भोजपुरी के ताकत मानत दुनिया, साहित्यकार कब मनीहें?
- टीम अंजोरिया

भोजपुरी के ताकत मानत दुनिया, साहित्यकार कब मनीहें?

एह साल प्रधानमंत्री का तरफ से जारी दिवाली बधाई में भोजपुरी भाषा के विकल्प देखल सुखद रहल। भोजपुरी बोले वाला आदमी अपना भाषा में देश के प्रधानमंत्री के संदेश पढ़ सके, ई बात अपना आप में मायने राखत बिया। एहसे भोजपुरी के व्यावहारिक स्वीकार के एगो अउरी उदाहरण सोझा आइल बा।

एह तरह के इस्तेमाल के संवैधानिक मान्यता के बराबर नइखे मानल जा सकत। बाकिर एकरा के मामूली कह के टारलो ना जा सके। जनता से संवाद करे वाला तन्त्र जब भोजपुरी चुनेला, त ऊ एह भाषा के पहुँच आ ओकरा से जुड़ल लोग के महत्त्व स्वीकार करत होला। सवाल उठत बा कि जवना सचाई के राजनीति, बाजार आ सिनेमा अपना व्यवहार में स्वीकार करत बाड़ें, भोजपुरी इलाका के कुछ नामी हिन्दी साहित्यकार ओकरा के स्वीकार करे में अतना असहज काहे हो जालें?

बाजार के उदाहरण देखीं। डाबर अपना लाल दन्त मंजन के प्रचार खातिर रवि किशन के साथे भोजपुरी में कहत बा—“दाँत में हमार दम बा, डाबर लाल पे घमंड बा।” स्वराज ट्रैक्टर्स महेन्द्र सिंह धोनी वाला अपना विज्ञापन के भोजपुरी रूप जारी करे के घोषणा करेला। कोलगेट के किरण कनौजिया वाला विज्ञापन अभियान के भाषन में भोजपुरी शामिल रहेला। ई फैसला भोजपुरी पर कृपा करे खातिर नइखे लिहल जात। कंपनियन के आपन सामान बेचे के बा आ ग्राहक के भरोसा जीते के बा। एह काम में भोजपुरी कारगर लागत बिया, त ओकर इस्तेमाल होत बा।

ग्राहक सेवा में त बात अउरी साफ हो जात बिया। वोडाफोन आइडिया TRAI के दीहल अपना लिखित जवाब में बतावत बिया कि ओकर वायस रिस्पान्स सिस्टम सतरह भाषा में काम करेला, जवना में भोजपुरी शामिल बिया। भारतीय स्टेट बैंक के आधिकारिक वेबसाइट पर संपर्क केंद्र के पन्द्रह भाषन में भोजपुरी के नाम दर्ज बा। फोन पर भाषा चुन के खाता के जानकारी आ तरह-तरह के सेवा लेबे के व्यवस्था बा।

सोचीं, भोजपुरी में ग्राहक के जरूरत बुझल जा सकेला, ओकरा के सूचना दीहल जा सकेला आ सेवा पहुँचावल जा सकेला। त भोजपुरी के सार्वजनिक इस्तेमाल बढ़ावे के सवाल पर ओकर सामर्थ्य पर सन्देह काहे कइल जाव? व्यवहार में काम करत भाषा के क्षमता के प्रमाण खातिर अउर कतना परीक्षा लिहल जाई?

हिन्दी सिनेमा के अनुभवो एही ओर इशारा करत बा। ‘पीके’ के मुख्य पात्र के भाषा खातिर भोजपुरी चुनल गइल। आमिर खान बतवले रहलें कि मूल पटकथा खड़ी बोली में रहे आ उनकर सुझाव पर भोजपुरी अपनावल गइल। ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में भोजपुरी-मिश्रित संवाद पात्रन आ परिवेश के पहचान बनलें। ऋचा चड्ढा एह खातिर भोजपुरी संवाद आ उच्चारण के अभ्यास कइला के बात कहले बाड़ी। ‘मसान’ के एगो कथा-खंड में भोजपुरी के इस्तेमाल के पुष्टि ओकर निर्देशक नीरज घेवनो कइले बाड़ें। OTT पर जारी लापता लेडीज फिलिम में मुख्यपात्र के भूमिका निबाहत रविकिशन जम के भोजपुरी अंदाज में आपन संवाद परोसले बाड़न।

एह उदाहरणन के गिनावत घरी भाषाई ईमानदारी जरूरी बा। हर पूरबी उच्चारण भोजपुरी नइखे, आ हर ‘हमका-तुमका’ वाला संवादो भोजपुरी नइखे हो जात। अवधी, भोजपुरी, मगही आ मैथिली के आपन-आपन पहचान बा। भोजपुरी के पक्ष मजबूत करे खातिर दोसरा भाषा के उदाहरण अपना खाता में जोड़े के जरूरत नइखे। ओकर अपना इस्तेमाल के पर्याप्त ठोस उदाहरण मौजूद बाड़ें। एह सगरी व्यवहार में भोजपुरी के आर्थिक आ राजनीतिक ताकत झलकत बिया। बाजार ओकरा बोले वाला लोग के ग्राहक मानत बा। राजनीतिक संवाद ओकरा बोले वाला लोग तक उनकर अपना भाषा में पहुँचल चाहत बा। सिनेमा भोजपुरी के सहारे पात्रन के विश्वसनीय बनावत बा आ दर्शक से जुड़त बा। एक-एक उदाहरण भोजपुरी के व्यापक सार्वजनिक जीवन के ओर संकेत करत बा।

अब सवाल ओह साहित्यिक नजरिया से बा जवन भोजपुरी के स्वतन्त्र प्रतिष्ठा मिलला में हिन्दी के नुकसान देखेला। खासकर भोजपुरी इलाका से निकलल ओह हिन्दी साहित्यकारन से, जे भोजपुरी के मान्यता के माँग के विरोध करेलें। उनुका से ई अपेक्षा अनुचित नइखे कि ऊ अपना तर्क के एह बदलत व्यवहार का सोझा रखसु। भोजपुरी के सम्मान बढ़ला से हिन्दी के सम्मान काहे घटी? भोजपुरी बोले वाला आदमी हिन्दी पढ़ सकेला, हिन्दी में लिख सकेला आ ओकर साहित्य के समृद्ध कर सकेला। एही आदमी के अपना मातृभाषा खातिर शिक्षा, सार्वजनिक सेवा आ संस्थागत सम्मान माँगे के अधिकारो बा। हिन्दी से प्रेम के प्रमाण देबे खातिर भोजपुरी के आपन पहचान छोड़ देवे के शर्त काहे होखे?

बाजार के इस्तेमाल से भाषा के पूरा न्याय अपने-आप ना मिल जाला। भोजपुरी में सामान बेचला आ भोजपुरी में नियमित पढ़ाई के अवसर मिलला में अन्तर बा। बधाई संदेश के विकल्प मिलला आ प्रशासन में टिकाऊ जगह मिलला में अन्तर बा। व्यावहारिक स्वीकार के अब स्थायी संस्थागत सम्मान तक पहुँचे के जरूरत बा।

बाकिर एह अगिला डेग के राह में ई कहल कि भोजपुरी में क्षमता नइखे, भा ओकर प्रतिष्ठा हिन्दी खातिर खतरा बा, अब अउरी कमजोर तर्क लागत बा। भोजपुरी के इस्तेमाल करे वाला संस्थान अपना व्यवहार से ओकर उपयोगिता देखावत बाड़ें।

भोजपुरी समाज के अपना भाषा में सम्बोधित कइल जाय, ओकरा के सेवा दीहल जाय, ओकरा से कारोबार कइल जाय—त ओकर भाषा के सम्मान के माँग उठते आपत्ति काहे?

दिवाली के बधाई में भोजपुरी के विकल्प एगो सुखद संकेत बा। एह संकेत का साथे बाजार, बैंक, दूरसंचार आ सिनेमा के उदाहरण जोड़ के देखीं त एगो साफ तस्वीर उभरत बिया। भोजपुरी के सार्वजनिक ताकत व्यवहार में स्वीकार कइल जा रहल बा।

अब भोजपुरी इलाका के ओह नामी हिन्दी साहित्यकारन के बतावे के बा—ऊ एह सचाई के कब सकरिहें?

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