तोहरा बिना

जे जिनिगी बन के जीवन में आइल होखे, ऊ धीरे-धीरे आपन राह बनावत जिनिगी से एकदम बाहर निकल जाए त? अइसन लागेला जइसे कवनो दरपन होखे, जवना में रउरा अपना के देखत रहल होखीं, आ उहे दरपन झन्न से टूट के चकनाचूर हो गइल होखे। अब अपना के देखीं त कइसे देखीं? कुछ बुझाते नइखे। तूं जिनिगी में रहलू त लागे कि अतना सुन्नर जिनिगी हमरा कइसे मिल गइल! ओह समय के दरपन में तूं रहलू, हम रहनी। कवनो हवा नियर जिनिगी में दाखिल होके, बेचा गइल जमीन लेखा एह तरह दाखिल-खारिज हो जइबू, ई कहाँ जानत रहनी। अब जब तूं जिनिगी से दाखिल-खारिज होके निकल गइल बाड़ू त बेर-बेर अपना से पूछत रहत बानी कि तूं जिनिगी रहलू कि कवनो सपना—टूट जाए वाला सपना।
किरिच-किरिच टूट के बिखरत रहेलू। रिस-रिस के याद में चुअत रहेलू। जइसे भारी बरखा में कवनो खपरैल के छान्ह जगह-जगह से चुअत होखे। अतना चुए कि घर में कहीं ठाढ़ होखे के जगहो ना मिले। चुअत पानी में भींजल लाजिम हो जाए। याद बा, तोहरा बरखा कतना पसन्द रहे। बरखा में हमरा से सट के रहल तोहरा कतना नीमन लागे। बरखा होत रहे आ बरखा में भींजत अँगना के ऊ दशहरी आम के पेड़ हमनी देखत रहीं आ प्रेम के बरखा में भींजत रहीं। तूं जानेलू कि हमरा दशहरी आम बहुते पसन्द बा। दशहरी आम चूसल आ ओकर मिठास में डूबल होखला का बादे मेहरारू के प्रेम के मिठास में डूबल जा सकेला। एह सवाद के का कहल जाव! अतना कि तोहार छाती के हम दशहरी कहे लागल रहनी। दशहरी कहते तूं पुलक उठत रहलू आ हमरा के भरपूर प्रेम करे लागत रहलू।
तोहार दशहरी चूसल, ओकर मिठास के भास, एहसास आ दशहरी के नशीली गमक में तर तोहार ऊ मादक साथ—आजुओ सोचत बानी त तोहरा प्यार से भर जात बानी। अइसे जइसे कवनो मेहरारू पनघट से गगरी भर के चलत होखे, ओइसहीं हुमुक-हुमुक के, ठुमुक-ठुमुक के चले लागत बानी। लागेला जइसे मदमस्त होके नदी के पुल पर, पूरनमासी के रात पूरा चान देखत, हमार हाथ पकड़ले तूं आजुओ ठाढ़ बाड़ू। आ हम तोहरा के देखत बानी। कबो नदी, कबो चान, कबो नदी में चान आ कबो तोहरा के। आवत-जात लोग आ आसपास ठाढ़ लोग हमनी के देखत होखे। जब ई मंजर इयाद आवेला त इहे सोचत नदी के पुल पर जाके ठाढ़ हो जात बानी—अकेले। पूरनमासी होखे भा ना होखे, तोहार इयाद हर रात के पूरनमासी के रात बना देले। तोहार अरसी, तोहरा प्यार के दरपन टूट गइल बा; बाकिर नदी के पानी के अरसी?
नदी से पूछत बानी। नदी कवनो जवाब नइखे देत।
अब तूंहू कहाँ जवाब देलू। ‘यू डोंट’ के ताला लगा दिहलू, ऊ अलग। आ हम तोहरा के दिहल वचन के ताला में बन्द बानी—‘यस, मी डोंट।’ एहसे ना फोन, ना मेसेज, ना भेंट। हम बहुते अलग किसिम के प्रेमी बानी। दिहल वचन कबो ना तुड़ेनी। घर के शान्ति ना तुड़ेनी। सन्नाटा बुन लेनी। कवनो आवाज ना देनी। बाकिर पल-पल आवत तोहार इयाद के का करीं? नीमन बा कि एह पर तूं ‘यू डोंट’ के ताला नइखू लगवले। तोहार इयाद आवेला त विरह के चिता पर कवनो सती लेखा बइठ जात बानी। धू-धू जरत रहत बानी। विरह के एह चिता से खाली तुंही हमरा के निकाल सकेलू। बाकिर ना निकालबू, ई बात अब बढ़िया से जान गइल बानी। बाकिर तोहार इयाद? आह! ई तोहार इयाद आ विरह के ई चिता!
तोहरा इयाद बा, जबे तूं मिलत रहलू, बरखा बन के मिलत रहलू। आ हमहूँ बरखा बन के तोहरा भीतर बरसे लागत रहनी। तोहरा भीतर जइसे कवनो संगीत बाजे लागे—मद्धिम-मद्धिम। हम कवनो जलतरंग लेखा तोहरा देह में उतरत रहनी। धीरे-धीरे। तोहरा देह-सरोवर में। तोहरा देह-सरोवर में मन के डेहरी पुलक-पुलक जात रहे। प्रेम के एह बरखा में भींज के तूं जइसे वसुन्धरा हो जात रहलू—भरल-पूरल वसुन्धरा। प्रकृति हमनी के दुलरावे लागे, सावन के बरखा लेखा। प्रेम के एह बरखा में नहाइल, धुत्त, तोहार निरबसन देह जइसे कवनो अलसाइल, निढाल साँझ बन जात रहे। अइसे जइसे पूरा चान नदी में उतर आवत होखे—डुबकी मारत। कबो डूबत, कबो उतरात। जइसे लहरन का बीच चान हेरा-हेरा जाला। कबो-कबो तूं कहत रहलू कि लहरन पर कबो भरोसा मत करिहऽ। हम पूछत रहनी—काहे? त तूं कहत रहलू—लहर कहीं के कहीं छोड़ देली सँ। छोड़ दीहल लहरन के सुभाव ह। लहरन के बस इहे आवेला। त का तुहूँ कवनो लहरे रहलू, जे हमरा के छोड़ के चल गइलू—अनायास? नदी आपन किनारा से मिलत रहेली। कबो तूं नदी बन जा आ अपना एह किनारा से मिल जा। भले फेर लहर बन के छोड़ के चल जइहऽ। तोहरा इयादन के पूरा लश्कर बा।
तोहरा इयाद बा, जबे तूं मिलत रहलू, बाँहि में मिलत रहलू। तूं कबो एतनो फुरसत ना दिहलू कि हम कबो अपना से मिल सकीं। अबहियो महकत मीठ इयाद में मिलेलू—बाँहि में। काश, हरसिंगार लेखा अनगिन रंग आ उमंग लेके महकत मीठ इयाद में समा जइतू। आ जा! तूं कहाँ बाड़ू? हरियर घास पर बिछल गुलमोहर के नरम फूलन पर बइठ के बतियावल इयाद आवेला। गुलमोहर लेखा दहकत तोहार ओंठ इयाद आवेला। गुलमोहर के मधु में फेर डूबे के मन करेला। तोहार बिसाल आ सुडौल छाती, मृदंग लेखा तोहार नितम्ब आ गरदन का पीछे से झाँकत तोहार पीठ इयाद आवेला। तोहरा के दिहल ‘यू डोंट’ वाला वचन में बन्हा त गइल बानी, बाकिर लागेला कि उहाँ तोहरा लगे कुछ छूट गइल बा। अइसे जइसे हमहीं छूट गइल बानी—उहवें, तोहरा लगे। जाने का-का छोड़ आइल बानी—ऊ घाम, ऊ बादर, ऊ बरखा; ऊ आँख, ऊ सपना आ ऊ साजिशो, जेकरा के तोहरा के पावे खातिर हजार बेर तुड़त आ अपना नेह से जोड़त रहनी—तोहरा भीतर बसल मेह से। ई नेह, ऊ मेह आ ओकर शीतल फुहार। तोहरा छाती पर कपोल धके ऊ मदमाती मनुहार—ई सब तोहरा लगे छोड़ आइल बानी। हमार अँगुरी देखिहऽ। कहीं उहवें त नइखे रह गइल—तोहरा के हेरत, तोहरा के सहेजत, तोहरा के थपकी देत। हमार हथेलियो शायद उहवें रह गइल बाड़ी सँ—दशहरी के टोवत। हमार ऊ ओंठ, जवना पर तूं खुद बाँसुरी बनत ना अघात रहलू। आ कहत रहलू कि अइसहीं मद्धिम-मद्धिम तोहरा भीतर बाजत रहे के चाहत बानी—मालकौंस लेखा। काहे कि एहमें रिषभ आ पंचम सुर ना लागेला। एहमें गान्धार, धैवत आ निषाद कोमल लागेला। रात के तिसरका पहर भैरवी थाट से निकलल एह मालकौंस में तूं हरदम निबद्ध होखे के चाहत रहलू—मद्धिम-मद्धिम। हो सके त एह सब के सहेज-सम्हार के रखिहऽ—सुई-तागा लेखा। काहे कि तोहरा लगे बहुते कुछ छूट गइल बा। बेहिसाब। एह मालकौंसो के ओकर भैरवी थाट में बचा के रखिहऽ। काहे कि हम फेर-फेर आइब—कवनो रात के तिसरका पहर, तोहरा भीतर मद्धिम-मद्धिम उतरे। उतर के तोहरा के निबद्ध करे।
फेर से देखऽ। कुछ छूट गइल बा कि कुछ टूट गइल बा—उहवें तोहरा लगे। कि हमहीं टूट के तोहरा लगे छूट गइल बानी। देखऽ, हमरा के बचा के रखिहऽ। तनिका देखिहऽ त, उहाँ अउरी का-का छूट गइल बा। काहे कि तोहरा के देखे आ तोहरा से बिछुड़े के द्वन्द्व में हम अपना साथे कुछ ला ना पवनी। कुछ लइतीं त कइसे? अपना के तोड़ के तोहरा लगे छोड़ आइल बानी।
तोहरा इयाद बा, जाड़ा के घाम में जब तूं मिलत रहलू त तोहार नरम आ तात हाथ हमरा हाथ में आके कइसे पिघले लागत रहे। हमनी के सगरी सीमा टूट जात रहे। शुरुआती दिनन में जब हमनी कवनो रेस्तराँ में चोरी-चोरी मिलत रहीं त हम बहुते परेशान हो जात रहनी। आ ऊ बेर, जब मेट्रो में एकान्त पाके हम अचानक तोहरा के चूम लिहले रहनी—तोहरा इयाद बा कि तूं सिहर उठल रहलू। भीड़ के समुन्दर में चलत-चलत जब कबो तोहरा के छू दीं त तूं चिहुँक जात रहलू। चिहुँक के एकदम अनजान बन जात रहलू। बहुते बाद में तूं बतवले रहलू कि कई बेर तोहरो मन हमरा के चूम लेबे के भइल। बाकिर लाज आ मेहरारू-सुलभ संकोच का चलते आपन सगरी इच्छा दबा लेत रहलू। आ हँ, कोहरा से भरल ओह दुपहरिया में जब हमनी नदी किनारे हाथ में हाथ लिहले बइठल रहीं, तभिए पानी से एगो मछरी निकल के छपाक से फेर नदी में कूद गइल रहे। तूं जोर से चिल्लइलू—“अरे!”—आ हमार गोदी में गिर गइलू। अइसे जइसे कवनो देवाल गिर गइल होखे।
बहुत देर ले हम तोहार पीठ थपथपावत रहनी। हाथ अनायास पीठ से होत पहिले नितम्ब थपथपावे लागल आ अचानक, अनायास छाती दिस बढ़ गइल त तूं चिहुँक के उठ बइठल रहलू। आ बहुते कड़ाई से कहले रहलू—“नो!” तनिका देर बाद आपन शाल हमरा साथे ओढ़त धीरे से पूछले रहलू—“कोहरा में जाड़ ना लागेला का?” हमहूँ धीरे से बतवले रहनी—“ना लागे।” त तूं बुदबुदइले रहलू—“हँ, जानत बानी कि जब हम साथे रहेनी त रउरा के जाड़ ना लागे।” फेर पलट के पूछले रहलू—“बाकिर भूख? भूखो ना लागे?” जवाब में हम कहले रहनी—“एह मदमस्त कोहरा में तोहरा जाड़ आ भूख के इयाद कइसे आ गइल?”
एकरा बाद तोहार मादक छुअन हमरा के रोमांचित कर दिहले रहे। हमनी लवट के कार में आ गइल रहीं। हम तोहरा पर बेतहाशा चुम्मन के बरखा कर दिहनी। तुहूँ आपन संयम तुड़ दिहलू आ हमनी कारे में प्रेम के चरम सुख ले पहुँच गइल रहीं। बाद में हमनी अक्सर कार के इस्तेमाल करे लगनी। बाद में तूं एकरा के अक्सर ‘कार सेवा’ कहे लगलू। खुल के कहे लगलू—“आज कार सेवा खातिर समय निकालल जाव।” तोहरा इयाद बा, हमरा पर घुड़सवारी कइलो तोहरा बहुते पसन्द रहे। अक्सर फोन करके कहत रहलू—“आज घुड़सवारी करे के बहुते मन हो रहल बा। आज समय निकाल के आईं।” पहिलका ना, बाकिर समापन सत्र तोहरे घुड़सवारी से पूरा होत रहे। तूं जइसे सम्भोग के सवादे बदल दिहले रहलू। एगो देर साँझ, जब कोहरा घना हो गइल रहे आ चानी नरम, कोहरा हमरा के अइसे घेरत रहे जइसे हमार बाँहि तोहरा के घेर लेले आ तूं रीझ गइल रहलू। हमनी का भीतर प्रेम के एगो नदी बहे लागल आ दुनु जने के एक दोसरा से जोड़ दिहलस। लागल कि खाली तोहरे के ना, हम अपनो के पा गइल बानी। तोहरा इयाद बा ओस में भींजल ऊ बिहान, जब हम तोहरा प्यार के नरम ओस में भींज गइल रहनी। ऊ ओस आजुओ हमार मन में टटके बा।तोहरा इयाद बा, जब तोहार आँख आ ओंठ के कोलाज तोहरा कपोल पर रचात रहे, तभिए ओस के एगो बूँद गिरल आ हम तोहरा प्यार में नहा गइनी। ऊ ओस के बूँद रहे कि तोहार नेह, जे ओस बन के टपकल रहे?
तोहरा मालूम बा, जब तूं मिलत रहलू त मन अमृत से लबालब भर जात रहे। हमार मन अमृत-अमृत हो जात रहे आ तोहार देह नदी बन जात रहे। नदी में प्रेम के मछरी कुलाँच मारे लागत रहे। तूं मिलत रहलू त मन धरती बन जात रहे। इच्छा के पल-छिन में अनगिन फूल खिल उठत रहे। हमनी के प्रेम के झोपड़ी में एगो आग सुलगे लागत रहे। तूं मिलत रहलू त मन नील गगन बन जात रहे आ प्यार पंछी। साँझ जल्दी हो जात रहे। उड़त चिरई ठहर जात रहे। झुंड के झुंड चिरई कवनो तार पर बइठल लउके त तूं अचानक चल देत रहलू। प्रेम के एह बेला में घड़ी के सुई जइसे ठहर जात रहे। नदी जइसे बिकल हो जात रहे। तापमान सिफर हो जात रहे। तापमान के ई सिफर हमार मन तुड़ देत रहे। प्रेम के बहत नदी बरफ बन जात रहे। बिछोह ग्लेशियर के टुकड़ा बन जात रहे। हमनी के प्रेम के गीत ठिठुर के सुन्न हो जात रहे। “तूं फेर कब मिलबू?” हम धीरे से पूछत रहनी। तूं कुछ ना बोलत रहलू। बरफ पिघले के आसरा में प्रेम जइसे छुट्टी ले लेत रहे। फूल लेखा फेर खिले के आसरा में हमनी के प्रेम प्रतीक्षारत हो जात रहे—ऊ प्रेम, जे अमृत हो जाए के चाहत रहे।
इहे ऊ दिन रहे जब—‘है अपना दिल तो आवारा, न जाने किस पे आएगा’, ‘हर गम फिसल जाए, जब तुम साथ हो’ आ ‘मौसम ये रूठने-मनाने का है, अपने दामन की खुशबू बना ले मुझे’—अलग-अलग समय के ई तीनों फिलिमी गीत एके साथ गावे आ सुने लागल रहनी। ई कवन मनोविज्ञान रहे भला? जाने काहे, जाने काहे। हमनी के जीवन में गीत बहुते बाड़े सँ, बाकिर तोहरा से बड़ गीत जिनिगी में कबो ना मिलल। आजुओ तोहरा के गावत रहत बानी। देखत रहत बानी। तोहरा इयाद में जीयत रहत बानी। अइसे जइसे कवनो अमूर्त चित्र देखत होखीं। अबहीं हवा में तोहरा के खोजत रहनी। बादर मिल गइल त ओकरे से तोहार पता पूछ लिहनी। बादर कहलस—“पता त हमरा मालूम बा, बाकिर बहुते जल्दी में बानी, एहसे बता पावल कठिन बा। बरस सकत बाड़ऽ त हमरा साथे बरसऽ। पता अपने मिल जाई। अनायासे ओकरा लगे पहुँच जइबऽ, जेकर पता पूछत बाड़ऽ।” एहसे अब बादर ना, हम बरसत बानी—तोहरा ले पहुँचे खातिर।
आजकाल्हु शहर में बरखा के मौसम बा। बरखा में जब शहर झील बन जाला त एह विपदहूँ में तोहार आँख इयाद आवेली सँ। आवत-जात देखत बानी त तोहार आँख झील लेखा लउकेली सँ। सॉरी, शहर के सगरी झील तोहार आँख बन जाली सँ। त का हम बरखा बन जात बानी? का हमरा इयाद के बरखा से तोहार आँख झील बन जाली सँ? बरखा अधिका हो जाले त शहर में बाढ़ आ जाला। आबादी बाढ़ में डूब जाले। त का हम अधिका बरसे लागल बानी आ तूं प्यार के बाढ़ में डूब गइल बाड़ू? शहरन के पर्यावरण-सन्तुलन त बिगड़िए गइल बा। का प्यार में पर्यावरण-सन्तुलनो बिगड़ेला? बिगड़ेला त अउरी बिगड़े दऽ।
जइसे धरती पर ओस गिरत होखे, तूं हमार गोदी में गिरऽ। जइसे अन्हार में कवनो अँजोर लउकेला, तूं हमार आँख में लउकऽ—कवनो कुतूहल लेखा। जइसे चानी में कवनो नदी बहत होखे, ओकरा में नाव चलत होखे आ नदी के कवनो टापू पर नाविक के आस लेखा एगो दिअरी जरत होखे—ओइसहीं हमार मन में बहऽ। नाव लेखा मंथर-मंथर चलऽ आ कवनो आस लेखा दिअरी बन के जरऽ। हम नदी के उहे नाविक बानी। हमरा के प्यार के राह दऽ। दुलार के ऊ साँझ दऽ। मनुहार के ऊ मानो दऽ, जवन धरती सुरुज के पहिल किरिन के देले। हम माटी बानी। अपना प्यार के पानी में सान के कवनो मूरतकार लेखा हमरा के गढ़ऽ। कुम्हार लेखा हमरा के रउँदऽ। तरसऽ मत, बरसऽ। कवनो पोखरा लेखा हमरा के प्यार के पानी से भर दऽ। सिंघाड़ा के लत्तर लेखा हमार सरबस पर पसर जा। हम अइसने चाहत बानी। तोहरा इयाद बा कि कबो इहे तोहार आँख हमार नगर रहल करेली सँ। एह नगर के नदी में नहाके हम गंगा नहा लेत रहनी। तोहार सीबीआई लेखा आँख से कबो कुछ छिप ना पावत रहे। ऊ हमरा के सबकुछ बता देत रहली सँ। समुन्दर लेखा गहिर तोहरा आँख के सिलवट देख के पूरनमासी के चानी मन में उतर जात रहे—कहीं बहुते गहिराई में।
बाकिर अब कहाँ? अब त तूं मिलबो ना करेलू। बतियइबो ना करेलू। तूं भुला गइल बाड़ू कि तोहरा आँख के नगर के एगो बासिन्दा हमहूँ बानी। बासिन्दा बानी कि परदेसी? कि तोहरा आँख के नदी सन्यास ले लिहले बिया? आ तोहार ओंठ आ तोहार ऊ खिलखिलात हँसी! एक बेर तोहार ओंठ चूसत हम कहले रहनी—“ई ओंठ हवें कि बनारसी पान के गिलौरी? मन करेला गप्प से एकरा के कवनो गोलगप्पा लेखा खा जाईं। पान लेखा कूँच-कूँच के खाईं। फेर तोहरा के बाँसुरी लेखा बजाईं। तोहरा ओंठ के बाँसुरी बाजे आ हम तोहरा ओंठ के अकास में हेरा जाईं।” ई सुन के तूं सोरह बरिस के लइकी लेखा पुलक उठल रहलू। बाकिर हम करबो का करितीं? तोहार ओंठ कवनो बाँसुरी के धुन से अधिका मीठ बा। कवनो फूल से अधिका मादक, अधिका मोहक, अधिका दिलकश आ मध से अधिका मिठास घोले वाला तोहार ई रसगर ओंठ हमेशा से हमार कमजोरी रहल बा। एह ओंठन में जादू जगा के जब तूं हँसत रहलू त जइसे कतना गुलाब एके साथ खिल उठत रहे। लागे कि चंडीगढ़ के रोज गार्डेन हमनी का भीतर उतर आइल बा। ओकरा गमक में हम डूब जात रहनी। ओंठन का बीच कतना कनेर आ कतना कचनार ठाढ़ हो जात रहे।
कुछ इयाद बा? तब मन में बेला उमग उठत रहे। रातरानी खिल जात रहे। हरसिंगार के फूल झरे लागत रहे। मन फगुआ आ बसन्त हो जात रहे। अइसे जइसे तोहार नयन फगुआ होखसु आ ओंठ बसन्त। एह ओंठन के इन्द्रधनुष में अतना मोहित रहत रहनी कि सगरो दुख भुला जात रहनी। हमनी के संसार सुनहला हो जात रहे।
तोहरा के इयाद करत बानी त तोहरा साथे बितावल जाड़ा इयाद आ जाला। तनिका लकड़ी, तनिका आग। तोहरा साथे बइठ के लिहल कुछ साँस। तोहरा बाँहि में लिहल ऊ उसाँस इयाद आ जाला। एह चाँदनी रात में अउरी का चाहीं? मन करेला तोहरा से कहीं—ई मन ना ह, एगो धरती ह। तूं हमरा मन में अइसे पसर जा, जइसे धरती पर चानी पसरेले। जइसे कवनो झील पर कोहरा पसरेला। जइसे आधरतिया के कवनो मधुबन में गमक पसर जाले। ई रात ना ह, रात के रंग ह। तोहरा काँख आ गरदन के बीच रगड़ खात हमरा नाक में पसरत सुगन्ध ह। ई तोहार खिलखिलात मन आ मौन ह—तोहार चूड़ी लेखा खिलखिलात। समय के कैमरा एह चानी के गमक के दर्ज कर लेव। एह चानी रात में तोहरा के देख लेव। एह चानी रात में तोहरा के चीन्ह के इयाद के गठरी में बान्ह लेव। चानी तनिका तोहरा रूप के जाल में मचल लेव। तोहरा घन केस में उलझ लेव। तूं हमार बाँहि में रुक जा। एह जाड़ रात में तोहार आग बहुते जरूरी बा—जीए खातिर। तबले रुक जा। बाकिर कहाँ!
तोहरा इयाद बा, कतना मन रहे कि कवनो चानी रात में तोहरा साथे कवनो छत पर पूरा रात बिताईं। ‘ठंडी सफेद चादरों पे जागें देर तक, तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए’ वाला गीत गुनगुनावत, छत पर पड़ल-पड़ल गावत रहीं। तोहरा से अक्सर ई बात कहत रहनी। बाकिर पूरनमासी के चान त तूं देखत आ देखावत रहलू—कबो नदी किनारे से, कबो कवनो फ्लैट के बालकनी से। बाकिर कवनो छत पर अइसन चानी रात कबो नसीब ना भइल कि तोहार गुदगुद नरम देह साथे बेफिकिर होके ओह चानी में नहइतीं आ तोहरा के अपना प्यार में नहवइतीं। बाकिर ई सपना अधूरा रह गइल त अधूरे रह गइल।
सपना में त तूं आजुओ मिलेलू। अइसे मिलेलू जइसे नदी के पानी—छू के निकल जालू। हमरा के अपना साथे बहा के काहे ना ले जालू? सपने में सही, तोहरा मिले के रूपो अजब-गजब होला। कबो कवनो नदी में आइल बाढ़ लेखा भरल-पूरल। कबो जमुना के पाट लेखा दूर ले फइलल-पसरल। कबो सरयू लेखा घाघरा के समेटले, छाती तान के गीत गावत। कबो तीस्ता लेखा चंचल त कबो ब्यास लेखा बहकल। कबो झेलम आ पद्मा लेखा सरहदन में बँटत आ जुड़त। नरमदा आ साबरमती लेखा रूठत-मनावत। कबो कुआनो लेखा कुम्हिलाइल। कबो गोमती लेखा बेबस। कबो वरुणा लेखा हेराइल-सुतल। कबो गंगा लेखा त्रिवेणी में समाइल। हुगली लेखा मटियाइल आ घुटत। रोज-रोज ज्वार-भाटा सहत। कबो ई, कबो ऊ बन के। छोट-बड़ सगरी नदी के आपन बना के। सगरो दुख-दरद अपना में समेटले, सागर से मिले जात। हमार मन के धरती पर तूं लगातार बहत रहेलू। अतना हरहरात आ अतना तेज बहेलू कि हम ना तोहरा के सम्हार पावेनी, ना अपना के। तोहरा भीतर उतरेनी त अपना के चारु ओर पानी से घेराइल पावेनी। पानी के अइसन घन जाल खाली तोहरा भीतर के नदिए में मिलेला। कबो नाव से नदी के बीच धार में झम्म से कूद जाइल हमार खेल रहे। नदी के पानी जइसे सपना के दुनिया में बान्ह लेत रहे। पानी का भीतर से ओह घरी सबकुछ साफ लउकत रहे। बीच धार नदी के पानी में धरती ले पहुँचे के रोमांच लेके कूदत रहनी, बाकिर पानी चीरत कबो धरती ले ना पहुँच पवनी। बेचैन पानी हमरा के ऊपर ठेल देत रहे। मन अफनाए लागे। ओह अथाह जलराशि में हम अकेला पड़ जाईं। आज ले ना जान पवनी कि अइसन काहे होत रहे। बाकिर पल भर में पानी के जाल चीरत झटाक से हमार माथ बाहर आ जात रहे। जइसे पानी के सपनइल जाल से छूट गइल होखीं। फेर नदी में तइरत आ धार से लड़त एह भा ओह किनारा पर आ जात रहनी। ई हमार लगभग रोजे के खेल रहे। हमार आ नदी के मेल रहे। लोग आ नाव के मल्लाह रोकत आ बरजत रह जात रहे। बाकिर सपनइल पानी जइसे हमरा के बोलावत रहे आ हम नाव से बीच धार में झम्म से कूद जात रहनी। नदी के थाह ना मिलत रहे। केहू कहे—पचीस पोरसा पानी बा; केहू बीस त केहू पन्द्रह। एक पोरसा के मतलब एगो हाथी बराबर। माने सैकड़न फुट गहिर पानी में उतरे के ऊ रोमांच रहे। तोहरो थाह ना मिले। तोहरा के पाके त कहाँ पा पवनी! बाकिर तोहरा से जुड़े के रोमांच विरह के एह चिता में जरतो घरी महसूस करत रहत बानी।
बरिसन पहिले, जब पहिला बेर हवाई जहाज में बइठल रहनी त रोमांचित होत एगो सहयात्री बतवले रहे कि हमनी कम से कम बीस-पचीस हजार फुट के ऊँचाई पर बानी जा। अकास अतना ऊँच हो सकेला। एकरो से अधिका ऊँच हो सकेला। होखबे करेला—अनन्त! बाकिर नदी ना अतना गहिर होखेले, ना अतना चाकर। ब्रह्मपुत्र नदो ना, समुन्दरो ना। हेलीकाप्टर जरूर अधिका ऊँच ना उड़े। ऊ जइसे धरती से डेग मिलावत उड़े आ दोस्ती निभावत चलेला। सबकुछ साफ-साफ लउकेला—धरतियो आ धरती के लोग। हरियाली देख के त अइसन लागेला जइसे अभी-अभी गले लगा ली। तोहरा के देखते हम सोचत बानी कि गले लगा लीं। समुन्दर के लहर लेखा तोहरा के अपना में समेट लीं। बाकिर तूं त समुन्दर के बिसालता देख के डेरा जालू। तोहरा इयाद बा, समुन्दर के रास्ता में जब हमनी स्टीमर पर रहीं। बिहान होखे वाला रहे। पौ फाटत रहे। तूं खिड़की से बाहर झाँकले रहलू आ लोक-लाज छोड़ के हमरा से सटत सिहर गइल रहलू। हम मुसुकात पूछले रहनी—“का भइल?” “चारु ओर खाली पानिए-पानी बा। दूर-दूर ले कहीं कुछ नइखे।” तूं सहमत, अफनात आ आँख मूनत कहले रहलू। अइसे जइसे नान्ह लइकी बन गइल रहलू। जाने काहे, प्रेम होखे भा डर, आदमी के लइका बनाइए देला। बाकिर तोहरा भीतर उतरे के रोमांच! बेर-बेर उतरे के रोमांच!
ई रोमांच सैकड़न भा हजारन फुट गहिर उतरे के ना ह। ई अनन्त दिस जाए के रोमांच ह, जहाँ कवनो नाप नइखे। मन का भीतर उतरे के होला। आ तूं बाड़ू कि नदी के पानी लेखा हाली से छू के निकल जालू। अपना एह एक छुअन से जइसे हमरा के सुख से भर जालू। लागेला जइसे हम फेर नदी में झम्म से कूद गइल बानी—प्रेम के नदी में। तूं हमरा के छुअत बाड़ू आ हम डूबत बानी। जइसे उगत-डूबत सुरुज के परछाईं नदी में डूबत होखे। तोहरा भीतर के धरती हमरा के छुअत बिया।
बाकिर प्रेम के अतना सगरो अमृत पीयतो हमनी जानत रहीं कि बिआह से बाहर के प्रेमियन के कवनो पहचान ना होखे। एह साँच के हमनी दुनु जने जानत रहीं। एहसे अपना प्रेम के सीमा जानत रहीं। सभका सोझा अनचिन्हार बने के सुरंग में लुकाइलो जानत रहीं। परछाईं जइसे हमनी से आँख चोरा लेत रहे। प्रेम के उफान जइसे थम जात रहे। हमनी के प्रेम जइसे डेरा जात रहे। हमनी के प्रेमी चोर बन जात रहे। दुख-सुख में साथ रहतो हमनी साथ ना लउकत रहीं। लोकलाज के चद्दर में लजाइल रहत रहीं। हमनी मर-मर जात रहीं, बाकिर ना केहू हमनी के मरल देख पावत रहे, ना कवनो धुआँ। तूं तरसत रहत रहलू। हमार पल भर के छुअन खातिर सुलगत रहलू। आ ऊ छुअन मिलते, प्यार भरल ओह पल भर के छुअन से तोहार दुनिया सँवर जात रहे। तूं कवनो फूल से अधिका गमक आ मध से अधिका मिठास से भर जात रहलू। खूबे खुश हो जात रहलू। तोहरा खुशी के एह गमक में नहा के हम निछावर हो जात रहनी।
एही मिठास में जिनिगी गुजार दिहले बानी। जान निछावर बा। पूस के घाम में तोहरा रूप पर हम निछावर रहबे करीं। बाकिर अचानक का भइल कि तूं बदले लगलू? जाने कइसे प्रेम के नदी के किनारा, बल खात लहर आ कूदत-उछलत मछरी लेखा हमरा से हेराए लगलू। लागे कि बन्द मुट्ठी के बालू लेखा हमरा हाथ से फिसलत जात बाड़ू। चइत के चानी लेखा सुख आ रातरानी से गमकत रात लेखा प्रेम के पाग अब हमनी का बीच से बिसरात जात बा। जिनिगी के जंगल से सट के बहत हमनी के प्रेम के निर्मल नदी हमनी के नसीब से छूटत जात रहे। शायद जिनिगी के सड़क पर प्रेम के ट्रैफिक हमनी सम्हार ना पवनी। आज ले ना जान पवनी। ऊ दिनो रहे जब हम तोहरा के सुन्नर कहत रहनी आ तूं मगरूर हो जात रहलू। तोहरा के जिनिगी आ जिनिगी के सबसे बड़ अरमान कहत रहनी त तूं अकड़ के चूर हो जात रहलू। तोहरा के चान कहीं त चानी बन जात रहलू। जान कहीं त मदहोश हो जात रहलू। जिनिगी कहीं त चमक के समसेर बन जात रहलू। तूं हमार नशा बन गइलू। नदी के कवनो धार लेखा, सागर में मिले वाली कवनो नदी लेखा, हमार जिनिगी में समाए लगलू—बलुक समाइए गइलू। फूल आ गमक लेखा हमनी एक हो गइल रहीं। लागल कि प्रेम करके हमनी जग जीत लिहले बानी जा।
फेर का रहे! जब कबो तूं झूमत-झामत आवत रहलू त लागे कि बरखा के पहिल बूँद आवत बिया। मस्त हवा आ फूल के गमक लेखा आवत रहलू आ कवनो अबोध लइका लेखा हमार गरदन में दुनु बाँहि डाल के झूम जात रहलू। मन में प्यार के मौसम मचल उठत रहे। सगरो दुख मर जात रहे आ मन में रातरानी खिल जात रहे। गहिर झील में कवनो हंसिनी लेखा अपना परछाईं में उतरत चल जात रहलू। गउरइया लेखा फुदकत आ अचानक सुन्दरता के इन्द्रधनुष रचत हमरा पर छा जात रहलू। प्रेम के परबत लेखा जीयत, देवदार लेखा माथ उठा के जीयत, अपना देह-सरोवर में हमरा के डुबावत आ प्रेम के चानी खिलावत तूं का से का हो जात रहलू—ई तूं का जनबू भला! जइसे कवनो मेहरारू धीमा आँच पर खाना पकावेले, ओइसहीं तूं चाहत रहलू कि हम तोहरा से प्रेम करीं। तोहरा साथे प्रेम के इहे ढंग हमरा पसन्द रहे। हमरा साथे तूं माथ उठा के प्रेम कइल सीखले रहलू—दासी लेखा ना। प्रेम में बराबरी बहुते जरूरी बा। मेहरारू के दासी बना के ना ओकरा से प्रेम हो सकेला, ना सफल सम्भोग। प्रेम आ सम्भोग के सुख खाली बराबरी में सम्भव होला। ई बात बहुते कम मरद जानेले। एकतरफा सम्भोगे के प्रेम मान लेबे के मूर्खता मरदन के आम आदत ह। मेहरारुवन के ई पसन्द ना आवे, बाकिर ऊ लोग कह ना पावे। तुहूँ लोकलाज में फँस के अपना पति से कबो ई बात ना कह पवलू, बाकिर हमरा से कहत रहलू। हमरा से ई सब कहे में तूं कवनो बन्धन में ना रहलू। “दासी ना, तूं हमार प्रेमिका हउ”—हमरा से ई बात सुन के तूं भाव-बिह्वल हो गइल रहलू। लागल कि तूं का पा लऽ आ हमरा के का दे दऽ! दिहलूओ—आपन अथाह प्रेम। निरन्तर आ अलौकिक प्रेम। तोहरा लगे हमरा खातिर अथाह प्रेम रहे आ ऊ प्रेम तूं हमरा के दिहलू। तूं नइखू जानत—आज भले ना मिलेलू, ना बतियावेलू, बाकिर तोहार ऊ अथाह आ निष्कपट प्रेम हमरे लगे बा। एही भाव आ बिसवास से हमनी प्रेम के बीया के बिरिछ बनवले रहीं।
हमार बराबरी से मिलल तोहरा भावत रहे।
हम मेहरारू के गुलाम ना मानेनी, ई बात तोहरा नीमन लागे। तूं कहत रहलू—“भले हम प्रेम-बिआह कइले बानी, बाकिर प्यार हमरा रउरे से मिलल बा। बिआह से सम्भोग के सुख मालूम भइल, प्रेम के सुख ना। बाद में सम्भोग के ई सुखो खाली पतिए के हिस्सा में रह गइल। पति के आदेश आ पति के इच्छे सम्भोग बन गइल। हमार जरूरत का बा, हमरो कवनो इच्छा बा—ई पति के आज ले मालूम नइखे। हम मेहरारू ना, सम्भोग के एगो साधन बानी। पति खातिर सम्भोग के खिलौना बानी—बस।” तोहार इहे यातना शायद तोहरा के खींच के हमरा लगे ले आइल। तूं प्रेम कइलू आ चल गइलू। जइसे प्रेम से तोहार पेट भर गइल। बाकिर अपना प्रेम में हमरा के कैद कर गइलू। एह प्रेम के कैद में गिरफ्तार हम, तोहरा प्रेम के कचहरी में तोहार पैरवी करत, वकील लेखा ना बलुक मुलजिम लेखा पेश बानी।
बिजली जाले, आ जाले। नेटवर्क जाला, आ जाला। तूं काहे ना आवेलू?
काश, बीमा कम्पनी स्वास्थ्य लेखा प्रेमो के बीमा करत रहितीं आ हम कैशलेस क्लेम लेके आपन हेराइल प्रेम पा जइतीं! कई बेर सोचत बानी कि कहीं अइसन त नइखे कि जवना के हमनी मोहब्बत कहेनी जा, ऊ खाली एगो जरूरत भर ह? जरूरत पूरा, मोहब्बत पूरा। एहसे सच-सच बतइहऽ प्रिये—हम जरूरत रहनी कि मोहब्बत? सच बतइबू त बुरा ना लागी। काहे कि जे मेहरारू प्रेम खातिर अपना पिता आ पिता के घर हमेशा खातिर छोड़ सकेले, ऊ अगर प्रेम में बिया त पति के घरो छोड़ सकेले। अतना साहस त करिए सकेले। कि सगरो साहस खालिए पिता खातिर रहे? त का ई सचहूँ मोहब्बत रहे? मोहब्बत रहे कि जरूरत? लोग जरूरत के नाम मोहब्बत काहे रखेला, कुछ बुझात नइखे। जरूरत पूरा, मोहब्बत पूरा। जिनिगी के ई अजीब सिलसिला बा। तोहरा इयादे होई कि प्रेम खातिर हमार चुनाव तुंही कइले रहलू। खोजो तुंही कइले रहलू। शायद सम्भोग के सवाद बदले खातिर। प्रेम के पियास मेटावे खातिर। जवनो होखे, तुंही जानऽ। हम त बस तोहरा प्रेम के नदी के धार में अनायास समा गइल रहनी। जइसे नदी कंकड़, पाथर, हीरा आ मोती—सबकुछ अपना साथे बहा ले जाले, ओइसहीं हमहूँ तोहरा प्रेम-नदी के धार में बहत रहनी। अब तोहरा नदी के कवनो लहर हमरा के कवनो किनारा पर छोड़ के आगे बढ़ गइल बिया त एहमें हमार का दोष? प्रेम-नदी के किनारे आजुओ बहे के आस में एगो प्रत्याशी लेखा उपस्थित बानी। मन-ही-मन बहत जात बानी।
तूं नइखू जानत त अब जान लऽ—प्रेम महतारी लेखा होला। महतारी के दुलार कबो पूरा ना होला। प्रेम केहू के होखे, प्रेम कबो पूरा ना होला। समय-समय पर तोहरा साथे मिलल ऊ पंछी, ऊ कोइल, ऊ बिरिछ, ऊ बनस्पति, किसिम-किसिम के ऊ फूल, तुलसी के ऊ चउरा, ऊ बरखा, ऊ पुरवइया, ऊ घाम, ऊ चानी, आम के ऊ मोजर, ऊ पल्लव, बरखा में भींजत अँगना के ऊ दशहरी आम के पेड़ आ हरियर घास पर बिखरल गुलमोहर के ऊ फूलो तोहरा के कबो ना भुलइहें। ऊ मछरियो तोहरा के ना भुलाई, जे हमनी के एक दोसरा के देखत देख के नदी में छपाक से कूदल रहे। ऊ कोहरा, ऊ ओस के बूँद—सबका इयाद में तूं ठहरल बाड़ू। एह सबके इयाद में तूं बनल रहबू। ऊ नदियो भला तोहरा के कहाँ भुलाई, जवना पर बनल पुल पर ठाढ़ होके हमनी पूरनमासी के चान देखत रहीं। पूरनमासी के चान में जइसे हम आ तूं हमेशा खातिर दर्ज बानी जा। खाली हमहीं ना, ई सगरो तोहरा से प्रेम करेला। आ प्रेम केहू के होखे, प्रेम कबो पूरा ना होला। कबो ना।
हमार परेशानी देख के लोग-बाग पूछत रहेला—“का भइल?” हम लोगन के बतावत रहेनी कि एगो मेहरारू रहे, जे हमरा के जवान बनवले रखत रहे। ऊ हमरा के छोड़ के चल गइल। लोग हमरा पर हँसत निकल जाला। तोहरा इयाद बा, तोहरा के पावे के हड़बड़ी में कई बेर कार के लाइट बन्द कइलो भुला जात रहनी। लवटत घरी बैटरी डाउन हो गइला से कार स्टार्ट ना होखे त तोहरा के अकेले लवटे के पड़त रहे। तूं झुँझुआत लवटत रहलू। प्यार के सगरो हरसिंगार झर के बिखर जात रहे।
ओइसहीं हमहूँ बिखर गइल बानी—तोहरा बिना। जिनिगी के बैटरी डाउन हो गइल बिया। प्रेम के मछरी तड़पत बिया—तोहरा प्यार के पानी बिना।
(दयानंद पांडेय के लिखल हिन्दी कहानी के भोजपुरी अनुवाद)


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