सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-64
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
लटकलऽ कि गइलऽ बेटा


आजु लभेरन बहुत देर से अइले। अभी काकी कुछ पुछबे करती, तले दूनों नतिया इस्कूल से आ गइले सन आ बिना युनिफार्म चेंज कइले मइया के बतावे लगले सन।
“मइया, एगो ट्रक का पीछा लिखल रहल हा- ‘लटकलऽ कि गइलऽ बेटा!’ एकर माने का भइल?”
काकी लभेरन का ओरि तकली आ लभेरन बतावे लगले।
भोजपुरी संस्कृति के एगो विशेषता ईहो बा कि ओहमें गंभीर से गंभीरो बात व्यंग्य, विनोद आ ठिठोली का सहारे कहि देबे के कला मिलेले। भोजपुरिया मनई के बात खाली उपदेसे खातिर ना होले। ऊ लोग कई बेर अइसन बात कह देलन कि सुनत घरी हँसी आवेला, बाकिर ओह हँसी का भीतर जीवन के कठोर सच्चाइयो रहेले। ‘लटकलऽ कि गइलऽ बेटा!’ एगो अइसने व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति हटे। जइसे, कवनो आदमी ट्रेन भा बस का पायदान पर लटकि के जात होखे, त ओकरा के देखि के केहूँ कहि दी- “लटकलऽ कि गइलऽ बेटा!” ऊ आदमी अभी जीयत बा, जतरा करऽता, ओकरा कुछ भइलो नइखे बाकिर बोले वाला ओकरा भविष्य के अइसन फैसला सुना दीही, जइसे ऊ ऊपर चलि गइल होखे।
एह कथन के सीधा अर्थ ई नइखे कि लटकल आदमी खतमे हो गइल। असल में ई खतरा का परिणाम के अतिरंजित रूप में पेश करे के तरीका हटे। ‘बेटा’ कहिके व्यंग्य के मिठास बढ़ावल एह कहाउत के अद्भुत हिस्सा हटे। ‘बेटा’ में दुलार बा, उपहास बा आ एगो बेफिक्री भी बा। लागऽता जइसे बोले वाला कहत होखे-
“बबुआ, हम तोहरा के का समझाईं! तू त अपना नाश के पूरा इंतजाम कइ लेले बाड़।”
भोजपुरी के एह भाषायी बारीकी के जोड़ ना मिली। एक ओर आत्मीय संबोधन आ दोसरा ओर परिणाम के बरियार चेतावनी। एहमें परिणाम का माध्यम से व्यक्त निषेध वाक्य में चेतावनी त बड़ले बा, हास्यो कम नइखे आ एकरा व्यंग्यात्मक प्रभाव के त जबाबे नइखे। ‘लटकलऽ’ (एगो काम के स्थिति) आ ‘गइलऽ’ (ओह काम के होखेवाला परिणाम) का बीच के दूरी एतना कम कर दिहल गइल बा कि जइसे लटकला आ मरला का बीचे कवनो अंतरे ना बाँचल होखे, जबकि असल जीवन में त दूनों का बीचे बहुत अंतर बा। ईहे व्यंग श्रोता के हँसावेला आ ओकरा सङे सावधानो करेला।
ई कहाउत खाली गाड़ी का पायदाने तक सीमित नइखे, बलुक रोजमर्रा का जिनगी आ फ़ैसलो पर लागू होला। जिनगी में अवकात से अधिका जोखिमो लिहला के बिनाशकारी मानल जाला। ‘लटकल’ के मतलब अधबीच में झूललो होला। जब कवनो काम भा फ़ैसला में आदमी आधा-अधूरा लटकि के रहि जाला, माने ना एह पार नु ओह पार, त ओकर नुकसान भा हार निश्चिते मानल जाला।
भोजपुरी लोक-संस्कृति में अइसन कई गो चोख आ सटीक कहाउत बाड़ी सँ, जवना में जिनगी के गूढ़ अनुभव आ सीख छिपल बाटे, जइसे- घर के भेदिया लंका ढाहे, अपने गोड़ प टाङी मारल, खाए के बेरा बिलारि आ काम के बेरा बाघ, अउर ना नव मन तेल होई, ना राधा नचिहें।
तले काकी एगो आपन जिग्यासा रखली- “लटकन भी लटकले से बनल होई?”
लभेरन आपन बात जारी रखले।
मूल धातु ‘लटक’ से बनल ‘लटकल’ शब्द क्रियापद का अलावे विशेषण हटे आ एकरे सङे बनल ‘लटकन’ शब्द संज्ञा हटे। व्याकरण का दृष्टिकोण से ‘लटकन’ क्रिया से बनल साधन-वाचक भा भाव-वाचक संज्ञा ह। एकर माने भइल- “ऊ चीज, जवन नीचे का ओर स्वतंत्र रूप से झूलत भा लटकत रहे। गहना-गुरिया में कान के झुमका, बाली भा नथिया का नीचे के झूलेवाला छोट-छोट मोती-मूँगा देखल जाला। जइसे पहिने वाला कपड़ा में लहङा, ओढ़नी भा कुर्ती के डोरी का छोर पर बन्हाए वाला रंग-बिरंगी फुदेना भा मोती के गुच्छा ओगैरह काफी लोकप्रिय बा, ओइसहीं घरेलू सजावट में तोरण आ झालर के भी स्थान बाटे। अउर त अउर, व्यक्ति का बेवहार आ पोजीशन के चिन्हावहूँ खातिर मुँहलग्गू भा पिछलग्गू लोगन खातिर ‘लटकन’ के लाक्षणिक प्रयोग खूब देखे के मिलेला।
मानल जाउ त गाड़ी खाली गाड़िए नइखे, ई हमनी के जिनिगी का जतरो के प्रतीक बिया। हमनी का कई बेर केहूँ दोसरा का पाछा लटकि के आगे बढ़े के कोशिश करींले जा। अपना तात्कालिक फायदा खातिर बिना सोचले-समझले केहूँ का सफलता के नकलो करींले जा। बाकिर जब मुँहे का भरी गिरींले जा तब जाके बुझाला कि पहिले अपना समरथ के जाँचि-परख लेबे के चाहत रहे। ‘लटकलऽ त गइलऽ बेटा’ सुनते लागेला जइसे बिजली के करंट लागि गइल होखे। त एहमें गलती का बा? चलीं केहूँ का सङे बाकिर ओकरा पाछा लटकि के ना, सोच-समझ के।
काकी बोलली- “भोजपुरी में ‘लटके’ के प्रयोग खाली शारीरिक रूप से ‘लटकल रहे’ का अर्थ में ना होला। एकर ईहो माने भइल कि कवनो काम, निर्णय भा परिणाम अनिश्चितता में परि गइल बा। संदर्भ का हिसाब से एकर ईहो भाव हो सकेला- काम बिगरि गइल, अवसर हाथ से निकल गइल, प्रतिष्ठा गइल भा अइसना संकट में परि गइल, जहँवा से निकलल मुश्किल बा। एह तरह का कवनो स्थिति से निपटे खातिर सावधान रहल जरूरी बा, लटके से बाँचे के परी।”
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