बलेसरा काहें बिकाला
- दयानंद पांडेय

बलेसरा काहें बिकाला

– दयानंद पांडेय

जइसे कवनो नरम अउरी मीठ ऊंख होखे। एगो गुल्ला छिलनीं त पूरा पोर खुल जाव। कुछ वइसहीं मीठ, नरम अउरी फोफर आवाज़ बलेसरा के बा। आपन गमक, माटी के महक अउरी एगो खास ठसक लिहले। बलेसरा मतलब बालेश्वर।

आठवीं तक पढ़ल बालेश्वर के नाम आजु के तारीख में भोजपुरी लोक गायकी में शिखर पर बा। उनुकरे गायकी में कहीं त, ‘आजु बलेसरा बिकाला।’ एही बलेसरा से जब पूछलीं कि, ‘तू गायक नाईं होत त का होत?’ त ऊ बोललें, ‘खेती-मजूरी करतीं अउरी का होतीं?’ दरअसल असलियतो इहे बा कि बलेसरा के लोक गायकी के यात्रा सुविचारित नइखे रहल। ऊ छूटते कहेलें, ‘कवनो गुरू ना।’

त सीखनीं कइसे?

बस गावत-गावत।

अउरी शिष्य?

शिष्य मनबे ना करीं कवनो के। तबहियोा हमार गाना बहुते लोग गावेला।

‘फिरकापरस्ती वाली बस्ती बसाई न जाएगी / आडवाणी वाली भाषा पढ़ाई न जाएगी’ अइसन तल्ख गीत लिखे अउरी गावे वाला बलेसरा बचपन में गायकी के यात्रा शुरू कइलें नकल क-क के। ऊ कहेलें, ‘गाँव में शादी-ब्याह में, रामलीला, नौटंकी में गाना शुरू कइलीं। कलाकारन के कॉपी करे शुरू कइलीं।’

कवन कलाकारन के?

भोजपुरी लोकगायकन के। जइसे वलीउल्लाह रहन, जयश्री रहन। हम न सिर्फ इनकर कॉपी कइलीं, बल्कि कोशिश कइलीं कि इनकरा टीम में आ जाईं। पर ई लोग अपना टीम में हमरा के ना लेलस। लेकिन हम हिम्मत ना हरलीं। गाँवन के मंचन पर चंग बजा-बजा के अकेलही गावल शुरू कइलीं। पइसा कुछऊ ना मिलत रहल, खाली वाहवाही मिलत रहल। ज़िला पोस्ट मधुबन, गाँव बदनपुर में 1 जनवरी 1942 के जनमल बालेश्वर एह वाहवाहीये से खुश रहलन कि उनकर नाम होवे लागल रहल। बालेश्वर अपना गायकी के दौर नकल से शुरू ज़रूर कइलें, पर शुरूए से खुद के लिखल गाना गवलें। हालांकि ऊ एकरा के गाना ‘बनावल’ बोलेलें। उनकर बनावल गानन में तंज अउरी तल्खी तबो बोलत रहल। नतीजतन कई बेर मारो-पीट के नौबत आइल। ऊ बतावेलें, ‘हमरा गाँव में एगो बारात आइल। बारात के गाँवे वाला लूट लिहलें। एहपर गाना बनवलीं अउरी गावे लगलीं त गाँव वाला नाराज हो गइले कि गाँव के बेइज्जती करवावत बाड़ऽ। अइसहीं एगो डॉक्टर हमरा गाँव के एगो गजराज यादव के सुई लगवलस त ऊ मरते-मरते बचलें। बाद में पता चलल कि उनकर ज़मीन लोग फर्जी बैनामा करवा लेले रहल। एह साजिश पर गाना बनवलीं अउरी गावे लगलीं त जवार के ठाकुर लोग नाराज हो गइले। मार खाते-खात बचलीं। घर में दू-चार चोरी करवा दिहलें ई लोग, काहे कि ओहुं दिनन ठाकुरन के जुल्म के खिलाफ लिखत रहीं। हम अपना क्षेत्र के सामंतवादी ठाकुरन के आँखि के काँटा बन गइलीं। अब ओ लोगन के हम कइसे समझवतीं कि हम ठाकुर जाति के खिलाफ ना, उनका ज़ुल्म अउरी ज़्यादतीयन के खिलाफ गावत रहीं। लेकिन बात ज़्यादा बढ़ गइल। पर हमार सौभाग्य रहल कि तब्बे 1962 के चुनाव आ गइल। संयोग से मधुबन के पूर्व विधायक अउरी स्वतंत्रता सेनानी विष्णुदेव गुप्ता दोहरीघाट भेज देलें, सोशलिस्ट पार्टी के प्रचार करे खातिर। हम ओहिजा चुनाव के गाना बना-बना के गावे लगलीं। ओहीं कम्युनिस्ट पार्टी के झारखंडे राय हमार प्रतिभा के पहचनलें अउरी घोसी ले गइले अपना चुनाव प्रचार खातिर। ओहिजा झारखंडे राय के विजय खातिर गाना बना-बना के गावे लगलीं। झारखंडे राय जीत गइले त हमरो के अपना साथे लखनऊ ले अइलें। लखनऊ आके काफी भटकलीं। एने भटकाव रहल, ओने ठाकुरन के ज़ुल्म। हम लखनऊए में गली-चौराहन पर भटकल ठीक समझलीं। एने-ओने घूम-घाम के गावत रहीं। 1965 में आकाशवाणी लखनऊ में गावे खातिर इम्तहान दिहलीं, लेकिन फेल हो गइलीं। अनुभव ना रहल। हमार परेशानी बढ़त गइल। तब्बो एगो छोटहन नौकरी कर लिहलीं। गाना तबहियों ना छोड़लीं। बाद में सूचना विभाग के के. बी. चंद्रा बतवलें कि आकाशवाणी के इम्तहान कइसे दीं। फेरु दस बरस बाद दोबारा आकाशवाणी लखनऊ में इम्तहान दिहलीं त पास हो गइलीं। आकाशवाणी पर हमार बुलंद आवाज़ जब छा गइल त कई गो अउरीओ लोग मौका देवे के तैयार हो गइले। हरवंश जायसवाल सरकारी प्रोग्राम में हमरा से चार साल तक कार्यक्रम करववलें। अब कार्यक्रमन से पइसा त मिले लागल रहल, नामे-मात्र के सही, पर वाहवाही खूब मिलत रहल। अउरी हम खुश रहीं। बाद में रिकार्ड बनवावे के धुन समाइल।

दू साल ले एच.एम.वी. के मैनेजर जहीर अहमद दौड़वले रहन कि तोहार रिकार्ड बनाइब। ई 1978 के बात ह। लेकिन ऊ हमरा के कमज़ोर समझ के, वादा क के छोड़ देत रहलन। हरवंश जायसवाल के बहुत कहला पर कि बालेश्वर के एगो मौका दीं, रिकार्ड बिकाई; त जुलाई 1979 में एच.एम.वी. दू गो रिकार्ड बनववलस। एगो रहल ‘नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के’ अउरी दूसरका ‘बलिया बीचे बलमा हेराइल सजनी।’ 1980 में ई रिकार्ड बाज़ार में आ गइल। 1982 आवत-आवत हमार मार्केट हाई हो गइल। देश के कोने-कोने में प्रोग्राम होवे लागल। हमरा कार्यक्रमन में टिकट खातिर मार होवे लागल। हम हीरो हो गइलीं भोजपुरी लोक-संगीत के।

‘1988 में ‘पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद’ कलकत्ता के इनडोर स्टेडियम में ‘भोजपुरी सम्राट’ के उपाधि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल से दिअवलस। दिल्ली में अखिल भारतीय भोजपुरी गायक सम्मेलन में 1991 में पूर्व मंत्री के. के. तिवारी ‘भोजपुरी रत्न’ उपाधि से सम्मानित कइलें। एकरा पहिले 1990 में दिल्लीए में ‘बिहार प्रवासी मजदूर संघ’ हमरा के ‘भोजपुरी पुत्’र के उपाधि देले रहल। एकरो पहिले मई 1989 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति अउरी वर्तमान में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के साथे जर्मनी, हालैंड, सूरीनाम, गुयाना, दक्षिण अमेरिको घूमलीं।’

बात अब के चलल त बालेश्वर के कहल रहल, ‘अभी त स्टेज कार्यक्रमने से फुर्सत नइखे। वइसे स्टेज कार्यक्रमन के अलावा आकाशवाणी, दूरदर्शनो खातिर गाइला। अउरी एकरो से बेसी सुपर कैसेट्स के टी-सीरीज में गाइला। हालांकि एकरा पहिले एच.एम.वी. से अनुबंध रहल हमार, पर एच.एम.वी. रायल्टी देवे में देर कइलस त हम टी-सीरीज में गावे लगलीं। 1985 में एच.एम.वी. हमरा ऊपर अनुबंध तूड़े के मुकदमा क देलस, कलकत्ता उच्च न्यायालय में। अब ई मुकदमा टी-सीरीज वाला लड़त बाड़न हमरा ओर से।’ बालेश्वर के अब तक करीब 12 गो रिकार्ड अउरी 25 गो कैसेट बन चुकल बा। एने हर साल कवनो ना कवनो चार भा पाँच कैसेट आ जाला। दू गो किताबो उनका गानन के छपल बा।

‘बुलंदी पर होवे के बावजूद कैसेट बाज़ार में आवे के गति एतना धीमा काहे बा?’ पूछला पर ऊ बोललें, ‘हम वइसहूं कैसेट खातिर कम गाइला, एह खातिर कि स्टैंडर्ड मेंटेन रहे।’

अउरी साचो शायद इहे बा कि काल्ह के बालेश्वर अउरी आजु के बालेश्वर में काफी फ़र्क आइल बा, कई गो अंतर्विरोध जनमल बा। कई गो चीज़ बदलल बा। ठीक वइसहीं जइसे ऊ गाँव बदल दिहलें। अब उनकर गाँव बदनपुर, पोस्ट मधुबन, ज़िला आज़मगढ़ नइखे। अब उनकर गाँव ज़िला मऊ में कल्पनाथ राय रोड पर चचाईपार बा। पिता अर्जुन त अब जीवित नइखन। तीन भाइयन में एगो भाईओ ना रहलें, पर दोसरका भाई नगेसर नागालैंड में ठेकेदारी करेले। तीन बेटवन में दू गो नौकरी करेले – एगो सचिवालय में, दुसरका कोआपरेटिव बैंक में। तीसरका पढ़ रहल बाड़े आठवीं में। दू गो बहू, एगो नातिन, एगो नाती, भतीजा, भाई बाड़े परिवार में।

अउरी बलेसरा?

कबहीं शौकिया अउरी सिर्फ वाहवाही खातिर गावे वाला बलेसरा व्यावसायिकता के शिकार हो के अब बालेश्वर हो गइल बाड़न। अब ऊ नकल ना करेलें कवनो के, लोग उनकर नकल करेला। अपना बनावल अउरी गावल गानन में हालांकि अबहियों बालेश्वर ‘बलेसरा’ के बेचेले, पर बाड़न ऊ अबहियों बालेश्वरे।

1962 अउरी 1992 के बालेश्वर के फ़र्क सिर्फ इहे नइखे। बालेश्वर के गायकी के फलको अब विस्तार पउले दिखेला। ऊ कहेलें, ‘हमार दिमाग अब मंडल-कमंडल, मंदिर-मस्जिद के झगड़ा में अधिक लागेला।’ मंदिर मुद्दा पर बालेश्वर के ई गाना कुछ बेसिये ज़ोर पकड़ले बा: ‘मंदिर बनी लेकिन महजिद गिराई न जाएगी / आडवाणी वाली भाषा पढ़ाई न जाएगी।’ कुछ समय पहिले जब मिली-जुली सरकारन के दौर चलल रहल त बालेश्वर गावत रहन, ‘दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार न मिले / हिटलरशाही मिले मगर मिली जुली सरकार न मिले। मरदा एक ही मिले, मगर हिजड़ा कई हजार न मिले।’

आरक्षणो पर बालेश्वर स्टेजन पर ललकारेलें, ‘जिन्ना ने हिंदुस्तान पाकिस्तान का बंटवारा करा दिया / बुखारी आडवाणी ने मंदिर मस्जिद को लड़ा दिया / वी.पी. सिंह शरद यादव ने मंडल कमंडल खड़खड़ा दिया / पासवान काशीराम ने हरिजन और सवर्णों को जुझा दिया।’

बालेश्वर अपना अंतर्विरोधनो के नीकहा जानेलें अउरी सकारेलें: ‘कैसेट में श्रृंगार रस अउरी सामाजिक गाना गाइला। पर स्टेज पर राजनीतिक गाना ज़्यादा गाइला।’ ई पूछला पर कि कवना राजनीतिक पार्टी से संबंध राखेलें, बालेश्वर कहेलें, ‘न कवनो राजनीतिक पार्टी से हमार संबंध बा, न ही जातिवादी हईं हम। हालांकि जातिवाद आजु समाज में ‘ओवर’ हो गइल बा, खास कर के गाँवन में ई ठीक नइखे।’

बात उनकर रचनाकार पक्ष के चलल त ई अंतर्विरोधो ऊ बड़ ईमानदारी से सकार लिहले। पूछलीं उनुका से कि, ‘कवि सम्मलेनन में काहे ना जाइला?’ ऊ बोललें, ‘कवि सम्मलेनन में जाए के सोचिला त, बाकिर ईहो जानीला कि कवि सम्मलेनन में जाइब त फ़्लाप हो जाइब।’

काहे?

काहे कि बिना साज के अउरी टीम के हम गा नइखीं सकत। अउरी उहाँ अकेले गावे के पड़ी। एह खातिर कवि सम्मलेनन में हम ना जा सकीं। हालांकि लिखिला ओहे जे समाज में देखिला।’ फिर जइसे उनकर असंतोषो उभर आवेला, ‘हमार नीक बैकिंग चूंकि नइखे से कीचड़ में पड़ल बानी। एतना लिखे-पढ़े, गावे का बादो का मिलेला?’ ऊ पूछेले अउरी कहेलें, ‘भोजपुरी लोकगीतन के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कइलीं, पर पद्मश्री पा गइलीं शारदा सिन्हा।’ बालेश्वर ईहो जोड़ेले, ‘सरकार के ओर से हमरा के पुरस्कार मिलल असंभवो बा, काहे कि मक्खनबाजी के ढंग हमरा ना आवे। हमार गाना क्रांतिकारी बा, आलोचनात्मक बा। दलबदलुअन के खिलाफ लिखिला, त कौन नेता एकरा के पसंद करी? कवना पार्टी में दलबदलू नइखन?’

बात भोजपुरी गायक कलाकारन के चलल बा त बालेश्वर बिफरले, ‘भोजपुरी गाना गावे वाला कलाकारन पर सरकार के निगाह बिलकुल नइखे। कलाकार बहुत बाड़ें, पर पर्दा पर जे आवेला उहे कलाकार हो जाला।’ बालेश्वर सकारेले, ‘हमरो से नीक गावे वाला बाड़ें, पर उनुका मौके ना मिले। स्टेज प्रोग्रामन से फुर्सत मिले त ई सब बात उठाईं। उ.प्र. सरकार अबहीं ले भोजपुरी खातिर कुछ कइले नइखे। बाकिर हम भोजपुरी अकादमी गठित कइले बानी। हम एह अकादमी के संस्थापक अउरी सचिव हईं, जय प्रकाश शाही अध्यक्ष बानी।’

बालेश्वर बतावेले, ‘पंद्रह बरस पहिले तक भोजपुरी गावे वाला कलाकारन के बड़ हीन स्थिति रहल बाहर। लोग मजाक उड़ावत रहल, हमरो मजाक बनावत रहल लोग। पर अब अइसन नइखे।’ बतावत-बतावत ऊ फेरु पुरान बात पर आ गइल बाड़ें, ‘अबहीं तक विश्व में सभसे अधिक भोजपुरिया बाड़ें जे मेहनत करेले। पर दूरदर्शन के राष्ट्रीय कार्यक्रमन में भोजपुरी कलाकारन के मौका ना दीहल जाला। ई भोजपुरी के साथे अन्याय ह।’ बालेश्वर से हम पूछ लिहलीं कि, ‘का रऊआ के अइसन ना लागे कि अगर राउर पढ़ाई-लिखाई पूरी होत त रऊआ अउरी नीक रचना कर सकतीं?’ बालेश्वर लगभग बउरा गइले अउरी बोललें, ‘पढ़ाई-लिखाई पूरी अउरी बढ़िया होत, अउरी कि हम सवर्ण परिवार में पैदा भइल रहतीं त हम शायद बहुत आगे जइतीं। तब शायद उच्च कोटि के साहित्यकार होखतीं हम।’ ऊ बात फिर बदलेले, ‘तबहियो हमरा गर्व बा कि पिछड़ा वर्ग में रहियो के हम समाज के सारा बातन के ललकार के कहिला।’

ई टोकला पर कि, ‘अगर सवर्ण परिवार में पैदा होखते त का अइसहीं गा पवतें?’ सवाल सुन के बालेश्वर भकुआ जाँलन।

‘हाँ ईहो हो सकत रहल। हो सकत रहल कि तब ना गा पवतीं।’ फेरु ऊ जइसे सफाई देवे लागेले, ‘जाति-पाँति में हमार विश्वास नइखे। हम त सभका प्रोग्राम में जाइला।’

राजनीतिक अउरी सामाजिक तंज कसे, रचे अउरी गावे वाला बालेश्वर के गावल द्विअर्थी गानन के बात चलल त बालेश्वर बगल ना झँकलें। बोललें, ‘हँ गाइला। का बुरा बा? लोग सुनेला त गाइला।’ फेर ऊ खुद कुछ द्विअर्थी गानन के फेहरिस्त खोल बइठेले, ‘‘कटहर के कोआ तू खइबू, त मोटका मुअड़वा का होई’, ‘नैहरे में हो गई अधेड़’, ‘दारू बदनाम है, नशे में सारी दुनिया’, ‘कचहरिया में गोरी से पूछऽता सजनवा’, ‘जब खिलल कली से तू खेललऽ, अब लटकल अनरवा का होई’।’

फ़िल्मन में गावे के बात चलल त ऊ कहे लगलें, ‘फ़िल्मन में ट्राई करे के मौका ना मिलल। स्टेजे प्रोग्राम में एतना व्यस्त रहिला कि बंबई, दिल्ली के चक्कर ना लगा पाइला।’ फेर ऊ बतावे लगलें कि, ‘तब्बो सुजीत कुमार अपना भोजपुरी फ़िल्म ‘पान खाएं सइया हमार’ में हमरा से बिना पूछले हमार गावल तीन गो गाना हमरे आवाज़ में कैसेट से लेके इस्तेमाल कर लिहलें। एक त सभसे मशहूर गाना हमार, ‘बलिया बीचे बलमा हेराइल सजनी’ अउरी दूसरा ‘मोटका मुअड़वा का होई’, अउरी तीसरा ‘कजरवा हे धनिया’ गीत ले लेलें फ़िल्म में। पर ना त हमरा से पूछलें, ना पइसा दिहलें अउरी ना ही फ़िल्म में कतहूँ हमार नाम दिहलें।’

रउरा ऐतराज ना जतवलीं सुजीत कुमार से?

का ऐतराज जताईं? भोजपुरी के नाम पर संतोष कर गइलीं। हम त पिक्चरो ना देख पाइलीं। तबहिो फ़िल्म में हमार गाना उहे लोग हमरा कैसेट से लेहलें, एकर खुशी बा। बस अफसोस इहे बा कि पइसा ना दिहलें ना सही, नाम त दे देले होखतें। पर चलीं कवनो बात ना, अब कवन बवाल में पड़े। पब्लिक त जनबे करेलें कि ऊ हमार गाना ह।’ फेर ऊ एगो घटना सुनावे लगलें, ‘ई 1986 के बात ह। आसाम हम गइल रहीं। तिनसुखिया में बालेश्वर नाईट मनावल जात रहल। पर तिनसुखिया के आगे दुमदुमो में हमार नाईट रहल, हमरा के मालूमो ना रहल। बाद में पता चलल कि उहाँ कवनो नकली बालेश्वर पहुँचल रहल। लेकिन जब उहाँ के जनता ‘बलिया बीचे बलमा हेराइल सजनी’ के फरमाइश क देलस त ऊ नकली कलाकार हथियार डाल गइल। बोलल कि हम त बालेश्वर नइखीं, फेर त उहाँ कुरसी टूटे लागल। हंगामा हो गइल। टिकट लोगन के वापस भइल तब्बे शांति बन पाइल।’

बालेश्वर के टीम में पहिले पाँच लोग रहन पर अब बीस लोग बा। ऊ कहेलें, ‘माँग बढ़त गइल त टीम बड़ करे के पड़ल। बालेश्वर के टीम लोकगीत अउरी लोकनृत्य के 5-6 घंटा के कार्यक्रम बड़ आराम से करेले। ऊ भोजपुरी में बिरहा, कहरवा, सोरठी, लाचारी, झूमर, चैता, फगुवा, गारी, कजरी, विदेशिया आदि सभ तरह के गीत गावेले। राजनीतिक अउरी सामाजिक गाना इन दिनों उनकर स्टेज प्रोग्रामन में अनायासे छा जाला। आजकल ऊ नया गाना बनवले बाड़ें: ‘पैसा ये पैसा कैसा ये पैसा / पैसे के लिए सुख चैन बेच दिया। / कोई बेचे लोटा कोई बेचे थाली / हर्षद मेहता ने इंडिया का बैंक बेच दिया। / कोई बेचे बेटी कोई बेचे बहू / कृष्णमूर्ति ने पद्मश्री बेच दिया। / कोई बेचे मंदिर कोई बेचे महजिद / बालेश्वर ने बिरहा बेच दिया।’

बालेश्वर समकालीन भोजपुरी गायकन में हीरा लाल यादव, बुल्लू यादव, बेचन राम, परशुराम यादव अउरी बिहार के मुन्ना सिंह, रत्नेसर सिंह आ शारदा सिन्हा के नाम गिनावेले। नया भोजपुरी गायकन के चर्चा चलल त ऊ श्यामा यादव, प्रेमी प्रसाद, जे. डी. श्रीवास्तव, कुमारी सोना सिंह अउरी श्रीमती रागिनी पाण्डेय के नाम गिना गइले। अउरी बतावे लगलें, ‘एमें कुछ त हमार टीम में बाड़ें अउरी कुछ बाहरो बाड़ें।’ बात ही बात में ऊ कहे लगलें, ‘हमार लक्ष्य बा कि भोजपुरी अउरी अवधी लोकगीतन के डिस्को के होड़ में झंडा ऊँचा रहे।’

फेर बालेश्वर के नौकरी-चाकरी के बात चलल त ऊ टाल गइले। कहे लगलें, ‘नौकरी-चाकरी से अब का लेवे-देवे के बा।’

‘एगो प्रोग्राम के केतना लेइला?’ अइसन सवालो ऊ इनकम टैक्स के आड़ में टाल गइले। पूछलीं कि गाँव कब जाइला त कहे लगलें, ‘गाँव कभिये-कभी जाइला, छह महीना हो गइल। जब ओने के प्रोग्राम लागेला त ज़रूर जाइला।’

खेती-बारी?

खेती-बारी एगो भतीजा देखेला।

लखनऊ में दारुलशफा बी ब्लॉक के एगो गैराज में बइठकी जमावे वाला बालेश्वर के चाहे जेतना अंतर्विरोध होखे, ऊ चाहे जेतना बदल गइल होखन, बलेसरा से बालेश्वर हो गइल होखन, गाँवो भलही कभिये-कभार जात होखन, पर एगो बात ऊ अबहियों नइखन भूलाइल – ऊ ह चुनाव प्रचार। अउरी ऊ जेकरे चुनाव प्रचार में गाना गावेले, ऊ जीत जाला। फ़र्क बस इहे बा कि पहिले ऊ झारखंडे राय सरीखन के चुनाव प्रचार करत रहन अउरी अब कल्पनाथ राय जइसन के।

त का बलेसरा के बिकाए के राज इहे बा?

लेकिन बलेसरा के बिकाए के मर्म चुनाव प्रचार नइखे। ऊ त बिकाला हाड़ तोड़ मेहनत करे वाला मजूरन, मेहनतकशन अउरी खेतिहरन के बीच।

शहरी ड्राइंग रूमन के शोभा बलेसरा ना भइलन, ना सही। ऊ त खेतन के मेड़ पर, मेलन-बाज़ारन में, गाँव के गलियन में अउरी मद्धिम रोशनी वाला मटियारा घरन में मकलात, गावत-बजावत बानी- ‘समधिनिया का पेट जइसे इंडिया का गेट!’ बिलकुल मीठ नरम ऊँख नीअरा। पोर-पोर खोलत भइल एक ही गुल्ला में, ‘समधिनिया का बेलना झूठ बोलेला।’ भद्रलोक ना सुन पावे त ना सुने, बलेसरा त ‘रई-रई-रई’ करत भइल गाई, बिकाई अउरी ललकारबो करी- ‘फिरकापरस्ती वाली बस्ती बसाई न जाएगी / आडवाणी वाली भाषा पढ़ाई न जाएगी।’ बालेश्वर के गायकी के ई अंतिम बिंदु नइखे, बदलाव के कई गो पड़ाव अभी बाकी बा।

(बलेसरा काहें बिकाला साक्षात्कार के भोजपुरी अनुवाद)

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