अपने-अपने युद्ध : दुसरकी कड़ी
दयानंद पांडेय के हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद
(जानत बानीं कि रउरा पिछला कड़ी पढ़ लिहले बानी तबहियों इयाद करावल जरुरी लागल कि नइखीं पढ़लें त शुरुआत ओहिजे से करीं – अनुवादक)

एन. एस. डी. में जब ऊ दाखिला लिहलसि त घर में चारो ओर से विरोध भइल। ऊ नाटक में एक्टिंग पहिलहूँ करत रहल आ तब घरवालन के एतराज त रहल, बाकिर विरोध जइसन विरोध ना। बाकिर जब एन. एस. डी. में दाखिला लेबे चलल त घर में जइसे कुहराम मच गइल। बाकिर अजय त जइसे लँगोट बान्ह के तइयार रहल। एगो अजीब रोमांटिसिज्म ओकरा माथा पर सवार रहल। आ ऊ आखिर एन. एस. डी. में दाखिला लेइये लिहलसि। ई ऊ दिन रहल जब एनएसडियन के पाँख जहाँ-तहाँ उड़त आ पसरत रहल। तब ई ढेरमढेर टी. वी. चैनल ना रहलें। फेर दूरदर्शनो के पाँख बहुते छोट रहल आ फिलिमन में ओम शिवपुरी ले झंडा गाड़त रहलें। ई समानांतर फिलिमन के दिन रहल। नसीर, राजबब्बर, कुलभूषण, रंजीत, रैना के नाम एनएसडियन अजीब उत्साह से उच्चारत अपना के ओही लोग का साथे पावत रहलें। बाकिर सचहूँ सभका भाग्य में ऊ रुपहुला परदा, पैबंद बन के सही, ना लिखाइल रहल।
अजय के भाग्यो में ना लिखाइल रहल।
अजय जब एन. एस. डी. आइल रहल त ई सोच के कि अभिनय के नया प्रतिमान गढ़ी, तहलका मचा दी। बाकिर दोसरा साल जब ओकरा के क्राफ्ट में विशेषज्ञता हासिल करे खातिर चुनल गइल त ऊ अवाक रह गइल। बहुते हाथ-पाँव मरला पर ओकरा के निर्देशन में डालल गइल। बाकिर ऊ हार माने वाला ना रहल। निदेशक के कनविंस कइलसि। ऊ मान गइलें आ ऊ फेर अभिनय में आ गइल। बाकिर बाद में ओकरा का लागल, ओकर बैचमेट से ले के लेक्चरर ले ई एहसास करावे लागल लोग कि एक्टिंग के जर्म्स ओकरा में बड़ले नइखे। ऊ बेकारे समय बरबाद करत बा।
अजय के पहिल सपना इहँवे टूटल।
अजय ओह दिन पहिला बेर दाढ़ी बढ़ावल शुरू कइलसि। दाढ़ी बढ़ा लिहला से एगो बात ई भइल कि लोग कहे लागल कि अजय के मुखाभिनय में भारी फरक आ गइल बा। अब उहे लोग, जे कहत रहल कि अभिनय अजय का बूता के बात नइखे, कहे लागल कि अजय नसीर के नकल करेला। बाकिर अजय के कहनाम रहल कि ऊ नसीर के नकल ना करे। ओकर मुखाभिनय में कवनो फरको ना आइल रहल। अभिनय के उहे रेखा ऊ अबहियो गढ़त रहल। फरक बस अतने रहल कि ओकरा चेहरा पर दाढ़ी जम गइल। दाढ़ी शायद ओकर नया सपना रहल। ओही दिन मोहन राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ में जब अजय क्राफ्ट आ अभिनय दुनु जिम्मेदारी एक साथे निभवलसि त निर्देशक फ्रिट्ज वेनविट्ज ओकरा के गले लगा लिहलें। फेर त ऊ उनुकर प्रिय हो गइल। अतना कि ओकरा लागे लागल कि ओकरा अभिनेता ना, निर्देशक होखे के चाहीं। अजय के उधेड़बुन बढ़त जात रहल। ऊ ठीक-ठीक तय ना क पावत रहल कि ऊ का बने—अभिनेता कि निर्देशक? कि क्राफ्ट्से में लवट जाव। हालाँकि अब कुछ संभव ना रहल। इहे ऊ दिन रहल जब ऊ चरसो पिए लागल रहे।
का उधेड़बुन से बचे खातिर?
एक दिन एन. एस. डी. का सोझा वाला लॉन में बइठल ऊ सुट्टा मारत रहल कि अचानक कथक केंद्र का भीतर से एगो लड़की के जोर-जोर से बोले के आवाज सुनाइल। बाकिर ई आवाज रह-रह के रुक जात रहल भा आवत-आवत ठहर जात रहल। चरस अबहीं ओकरा पर असर ना कइले रहल भा शायद असर अबहीं आधा-अधूरा रहल, ठीक-ठीक इयाद नइखे। बाकिर ऊ एकाएक उठ खड़ा भइल आ लगभग दउड़त कथक केंद्र में घुस गइल। ओह लड़की के आवाज में अजीब कातरता आ लाचारी समाइल रहल कि अजय अचानक हिंसक हो उठल। कथक केंद्र के महाराज जी के ऊ मरलसि त ना, बाकिर जोर से धक्का दिहलसि आ ऊ फर्श पर गिर पड़लें। जाँघिया पहिनले महाराज मुँह का भरे फर्श पर अइसन गिरलें कि मुँह से खून गिरे लागल। एह तरह महाराज जी के बाँह से ऊ लड़की छिटक के देवाल से अइसन जा भिड़ल कि ओकर रुलाई घुँघरू के झंकार में झनझना के रह गइल। ओकर आँख से लोर अइसन लुढ़कल कि अजय के बेगम अख्तर के गायकी इयाद आ गइल—‘‘रस की बूंदें पड़ें।’’ हालाँकि ई गायकी इहाँ मुनासिब ना रहल। बाकिर ओकरा सूझल इहे।
ई अलका रहली।
भइल ई रहल कि कथक केंद्र में अलका के पहिलका साल रहल, एहसे महाराज जी उनुका पर कुछ जादे कृपालु हो गइलें। उनुका अलका में अप्रतिम प्रतिभा लउके लागल। एहसे ऊ उनुका के आपन शिष्या बना लिहलें। शिष्या त अलका बन गइली, बाकिर महाराज जी के ‘‘सेवा’’ करे में आनाकानी करे लगली। आ महाराज के अदा ई रहल कि बिना ‘‘सेवा’’ करवले ऊ सिखावत ना रहलें। ‘‘सेवा’’ आ ‘‘सीखे’’ के बीच जे अन्तर्द्वंद्व शुरू भइल त ऊ खिंचते गइल। अकसर महाराज जी कुछ खास सिखावे खातिर उनुका के साँझ के अकेले बोलावस। बाकिर छोट शहर के अलका पहुँचस त कवनो ना कवनो सहेली के ले के। महाराज जी कथक नृत्य के पुरोधा रहलें, कई-कई पुरस्कार आ प्रशस्ति से विभूषित। उनुका ‘‘आशीर्वाद’’ का बिना कथक में केहू के ‘‘एंट्री’’ ना मिले, केहू कलाकार ना बन सके आ कम से कम उनुका कथक केंद्र के डिग्री त ना पा सके। ओही महाराज जी के आँख में कौंध गइल रहल ऊ अलका नाम के कन्या। आ अइसन कबो ना भइल रहल कि कथक केंद्र के कवनो कन्या उनुका आँख में समाव आ उनुका बाँह में समइले बिना, जाँघ पर बइठले बिना रह जाव। त जे कन्या उनुका आँख के चकाचौंध करे, नस में उमंग भर दे, आह में रमे, ओकरा के ‘‘शिष्या’’ बनावे के इच्छा ऊ बहुते शाकाहारी ढंग से जाहिर करस। आ भला कवना कन्या के ई हसरत ना होखे, अतना बड़ गुरु महाराज के शिष्या बने के चाह ना होखे? त ऊ ओकरा के अकेले बोलावस। पहिले गोड़ दबवावस; गोड़ दबवावत-दबवावत कन्या के हाथ दबावस। ई दोसर चरण रहल। तीसरा चरण में ऊ कन्या के हाथ धीरे से अपनी जाँघ का बीचे खींचस। आ कन्या तनी संकोच करे त बड़ी मनुहार से ओकरा के नृत्य के चकमक आ जगमग दुनिया से नहवावस। अधिकतर कन्या नहा जा सँ आ जे नहाए में अफनास, ओहनी के ऊ गंडा बान्हे के तजबीज देस। त कुछ गंडा के गंध में आ जास आ बिछ जास गुरु महाराज के ‘‘सेवा’’ में। कुछ तबो महाराज जी के अपना के सौंपे का बदले आपन चप्पल भा थप्पड़ सौंप देस।
अलका ओही कुछेक कन्यन में से एक रहली।
अलका के जब महाराज जी शुरू में अकेले आवे के नेवता दिहलें त पहिले त ऊ टार गइली। बाकिर नेवता के दबाव जब जादे बढ़ल त जाए के पड़ल। बाकिर गइली सहेली का साथे। आ जब कबो गइली त सहेली का साथे। सहेली का सोझवे ऊ महाराज जी के गोड़ दबवली, बाकिर तनी झिझक का साथे। हफ्ता भर अलका के झिझक आ अपना हिचक से लड़त रहलें महाराज जी। अलका के सहेली उनुका खटकत रहल। त एक दिन ऊ ओकरा सहेली के बड़ी बेरुखी कहीं भा बदतमीजी का साथे, लगभग अपमानित करत टरका दिहलें। अलका तब बाथरूम गइल रहली। आ जाहिर बा कि नहाए ना गइल रहली। काहे कि उनुका के त महाराज जी नहवावे वाला रहलें।
दोसरा दिन अलका का साथे उनुकर सहेली ना आइल। अलका के अकेले आवे के पड़ल। महाराज जी के राहत मिलल। आ गोड़ दबवावत-दबवावत ऊ अलका के हाथ दबा दिहलें। धीरे से। अलका एकरा के अचानक भइल मान के महाराज जी के गोड़ दबावत शिष्या धर्म निभावते रहली कि ऊ फेर उनुकर हाथ दबवलें। आ भरपूर दबवलें। अलका तनी झिझकली। बाकिर गोड़ दबावत रहली। महाराज जी सोफा पर बड़हन जाँघिया पहिनले बइठल रहलें। अलका गौर कइली कि महाराज के जाँघिया आज कुछ जादे ऊपर खिसकल बा। ऊ तनी घबरइली। आ एही घबराहट में महाराज जी के अँगुरी पुटकावल शुरू क दिहली। बाकिर महाराज जी ‘‘ऊँ-हूँ’’ कहत उनुकर हाथ ऊपर खींच लिहलें। एकदमे निर्विकार भाव से। ऊ फेर गोड़ दबावे लगली। बाहर साँझ के अन्हार गहिरा गइल रहल। अलका के मन थरथराए लागल रहल। तबे महाराज जी फेर उनुकर हाथ धीरे से ऊपर खींचलें। बाकिर एकदमे अनमनस्क ढंग से। अब ऊ महाराज जी के मतलब बुझ गइली। काहे कि महाराज जी उनुकर हाथ अपना पुरुष अंग का ओर खींचे के अनायास ना, सायास कोशिश करत रहलें। बाकिर चेहरा के भाव अनायास वाला रहल। आ अलका गुरु जी के भारी व्यक्तित्व का दबाव में विरोध करे का बदले संकोच करत रहली। आ फेर ई सोचत रहली कि अगर विरोध कइली त बदनामी उनुके होखी। ऊ लड़की जात ठहरली। महाराज जी के का? फेर अचानक उनुका एगो जासूसी किताब इयाद आ गइल। मोहनलाल भास्कर के संस्मरण वाली जासूसी किताब ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’। एह किताब में अलका वइसे त कई गो रोचक किस्सा पढ़ले रहली। बाकिर एह घरी उनुका तुरन्त एगो किस्सा इयाद आवत रहल। पाकिस्तान के ओह शहर के नाम त इयाद ना आवत रहल, बाकिर किस्सा संछेप में ई रहल कि पाकिस्तान के कवनो शहर में एगो मौलवी साहब रहलें। अकेले में मेहरारुअन के झाड़-फूँक करस। किसिम-किसिम के मेहरारू उनुका शरण में पहुँचस। मौलाना के जब कवनो सुन्दर मेहरारू पर दिल आ जाव त झाड़-फूँक करत ऊ लगभग डाँटत बोलस, ‘‘नाड़ा खोल!’’ अधिकतर मेहरारू मौलवी के डाँट में आ के आपन नाड़ा खोल बइठस। आ मौलवी साहब के काम आसान हो जाव। मेहरारू बदनामी का डर से मौलवी का खिलाफ जबान ना खोलस। बाकिर जब एकाध मेहरारू मौलवी के डाँट ‘‘नाड़ा खोल!’’ पर एतराज करत उनुका के भला-बुरा कहे लागस त मौलवी तुरन्त पैंतरा बदल लेस। कहस, ‘‘कमबख्त औरत! नीयत तोहार खराब आ इल्जाम हमरा पर लगावत बाड़ू।’’ आ ऊ ओहिजे देवाल पर लागल एगो खूँटी देखावस, जवना में एगो नाड़ा बन्हाइल रहे। मौलवी साहब गरजस, ‘‘हम त ओह खूँटी पर बन्हाइल नाड़ा के खोले ला कहत रहीं। आ तू कमबख्त बदजात औरत हमरे पर तोहमत लगावे लगलू। भाग कमबख्त, अब अल्ला पाक के करम से हम तोहार इलाज ना क सकीं।’’ बेचारी मौलवी के मारल मेहरारू लवट के उनुका गोड़ पर गिर-गिर गिड़गिड़ाए लागे।
‘‘उफ्!’’ महाराज जी के बेर-बेर हाथ दबवला आ रह-रह के खींचत रहला से अलका बुदबुदइली। उनुका लागल कि बाहर से कहीं जादे अन्हार ओह कमरा में घिर आइल बा। आ मन में त एकदमे घुप्प अन्हार पसर गइल। ऊ सोचते जात रहली कि महाराज जी से कइसे पिंड छोड़ावसु। तबले महाराज जी पूरा ताकत से उनुकर हाथ खींच के, जहाँ चाहत रहलें, जाँघ का बीच रख लिहलें। आ गोड़ से उनुकर नितंब कुरेदलें। अलका पूरा तरह अफनाइल खड़ा भइली कि बगल के स्विच से बत्ती जरा देसु। ऊ उठली। उठले रहली कि महाराज जी कवनो शिकारी लेखा खींच के उनुका के बाँह में भींचे लगलें। उनुका गोदी में बइठले-बइठले उनुकर सगरी आन-मान भुला के अलका खींच के एगो थप्पड़ मरली आ छिटक के अलग होत लपक के बत्ती जरा दिहली।
महाराज जी के कनपटी लाल हो गइल रहल। बाकिर ऊ जइसे हार माने वाला ना रहलें। लगभग नृत्य मुद्रा में ऊ फेर अलका के पीछे से दबोच लिहलें। बत्ती के परवाह ना कइलें। ईहो ना सोचलें कि खिड़की-दरवाजा सब खुलल बा। आपन आन-मान आ उमिरो के धेयान भुला गइले रहलें। जइसे उनुकर सुध-बुध हेरा गइल रहल।
बाकिर अलका गरजली। उनुका के धिक्करली। चीख-चीख के धिक्करली। शर्म-हया आ उमिर के पाठ पढ़ावत फेर धकियवली। बाकिर महाराज जी जइसे शिष्या से कुछ सीखे-सुने के तइयारे ना रहलें। ऊ त खाली आपन पाठ पढ़ावे के हड़बड़ी में अलका नाम वाली कन्या के काबू में करत नृत्य के दोसर मुद्रा धारण क के फेर दबोच लिहलें। अलका फेर चिल्लइली। चिल्लइली, ‘‘दुष्ट, पापी, अधम कुकुर, हरामी!’’ आदि जतना तरह के शब्द उनुका जबान के डिक्शनरी में समा पवलें, ऊ उच्चारत आ चिल्लात रहली। बाकिर महाराज जी हर ‘‘अलंकार’’ सहज भाव से स्वीकारत-स्वीकारत बेर-बेर नृत्य मुद्रा बदल लेत रहलें। अद्भुत रहल उनुकर ई नर्तन, जे अलका के अशिष्ट वाचन का बावजूद सहज रूप से जारी रहल। जब अचानक अजय उनुका के ढकेललसि, तबो ऊ अलका के लगभग दबोचले, बाँह में धइले कवनो नृत्य मुद्रे में रहलें।
खैर, अजय अलका के ले के बाहर आइल। बाहर आ के अलका आपन घुँघरू उतार दिहली। आ दोसरा दिन ऊ कथक नृत्य के त ना, बाकिर कथक केंद्र के अलविदा कहे के सोचली। अजय से रोवत-रोवत ई बात कहली। ई बात अजय के ना भावल।
अजय उनुका के ढाढ़स बँधवलसि आ कहलसि कि महाराज कथक नृत्य के कवनो ठेकेदार त हउवें ना। आ ई कथक केंद्र उनुका बाप के नइखे। तबो अलका तीन दिन ले कथक पढ़े-सीखे ना गइली। कमरा में गुमसुम पड़ल लेटल रहली। चउथा दिन भोरहीं अजय हास्टल में उनुका से मिले आइल। फेर हौसला बँधवलसि। अलका कथक केंद्र जाए लगली। कथक केंद्र का जाए लगली, अजय से भेंट बढ़े-बढ़ावे लागल।
एन. एस. डी. में ई शायद पहिला बेर होत रहल कि कवनो लड़िका एन. एस. डी. से बाहर के लड़की का साथे जोड़ा बना के घूमत होखे। ना, अइसन कुछ मामला जरूर रहल, जवना में एन. एस. डी. का बाहर के नाम पर एन. एस. डी. रेपेट्री का साथे खास कर के कवनो लड़की जोड़ा अपना लिहले होखे। बाकिर एकरा अलावा अउरी कहीं ना।
अजय के एने एन. एस. डी. में आ ओने अलका के कथक केंद्र में ई आपत्ति एक ना, कई बेर मजाके-मजाक में झेले के पड़ल। बाकिर शायद लोकेंद्र—हँ, लोकेंद्र त्रिवेदी नाम रहल ओह लड़िका के—एक दिन अचानक ई आपत्ति खारिज क दिहलसि कि, ‘‘एन. एस. डी. का बाहर अजय पेंग जरूर मरले बा, बाकिर बावे कैम्पस का भीतरे। माने बहावलपुर हाउस का भीतरे। एहसे ऑब्जेक्शन ओवररूल्ड।’’ कहत ऊ दियासलाई के डिबिया कैरम के गोटी लेखा अइसन उछललसि कि ऊ गिलास में घुस गइल। ई खेल ओह दिना एनएसडियन का बीच आम रहल।
अलका-अजय अब दू देह आ एक जान रहलें। संजोग से दुनु यू. पी. के रहलें। त ई लगावो काम आइल। बाकिर दुनु अलग-अलग जाति के रहलें। एहसे दुनु अचानक जब बियाह करे के ठान लिहल लोग त जाहिर बा कि दुनु के घरवाला विरोध कइल लोग। बाकिर विरोध के भाड़ में डाल के बियाह क लिहल लोग। अलका-अजय से अब ऊ अजय-अलका हो गइल रहलें। अबले अजय एन. एस. डी. से एन. एस. डी. रेपेट्री में आ गइल रहल। अलका कथक केंद्र बीचहीं में छोड़ दिहले रहली। जाहिर बा कि अन्त में महाराजे जी कारण बनलें। बाकिर अलका के कबो एकर पछतावा ना भइल। बलुक कबो-कबो त एह घटना के अपना खातिर शुभो मान लेस। कहस, ‘‘ना त अजय कइसे मिलितें!’’
संजय जब अजय-अलका से मिलल, तबले अजय एन. एस. डी. रेपेट्री छोड़-छाड़ के बिजनेस के जुगाड़ में लाग गइल रहल। एगो सेकेंड हैंड लैंब्रेटा स्कूटर ले के ओही पर दउड़त रहे। नाटक-वाटक अब ओकरा खातिर ओतना महत्त्वपूर्ण ना रह गइल रहल। एन. एस. डी. के डिग्री ओकरा बेमानी लागे। आ अन्त में अलके का तरह ऊहो एन. एस. डी. आ नाटक के ‘‘अइसहीं’’ मनला का बावजूद महत्त्वपूर्ण एहसे माने कि ओही का चलते ओकरा अलका मिलल रहली।
अलका-अजय—ओह, सॉरी, अजय-अलका—बियाह भले घर-परिवार के विरोध का बावजूद कइले रहलें, बाकिर अब दुनु परिवार के स्वीकृति के मुहरो लाग गइल रहल आ दुनु ओर से बाकायदा आवल-जावल शुरू हो गइल रहल। अजय के बिजनेस खातिर ओकर पिता उकसवलें आ एह काम खातिर कुछ रुपियो दिहले रहलें। एक दिन संजय अचानक अजय-अलका का घरे पहुँचल त दुनु कहीं गइल रहलें। बाकिर ओही घरी अजय के पितो पहुँचल रहलें। छूटते संजय से पूछलें, ‘‘तूहूँ नाटक करेलऽ?’’ उनुका पूछे के ढंग तनी अजीब रहल। अइसन जइसे पूछत होखसु, ‘‘तूहूँ चोरी करेलऽ?’’
बाकिर जब संजय लगभग ओही अंदाज में कि, ‘‘का तूहूँ चोर हउवऽ?’’ कहलसि, ‘‘ना।’’ आ बड़ी कठोरता से दोहरवलसि, ‘‘ना, एकदमे ना।’’ त ओकर पिता तनी सहज भइलें आ बतवलें कि ऊ अजय के पिता हउवें। त संजय आदर आ विनय का साथे उनुका के परनाम कइलसि।
ऊ बहुते खुश भइलें।
फेर बाते-बात में जब जनलें कि संजय पत्रकार हवे त तनी अनमना भइलें, आ जब ई जानलें कि ऊ नाटक वगैरह के समीक्षो लिखेला त फेर संजय से उखड़ गइलें। जवना संजय के लिहाज आ संस्कार के तारीफ करत थोड़ी देर पहिले ना अघात रहलें, ओही संजय में अब उनुका अवगुणे-अवगुण लउके लागल। ऊ धाराप्रवाह चालू हो गइलें, ‘‘आजुकाल्हु के छोकरन के दिमागे खराब बा। काम-धंधा छोड़ के नौटंकी में चल जालें।’’ ऊ हाँफे लगलें, ‘‘आ तू अखबार वाला लोग एह छोकरन के छोकरियन का साथे फोटू छाप-छाप, तारीफ छाप-छूप के अउरी दिमाग खराब क देलऽ। जानेलऽ, एह नौटंकी आ अखबार में छपल फोटू से कहीं जिनिगी के गाड़ी चलेले?’’ वगैरह-वगैरह ऊ गारियन के संपुट का साथे बड़ी देर ले उच्चारत रहलें। फेर जब थाक के चुप हो गइलें त संजय लगभग विनयपूर्वक उनुका से आज्ञा माँगत चले लागल, त ऊ फेर फूट पड़लें, ‘‘नौटंकी वालन का साथे रहत-रहत तोहरा एक्टिंगो आ गइल बा! हम तब से अतना भला-बुरा बकले जात बानीं आ तू तबो गोड़ चाँपे वाला अंदाज में इजाजत माँगत बाड़ऽ।’’
‘‘ना, हमरा तनिको खराब ना लागल। आ फेर रउरा बुजुर्ग बानीं। अजय के पिता हईं। हम एक्टिंग काहे करब? आइबो ना करे हमरा।’’ संजय कहलसि त ऊ फेर सामान्य हो गइलें। कहलें, ‘‘एक्टिंग ना आवे त एक्टरन का बारे में लिखल छोड़ दऽ। बहुते लोग के भला होई।’’ संजय हँसत चल दिहलसि। फेर सोचलसि, अजय रंगकर्म कइसे निबाहेला?
आ आज प्रेस क्लब जात अजय के पिता के ई बात सोच के ओकरा फेर हँसी आवत रहल कि एक्टिंग से छोकरा बरबाद हो जालें। फेर ऊ अपने सोचलसि, का एक्टिंगो से छोकरा बरबाद हो जालें? एकदमे ‘पाकीजा’ फिलिम के ओह संवाद के तर्ज पर कि ‘‘अफसोस कि लोग दूध से भी जल जाते हैं।’’ फेर अचानक सोचलसि कि एक्टिंग करे वाला छोकरा बरबाद होलें कि ना, एह पर ऊ बाद में सोची। फिलहाल त ओकरा ई सोचे के बा कि एक्टिंग सीखे वाला छोकरा आत्महत्या काहे करेलें? उहो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में। कबो पेड़ पर फाँसी लगा के, कबो छत के पंखा से फाँसी लगा के। त कुछ अँगुरी से नँहिए निकाल के काम चला लेलें। आ आत्महत्या पर विराम लगा देलें।
त का ई एन. एस. डी. के डायरेक्टर पद से इब्राहिम अल्काजी के चल गइला के खालीपन रहल, भा कारंत के निदेशकीय क्षमता के ह्रास? भा कारंत आ अल्काजी के बारी-बारी चल गइला के छटपटाहट के आँच रहल, अनुशासन आ प्रशासन के नपुंसकता के थाह लेत समय के चाल रहल, कि एनएसडियन के टूटत महत्त्वाकांक्षा के विराम रहली सँ ई आत्महत्या? भा नया निदेशकन के अक्षमता आ अनुभवहीनता के नतीजा?
(पता ना एकर जवाब का मिली आ अजय-अलका भा अलका-अजय के कहानी का अइसने बनल रही। जाने खातिर फेर अगिला कड़ी पढ़े आवे के पड़ी – अनुवादक)
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उपन्यास सूची

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