तीन में कि तेरह में?
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-63
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

तीन में कि तेरह में?

लभेरन अभी पहुँचते बाड़े कि काकी के छोटका नतिया हाँफत-हाँफत आइल आ कहे लागल कि बसरोपन चाचा भगेलू चाचा के बार-बार कहत रहले हा कि “तूँ तीन में हवऽ कि तेरह में?” आ अतने पर भगेलू चाचा भभकि जात रहले ह। अब त काकी के एगो नीमन विषय भेंटा गइल। ऊ लभेरन से कहली कि अब आजु एही विषय पर तहरा बोले के बा। लभेरन चउकी पर पालथी मारि के ब्यास नियन बइठि गइले आ बोले शुरू कइले।

ओइसे त ‘तीन बुलाए, तेरह आए’ जइसन कहाउत हमनी किहाँ बहुत प्रचलित बा बाकिर एकरा में ‘तीन’ छोट संख्या आ ‘तेरह’ बड़ संख्या खातिर बतावल गइल बा। माने, एकर प्रतीकार्थ लिहल जाला। एकरा पर हम बहुत मंथन कइलीं बाकिर वास्तविक अंक के बात कइल जाउ त ई कनौजिया ब्राह्मण लोग से संबंध राखऽता।

कान्यकुब्ज ब्राह्मण में बड़ आ छोट का विभाजन के प्रकृति रहे। ‘बिसुआ’ जइसन पहचान के मुख्य आधार केहूँ के अपना से कम आ अधिका बतावल रहे। बाद में सरयूपारीण कान्यकुब्ज‌‌ ब्राह्मणो में ई प्रवृत्ति देखल गइल, जवन तीन (सर्वश्रेष्ठ) आ तेरह (श्रेष्ठ) का रूप में जनाए लागल। बाद में ई मुहावरा का रूप तक प्रतिष्ठित हो गइल। आजुओ लोग कहेला कि “तूँ तीन में हवऽ कि तेरह में?” हमरा लागऽता कि एकरे से विकसित हो के एगो कहाउत बनल- “तीन कनौजिया तेरह चूल्हा।”

ई मानल जाला कि ‘कन्नौज’ कान्यकुब्ज ब्राह्मण के मुख्य स्थली हटे, जहाँ से कनौजिया पूरा भारत में फइलले। सरयू नदी पार कइला का बाद जे कनौजिया फइलले, ओह लोगन के सरयूपारीण कान्यकुब्ज‌‌ कहल गइल आ बाद में चलि के कनौजिया आ सरजूपारी कहल गइल। बिहार में सरयूपारीण कान्यकुब्ज‌‌ अपना के कनौजिया (कान्यकुब्ज) कहेलन आ उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग में सरजूपारी (सरयूपारीण) कहेलन।

डॉ. शारदा पाठक के ‘सरयूपारीण ब्राह्मण-परिचय’, पं द्वारिकाप्रसाद मिश्र, शास्त्री के ‘सरयूपारीण गोत्रावली’ आ ‘सरयूपारीण ब्राह्मणों का इतिहास’ ग्रंथन से एगो अवधारणा बनत बा कि ‘तीन घर’ आ ‘तेरह घर’ के ई वर्गीकरण सरयूपारीण ब्राह्मण समाज में सामाजिक प्रतिष्ठा आ बियाह संबंध तय करे खातिर बनावल गइल रहे। एहिजा से प्राप्त विवरण के खास बात ई बा कि एहिजा तीन आ तेरह खाली गिनती ना, बलुक कुछ विशिष्ट पारिवारिक समूह के पहचान करावे वाली संख्या ह। एह व्यवस्था से बाहर का लोगन के कम महत्त्व दिहल जात रहे। आजुओ जहाँ के ब्राह्मण समाज संख्या में ज्यादे बाटे, ऊ अपना के उत्तम आ बाकी के अपना से कम आँकेला। ई प्रवृत्ति ब्राह्मणे में ना, कम-बेसी सभे समाज में पावल जाला। हम त दू गो भवद्द में एक टोला का तिवारी लोगन के देखले बानी कि ऊ लोग अपना भवद्द मिसिर लोग किहाँ जब ‘बीजे करे’ जाई त अलगा से आपन नून लेके जाई। ओह लोगन के पूड़ी का सङे बुनिया आ दही चलावल जाई।

ई सुनते बड़का नतिया तड़ दे पूछि दिहलसि- “मइया, खाए चले खातिर ‘बीजे’ काहें कहल जाला?” तब लभेरन समुझावे शुरू कइले-

“बहुत पुरान शब्द हटे ‘बीजे’। एकरा समर्थन में ऑनलाइन कोश ‘हिन्दवी’ में ‘बिजे’ अउर IGNCA का ‘कल्याणी-कोश’ में ‘बिजहो’ मिलऽता। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) का वेबसाइट पर कल्याणी-कोश के एगो पीडीएफ उपलब्ध बा, जवना का पृष्ठ 459 पर ‘बिजहो’ के माने बतावल गइल बा- “भोजन के लिए निमंत्रित व्यक्ति से चलने का अनुरोध करने वाली अभिव्यक्ति।” व्याख्या में बतावल गइल बा- “पहले ‘जायब’ के स्थान पर ‘विजय करब’ जैसी अभिव्यक्ति का प्रयोग होता था; इस आधार पर ‘विजय हो’ का अर्थ ‘भोजनार्थ चलिए’ माना गया है।” एह ‘बिजहो’ शब्द से ‘बिजे’ आ फेरु ‘बीजे’ बनल। स्पष्ट बा कि ‘बीजे’ के माने भइल- “खाए खातिर चले के अनुरोध।” फेरु मुख्य बात पर लभेरन आ गइले।

“सरयूपारीण ब्राह्मण वंशावली का तीन घर (त्रिकुल) के पारंपरिक रूप से समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त रहे। तेरह घर (त्रयोदश कुल) के समाज में दोसरका आ सबसे प्रतिष्ठित स्थान मिलल रहे।

‘तीन’ के गोत्र आ घराना
1. गर्ग गोत्र, मामखोर के शुक्ल 2. गौतम गोत्र, मधुबनी के मिश्र 3. शाण्डिल्य गोत्र, सोहगौरा के त्रिपाठी/तिवारी।

‘तेरह’ के गोत्र आ घराना
1. सावर्णि गोत्र, इटारि पाण्डेय 2. गर्ग गोत्र, इटिया पाण्डेय 3. कश्यप गोत्र, त्रिफला पाण्डेय 4. वत्स गोत्र, नागचौरी पाण्डेय 5. कश्यप गोत्र, राल्ही मिश्र 6. शाण्डिल्य गोत्र, पाला त्रिपाठी 7. शाण्डिल्य गोत्र, पिंडी त्रिपाठी 8. घृतकौशिक गोत्र, धर्मपुर मिश्र 9. वत्स गोत्र, पयासी मिश्र 10. संकृति गोत्र, मलाँव पाण्डेय 11. गौतम गोत्र, काँचनी गुरुदुवान द्विवेदी 12. भरद्वाज गोत्र, बड़गों द्विवेदी 13. भरद्वाज गोत्र, सरारि द्विवेदी।

काकी जिज्ञासा कइली- “सही में पंडीजी लोग में केहू छोट आ केहू बड़ होला का?”
लभेरन कहले- बिल्कुल ना। सनातन परंपरा का अनुसार, सभे गोत्र कवनो ना कवनो श्रेष्ठ ऋषि (जइसे- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भारद्वाज आदि) का वंश-परंपरा भा शिष्य-परंपरा में आवेला। जब कवनो ऋषि दोसरा ऋषि से छोट भा बड़ नइखे हो सकत त उनुकर गोत्रो छोट भा बड़ कइसे हो सकत बा? खाली पंडिएजी ना, सभे बरोबर आ श्रेष्ठ बा।


सतमेझरा कैटेगरी के लेख-सूची

0 Comments

Recent Posts