी के हिन्दी के उपभाषा बना दिहल गइल बा। एक तरह से भोजपुरी के महज बोली बना के राख दिहल गइल बा। आ एकरा ला सबले अधिका दोषी भोजपुरी वाले खुदे बाड़न। हिन्दी वाला त भोजपुरिए ना सगरी क्षेत्रीय भाषावन के हिन्दी में समाहित करावे का ताक में बाड़न। खास कर के ओह इलाका के भाषावन के जवना के हिन्दी पट्टी कहल जाला। एह पट्टी में पूर्वी आ पूर्वोत्तर के राज्य, उत्तरी राज्य, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, आ दक्खिनी भारत के राज्यन के शामिल ना मानल जाव। बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा आ उत्तराखंड के इलाका शामिल बाड़ी सँ। झारखण्ड के संथाली भाषा वाला राज्य मानल जाला।
1961 के जनगणना तक भोजपुरी के एगो स्वतंत्र भाषा का रूप में गिनल जात रहल। बाकिर 1971 के जनगणना से एकरा के हिन्दी का उपभाषा भा बोली का रूप में राख दिहल गइल आ अब एकर स्वतंंत्र अस्तित्व सरकारी आंकड़ा में नइखे रह गइल। 1961 वाला जनगणनो में भोजपुरी के बिहारी भाषा समूह में राखल गइल रहल जवना समूह में भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका, आ वज्जिका भाषा शामिल रहली सँ। बाद में मैथिली भाषियन के राजनीतिक क्षमता मैथिली के भाषा का रूप में अठवीं अनुसूची में शामिल करवा दिहलस। भोजपुरी के अलग आँकड़ा अबहियों प्रकाशित होला, हालाँकि ओकर संख्या हिन्दी के कुल संख्या में जोड़ दीहल जाला। 2011 के जनगणना में भारत में भोजपुरी मातृभाषा बतावे वाला लोग के संख्या 5,05,79,447 रहल—पाँच करोड़ पाँच लाख उन्नासी हजार चार सौ सैंतालीस।
सवाल गिनिती के नइखे। भाषाई राजनीति जानल चाहे वालन के जाने के पड़ी कि भोजपुरी के ऊ जगहा ना काहे ना मिलल जवन बहुते दोसरा भाषावन के मिल गइल। बलिया के दाढीबाबा के रोपल पौधा नेपाली भाषा के संविधान के अठवीं अनुसूची में शामिल करवा दिहलसी। हालांकि तब नरसिंहराव के सरकार रहल। कहल जाला के चन्द्रशेखर जी के बहुत आत्मीय संबंध एगो नेपालन राजनेत्री से रहल जे आगे चल के नेपाल के उपप्रधान मंत्री बनली आ कबो बिआह ना कइली। एह विषयान्तर में अबहीं गइल का जरुरत नइखे। ओह पर कबो फेर विस्तार से चरचा करब। अबहीं त बस ई जाने के कोशिश करब कि भोजपुरी का राह में कवन काँट-कूस बाड़ी सँ।
एह सवाल के जवाब में हिन्दी के विस्तारवादी राजनीति, सरकारी वर्गीकरण आ राजनीतिक प्राथमिकता तीनों शमिल कर के देखे के पड़ी।
पहिला बात—‘हिन्दी क्षेत्र’ बनावे का प्रक्रिया में कई भाषावन के अलग पहचान दबा दिहल गइल। आधुनिक हिन्दी के व्यापक सार्वजनिक भाषा बनावे का साथे भोजपुरी, अवधी, ब्रज आ मैथिली जइसन भाषावन (भाषा के बहुवचन भाषन ना भाषावन होखे के चाहीं जेहसे कवनो तरह भाषण से भ्रम ना होखे।) के ओकर ‘बोली’ मान लिहल गइल। भाषा-राजनीति पर शोध ई देखावेला कि ई खाली व्याकरण के समानता के मामला ना रहे; राष्ट्र, शिक्षा, छपाई आ प्रशासन में कवन भाषा के अधिकार मिली, एकरो संघर्ष रहे।
दूसर बात—1971 के वर्गीकरण एह अधीनता के सरकारी आँकड़ा में पक्का जगह दे दिहलसि। भोजपुरी के मातृभाषा वाला पहचान राखल गइल, बाकिर ओकर बोलनिहार हिन्दी के कुल संख्या में जोड़ दीहल गइलें। एकर राजनीतिक परिणाम साफ बा: भोजपुरी के संख्या हिन्दी के संख्याबल बढ़ावेला, जबकि भोजपुरी के अलग भाषा वाला दावा ओही प्रशासनिक ढाँचा में नीचे रहेला। ई परिणाम दस्तावेज से देखल जा सकेला। हिन्दी के संख्या बढ़ावे खातिर जानबूझ के ई फैसला भइल।
तीसर बात—आठवीं अनुसूची में जगह पावे के कवनो समान, तय कसौटी लागू नइखे। सरकार खुद संसद में कह चुकल बिया कि पहिले भाषा जोड़ल जाए के आधार ओह समय के परिस्थिति आ लोग के माँग रहल। दिसम्बर 2024 के जवाबो में सरकार मानलसि कि कसौटी बनावे वाली समितियन के कोशिश निर्णायक ना भइल। एहसे भोजपुरी के मान्यता के सवाल राजनीतिक निर्णय का अधीन हो गइल बा।
मैथिली के मान्यता मिल गइल आ भोजपुरी के काहे ना? मैथिली के अलग पहचान ला लमहर साहित्यिक, संस्थागत आ राजनीतिक आन्दोलन चलल, आ अन्ततः ओकर माँग संवैधानिक संशोधन तक पहुँचल। भोजपुरी के माँगो उठत रहल; बिहार सरकार के प्रस्ताव मिलला के पुष्टि केन्द्र सरकार कइले बिया। एहसे ई कह दीहल कि भोजपुरी समाज माँगबे ना कइलसि, उचित ना होई। हमार निष्कर्ष ई बा कि भोजपुरी के माँग के ओतना निर्णायक राजनीतिक प्राथमिकता ना मिलल, जतना ओकरा के मान्यता दिलावे खातिर जरूरी रहे। आ एकरा पीछे भोजपुरी के संगठनन के दोषी मानल गलत ना होखी। ई लोग आपन-आपन ढपली बजावे में अतना व्यस्त रहेला कि भोजपुरी के मुद्दा गड़ही में चल जाला।
पिछलो लेख में बता चुकल बानी कि भोजपुरी पत्रिकन आ वेबसाइटन के संपादकन के ई जिम्मेदारी होखे के चाहीं कि ऊ भोजपुरी के एगो मानक वर्तनी बनावे का काम में जुटो आ बना के दम लेव लोग। भोजपुरी के एगो पोढ़ लिखनिहार चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह अपना एगो लेख में लिखले रहीं –
‘कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी’ के अनुसार एक योजन पर बानी बदलेले। जरूर बदली। एकरा के केहू रोक ना सके। रोके के कवनो उपाय बेकार होई। बाकिर भाषा के एक रूप होखे के चाहीं। बंगाली बोले वाला इलाका छोट नइखे। जगह-जगह के बंगला बोली में बहुत अन्तर बा, बाकिर लिखित बंगला में एकरूपता बा। भोजपरी के अब खाली एगो बोली मानल अज्ञानता मानल जाई। एकरा लिखित रूप में एकरूपता होखे के चाहीं। काहे से कि अब ई एगो भाषा के रूप ले चुकल बिया।’
भोजपुरी के मान्यता देबे का विरोध में कुछ अइसनो नाम शामिल बाड़ी सँ जे रहल त भोजपुरी इलाका के बाकिर हिन्दी के मशहूर साहित्यकार हो गइला का बाद भोजपुरी के हेय देखावे-बतावे में लागल रहलें। अइसनका नामन में अमरनाथ के नाम खास कर के लिहल जरूरी बा। डॉ. अमरनाथ शर्मा रामपुर बुजुर्ग गाँव के रहलन जवन एह घरी महराजगंज जिला, उत्तर प्रदेश में पड़ेला। पहिले ई गाँव गोरखपुर जिला में रहल। ‘द वायर’ में 21 जुलाई 2017 का दिने प्रकाशित एगो खबर में अमरनाथ साफ कहले बाड़न कि ‘बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का विरोध’ काहे हो रहल बा। एह लेख में अमरनाथ बतवले बाड़न कि ऊ एगो प्रतिनिधिमण्डल ले के भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भेंट कइलन आ ज्ञापन सँउपलन कि, ‘भोजपुरी, राजस्थानी अथवा हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न किया जाए।”
एह प्रतिनिधिमण्डल में अमरनाथ का साथे राहुल देव, श्याम सिंह शशि, चित्रा मुद्गल, करुणाशंकर उपाध्याय, राकेश पाण्डेय आ दर्शन पाण्डेय शामिल रहलन।
भोजपुरी के मान्यता मिले के विरोध करे वालन के कुतर्क होला कि –
1. ‘भोजपुरी में मानक रूप, व्याकरण आ साहित्यिक परम्परा नइखे’
डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय के लेख ‘हिंदी को बोलियों से मत लड़ाइए’—5 अक्टूबर 2020 में भोजपुरी के मानकीकरण, व्याकरण, साहित्यिक परम्परा आ दैनिक अखबार के अभाव के आधार पर स्वतंत्र मान्यता के पात्रता पर सवाल उठावल गइल बा।
2. ‘भोजपुरी के मिलल त बाकी भाषवन के माँग रोकल ना जा सकी’
ओही लेख में उपाध्याय कहत बाड़ें कि भोजपुरी आ राजस्थानी के मान्यता मिलला पर अउर भाषाई रूप मान्यता माँगिहें आ एकरा से भाषाई अराजकता पैदा होई। एह तर्क में भोजपुरी के अपना योग्यता के जगहा ओकरा बाद उठे वाली सम्भावित माँगन के डर आधार बनत बा।
3. ‘हिन्दी के संयुक्त परिवार से अलग भइला पर भोजपुरी के अपना मूल्य घट जाई’
हद त तब हो गइल जब विद्यानिवास मिश्र के ‘हिंदी का विभाजन’ शीर्षक निबन्ध से ई अंश पढ़ल जाव – “परस्पर विभक्त हो जाने पर इनका कौड़ी बराबर मोल न रह जाएगा।”
एह विचार में भोजपुरी-अवधी वगैरह के महत्व हिन्दी के व्यापक ढाँचा में जुड़ल रहला से मानल जात बा। अबहियों हमरा सामने मिश्रजी के मूल निबन्ध के पूरा पाठ नइखे; ई उनकर नाँव से उपाध्याय द्वारा दीहल उद्धरण बा।
4. ‘हिन्दी के विश्वस्तरीय हैसियत आ संयुक्त राष्ट्र वाला दावा कमजोर होई’
भोजपुरी के अलग गिनला से हिन्दी के संख्याबल घटे के चिन्ता उपाध्याय के लेख में साफ बा। कान्तिकुमार जैन के नई धारा में प्रकाशित साक्षात्कारो में इहे सोच मिलत बा: हिन्दी के दुनिया के सबसे अधिका बोलल जाए वाली भाषन में गिने के बा त भोजपुरी-बुन्देली वगैरह के ओकरा से अलग मत करीं।
एह तर्क के राजनीतिक अर्थ बा—भोजपुरी के अलग पहचान के कीमत पर हिन्दी के बड़ा संख्याबल बनवले राखल। ई हमार विश्लेषण बा; जैन के कथन से ई सिद्ध नइखे होत कि भोजपुरी के मान्यता मिलते हिन्दी के राजभाषा वाला दर्जा खत्म हो जाई।
5. ‘भाषाई मान्यता से अलग राज्य आ भाषा-संघर्ष के माँग उठी’
एबीपी के 18 फरवरी 2017 के खबर अनुसार, मुम्बई प्रेस क्लब के चरचा में पूर्व न्यायाधीश चन्द्रशेखर धर्माधिकारी कहले रहलें कि भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल कइला से हिन्दी के झटका लागी, भाषा-संघर्ष आ अलग राज्य के माँग उठ सकेला। ई समाचार में दर्ज कथन बा; पूरा भाषण के प्रतिलिपि नइखे। ओही खबर में सतीश त्रिपाठी के उलटा मत बा कि भोजपुरी के मान्यता से हिन्दी पर असर ना पड़ी।
6. सरकारी बाधा—‘कसौटी तय नइखे, एहसे समयसीमा ना दे सकीं’
ई साहित्यकारन के विरोध से अलग प्रशासनिक स्थिति बा। गृह मंत्रालय के दिसम्बर 2025 के संसदीय जवाब में कहल गइल कि आठवीं अनुसूची में भाषा जोड़े खातिर तय कसौटी नइखे; पाहवा आ सीताकान्त महापात्र समिति के कोशिश अनिर्णीत रहल, एहसे समयसीमा ना बतावल जा सके। ई भोजपुरी के अयोग्य घोषित कइल ना हवे, बाकिर फैसला अनिश्चित काल तक लटकल रहे के आधार जरूर बनत बा।
एह सब में सबले बड़हन मुद्दा भोजपुरी के एगो मानक वर्तनी ना रहला के बा। कुछ लोग कहेला कि भोजपुरी के मानक वर्तनी बनावे के सवाल बर्हनी का छत्ता पर ढेला मरला जइसन होखी। ढेला मारेवाला के भभोराए के पूरा खतरा बा। त का एह खतरा से बचे का कोशिश में भोजपुरी के नुकसान करा दीहल जाव? एह सवाल के जवाब हर भोजपुरी प्रेमी के खोजे के पड़ी आ चाहे-अनचाहे एगो मानक वर्तनी बनावे का दिसाईं मेहनतो करे के पड़ी। हमरा विचार से कम से कम हर संपादक अपना प्रकाशन ला एगो मानक बना लेव। उदाहरण खातिर अँजोरिआ के मानक वर्तनी देख लीं सभे। ठीक बा एहसे कई तरह के मानक बने के खतरा बा। बाकिर गँवे-गँवे एही मानकन से ऊ मानक निकल पाई जवना के सार्वजनिक समर्थन मिल पाई।
भोजपुरी के ढेरहन समिति, सम्मेलन, संगठनन के एह पर काम करे के जरुरत बा।
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