अनतफल
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-60
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

अनतफल

काकी के दूनो नतिया दुपहरिया ले उपास रहिके अगरा के अपना बाँहि में अनऽत बन्हववले सन आ घरे आके पूआ-पूड़ी खइले सन। अतने में लभेरनो पहुँचि गइले। बड़का नतिया काकी से जानल चहलसि कि पंडीजी थरियवा में हाथ हिलाके का करत रहले हा। काकी बतवली कि ई छीरसागर खोजे के लोक-परंपरा हटे। अनंत चतुर्दशी का दिने व्रत-कथा सुनला आ पूजा-विधान पूरा भइला का बाद एगो थरिया में स्वच्छ जल राखल जाला। पुरोहित आ जजमान दूनो ओह जल में हाथ डालिके हाथ चलावेले। पुरोहित पूछेलन- “का ढूँढ़ऽतार?” त जजमान कहेले- “छीरसागर।” तब पुरोहित पूछेले- “काहें खातिर?” त जजमान कहेले- “अनतफल पावे के।” फेरु पुरोहित पूछेले- “पवलऽ?” त जजमान जबाब देले- “पवलीं।” तब पुरोहित निर्देश देले- “माथे चढ़ावऽ।” एकरा बाद जजमान ओह थरिया का पानी के सरधा से माथा पर छिरकेलन आ एकरा बाद सभका माथा पर ऊ पानी छिरकल जाला। ई छीरसागर में अनंत भगवान के खोज आ अनंत फल पावे के सांकेतिक विधान हटे।

अब छोटका नतिया लभेरन से कहलसि- “अंकल, हम देर से गइल रहीं, एहसे पूरा कथा ना बुझाइल। रउआँ एक बार सुना दीं ना!”

लभेरन अनऽत के कथा सुनावे लगलन-
भादो सुदी चतुर्दशी के अनंत चतुर्दशी कहल जाला। एही दिने अनऽत के ब्रत होला। भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से एह ब्रत के महिमा आ कथा बतावत कहले कि ई ब्रत पाप के नाश करे वाला, मंगलकारी आ मनुष्य के कामना पूरा करे वाला हटे।
बहुत पहिले के बात ह। सुमंतु नाम के एगो विद्वान ब्राह्मण के बियाह भृगु ऋषि का बेटी दीक्षा से भइल रहे। कुछ दिन का बाद दीक्षा के एगो बेटी भइल। ओकर नाम शीला रखाइल। शीला बहुत सुंदर आ सुशील रहली। कुछ समय बितला का बाद शीला के माई दीक्षा बेमारी से गुजर गइली। सुमंतु फेरु से बियाह कइले। उनुका दोसरा पत्नी के नाम कर्कशा रहे। ऊ कठोर सुभाव के निष्ठुर आ झगड़ालू रहे।
समय बीतल आ शीला बियाह जोग हो गइली। एक दिन ओहिजा कौडिन्य मुनि अइले। सुमंतु शुभ दिन में शीला के बियाह कौडिन्य मुनि से कइ दिहलें। बियाह पूरा भइला का बाद सुमंतु अपनी पत्नी कर्कशा से दामाद के कुछ दक्षिणा आ दहेज देबे के कहले। ई सुनते ऊ खिसिया गइली। ऊ सुमंतु से झगड़ा कइली आ बियाह के मंडप तक उखारि दिहली। अंत में सुमंतु अपना सामर्थ्य का अनुसार कुछ सामान दामाद के देके बेटी शीला के विदा कइले।
कौडिन्य मुनि शीला का सङे बैलगाड़ी पर अपना आश्रम का ओर चलि दिहले। रास्ता में दुपहरिया खा ऊ लोग एगो नदी का किनारे पहुँचल। ओहिजा शीला देखली कि कुछ मेहरारू नदी का किनारे श्रद्धा से एगो विशेष ब्रत करत बाड़ी। शीला आदर से ऊहन लोग का लगे गइली आ पुछली-
“बहिनी लोग! रउआँ सभे ई कवन ब्रत करत बानी?”
मेहरारू लोग बतावल- “ई अनंत चतुर्दशी के ब्रत ह। एहमें अनंत स्वरूप भगवान विष्णु के पूजा होला।”
शीला कहली- “हमहूँ ई व्रत करे के चाहत बानी। कृपा करके एकर विधि बतावल जाउ।” तब मेहरारू लोग अनंत-व्रत के विधि बतावल।
शीला श्रद्धा से ओइसहीं अनंत भगवान के पूजा कइली, ब्रत कइली, नैवेद्य अर्पित कइली आ चउदह गाँठ वाला अनंत (धागा) अपना बायाँ हाथ में बान्हि लिहली। एकरा बाद ऊ अपना पति कौडिन्य के साथे आगे खातिर चल दिहली। जब ऊ लोग अपना घर पहुँचल, त अनंत भगवान का किरिपा से उनुकर घर धन-धान्य, गोधन आ संपत्ति से भर गइल।

कुछ दिन का बाद कौडिन्य मुनि के नजर शीला का बाँहि में बान्हल अनंत पर परल। ऊ पुछले- “ई हाथ में का बन्हले बाड़ू?” शीला विनम्रता से कहली- “ई भगवान अनंत के पवित्र डोरा हटे। भगवान अनंत का किरिपा से हमनी का घर में ई सुख-समृद्धि आइल बा।” कौडिन्य मुनि के एह बात पर विश्वास ना भइल। ऊ क्रोध में आके शीला का हाथ से अनंत-दोरक खींच लिहले आ ओकरा के आगि में फेंक दिहले। शीला घबरा गइली। ऊ तुरंत आग से दोरक निकाल के दूध में डलली आ फेरु अपना हाथ में बान्हि लिहली। बाकिर भगवान अनंत का अपमान का चलते कौडिन्य के धन-धान्य नष्ट होखे लागल।

तब कौडिन्य मुनि के अपना गलती के एहसास भइल। ऊ भगवान अनंत का खोज में जंगल देनी निकलि गइले। रास्ता में ऊ सभे से भगवान अनंत का बारे में पूछत आगे बढ़त गइले। अंत में कौडिन्य अत्यंत दुखी होके भगवान अनंत से प्रार्थना करे लगले- “हे भगवान! अज्ञानता में हमरा से जे अपराध भइल बा, ओकरा के छेमा करीं। हमरा पर किरिपा करीं आ आपन दर्शन दीं।” उनुकर सच्चा पश्चात्ताप आ भक्ति देखिके भगवान अनंत प्रसन्न भइले आ उनुका के दर्शन दिहले आ सङे सङ उनुका के दरिद्रता के नाश, धर्म आ अंत में विष्णुलोक का प्राप्ति के वर दिहले। भगवान श्रीकृष्ण अंत में युधिष्ठिर से कहले कि जे मनुष्य श्रद्धा से अनंत के ब्रत करेला आ एह कथा के सुनेला भा सुनावेला, ऊ पाप से मुक्त होके उत्तम गति के प्राप्त होला।

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