तीज के पारन
- डाॅ. रामरक्षा मिश्र विमल

सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-58

आइल भोजपुरिया चिट्ठी

तीज के पारन

काकी के छोटका नतिया आजु भोरे-भोरे जब से अपना माई के तीज के पारन करत देखलसि, तबे ले ओकरा खुदबुद्दी नधले रहे। ऊ अपना मइया से कुछ पूछे खातिर उनुका के घोरवटत रहे। पलखत पावते ऊ काकी से कुछ पुछे के चहलसि, तबहिए लभेरन चहुँपि गइले। तबो ऊ आपन सवाल दागिए दिहलसि- “मइया, तीज के पारन आँचर में जव के सतुआ आ गुड़ लेके काहें कइल जाला?” ई सवाल बड़को नतिया के सही लागल। ऊ ओहमें जोरलसि- “जब नहा-खा का दिने पूआ-पूड़ी आ पेड़िकिया बनेला आ सभ खूब मन से खाला त पारन का बेरी सतुआ काहें?”

काकी कहली- “हम अपना पुरनिया लोगन के अइसहीं करत देखले बानी। हम बस अतने जानतानी। एकरा से जादा लभेरने बतइहें।” अब त सभकर निगाह लभेरन पर। लभेरन बतावे लगले। “असल में एकर कवनो शास्त्रीय विधान नइखे कि का खाइके पारन करे के चाहीं। जगह-जगह का लोकाचार में अलग-अलग बाटे। तीज के पारन का बेरा आँचर में जव के सतुआ आ गुड़ लेके पारन करे के परंपरा बिहार आ पूरबी उत्तर प्रदेश का कुछ इलाका में आजुओ चलन में बाटे। हमरा खयाल से एकरा पाछा स्वास्थ्य संबंधी चिंतन रहल होई।

तीज का बरत में मेहरारू लोग दिन-रात निर्जला रहेली। बरत टुटला का बाद शरीर के अइसना आहार के जरूरत होला जे पेट खातिर हलुक होखे आ जल्दी ऊर्जो देउ। जव के सतुआ पचे में आसान होला आ पौष्टिको होला। गुड़ शरीर के तुरंत ऊर्जा देला। लागता एही से जव का सतुआ आ गुड़ से पारन करे के परंपरा शुरू भइल होई। ओइसहूँ सतुआ खइला से तिले-तिले पियासो लागत रहेला, एहसे ई व्यावहारिको लागता।

अब सवाल बा कि ओकरा के आँचर में काहें लीहल जाला। आँचर में सतुआ आ गुड़ लेके पारन कइल खाली खाए के तरीका ना हटे। भारतीय लोकजीवन में नारी का आँचर के संबंध अन्न, गृहस्थी, मातृत्व आ मंगल से जोड़ल गइल बा। तीज खुद पार्वती जी का तप, पति-पत्नी के मंगल आ सौभाग्य से जुड़ल बरत हटे। एह में पारन का समय आँचर में अन्न के प्रतीक जव आ मिठास के प्रतीक गुड़ लेबे का परंपरा के लोकमानस में अने-धने भरल रहे में आ जीवन में मिठास का मंगलकामना से जोड़ के देखल जा सकेला।”

छोटका नतिया के जिग्यासा अभी पटाइल ना रहे। ऊ फेरु पुछलसि- “ई बरत काहें खातिर आ कइसे कइल जाला?”

लभेरन समुझवले कि सनातन धर्म का परंपरा में संतान खातिर जिउतिया आ पति का लामी उमिरि खातिर तीज के बहुत भारी महातम बा। तीज सोहागिन मेहरारुन खातिर सभ ले बड़ आ कठिन बरत मानल जाला। ई बरत पति का लामी उमिरि, नीमन स्वास्थ्य आ अखंड सौभाग्य खातिर कइल जाला। तीज पति साल भादो महीना के अँजोर का तृतीया तिथि के मनावल जाला। बरत से एक दिन पहिले नहा-खा का दिने साँझि खा मेहरारू लोग पूड़ी, पूआ, पेड़िकिया खाइके अगिला दिने बिना पानी पियले उपास रहिके बरत राखेली। साँझी खा बालू भा करइठ माटी से भगवान शिव के पार्थी बनाके पूजा करेली। सङे-सङे माता पार्वती आ गणेशो जी के बिधिवत पूजा कइल जाला। पूजा के बेरा तीज के कथा सुनल जाला। रात भर भजन-कीर्तन गवाला आ अगिला दिने कवनो नदी भा पोखरा में पार्थी के दहा दिहला का बाद पारन कइल जाला।

अबकी मझिला नतिया तीज के कथा कहे खातिर निहोरा करे लागल। तब लभेरन सुनावे शुरू कइले।

कहल जाला कि माता पार्वती बचपन से भगवान शिव के अपना पति का रूप में पावे के चाहत रहली। एकरा खातिर ऊ हिमालय पर बहुते कठिन तपस्या कइली। ऊ कई बरिस ले खाली हवा पी के आ सूखल पतई खाके घोर तपस्या में लीन रहली। माता पार्वती का एह कठिन तप के देखि के उनुकर बाबूजी राजा हिमालय बहुत चिंतित हो गइले। ओही घरी महर्षि नारद राजा हिमालय भीरी अइले आ कहले कि भगवान बिष्णु पार्वती जी से बियाह कइल चाहतारे। राजा हिमालय ई बात सुन के बहुत खुश भइले आ बिष्णु जी से बियाह के बात पक्का क दिहले। जब पार्वती जी के एह बात के पता चलल त ऊ बहुते दुखी भइली, काहें से कि ऊ त मने मन भगवान शिव के आपन पति मान चुकल रहली। पार्वती जी अपना मन के बेथा अपना सखियन के बतवली। ऊ सखी पार्वती जी के बचावे खातिर उनुका के हरण क के घनघोर जंगल का एगो गुफा में छुपा दिहली स। सखियन द्वारा ‘हरन’ कइला का कारन एह बरत के नाँव ‘हरितालिका’ परल। जंगल का ओही गुफा में भादो सुदी तृतीया के माता पार्वती बालू के पार्थी बनवली आ रात भर निर्जला रहि के भगवान शिव के कठिन पूजा-अर्चना कइली। पार्वती जी का एह कठोर तपस्या आ अटूट प्रेम से परसन्न होके महादेव परगट भइलीं आ उनुका के पत्नी रूप में स्वीकार करे के बरदान दिहलीं। बाद में राजा हिमालयो शिव-पार्वती के बियाह धूमधाम से करा दिहले। तबे से ई मान्यता बाटे कि जे मेहरारू ई बरत राखेली, उनुकर सोहाग शिव-पार्वती जइसन अमर रहेला।

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