भोजपुरी के गँवारू भाषा जनि बनाईं

भोजपुरी दू डेग आगे त हिंदी दू डेग पाछे
हिंदी के कुछ तथाकथित विद्वान एह घरी भोजपुरी पर आपन-आपन ब्रह्मास्त्र चलावे में लागल बा लोग। ऊहन लोग में ई डर समा गइल बा कि भोजपुरी के जहाँ संविधान का आठवीं सूची में जगह मिलल कि हिंदी सतनास के गइलि। उहाँ सभ के गणित विषय ढेर प्रिय हो गइल बा। बड़ा नीमन फर्मूला निकलले बानी सभे- “भोजपुरी दू डेग आगे त हिंदी दू डेग पाछे।” अतने ना, उहाँ सभ भोजपुरी के बोली” बतावे भर भी अध्ययन तनी ढेरे क लेले बानी ।
अब उहाँ सभके के बताओ कि जवन आजु मानक हिंदी बिया, तवन पहिले ‘खड़ी बोली’ रहे आ हाँ खा तक सधारन जनता में ‘खड़ी हिंदी’ का नाँव से जानल जात रहे। भारतेंदुओ युग में गद्य के भलहीं शुरुआत हो गइल रहे बाकिर कविता त काफी बाद में, ऊहो टुक-टाँइ टुक-टाँइ लिखाए शुरू भइल। हिंदी के ई सरूप बनल द्विवेदी बुग में, जबकि ओकरा पहिले तुलसी के अवधी, सर के ब्रजभाषा अउर कबीर के भोजपुरी आम जन में प्रतिष्ठित रहली सन। साँच त ई बा कि एहिजा भाषा विज्ञान के कवनो जरूरते नइखे, एहिजा इतिहासे के चरचा ईमानदार चरचा कहाई। हर भोजपुरिया का भीतर अपना राष्ट्रभाषा हिंदी खातिर अशेष सम्मान आ प्यार बाटे / भोजपुरी हमनी के मातृभाषा हटे। हिंदी के मजबूती का नाँव पर भोजपुरी के घवदाह कइल कवनों चल्हाकी के काम ना कहाई।
सर्वे का फार्मेट में बदलाव कराई
भोजपुरी के संविधान का आठवीं अनुसूची में रखवावे का विरोधी लोगन में प्रो. अगरनाथ जी के पहिल चर्चा होला। उहाँका भाषा आ साहित्य के विद्वान हई। उहाँके चिंता अंकगणित के लेके बा। हिंदी का मजबूती के चिंता कइल कवनो गुनाह थोरे बा ? ई त सभ में होखेके चाहीं। बाकिर एकरा खातिर भोजपुरी के विकास रोकल कहाँ से सही कहल जाई ? ई काम भोजपुरी का विकास के बेगर रोकलो त होइये सकऽता।
हम उहाँके एगो फेसबुक पोस्ट पर आपन टिप्पणी देले रहीं। हम लिखले रहीं कि सर्वे का वर्तमान स्वरूप से हिंदीभाषी के वास्तविक संख्या सामने नइखे आवत। अहिंदीभाषी क्षेत्र में भी हिंदी बोले-लिखे-पढ़ेवाला के नीमन संख्या बाटे। हिंदी देश के गर्व के भाषा ह। गाँधीजी आदि महापुरुष लोग आजादी से पहिलहीं एकरा के राष्ट्रभाषा मानि लेले रहन। संपर्क भाषा का रुप में भी भारत में एकर केहू सानी नइखे। वर्तमान में हिंदी के विराट रूप राष्ट्रभाषा के बाटे; एकर दरजा भारत सरकार के प्रथम राजभाषा के बा। हिंदी कवनो बड़हन भूभाग के मातृभाषा ना हटे, एहसे मातृभाषा वाला वर्ग में हिंदी के ना राखल जाएके चाहीं। एकर खातिर एगो अलग कॉलम होखेके चाहीं ताकि सभ भसन के मिलाके जवन संख्या बने, तवना में ई मति जुटो। खाली अतने बदलाव से कवनों मातृभाषाभाषी के संख्या कम ना होई आ हिंदीभाषी के वास्तविक संख्या सामने आ जाई। आजु देश के अधिकांश लोग अपना भाषा का साथे हिंदियों में संवाद करऽतारे, एहसे एकर जरूरत पक्षपातपूर्ण भी ना कहाई।
हमरा एह आशय के टिप्पणी पर केहू के कवनो प्रतिक्रिया त ना रहे बाकिर कुछ दिन का बाद अमरनाथ जी के अगिला पोस्ट में एह आशय के एगो प्रस्ताव भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता से पारित करववला के आइल रहे। एकरा बादो आजु जब एह संदर्भ में नकारात्यक टिप्पणियन के बाढ़ि लउकऽतिया त चिंता होता।
ध्वनि आधारित वर्तनी
सोशल साइट पर बीच-बीच में भोजपुरिया लोगन के व्यंगो पढ़े के खूब मिलेला। कुछ लोग त ओह लोगन खातिर गारियो देबे खातिर उतारू हो जालन, जे उनका भाषा में तनिको दोष निकालि देले होखे। माने भोजपुरी एगो अइसन भाषा ह, जवना खातिर पढ़ल-लिखल बिलकुल जरूरी नइखे, जवन मन करे, जइसे-तइसे लिख दीहीं। ऊहे करेक्ट आ ऊहे परफेक्ट। जो एकरे के यही मानि लिहल जाउ त सहजे में भोजपुरी का स्तर के आकलन कइल जा सकऽता। फेर एकरा खातिर अतना ढंढ-कमंडल बन्हला बिना कवन अकाज बा भाई ?
वर्तमान में गईल, नईखे, कईसे आदि शब्दन के भरमार लउके लागल बा। अलग-अलग क्षेत्रन में कुछ शब्दन के रूप अलग बा; ओकर प्रयोग एक हद तक जायज बा, बाकिर जवना शब्दन के वर्तनी ओकरा ध्वनि का अनुरूप नइखे, ओकरा प्रयोग के उपयुक्त कइसे मानल जा सकऽता? बलाघात का कारन गइल, गइलऽ आ गऽइल के अलग-अलग ध्वनि मिलेले बाकिर गईल, नईखे, कईसे आदि के ध्वनि कतहीं नइखे। एहिजा ‘इ’ (हस्व) के प्रयोग ठीक रही। मानकीकरण का राहि में भोजपुरी भलहीं ढेर डेग आगे ना बढ़ल होखे, बाकिर नीमन त ईहे होई कि भोजपुरी शब्दन का ध्वनि के महसूस कइल जाउ आ ओकरा खातिर सही वर्तनी के प्रयोग कइल जाउ। हम अन्य संपादक लोगन से भी अनुरोध कइल चाहबि कि ध्वनि का आधार पर जो वर्तनी सही नइखे लागत त ओकर के जरुर संपादित कइल जाउ आ गाहे-बेगाहे एह आशय के कुछ लेख आ टिप्पणी भी प्रकाशित कइल जाउ।
भोजपुरी के गँवारु भाषा जनि बनाई
भोजपुरी के गँवारु भाषा बनावे प उतारू लोगन से भी हमय बहुत शिकायत बा। बोली से भाषा तक पहुँचे में भाषा के (मोटामोटी) एकरूपता काम आवेले आ ओकरे कारन मानकत्व मिलेला, हालांकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर का भसन में भी ई गुन नइखे मिलत। बाकिर, एह दौरान जबन बात सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होले ऊ ह “भाषा के स्तरीयता का प्रति सचेष्टता”। लगातार लागल रहे के परी एह पुनीत कार्य से; एकय सङहीं समय का सङहू चलेके परी। वक्त का प्रवाह से भाषा का प्रवाह के अलग नइखे कइल जा सकत। लोकप्रिय आ सहज आगत देशी-विदेशी शब्दन के अपनावल भी ओतने जरूरी बाटे ना त भाषा से सहजता गायब हो जाई। समय का साथ चले में कई गो चीजन के छूटि जाए के खतरा भी रहेला बाकिर ओतना मोह त बाद क के चलहीं के परी। एहसे सहज बोलचाल में आ रहल अलग भसन का शब्दन पर नाक-भौं मति सिकोरीं। भाषा के गँवारू बनावे खातिर कोपभवन में मति चलि जाई। जब ढेर लिखाए आ बोलाए लागी त कई गो शब्द आपन रुप बदलि दीहें स। इंतजार कइल जाउ। हमनी के ज्यादा से ज्यादा ध्यान लिखे आ बोले पर रहेके चाहीं।
कर्टसी आ संवेदना
भोजपुरी का प्रति प्रेम सोशल साइट आ धरना-प्रदर्शन में त खूब लउकऽता बाकिर जब केहू पुस्तक आ पत्रिका मुफ्त में आ आपन डाको खर्च लगाके भेजऽता, तबो भोजपुरी के अधिकांश सम्मान्य जन पावतियो के एगो शब्द ना लिखऽतानी ना सुनावऽतानी, प्रतिक्रिया लिखल त दूर के बात बा। भोजपुरी संस्कृति के जीएवाला लोग में कर्टसी आ संवेदना के लगातार बढ़ रहल अभाव चिंताजनक बा। साहित्यकार आ संपादक लोगन से जब हमार बात होला त अक्सर ई मुद्दा उठ जाला आ ‘खेद प्रकट’ आउर संतोष का सङे मन का कोठिला में बन्र हो जाला। जरुरी बा एह खतरनाक स्थिति पर सोचल। अइसन काहें होता? अउर संदर्भन में लोगन में कर्टसी के अभाव नइखे लउकत, खाली भोजपुरिए में ई बेमारी आपन पाँव ढेर बढ़ा रहल बिया। ई अनदेखा कइल ह आ एकरा मूल में अहंकार से लबालब समाजनिरपेक्ष व्यक्ति के अहंकार काम करेला। किताबि भा पत्रिका रउरा थले घटिया भा अनस्तरीय लायल होखे, एक बेरि फ़ोन उठाके त बोलि दीं कि मिल गइल, ना रिस्पांस मिले त मैसेज कर दीं, अतना से रउरा अनलिमिटेड पैक के एको पइसा के नुकसान नइखे होखे जात। अतने से ओह लेखक भा संपादक के कम से कम उत्साह त बढ़ि जाई। ई इग्नोर करेवाला रवैया भोजपुरी का विकास में कतना सहयोगी बनी, ई त भविष्ये बताई ।
चलत-चलत एगो प्रस्ताव –
ष आ श के प्रयोग
जहँवा हिंदी का शब्द के प्रयोग अपरिवर्तित रुप (बिना विभक्ति-प्रत्यय) में होखे, ओहिजा ‘ष’ आ ‘श’ के ग्रयोग करेके चाहीं। उच्चारण में असहज प्रयोग का बादो इन्हनी से बनल शब्द अबहिंयो हिंदी में ओसहीं बनल बाड़न। उदाहरण खातिर ‘हिंदीभाषी भी’ आ ‘हिंदियोभासी’ – दूनो पद सही बा बाकिर हिंदीभासी भा हिंदी भासा के प्रयोग ठीक ना रही । ई मत भूलल जाउ कि सभ भोजपुरीभापी अपना सहज रूप में अब हिंदीभाषी भी (हिंंदियोभासी) बाड़न। अपना के बिल्कुल अलग देखावे खातिर दू-दू गो शब्द दिहला से अगिला पीढ़ी भ्रम में आके गलत प्रयोग के शिकार हो सकऽतिया। हमनीके मए मेहनत उहनीके सँवारे खातिर होखेके चाहीं; बिगारे खातिर ना।
ङ के प्रयोग
हिंदी में ‘ङ’ के प्रयोग बिना स्वर के आ खाली अनुस्वार का रुप में बा। भोजपुरी के ई सौभाग्य बा कि ओकरा में ‘ङ’ के प्रयोग स्वर का सङहू बा – जइसे – महङ, महङा, महङी, बहङी, महङू, महङे, महङो। रउआँ लाख चाहबि बाकिर महँग, महँगो, बहँगी आदि में भोजपुरी माटी के ध्वनि ना मिली। एहसे हमार आग्रह बा कि अपना एह थाती के अनदेखा मति कइल जाव आ लेखन में एकर सहज प्रयोग कइल जाव। एही तरह के कुछ सहज प्रयोग भोजपुरी के अलग पहचान खातिर बाद में आधार स्तंभ होइहें स। भाषा में कबो-कबो संकट के स्थिति आ जाले। अब जो ‘सवाङ’ के ‘सवांग’ लिखबि त शवांग के बिंब त आइए नु जाई मन में! अइसहीं, संस्कृत के ‘षडानन’ का तर्ज पर हिंदी में ‘षड़ानन’ लिखबि त उच्चारण त ‘सड़ानन’ नियन होइबे करी। कम से कम एह जुगुप्सा मिश्रित हास्य से त हमनी के बाँचहीं के चाहीं। ‘सड़ानन” ना कहिके निकटस्थ (आ अवधी में भी स्वीकृत) उच्चारण (खड़ानन) त कइले जा सकऽता।
भोजपुरी भाषा, साहित्य आ संस्कृति का बढ़ंती खातिर आस लगवले शुभकामना करत,
रामरक्षा मिश्र विमल

0 Comments