नोकर प चाकर, ढाबा पर ओसारा
- डाॅ. रामरक्षा मिश्र

सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-59

आइल भोजपुरिया चिट्ठी

 

नोकर प चाकर, ढाबा पर ओसारा

आजु भोरे-भोरे लभेरन जब काकी किहाँ पहुँचले त देखले कि उनुकर बड़का नतिया मुँह फुलाके बइठल बा। लभेरन काकी से इशारा में पुछले कि बबुआ काहें रूसल बाड़े। काकी कहली कि कुछु ना, आजु-काल्हु लइका ढेर आलसी होखे लागल बाड़े सन। हाथ में एगो मोबाइल पकड़ा गइल बा त कहीं हिले के नाँवे नइखन स लेत। बड़का के एक गिलास पानी ले आवे के कहलीं हा त ऊ छोटका के कहि देलस हा। एही उमिरि में नोकर प चाकर, ढाबा पर ओसारा। ना चहते भी डाँटे के परल हा, अबहिंए ना अकिल खुली त बाद में त भगवाने मालिक बाड़े।

अब छोटका के मुँह खुलल- ‘नोकर प चाकर’ के माने का भइल दादी!

काकी बतावे लगली- केहूँ के कहला पर, जब ऊ ओह काम के अपने ना कइके ओही खातिर दोसरा के आदेश दे दी त कहाई- ‘नोकर प चाकर’।

अतना में बड़का के मन बदलि गइल आ ऊहो एगो बात पुछलसि- ढाबा आ ओसारा का होला?

तब लभेरन बतवले कि ढाबा एगो अइसन ऊँच जगह होत रहे, जहाँ लोग गप-शप करे खातिर भा तास खेले खातिर जुटत रहे। जरूरी नइखे कि ओकरा ऊपर छत होखबे करे। ऊ चऊतरो हो सकत बा। कुछ प्रदेशन में त भोजनालयो के ढाबा कहल जाला। ओसारा मतलब, जवना घर के छत त होखबे करे, ऊ विश्राम करे के भी जगह होखे। बइठकी के बइठकी आ मन कइल त ऊपर ओसारा में जाके तनि ओठँघि गइलीं। जो ढाबा के माने भोजनालय लिहलऽ त नीचे भोजन करऽ आ ऊपर जाके सूति जा। माने सुविधा पर सुविधा।

अतना पर काकी कहली- “माने जहँवा जतने सुविधा मिलेला, आदमी ओतने अउरी सुविधा अपना खातिर जोड़त जाला।”

तब लभेरन ओहमें जोरले- ‘नोकर प चाकर’ काम के सुविधा भइल आ ‘ढाबा पर ओसारा’ आराम के सुविधा। माने एह कहाउत में ‘काम से बाँचे के सुविधा’ अउर ‘जीवन में बढ़त सुविधाभोगिता’- दूनों के भाव एक सङे मिलत बा।

अब छोटका के मुँह खुलल- अंकल, एही प एगो कहनी सुना दिहीं।

लभेरन काकी ओर देखले आ सहमति पाके कहनी सुनावे लगले।

एक समय के बात हटे। बिहार का एगो गाँव में धरमदास बाबू नाँव के एगो जमींदार रहले। धरमदास बाबू के घर बहुत बऽड़ रहे। घर का आगा एगो लंबा-चौड़ा ढाबा रहे। गाँव के लोग जब-तब ओहिजा आके बइठसु, बतियावसु आ खेती-बारी के हाल सुनावसु। केहूँ के बैल बेराम बा त केहूँ का खेत में पानी के दिक्कत बा, केहूँ के बेटा शहर से आइल बा- सभ बात के चर्चा ओह ढाबा पर होखत रहे।

एक दिन बाबू साहेब ढाबा पर बइठल रहले। ऊ अपना नोकर रघु से कहले- “रघु, जाके हमरा खातिर एक गिलास पानी ले आव।”

‘जी मालिक’ कहिके रघु उठल जरूर बाकिर पानी लेबे ना गइल। ऊ आँगन में खेलत छोटकू के देख के बोलवलसि आ ओकरा से कहलसि कि बाबू साहेब पानी मङले हा, तनी दउरि के आनि द। छोटकू गिलास उठावे जाते रहल कि बाबू साहेब देख लिहले।

“अरे रघु! पानी त तोहरा से नु मँगलीं हा?”

रघु हाथ जोड़ के हँसत कहलस- “मालिक, छोटकू हमरा से छोट बा। ओकरा से काम करवले पर नु ऊ कुछु सीखी?” बाबू साहेब कुछ ना कहले।

दोसरा दिन बाबू साहेब बाजार से एगो कलम ले आवे के कहले। ओहू दिने रघु ऊहे काम कइले, छोटकू के कहि दिहलसि। तिसरका दिने घर का पिछुआरी से एगो बोरा उठा के ले आवे के रहे। अबकी छोटकू टारि दिहलसि। फेरु रघु मुनिया के कहले। ऊहो बहाना बना दिहलसि।

अब त बाबू साहेब जोर-जोर से हँसे लगले। बाबू साहेब कहले-

“वाह रघु! काम तोहरा से कहल जाई त तू छोटकू से कहबऽ। छोटकू मुनिया से कहिहें। मुनिया छोटन से कहिहें। छोटन स्कूल जाए वाला से कहिहें!” ढाबा के सभ लोग हँसे लागल।

एही में ढाबा का कोना में बइठल जगेसर काका धीरे से मुस्कुरा के कहले-

“बाबू साहेब, पहिले लोगन के बइठे खातिर ढाबा बनल। फेरु सोचल गइल कि धूप में काहें बइठी लोग? चलऽ, ओकरा आगे ओसारा बना दीं। अब लोग खाली बइठी ना, छाँह में आरामो करी।”

बाबू साहेब हँसत कहले-

“त काका, एह में खराबी का बा?” काका आँख दबावत कहले-

“सुविधा बढ़े में खराबी नइखे बाबू साहेब। बाकिर जब सुविधा के आदत पड़ जाला, त आदमी आपन जिमवारी भुला जाला। अब रघु के देखीं— काम करे के रहे, बाकिर काम खुद ना करी; छोटकू पर डाल दी। छोटकू छोटन पर टार दी। ई त हो गइल नोकर पर चाकर।”

“आ सुविधा बढ़ावत-बढ़ावत…?”

सभ केहूँ एके सङे बोलि उठल- “ढाबा पर ओसारा!” पूरा ढाबा ठहाका से गूँज उठल।

रघुओ हँसे लागल।

ओही दिन से गाँव में जब कवनो आदमी आपन काम खुदे करे का जगहा अपना से छोट पर टारि देइ त लोग मुस्कुरा के कहे लागे- “नोकर प चाकर, ढाबा पर ओसारा!” आ फेरु त धीरे-धीरे ई बात गाँव से जवार तक पहुँच गइल।

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