भोजपुरी में राजनीति

राजनीति में भोजपुरी कतहीं नइखे बाकिर भोजपुरी में राजनीति गतरे-गतर समाइल बावे। एह लेख में भोजपुरी के कम आ राजनीति के चरचा बेसी होखी। कुछ लोग के नीमन लागी, कुछ लोग के बाउर। कुछ लोग एकरा के अपना पर ले ली, कुछ लोग एकरा के दोसरा पर थोप दी।
राजनीति में भोजपुरी भा भोजपुरी के राजनीति एगो अलगा विषय हवे। भोजपुरी से जवन राजनीति खेलल गइल भा खेलल जा रहल बा ऊ सभे का सोझा बा। बस केहू ओकरा पर धेयान नइखे देत। काहे कि भोजपुरी के राजनीति पर सोचे के मौका त तब मिली जब भोजपुरी में राजनीति कइला से फुरसत मिल जाव। आम भोजपुरिया मनई एह राजनीति के समुझ नइखे पावत भा समुझे के कोशिशे नइखे करत। ओकरा अपना घर-परिवार, नौकरी-व्यापार से फुरसत नइखे। ऊ देखत सभके बा, बस चीन्हत नइखे।
भोजपुरी कई एक देशन में बोलल जाले आ हर देश के भोजपुरी कुछ ना कुछ अलगा होला। मारीशस के भोजपुरी, सूरीनाम के भोजपुरी, त्रिनिडाड के भोजपुरी के त बाते छोड़ दीं जब बनारस के भोजपुरी, गोरखपुर के भोजपुरी, छपरा के भोजपुरी, देेवरिया के भोजपुरी भा हर जिला-जवार के भोजपुरी एक दोसरा से अलग हो जाले। तीन कोस पर पानी बदले पाँच कोस पर बानी वाला कहाउत अइसहीं ना बन गइल। बाकिर एह पर केहू के धेयान नइखे। सभे अपना विचार आ हित के, हित के बेसी विचार के कम का पसार में लागल बा। भोजपुरी का नाम पर अनगिनत संस्था बाड़ी सँ, कवनो अखिल भारतीय, त कवनो विश्व वाला। बाकिर भोजपुरी वाला संस्था एकहू नइखे। बहुते पत्र पत्रिको भोजपुरी में बाड़ी सँ। कुछ बरीसन से प्रकाशित हो रहल बाड़ी सँ, कुछ बरीस दू बरीस से। भोजपुरी के कवनो अखबार नइखे, कवनो टीवी चैनल नइखे। एही कड़ी मेंं भोजपुरी के वेबसाइटो जोड़ लीहल जाव। अँजोरिआ के तेइस बरीस उमिर का दौरान अनेके वेबसाइट शुरु भइली सँ आ पत्र-पत्रिकने का तर्ज पर साल दू पाँच बरीस में बन्द होखत गइली सँ। अँजोरिआ एह चलते जिन्दा रह गइल कि ई एक आदमी के जाङर आ जजबात का चलते। ना त साधन आ संसाधन त बहुते वेबसाइटन का लगे अकूत रहल। कुछ के पाले-पोसे वाला मिल गइलें त कुछ टुकुर-टुकुर ताकते रह गइली सँ। अँजोरिओ के बन्द करे के एलान कर दीहल गइल रहल। ऊ त एगो भोजपुरी प्रेमी मिल गइलें जे एकरा हॉस्टिंग के खरचा सम्हार लिहलें आ अँजोरिआ के नया जिनिगी मिल गइल।
ई सभ बात त पता ना हम कई बेर कर चुकल बानी। आजु बात एकर ना होके भोजपुरी में राजनीति पर करे बइठल बानी। आ एह राजनीति के दोषी सभे बा। हर संपादक, हर प्रकाशक। काहे कि ओकरा अपना नाम के चिन्ता बा, भोजपुरी के ना। ऊ अपना हित-मीत के लिखलका प्रकाशित कर के इतिश्री कर लेत बा। बाकिर संपादक आ प्रकाशक के जिम्मेदारी का अतने भर होला?
जबे भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के सवाल होला तबे कवनो ना कवनो अमरनाथ अमरकंटक बन के हाजिर हो जालें। हालत ई हो गइल बा कि कवनो सरकार भोजपुरी के मान्यता देबे के सोचते नइखे। अनगिनत लोक भाषावन के हत्यारिन हिन्दी के बस आपन चिन्ता बा कि कसहूं ओकर बहुमत बनल रहे। अब त भोजपुरी के हिन्दी के उपभाषा मान लीहल गइल बा। ओह हिन्दी के, जवना के जनम भोजपुरी का बाद भइल। बाकिर राजनीतिक संरक्षण पा के ऊ अपना बड़की बहिनियनो से बड़ बन गइल। भोजपुरी के सबले बड़हन कमी गिनावे ला लोग एकरा वर्तनी के विविधता के सवाल उठावेला। आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स का जमाना में परेशान बाड़ें ओकर संपादक कि कवना भोजपुरी के मानक मानल जाव? आ जबले कवनो मानक ना होखी तब ले कवनो प्रकाशन, कवनो वेबसाइट, कवनो अखबार पसार ना पा सके।
त का ई काम भोजपुरी के संस्था, सम्मेलन, वेबसाइट, पत्रिका के संपादकन के जिम्मेदारी ना होखे के चाहीं, कि एगो मानक बनावे का दिसाईं काम होखे। कवनो भाषा के वर्तनी के स्थिर बनावे में ओह भाषा के पत्र-पत्रिका, पुस्तक, साहित्य के बड़हन योगदान होला। काहे कि बोललका के असर ओतना ना होखे जवन छपलका के होखेला। आजुओ सोशल मीडिया के पसार चाहे जतना हो गइल होखे बाकिर अखबारन में छपल खबर आजुओ बेसी प्रामाणिक मानल जाला। काहे कि ऊ छपल बा। आजु अउरी लिखनिहारे ना भोजपुरी के स्थापित आ पोढ़ पत्रिकनो के संपादक वेबसाइट भा अपना पत्रिका पर कम फेसबुक, इंस्टाग्राम पर बेसी समय बितावेलें। आ ओहिजो कवनो पोढ़ चरचा होखे त कुछ काम होखे। अधिकतर लोग अंगूठा टीप के आपन काम चला लेलें। ई ना कि एक दू लाइन मे आपन राय दे देसु।
अगर रउरो कवनो पत्रिका भा वेबसाइट के प्रकाशन भा संपादन करीलें त एह पर राउर सोचल बहुते जरुरी बा। भोजपुरी के काम होखी त राउरो नाम होखी। ना त हम रउरा के सम्मानित करत रहब आ रउरा हमरा के। हर लिखनिहार मानो किरिया खा के बइठल बा कि दोसरा के लिखलका, दोसरका के पत्रिका, दोसरा के वेबसाइट के नामो ना लेब, देखल आ बतियावल त दोसर बात बा। हमार मजबूरी बा कि हमार शिक्षा भाषा आ व्याकरण के नइखे रहल कबो। बस भोजपुरी से नेह का चलते एह काम में लागल बानी। एहसे एह दिसाईं हमार कवनो प्रयास बेअसर होखी। अब रउरा सोचीं कि भोजपुरिये ना रही त राउर लिखलका, बोललका, छपलका के देखी-सुनी-पढ़ी?

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